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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 29 प्रत्येनीक अलंकार पीछे     आगे

 
लक्षण (लावनी) :-
जब केहु अपना बली शत्रु पर बदला चुका न पावेला।
तब बैरी का अब्बीर सम्बचन्धी पर बैर सधावेला॥
अलंकार तब प्रत्य नीक कवि जन का उहाँ भेंटात हवे।
केहु का हेतूत्प्रेतक्षा का भीतर ऊ बन्दट बुझात हवे॥
 
उदाहरण (लावनी) :-
पर्वत और पेड़ ई दूनूँ ना तनिको चलि पावेला।
एही से ई दूनूँ सब दिन नग या अचल कहावेला॥
पर्वत बयारि के राह रोकि के आगे बढ़े न देत हवे।
आ बयारि का पानी के भी बल पूर्वक ले लेत हवे॥
एसे बेयारि का मन में परबत बैर भाव उपजावेला।
लेकिन ओकर बश तनिको परबत पर ना चलि पावेला॥
तब बयारि नग जानि पेड़ के आपन बैर सधावेला।
सब डाढि़ पाति तूरेला या जरि से उखाडि़ भहरावेला॥
सिर गणेश जी के जोरे के चारू ओर जोहाइल।
तब कवनों हाथी का बच्चा के सिर काटि जोराइल॥
तब से देवतन का साथे हाथी के बैर बन्हा इल।
तब बैर सधावे के उपाय हाथी के मन में आइल॥
सजी देवता के निवास पीपर में सदा रहेला।
ई बात सजी हिन्दूा आ उनके धर्म स्प ष्टr कहेला॥
देवता लोगन पर जब हाथी बैर सधा ना पावेला।
अत: पीपरे जोहि-जोहि के डाढि़ पाति भहरावेला॥
अत: कुंजरासन पीपर के एगो नाम कहावेला।
आ बड़ा चाव से धीरे-धीरे ओकर भोग लगावेला॥
 
सार :- बेटहा समधी लूट मचावे किंतु न ऊ पकड़ाला।
बदला में बेटा उनके मड़वा में बान्हवल जाला।
पण्डित और हजामिन बेटिहा तीनूँ तब बिटुराला।
हाकिम आ पेसकार अर्दली अस त्रिमूर्ति बन जाला।
पोथी का अनुसार दण्डल , तब बर के उचित दियाला।
भारी एगो बोझा कसि के वर के सिरे धराला।
ऊ बोझा बर का जिनगी भर ढ़ोवे के परि जाला।
बेटहा समधी और बराती उहाँ पहुचि ना पावें।
वर अकेल का करें उहाँ निज के चुप चाप बन्हालवें।
बेटिहा के सब अन्नह बराती लोग कचरि के खाला।
लेकिन ओ लोगन के कुछऊ ना कबे दियाला।
साथे रहला गुने अन्यऊ पर खीसि उतारल जाला।
कि बिना जियाने बाजा उहवाँ बारम्बाखर पिटाला।
पिता मृत्युा सुनि अश्वरत्थाामा बहुत दुखी जब भइले।
पाण्डमव लोगन पर बैर सधावे के निश्चाय तब कइले।
लेकिन पाण्डाव लोगन से जब बैर सधा ना पवले।
तब उनके पाँच जने लरिकन के सूतल पाइ मुववले।
दांत काटि के मरिचा के जब कई टूक टुकियावेला।
किन्तुा दाँत पर मरिचा के वश ना तनिको चलि पावेला।
तब दाँतन के निकट पड़ोसी निबल जीभि पर आवेला।
और जीभि के जी भर जोर लगा के खूब जरावेला।
दुओ हाथ मिलि के पाकल केरा के छाल उतारेला।
और अनादर से ओके धरती पर कहीं पावरेला।
ऊ छाल दुओ हाथन का प्रति निज मन में बैर बसावेला।
किन्तुद हाथ का पास पहुँचि के बैर सधा ना पावेला।
अत: हाथ का साथी पगु पर आपन बैर सधावेला।
अवसर पा के पगु बि‍चिला के बइसन कबें गिरावेला।
कि तन के हड्डी एकाध तूरेला या छटकावेला।
आ उनके जीवन भर खातिर लंगड़ लूल बनावेला।
गुरु वशिष्ठ जी जब निषाद के सखा राम के जनले।
तब उनके कोरा उठाइ के मिलले छूत न मनले।
जब हनुमान राम के किंकर अपना के बतलवले।
तब आसन से उठि भरत प्रेम से उनके हृदय लगवले॥
 
दोहा :-
नया मित्र के शत्रु आ रिपु के मित्र पुरान।
बालि बधे के राम का कारण मिलल प्रधान॥
पवन सँघतिया अगिनि के पवन पुत्र हनुमान।
अत: जरवले पोंछिना मित्र पुत्र पहिचान॥
हारल थाकल देखि निज मित्र पुत्र हनुमान।
अइले गिरि मैनाक तब बनि विश्राम स्थाान॥
कम दहेज पर होत जब सास ससुर अति रुष्ट‍।
जियत पतोहू फूँकि के होत तनिक सन्तु्ष्ट।॥
छात्र झुण्डफ प्राचार्य पर पावत करि न प्रहार।
तूरि मेज कुर्सी सजी फाटक देत उजार॥
लाठी देखि पुलीस के छात्र समूह पराय।
बस के सीसा तूरि के आगी देत लगाय॥
फूलन देवी पुलिसका रहे न आवति हाथ।
खीसि उतारे पुलिस तब घरवालन का माथ॥
पूजा जब ना इंद्र का मिलत अत: रिसियाइ।
अधिक सुखारि दहारि से फसिल देत निहसाइ॥
* * * *
शिव जी सदा राम जी कुछ दिन सिर पर जटा सजवले।
लेकिन दाढ़ी मूँछ कबें ना एको जने रखवले॥
दुओ जने पर दाढ़ी मूँछ अत: बहुते रिसियइली।
लेकिन बली जानि उनसे ना बैर सधावे गइली॥
पर उनके कुछ भक्तै लोग अपना से अबर बुझाइल।
ओही सब का ऊपर आपन बैर पुरान लियाइल॥
उनका मुँह पर बढि़ के कब्जान पूरा गइल जमावल।
मनो पेट आ छाती पर बा खस के टाट लगावल॥
हनूमान के सीता जी जब भक्ते राम के जनली।
तब उनसे बतियवली उनके पुत्र आपने मनली॥
रिपु के मित्र मित्र के बैरी राम बालि के जनले।
अत: बालि बध बहुत जरुरी रामचंद्र जी मनले॥
 
सवैया :-
सुरलोक में इन्द्रा के राज हवे जनि पूजल जाले इहाँ अब भू पर।
चलि पावल ना उनके कि छउु मुनि गौतम आ ब्रजराज ए दू पर।
धरती पर खीसि निकाले के बज्र गिरावें कि जा के गिरो ऊ किछू पर।
चरितार्थ करें ऊ कहाउति ईहे कि सौति के खीसि कठौती का ऊपर॥
* * * *
बेटहा जब आपन दल बिटोरि बेटिहा के लूटे आवेला।
तब बेटिहा का घर का नियरे ऊ डेरा कहीं गिरावेला॥
कुक्कुिर नीयर बरात के उहवाँ कवरा खूब खियावेला।
आ बर के इहवाँ माड़ो में बिलकुल अकेल जब पावेला॥
ई लूट के बदला तब लेबे के अवसर आपन जानेला।
तब बर का गर में भारी एगो जियता पत्थार बान्हेoला॥
ई जियता पत्थमर दिन पर दिन संख्या‍ में बढ़ते जाला।
आ बर का माथा पर ई सगरे बोझा चढ़ते जाला॥
समधी बनि के जे लूटल ऊ कुछ दिन पर स्वलर्ग सिधावेला।
आ बेटा ई बोझा ढोवत में आपन उमरि बितावेला॥
अर्थात बाप का करनी के फल बेटा सब दिन ढोवेला।
या बाप करेला सउनन ऊ सब लादी बेटा धोवेला॥
सौती के खीसि कठौती पर मेहरारू लोग सधावेला।
ए अलंकार के नाम कवित में प्रत्यागनीक कहावेला॥
 
प्रतीप अंलकार
लक्षण :-
उपमान कहीं उपमेय बने , उपमेय कहीं उपमान कहात बा।
अपमान करें एक दूसरा के , कतहीं दुओ के दहे कर्म लखात बा।
उपमेय कहीं उपमान के व्यखर्थ बतावत में तनिको न लजात बा।
एतने उलटा पलटा कइला से प्रतीप के पाँच प्रकार सुहात बा।
 
वीर :- जहँ उत्क्र्ष बढ़ावे खातिर उमपा के क्रम बा उलटात।
कथ्य अकथ्य बीर दुइ बाजें तहवाँ पाँच प्रतीप कहात॥
उदाहरण (दोहा) :-
बा देवी जी इन्दिरा का सिर पर जब ताज।
तब फूलन मलखान बिनु बाटे कवन अकाज॥
 
सवैया :- जनि फूलन गर्वकर जग में तोहरे अस इन्दिरा जी जस पावें।
उनहूँ के धरे के जे यत्न करे उनके धइ माटी में माटी मिलावें।
अँगुठा हथवा के दिखा दिहलू सबके तोहके जे धरे बदे आवें।
अब हाथ के बात चलावो के इन्दिरा जी अंगुठा चरनों के देखावें॥
 

 

पहिला प्रतीप
लक्षण (दोहा) :-
जगह जहाँ उमपेय के छेंकि लेत उपमान।
उहवाँ प्रथम प्रतीप के मानल जात स्थांन॥
कथ्य अकथ्यक परस्पंरऽ बदलत जहँ निज स्था/न।
जस के तस रहि जात बा दोउ के दशा समान॥
पहिला भेद प्रतीप के उहवाँ मानल जात।
उपमे के ई भेद हऽ साँच कहीं यदि बात॥
 
वीर :- प्रथम प्रतीप जहाँ चलि आवे केवल उपमा क्रम उलटात।
कथ्य अकथ्यथ दुओ के कुश्तीे जोड़ बराबर में रहि जात॥
उदाहरण (सवैया) :-
कुहरा में कई दिन सूर्य न दीख परें परि जात प्रभा अति मंद बा।
भँवरा परि कंज का कोष में राति बितावत हो के उहाँ निसपन्द बा।
अति शीत से पीडि़त पंकज भी परि पाँक में जीयत हो के अनंद बा।
तवने तरे फूलन भी चुपचाप ए साइत जेल का भीतर बंद बा।
हमरे अस होके हुमायूँ कबे जियले जिन शान्ति से बैठि न पौले।
रहले हमरे अस औरंगजेब जे गायक लोग के मारि भगौले।
तुगलक मुहम्म द भी अस हो के न ठीक से राज चलौले।
मियाँ जाफर भी रहले हमरे अस जे जग में बदनाम उठौले॥
रहले हमरे अस राजनारायण जे अपना के कहीं न खपौले।
रहले हमरे अस जै परकास जे जीवन लक्ष्यी बिहीन बितौले।
रहले हमरे अस चौधुरी जी तब अन्तल में आपन जाति चिन्हौेले।
भइले कृपलानी कबें हमरा अस जे घर छोडि़ छवौले॥
 
सोरठा :-
रण कौशल दिखलाय फूलन ज्योंs बन में छिपे।
चपला चमकि लुकाय तइसे जा के मेघ में॥
 
दूसरा प्रतीप अलंकार
लक्षण (सोरठा) :-
उपमाने उपमेय बनत द्वितीय प्रतीप में।
कथ्य होत अति हेय असली हो अथवा नया॥
 
तोमर :-
उपमेय कुश्ती खात। दूसर प्रतीप कहात॥
दोहा :-
उपमाने उपमेय बनि होत अनादर जोग।
दोसर भेद प्रतीप के उहाँ कहत कवि लोग॥
उदाहरण (दोहा) :-
हे फूलन तू मान प्रिय अपने के मति मान।
जग में केतने लोग बा देत मान पर प्रान॥
हम का करीं बिषाद हिय फाटल देखि बेवाई।
फटे सदा ईर्ष्यादलु हिय पर धन देखि सिहाइ॥
सवैया :-
जनि फूलन गर्व करऽ एतना कि बड़ा लुटलू धन दस्यु॥ कहाई के।
कुछ लोग बा लूटत लाख गुना जन सेवक के कुरुसी हथियाई के।
दरहीं पर बैठल ऊ सब लूटत लूटत तू सदा भागि पराइ के।
मन ना पतियाय त आँखि से देखि लऽ दिल्ली में या लखनौवे में जाइ के॥
 
धनवान करें न गुमान कबे लखि के अपना धन के अधिकाई।
बरखा रितु में तनि आँखि उघारि निहारि लें चेरन के धनिकाई।
धरती पर माटी हवे जेतना धन केंचुवा के सगरें ऊ कहाइ।
कई लाख हजार ले ओकर पुश्तन सदा रही खात तबो न ओराई॥
* * * *
महादेव जी एक बैल रखि पशुपति नाथ कहावें।
धर्मराज एके भैंसा रखि सब के मारि गिरावें।
कृषक बृषभ आ महिष कइ रखि केतना बड़ा कहाई।
ऐकिक नियम गणित के एकर उत्तर सही बताई॥
 
तीसरा प्रतीप
लक्षण (दोहा) :-
जहाँ कहीं उपमेयसे हीन होत उपमान।
तहाँ तृतीय प्रतीप के मानल जात स्थाान॥
तोमर :- उपमान कुश्तीथ खात। तीसर प्रतीप कहात॥
उदाहरण (हरिगीतिका) :-
विसुनाथ मन्दिर से गइल सोनाके सुनबा पाइ के।
जन्न त में औरंगजेब के मन भइल काठ लजाइ के।
कि '' बाद हमरा भइल ना केहुवे जे मुसल्मा न से।
काम पूरा हो गइल ऊ हिन्दु के ठकुरान से।
राधे भगवती मारकण्डेि के मुबारकबाद।
बाद मुद्दत के दियावत जे हमार इयाद बा ''
 
कवित्त :-
मुसल्माgन बात भेल भूलि जा मोहम्मदद के
हिन्दूा का न बात मोहमद के भुलात बा।
पहिले से ठाँव ठाँव बाटे महज्जिद किंतु
दिव्य ज्यो ति वाला लोग जहाँ जहाँ जात बा।
गोल बान्हि एगो सतसंग के बहाना बना
जा के महज्जिद उठावत दिन-रात बा।
जाते जलपान जम जम के बा होत उहाँ
हिन्दूल का आगे भइल मीयाँ लोग मात बा॥
बकरा के संख्या बकरीद में कटाव जौन
ओसे कई गुना ज्या‍दा होली में कटात बा।
तजिया का मेला में मस्‍ती जे रहल ओसे
झण्डा का जलूस में जियादे लहरात बा।
शीया और सुन्नी का युद्ध से भी कहीं अधिक
घोर युद्ध शाही और तिवारी में ठनात बा।
उहाँ इस्तिंजा इहाँ धोतिये के सोखत बा
हिन्दूस का आगे भइल मीआँ लोग मात बा॥
प्राय: पढ़वैया लोग मदरसा जात बाटे
फैशन में आ के अब दार्ही भी रखात बा।
नया लोग हिप्पीअ कट केश के शौकीन बाटे
अतएव ओ सबका खत ना कटात बा।
मुसल्मासनी तहमद बा सिर्फ चारि खाना के
हिन्दूा का कई रंग का छीटि के किनात बा।
पानी पीये कल में के लोटा न माज रखें।
हिन्दूी का आगे भइल मीआँ लोग मात बा॥
चुनावी जोश में बा कृपान प्रतिद्वन्द्वी पर
ठाँव-ठाँव रोज कूर बानी भी सुनात बा।
उनके चुनावी नेता एक गो बुखारी इहाँ
वोट का बुखार से बुखारी गात-गात बा।
हिन्दूा का एकता के लीलत जाति बाद बाटे
बात उर दू के अत- सबका सुहात बा।
उठि पाँड़े तीन खुदादीन के जितावें इहाँ
हिन्दूँ का आगे भइलें मीआँ लोग मात बा॥
पानी का किफायत में भी हिन्दूम अब आगे बा
कुल्लाा ना करें दातुन कूँचि के फेकात बा।
उहाँ एक दातुन चलत सवा मास इहाँ
एक ब्रश हिन्दूत का बरीसन खेपात बा।
प्राय: मुसलमान वजू करें कई बार
भोजने के बेरा हाथ हिन्दूं के धोवात बा।
सुत्थ न आ मोजा के बधना कई साथ राखें
हिन्दूक का आगे भइल मीआँ लोग मात बा॥
हिन्दुकवो का खेतन में मक्का सोहे ठाँव-ठाँव
और कहीं दर्शन मंसूर के हो जात बा।
शायर रोवावें बुलबुल के खिजाँ में उहाँ
कवि के पपीहा कब इहवाँ चुपात बा।
जान के भी हिन्दू निज के बना अजान देत
हिन्दू का आगे भइल मीआँ लोग मात बा॥
दर्शन दुवरि का के दुर्लभ भइल जाता
ठाँव-ठाँव मक्काल हर गाँव में देखात बा।
कौने घरे मूसा के लौकत अवतार नाहीं
जे के बंश वृद्धि एक भारी करामात बा।
मूसा एक नदी छड़ी फेंकि के सुखौले कबें
कुम्भएज के पयोधि पीयल पूरा प्रख्या/त बा॥
उनके पैगम्बयर त अस्सिये हजार बाड़े
सहस अठासी मुनि हिन्दूध के सुनात बा।
बेटा के बलि देबे मुस्लिम केहु जात रहे
रावन चढ़ौले माथ आपने कहात बा।
मुस्लिम में मोहर दान मानल बा नावें के
हिन्दूम का बियाह में तऽ बेटिहा बिलात बा।
केहू तरे देखला से हमरा बुझात बा कि
हिन्दूर का आगे भइल मीआं लोग मात बा॥
 

चौथा प्रतीप
लक्षण (दोहा) :-
मिले न जब उपमेय का योग्य> कहीं उपमान।
उहाँ चतुर्थ प्रतीप के कवि सब देत स्थांन॥
सार :-
पहिले अकथ्य और कथ्यद दुओ के आनि लड़ावल जाला।
पर अकथ्यथ चौथा प्रतीप में सदा अयोग्य कहाला॥
उदाहरण (सवैया) :-
फूलन योग्यय कहाँ उपमान पराक्रम जे अतिघोर देखौली।
होलिका बालक के न जरा अपने जरि के सुरधाम सिधौली।
साँपन के महतारी न बानर से जितली त असीम सुनौली।
तारा मंदोदरि भी अपना पति का बध के बदला न सुनौली॥
कपटी अति क्रूर जे पूतना ऊ शिशु के विष देत में जान गंवौली।
रहि के सदा दासता में घर फोरी में मन्थ रा आपन माथ फोरौली।
रहली एगो ताडुका राम का एक ही वाण से स्वेर्ग के राह टिकौली।
लडि़ के लगातार दु साल प्रहार न अस्त्र के एकहू फूलन पौली॥
सूपनखा दुइ रूप में आइ के राम के रंच डिगाइ न पौली।
कूबरी कृत्रिम रूप से कृष्णा के फाँसि के गोपिन के डहँकौली।
मर्कट के मुकवा लहि लंकिनी सिंहिका भी सुरलोक सिधौली।
फूलन का तुलना बदे एकहू नारि न आजु ले योग्यक कहौली॥
 
सार :-
फूलन का उपमा में जे केहु भिण्डाजरा के आनी।
ओकरा के दुनियाँ सोरहकनियाँ भसुर बुद्धि के मानी॥
फूलन देबी आन देश से ना हथियार मँगवली।
आ ना आपन अस्त्रश शस्त्रम मन्दिर में कहीं छिपौली॥
धार्मिक लोक मान्यसता से ना तनिको लाभ उठवली।
आत्म समर्पण का पहिले निज शर्त कबूल करौली॥
अपना सब साथिन के अपना साथे जगह दियौली।
अपना खास भतीजा के दे खेत गृहस्थद बनौली॥
घर से भी ज्याादा सुख उनके देत रहत बा कारा।
ना घर के ना घाट के होके मरि गइले भिण्डाहरा॥
गाँधी का उपमा में यदि केहु बुद्ध देव के आने।
काम बुद्धि से लेबे के ऊ सपनों में ना जाने॥
गाँधी बुद्ध देव सम रहले कहले गलत बुझाता।
ऊ बिलवाऊ ऊ बहुराऊ अन्तेर अधिक देखाता॥
बुद्ध राज्यब घर बार छोडि़ बनि भिक्षुक माथ मुड़ौले।
आ कोरा संदेश अहिंसा के ऊ सदा सुनौले॥
गाँधी अस्त्र अहिंसा द्वारा रिपु के मारि भगौले।
कई सदी से गइल राज्य जे रहे पुन: बहुरौले॥
 
चौपई :-
भानु उगे मुख शोभा पावे। भानु उगे शशि तेज गंवारे॥
कइसे मुख सम चन्द्रप कहावे। बात समझ में तनिक न आवे॥
वाणी-चरण ध्या‍न दे सूक्ति। कमला चरण ध्याेन दे भुक्ति॥
हरि हर चरण ध्या न दे मुक्ति। चरण समान कमल केहि युक्ति॥
भसुर लोग गुरहत्थे् जात। मोंछि कुकुर के पोंछि कहात॥
लेकिन गलत कहत सब नारि। कइसे मोंछि पोंछि अनुहारि॥
मोंछि कटे यदि बार हजार। पुन: जामि के होत तेयार॥
कुकुर के यदि पोंछि कटात। जिनगी भर बाँड़े रहि जात॥
आँखि मीन सम मानल जात। लेकिन ईहो झूठ कहात॥
भीतर बाहर एके खाँन। आँखि मृदुल नवनीत समान॥
ऊपर चीकन भीतर काँट। मीन आँखि से सकी न आँट॥
लाज आँखि में करे निवास। लाज न रहे मीन के पास॥
 
वीर :- तजऽ ताडुका और मन्थमरा सूपनखा भी निज अभिमान।
बल बुधि आ बहुरूपीपन में फूलन सब के कटिहें कान॥
 
सार :- रजिया बेगम चाँद बीबी आ नूरजहाँ मुगलानी।
फूलन के तुलना का करिहें भरिहें उनकी पानी॥
 
वीर :- (उपमान में हीनता)
बाँहि सूँड़ सम कइसे जेहि में अँगुरी केवल एक दिखात।
भीतर पूरा पोल जहाँ से पोंटा बहत रहत दिन रात॥
वीर :- (उपमेय के उत्कहर्ष)
सूँड़ बाँहि का आगे का बा? जेसे केतने ग्रंथ लिखात।
अद्भुत यन्त्रा बनत दिन पर दिन औरी सुखद भवन सिरजात॥
 
 

चौथा प्रतीप या अनुक्ते धर्म व्य तिरेक
लक्षण (छन्दत) :-
कथ्य अकक्यक दुओ के कुश्तीर पहिले जहाँ लड़ावल जाला।
बिनु कारण अकथ्यक के लेकिन सदा अरोग्य/ बतावल जाला॥
 
विस्तृनत लक्षण (चौपाई) :-
चौथ प्रतीप जहाँ आ जाय। धर्महीन व्य तिरेक कहाय॥
होत दुओ में एके काम। यद्यपि अलग-अलग बा नाम॥
दूनूँ में केवल उपमान। बनत अयोग्य् सहत अपमान॥
बनत न किन्तुव बनावल जात। सहत न किन्तुअ सहावल जात॥
बिना बिचारे दण्ड‍ दियात। कारण या बतलावल जात॥
चौथे प्रतीप के सुकवि अनेक। कहत अनुक्त धर्म व्य तिरेक॥
अन्त र तनिक न मानल जात। चाचा पितिया एके बात॥
उदाहरण (चौपई) :-
जे गाँधी के ना पहिचानी। उहे बुद्ध सम उनके मानी॥
चरण कमल सम उहे बखानी। जे उपमा के हालि न जानी॥
सार :- राना साँगा का उपमा में ऊहे रखी सिकन्दoर।
रत्ती भर भी बुद्धि रखी ना जे माथ का अन्दहर॥
सवैया :-
देखि के फूलन के अति लाजन पूतना आ सुरसा गडि़ गैली।
ताडुका ताड़ न रोकि सकें अरु होलिका भी बहुते हलुकैली।
मन्थ रा मन्दक परे तुलना में आ कूबरी हो बरी भागि परैली।
सिंहिका लंकिनी सूपनखा इरिषा से बड़ा मन में अनखैली॥
हेरि के फूलन के अँखिया हरिनीन के होश हवा में हेराइल।
खंजन फागुन का पहिले पुसवे में सुदूर पहाड़े पराइल।
पंकज पंखुड़ी में मुह तोपि के मित्र बिना जल में जा लुकाइल।
पानीये में मन मारि के मीन जिये जियते कबे ना उपराइल॥
उपमा यदि गान्धीा का बुद्धि से बुद्ध का बुद्धि के दीं तब ऊ ना सुहात बा।
साँगा का शौर्य का सामने शक्ति सिकन्दबर के कुछ में न गनात बा।
खालसा लोगन के करनी तयमूर का क्रूरता से बढि़ जात बा।
बिस्कुलट का अगवाँ न बतासा पुछात हवे ऊ कुजाति छँटात बा॥
जवना जनतंत्र में चोर बनोर से भी कर जोर के वोट मंगाता।
जहवाँ डरि नेतन से अपराधिन के पकड़े में पुलीस डेराता।
रुपया भरपूर बँटात बा वोट में पोलिंग पै गोलियों चलि जाता।
जनतंत्र कहीं यदि एके त केके अराजकता कहीं बोलें विधाता॥
 
वीर :- चीनी का रस के उपमा केहु अगर चाय से बाटे देत।
तब सुमझीं कि ऊ न बुद्धि से काम तनिक भी बाटे लेत॥
 
छन्द> :- खाजा टोपी से लजाइ के राजमुकुट बा दूर पराइल।
कुर्सी के उपमा न पाइ के सिंहासन बा कहीं लुकाइल॥
 

पाँचवाँ प्रतीप
लक्षण (दोहा) :-
सनमुख जब उपमेय का ब्य र्थ बनत उपमान।
तब प्रतीम पंचम उहाँ मानत सब मतिमान॥
 
हरिगीतिका :-
उपमान के भी काम जब पूरा करत उपमेय बा।
उपयोगिता ना रहत ओकर बनत ऐसन हेय बा।
उपमान का उपमा में दुइ पर परत सतत निगाह बा।
पंडित के उपरोहित तथा कोइरी के जस हरवाह बा॥
व्यिर्थ या कैमर्थ [1] मिथ्या: मन्द/ आदि कहात बा।
आक्षेप और प्रतीप पंचम उहाँ मानल जात बा॥
उदाहरण (कवित्त) :-
परीक्षा का बेरा जिन सोर्सरहे तगड़ा तऽ
कोर्स का किताबन के रटाई बेकार बा।
टी.भी. का आगे व्य॥र्थ भइल अब नाटक बा
रेडियो का आगे अब व्य.र्थ अखबार बा।
बर चपरासियो भी होखे त ओकरा आगे
तुच्छर वर बीस बिगहा के काश्तsकार बा।
बेटिहा समधी के माँग जो ना भरल जा तऽ
कन्याा के माँग भरल सूना संसकार बा।
जवना बरात बीच गाल अगुवा का और
बेटिहा का बजावे के नाक परि जात बा।
समधी दहेज बदे नाच निज नाधें जहाँ
तहाँ अन्य बाजा नाच व्यtर्थ में बन्हाात बा।
रुपया बिना ना भार जेकरा घोंटात ओके
रुपये दियाउ दालि व्यकर्थ परोसात बा।
उनका लिए अन्या औषधालय अनेर बाटे
आगरा या राँची ठीक दुइये बुझात बा॥
चीनी मिल बइठे त बइठे कराह कोल्हू॥
क्रशरो बइठि जात उइवाँ बेकार बा।
नया नया डाट पेन ऐसन चलल बा कि
छात्र लोग ओही के जियादे खरीदार बा।
कण्डा के कलम निब होल्डार के बात कौन
फाउण्टेोन पेन तक के मन्देो बजार बा।
करिखा के रोशनाई बनत कहीं ना बाटे
दर्शन दवात के दिखात दुशवार बा॥
नीम का खरी के खाद उत्तम कहल जात
जेहि में विशेष एक गुण कीड़ा मार बा।
हड्डी के पीसि के बनावल जात खाद जौन
ओहू खाद से भी बढि़ जात पैदावर बा।
गोबर के खाद और खाद जे कम्पोवस्टे के बा
दूनूँ के किसान स्व यं करत तेयार बा।
माटी पोखरी के और दूसरो जे खाद बाटे
यूरिया का आगे लोग बूझत बेकार बा॥
सवैया :- कुछ आपन पानी जियादे चढ़ावे बदे बेटहा का न नेकु खेपाता।
बस एही बदे बेटिहा के सदा सब बात में नीचा देखावल जाता।
कई बोतल पानी चढ़ो उनके तब आदर भाव अनेर दियाता।
उनका न बुझात बा कि उनका पनियाँ पर पानी इहाँ फिर जाता॥
फल उत्तम देत बा सेवक के फल बाउर ना जेहि में कबें आवत।
सब जीव के शुद्ध सदा गति दे शरणागत के तन ताप नशावत।
मुवला पर प्राणी के पुश्तद अनेक समेत सदा सरगे पहुँचावत।
भजि राम के नाम लहे फल जे नर आम के पेड़ लगाइ के पावत॥
नहवाइ के आन केहू तन में कपड़ा अतिकोरा नया पहिरावत।
चढि़ के चले खातिर यान एगो अति सुन्दरर साज समेत सजावत।
संग में बरियात चलें कहीं निश्चित ठाँव पै जाइ जे डेरा गिरावत।
पढ़े ब्राह्मन वेद पुरान हजाम समेत बिधान सजी निबहावत॥
कचिया पकिया दुइ भोजन भोज लगाइ के लोग सुमोद मनावत।
केहू दान के वस्तुो अनेक प्रकार के पाइ सहर्ष असीस सुनावत।
जीव भी तब जाके नया जगही तब आपन एक बसेरा बनावत।
शव श्राध की कौन सी श्रद्धा बचे जे बियाह न बा अगताह पुजावत॥
कहीं पोलिंग कैपचर होत चुनाव में आ बर जोरी से वोट लियाता।
कहीं गोली चलाइ मुवाइ एकाध भगाइ के शेष के वोट लुटाता।
जहाँ ऐसन घोर अराजक लोग अनेक बसें केहु ना पकड़ाता।
सिरिजे बदे श्रीमती फूलन के तहाँ व्यहर्थ परिश्रम कैले विधाता॥
हम के सब मूरख लोग बुझे हम मूरख एक महान हईं।
कवि लोग बुझे कवियो जन में हम पावत एक अथान हईं।
निज के हम मानीले छात्र एगो नित देत पढ़ाई पर ध्या न हईं।
बुद्धिमान में कुछ लोग बुझे हमके कि एगो बुद्धिमान हई॥
 
द्रुत बिलम्बित :-
करि सके यदि जाँगरे काम ना। यदि न लौकत हो कुछ आँखि से।
उलिट जीयल हो एल जी लगे। मरन बा रन जीति सुहावनी॥
 
दोहा :-
बेटहा समधी बइठि जा जेकरा जाइ दुवार।
कुर्कमीन तब का उहाँ का तब थानेदार॥
अन धन बासन बसन पशु ले जाता सब छीन।
बीहड़ दस्युब कथा सजी समधी करत मलीन॥
 
श्लो>क :-
सतुआ जौ चना के हो मरिचा नून का संगे।
व्यआर्थ पूड़ी दही चीनी दालि भात बरा बरी॥
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तब जेल न गइला से हमके तेजका नेता कायर कहले।
केहु चापलूस कहि दिहल राज का अमलन से मिलि के रहले॥
पढि़ के हम हाकिम भइनीं ना आ दूध दही ना खइनीं हम।
अतएव बहुतका मन में बड़ा अभागा मानल गइनीं हम॥
 


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