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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 30 प्रहर्षण अलंकार पीछे     आगे

 
पहिला प्रहर्षणअलंकार (समाधि अलंकार)
लक्षण (दोहा) :- बिना यत्न कइले जहाँ हो चित चाहल काम।
अलंकार के परत तब प्रथम प्रहर्षण नाम॥
(उद्योतकार द्वारा उहे हवे समाधि कहात)
 
उदाहरण (वीर) :-
एक जने महपातर रहले खटिया ओढ़ना बिना तबाह।
तब तक उनके जजमानी में मुवले एक जने धनिकाह॥
हरण करे के संयुक्ताे के वेश बदलि के पृथ्वी<राज।
जोहत रहले अवसर कवनो सिद्ध करे के आपन काज॥
फाटक पर अपना प्रतिमा तर खड़ा भइल रहले चुपचाप।
ले जयमाल तहाँ चलि आइल संयुक्ताइ तब अपने आप॥
घोड़ा पर चढि़ पृथ्वीलराज का साथे चलली भाग पराय।
राजा सब निरुपाय होइ के देखन लगे आँखि मुँह बाय॥
रामचन्द्रि जी खोजे चललें जब सुग्रीव निवास स्था न।
चढ़ा कान्ह् पर ले जा करके मिलन करा दिहले हनुमान॥
 
सार :-
छल प्रपंच किछऊ ना कइले ना कतहीं लरियैले।
अकस्मापत बड़की कुरुसी पर चनशेखर चलि गैले॥
 
दूसरा प्रहर्षण अलंकार
 
लक्षण (दोहा) :- मनचाहा से भी अधिक सिद्ध होत जब काम।
उहाँ प्रहर्षण दूसरा अलंकारके नाम॥
या
छंद :- इच्छ भर अथवा ज्याnदा भी केहु कुछ बिनु श्रम जब पा जाला।
तब उहाँ प्रहर्षण दूसरा कुछ कवि द्वारा नाम दियाला।
उदाहरण (दोहा) :-
दुइ दिन का अवकाश के कइले टीचर चाह।
साइनडाई तब उहाँ चलल कई सप्तारह॥
राम बिबाहे के रहे दशरथ का मन चाह।
चारि जने के हो गइल लेकिन उहाँ बियाह॥
मिडवाइफ का फीस के दुवरा होता मोल।
तब तक गूँजल गेह में केहाँ - केहाँ के बोल
लगले करे किसान जब ढेकुलि कूँढि़ तेयार।
तब तक बरखा हो गइल छछकल मेड़ डँड़ार॥
 
तीसरा प्रहर्षण अलंकार
लक्षण (दोहा) :-
यत्न शुरू होते जहाँ होत सिद्ध मन काम।
उहाँ प्रहर्षण तीसरा अलंकार के नाम॥
या
वीर :-
जहाँ यत्नर आरम्भg करत में इच्छित कार्य सिद्ध हो जात।
उहाँ प्रहर्षण अलंकार के भेद तीसरा हवे कहात॥
उदाहरण (दोहा) :-
मिडवाइफ का फीस के होखे लागल मोल।
तब तक गूँजल गेह में , केहाँ - केहाँ के बोल॥
दुइ दिन छुट्टी के भइल टीचर का मन चाह।
साइनडाई आइ के चलल कई सप्ता ह॥
लगले करें किसान जब ढेकुल कूँड़ तेयार।
तब तक बर्षा हो गइल , छछकल मेड़ मंडार॥
चख नीके घर से चला तरकुलवा के बाट।
बीच राह में मिल गया हमें तबनियाँ घाट॥
 
वीर :-
रथ रोके के सिंह मुलायम का मन में जब भइल बिचार।
बथना कुटी जाइ के लगले मोर्चाबन्दीज करे तेयार॥
तब तक रथ लालू बिहार में रोकले जाइ समस्तीेपुर
कार्य सिद्ध हो गइल मुलायम के चिन्ताल सब भागल दूर॥
टरल तुरन्ते बथना कुटिया वाला सम्भाावित संघर्ष।
सिंह मुलायम मनहीं मन में लगले खूब मनावे हर्ष॥
 


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