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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 33 भ्रान्तिमान अलंकार पीछे     आगे

(भ्रान्ति , भ्रम अलंकार)
लक्षण (दोहा) :-
बुधि जब कवनों वस्तु के अन्यि वस्तुक ले मान।
भ्रान्ति नाम से भ्रम उहे कवि सब कहत बखान॥
 
वीर :- भ्रमबस जब कवनों पदार्थ के अन्यs पदार्थ समुझि मन जात।
भ्रान्तिमान या भ्रान्ति नाम के अलंकार तब उहाँ सुहात॥
 
उदाहरण (सार छंद) :-
'' कुछ दिन भोजन वारि बतासा '' पारवती जी कैली।
हम बुझनी कि पानी पी-पी खूब बतासा खैली॥
दोहा :-
अर्थ सन्तकपन के रहे गर्मी जलन जराव।
हम बुझनी कि अर्थ बा एकर सन्तर सुभाव॥
 
हरिगीतिका :-
पीयल बिड़ी फेकल गईल भुइयाँ गिरल कुछ हिल गइल।
बिसतुइया कीड़ा समझु के तुरत ओके लिल गइल॥
 
सवैया :- लड़की कवनो फुल पाइन्टइ में अइली लखनौवा एमेले निवास में।
'' चलि आइल फूलन हाय। इहाँ '' कहते सब लोग पराइल त्रास में।
छिपि गैल केहू अपना कमरा में लुकाइल जा केहू मित्र का पास में।
ओह कल्पित का डर से रहि पावल ना केहु होश हवास में॥
 
जनले जब मारिच राम प्रभाव त होस हवास बिदा निज कैले।
जेहि वस्तुर का नाम में वर्णरकार सुने ओके मानि के राम डरैले।
तवने तरे बी.पी. बुखारी मियाँ का प्रभाव से पूर्ण प्रभावित भैले।
तब मन्दिर में सुनि वर्ण मकार तुरन्तक ओके बुझि मस्जिद गैले॥
 


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