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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 36 मिथ्याध्यसवसित अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (सार) :- एक झूठ के साँच करे के झूठ अनेक कहाला।
मिथ्याध्यगवसित नामक उहवाँ अलंकार बनि जाला॥
 
उदाहरण (छन्दय) :-
कृपया कर्ण बलि परशुराम सम नारद व्यावस सरिस अज्ञानी।
ध्रुव प्रहलाद राम सम नास्तिक एकलव्यय सम गुरू अपमानी।
राणा सांगा सम रणकायर हरिश्चं द्र अस झूठ कहैया।
अइसन लोग हमार मित्र बा बिनुवा भावे अस निरदैया॥
मृग तृष्णाम का पानी में जाइ के माघ में जे नित होत परात नहाला।
गर में जेकरा दिन रात सुहात बा गूलर फूल के सुन्दिर माला।
सिर केकरा के पगु केंचुवा के जेकरा निज आँखि से साफ देखाला।
बस उहे परीक्षा में जाके सुधार करे बदे छात्रन से अझुराला॥
चिरई दूहि के बिना पेनिये का पतुकी में धिका के दही जे जमाई।
भगवान के पत्थबर मूर्ति के न्यो ति के ऊहे दही भरि पेट खियाई।
दुम कुक्कुिर के करि पायी जे सोझ या साँप के सोझ चले के सिखाई।
महँगी आ दहेज के बाढि़ दिनों-दिन रोके बदे उहे बीरा चबाई॥
जवना देशवा बसे उज्जिर काग तथा जहवां बकुला बसे काला।
बरखा रितु में जहाँ नाचत मोर ना गिद्ध जहाँ कबे मांस न खाला॥
बरसे न चुनाव में लोटि जहाँ चले बूथ पै लाठी बनूखि न भाला।
उहवें भगवान जी होइहें कहीं हमरा अपना मनवां में बुझाला॥
तुलसी दल से जे गनेस के पूजत या दूरगा जी पै दूबि चढ़ावे।
तुलसी जी का माला से सन्याजत करे चढ़ा केतकी शंकर जी के रिझावे॥
भरि पात्र के काशी पुरी से गंगाजल तीरथ राज में जे नहवावे।
उहे भारत वर्ष से जाति के भेद आ छूत का भूत के दूर भगावे॥
भागिये में जेकरा पिता का लिखले कहियो ना बियाह बिधाता।
जे फल खात सदा सुर रुख के या फल फूल ऊ बेंत के खाता।
जे बालू के भीति उठाइ के ऊपर च्युतटी का पाँखि से छान्हि छवाता।
घूस के बन्दभ करे बदे भारत में उहे व्याक्ति समर्थ देखाता॥
 
ताटंक :- जे सुखले धरती पर अथवा बन में नाव चलावेला।
बिनु तिकड़म रचले चुनाव में उहे सफलता पावेला॥
 
सार छंद (16 + 12) :-
आंखिन से कम लउके लागल दे ना साफ देखायी।
कानन में बहिरापन आइल दे ना साफ सुनायी।
तब धनवन्तबरि जी एक्काा से हमरा गावें अइले।
आँखि कान के ठीक करे के सही व्य वस्थाह कइले॥
करिया बकुली के छटाक छव ताजा दूध मँगवले।
आ गूलर के कुछ फूल मँगा के ओमें सजी भिजवले॥
ऊ फल सब पारस पत्थ र पर मेंहीं खूब पिसाइल।
आ तेरसि के गरहन लगला पर शिर पर दवा मलाइल॥
दवा मलात कहीं कि दूनू रोग तुरन्तेल भागल।
केतने अचरज के बात देखाये और सुनाए लागल॥
जे गान्धीज जी के गरियावल जी भर के पी पी पानी।
ऊहे मुख्यज मन्तिरी बनि के काटल कुछ दिन चानी॥
दिल्लीख और लखनऊ से सब एमेले एम्पीछ आ के।
निज क्षेत्रन में पूछत देखनी कुशल क्षेम जनता के॥
बिनु गाइड आ कुंजी पढ़ले आ बिनु ट्युटर रखले।
लरिका भइले पास मिठाई हनुमान के भखले॥
देखनी बिना मार भइले आ बिना पुलिस का अइले।
छात्र यूनियन के नेता सदभाव समेत चुनइले॥
जइसे अगस्तय जी चिरूवा से पूरा समुद्र पी गइले।
ओइसे गनेस जी चम्म च से जब दूध पिये पर भइले॥
तब यू.पी. आ बिहार दूनू सूबा के दूध ओराइल।
आ पचहत्तर रुपये किलो दूध बिकात सुनाइल॥
ई चर्चा केवल पन्द्रोह या बीसे दिन तक चलि पावल।
लेकिन ए घटना के कारण ना केहु कवनो बतलावल॥
आ मन हमार नवकी कविता का ओर जोर से भागल।
काहें कि ओहि में हमरा कुछ अर्थ बुझाए लागल॥
सम्मे लन के श्रोता सब केहु उहे सुने के चाहल।
आ सुनि के ओ के सब केहू बारम्बाकर सराहल॥
निज रुचि के संगीत कला में जब हम पता लगवनी।
तब केवल औरंगजेब के अपना अइसन पवनी॥
अब चुनाव में जातिवाद से काम न कहीं लियाता।
बिना नून मरिचा के सब केहु सानल सतुआ खाता॥
थानेदार जे नेता सब के हाथ कबे ना जोड़ी।
आ ना ओ सबका कहला से अपराधिन के छोड़ी॥
भाई और पिता का साथे स्नेधह सनल व्यtवहार के।
अपना से भिन्ना धर्म वालन पर राखत भाव उदार के॥
संगीत वालन का प्रति आदर आ सरकार के।
विविध विषय का विद्वानन का साथ विमर्श विचार के॥
दूर रहे के लोभ दगा आ धोखा धड़ी फरेब से।
ई सब गुण सीखे के हो तब सीखें औरंगजेब से॥
अकबर के जेतना नीति रहे ऊ सजी कबर में धइले ऊ।
आ राजपाट पूरा समेटि के उँहे अपनहूँ गइले ऊ॥
 


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