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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 39 ललित अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (दोहा) :- खुलि के बात कहात ना छाया मात्र कहात।
ललित नाम के तब उहाँ अलंकार बनि जात॥
 
उदाहरण (दोहा) :- दहतर या सूखा जहाँ लेभी उहों लियात।
आगी से जरला गतर पर बा नून दरात॥
चौकी पर कुछ आन सुनि चौका में लखि आन।
आँखि कान के भागर सुनि मौन भइल यजमान॥
बस में पर बस तन चले मन दुख बस मन पारि।
अस्प ताल के बिस्तखरा या यमराज दुवारि॥
X X X
इसकुलिहा लरिकन के छेड़ल बिरनी के छाता छूवल बा।
डाकुन के आगे लाठी आँजल बिना मौत के मूवल बा॥
 
सवैया :- देहिया बलवान रहे जहिया तहिया रुपया हम लाख कमैनी।
अपराध का दण्डल से बाँचे बदे सब अर्जित द्रव्यप लुटावत गैनी।
परलोक में दण्डा से बाँचे बदे हम काशी प्रयाग में जा के नहैनी।
दिन रात बड़ा पछतात हँईं जग छोडे़ बदे खटिया जब धैनी॥
जेतना अब शासन सक्रिय बा ओतना यदि ऊ पहिले रहि जाइत।
तब ऐसन बात न होइत कि मरि गैला का बाद से बैद खोजाइत।
घरवा जरि गैला का बाद से आगि बुतावे बदे न इनार खनाइत।
बहला पर खेत के पानी सजी कसि के मजबूत न बान्हर बन्हाtइत॥
चरि गैला पै खेत के बालि न खेत में यूरिया खद मँगा के छिटाइत।
धन चोरी हो गैला का बाद न ताला अलीगढ़ वाला लगावत जाइत।
भइला पर जब्ता जमानत ना मतदाता में कम्बटल कोट बँटाइत।
जल पीके न जाति जोहाइत न बितला पर जाड़ न जामा सियाइत॥
खइला बिनु मू गइला पर ना महपातर घीव पियावल जाइत।
जियते जेके लात के ठोकर ओकर लाश उठा के न कान्हेंय ढोवाइत।
जियते ना इनार के पानी देके मुवला पै गंगाजल खोजि के आइत।
जिनगी में सदा टुटही तरई मुवले दुइ खाट न दान दियाइत॥
 


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