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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 41 लोकोक्ति अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (सार) :-
अवसर का अनुकूल आनि के जब लोकोक्ति धराला।
जे से पहिले कथित अर्थ में चमत्कािर आ जाला॥
लोकोक्ति नाम के अलंकार तब ऊहो एक कहाला।
केशव देव आदि कुछ कविगन का ना किन्तुा सुहाला॥
 
उदारहण (चौपाई) :-
सेवक छेंके गद्दी जाके। स्वाामी फइले से मुँह ताके॥
सेवक राज करे मनमानी। बइठल काटे सुख से चानी॥
कवनों दल के दास बनेला। स्वाखमी के न पुकार सुनेला॥
लोकतंत्र के इहे कसौटी। गोसयाँ भुइयाँ कुकुर पुँजौटी॥
 
ताटंक :-
केहु लाठी बरसावे आ केहु रुपया पइसा छीटेला।
आ केहु केवल तीनि पाँच करि के चुनाव रण जीतेला॥
तब नेता निज क्षेत्र छोडि़ के नव दू गयारह हो जाला।
पाँचों अँगुरी रहत घीव में आ पव बारह हो जाला॥
बीते तेरहो करम लोग के किन्तुप कबें ना झाँकेला।
अपने बीस बने खातिर दुसरा के अनइस ताकेला॥
* * * *
जेकर लिट्टी से बन-बन रोवे फकीरवा ठोकि-ठोकि के खाला।
सेवक का घर सदा दिवाली स्वा मी का घर किंतु दिवाला॥
 
वीर :-
आगामी चुनाव जीते के सजी लोग बा होत तेयार।
दण्ड बइठकी लगा रहल बा देहि बनावत बा बरियार॥
ईटा पत्थ‍र आ चप्पहल के होई धुवाँधार बरसात।
परी सहे के सब चुप हो के सहजे मिली न बारा भात ॥
सब लोहा के चना चबाई अइसन कड़ी पड़ी मुठभेर।
सुखले गरई ना मारी केहु लगी न आन्ह र हाथ बटेर厝॥
काँगरेस ऊँची दुकान के फीकी फेरु परी पकवान।
या आवा में नाद भुलाई अइसन परी वोट के टान॥
बी.पी. बाड़े थौशल हाथी ना उठला के हवे उमेद।
चनसेखर सिंह नाव पुरानी जेहि में होइ गइल बा छेद॥
दिल्ली दूर रही सबको से दालि भात के रही न कौर।
जनता दल के दालि गली ना मीआँ के मसजिद तक दौर॥
हाथी जेकर पैर न दी तब कइसे गढ़ से पइसी लोग।
तेपर बी.पी. का चक्क र में फँसि जाये के लउकत जोग॥
पंकज के ऋतु पावस बाटे लेकिन पोखरि बाटे छोट।
आ पइसा पर बिकल बराम्हखन काटि रहल बाड़े कुछ वोट॥
कवना करे ऊँट कब बइठी ना केहु जानत बिधि के खेल।
लेकिन मियाँ मुलायम का बा गाछे कटहर ओठे तेल॥
बढ़े लोकप्रियता अति आपन एकरा खातिर जज्ञ महान।
भइल एक गो जेमें दीहल गइल योग्याता के बलिदान॥
अपना पास न रहल योग्य ता अत: आन के गइल छिनाइ।
यदि बानर का घर नरही तब कइसे बया बसी घर छाह॥
मृत मण्ड ल आयोग पत्र के शंख बजाइ भइल एलान।
टके सेर भाजी आ खाजा दुओ बिकी अब एक समान॥
मंत्री पद परसाद रुप में अपना दलन में गइल बटाय।
मंत्री के संख्यार निज दल में एतना दीहल गइल बढ़ाय॥
मंत्री अधिक बिभाग थोर बा ना आँटत बा सबके कार।
हाथ गोड़ में किछउ नाहीं टकहा सोभत किंतु लिलार॥
बाछी जौन दान के होले ओकर दाँत गनल ना जात।
बिना घीव के केहु का कबहूँ ना कुजात के भात घोटात॥
प्रजातंत्र का छाती पर बा कोदो दरल जात दिनरात।
जातिबाद आ मँहगाई के पौधा बाटे सीचल जात॥
 
चौपई :-
सरकारी कर जा सब माफ। भइल वोट के रस्तात साफ॥
हरे फिटकिरी के ना कार। रंग चढ़ी चमकत टहकार।
कइसन बढि़याँ ई उपकार। तेपर पर माथे फरहार॥
नया अमेठी भइल तेयार। सहजे बेड़ा लागी पार॥
आन केहू के अहरा पाइ। लिट्टी आपन गइल सेंकाइ॥
घर के ना लागत बा दाम। कौन किफायत के तब काम॥
आन के पुरवा आन के घीउ। जे जेतना तक चाहो पीउ॥
चामें के बा बनल बखार। तेपर बा कुक्कुपर रखवार॥
जब आपन बाटे सरकार। दोसर के तब पूछनिहार॥
बहती गंगा के बा धार। अइसन मिली न फेरु सुतार॥
एमें उहे न धोई हाथ। जेकर भागि देत ना साथ॥
केकरा मिली मियन के वोट। एक जगह पर हो के गोट॥
एकर अबे चलत ना थाह। केकर घर भरिहें अल्लागह॥
किन्तुे मुलायम आपन मानि। और धन्या अपना के जानि॥
रातो दिन बाड़े अगरात। धरती पर बा परत न लात॥
पोखरा के न बाथ के कार। लागल तब तक ले घरियार॥
डेरा आके दिहलसि डालि। उहे मुलायम के बा हालि॥
 
केंचुआ छंद :-
छप्प न लाख रुपया जामा मस्जिद का जीर्णोधार
का नाम पर सरकारी खजाना से दियाइल हऽ।
सरकारी धन दे के अपना खातिर वोट किनाइल हऽ।
घलुवा में पीर एगो मन्त र बतलवले हऽ।
सबको से पहिले कानून लीले के सिखवले हऽ।
कि ला लीलऽ ई लीलऽ आ ऊ लीलऽ ।
जवन मिले तवने लीलऽ जाने भर में कुछ मत ढीलऽ।
मँहगाई का पौधा में पानी दियाता , ढेर दे के कम लियाता॥
 


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