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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 42 विपरीत अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (वीर) :-
दुसरा के प्रति जे जइसनका करे चलत आपन व्यrवहार।
पर ऊ हो न सके अपने हो जा ठीक ओइसने कार॥
 
अलंकार विपरीत नाम के हमरा उहवाँ हवे लखात।
नया डिजाइन के ई वाटे और कहीं ना पावल जात॥
 
उदाहरण (वीर) :-
आइल असों जे तीर्थ नहाये ऊ अपने ना सकल नहाइ।
आपन खून बहा के दीहल तीर्थ अयोध्या के नहवाइ॥
 
जे देवता के पूजे आइल मन्दिर तक ना पहुँचल जाइ।
मन्दिर से फइले पूजा के सब सामग्री गइल छिटाइ॥
 
पर अपने ऊ सरगे पहुँचल मंदिर में आवे के चाहि।
उहवाँ ओके सुर सब पूजल आपन भागि सराहि सराहि॥
 


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