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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 43 विषादन अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (दोहा) :-
मन के चाहल होत ना अनचाहल हो जात।
उहाँ विषादन नाम के अलंकार दरसात॥
 
उदाहरण (कुण्डेलिया) :-
आरक्षण घोषित भइल करे बदे कल्यातन।
किन्तु कई सौ युवक के सुनते छूटल प्रान।
सुनते छूटल प्रान और बस कई फुँकाइल।
बन्द भइल इसकूल मास ति सरा नियराइल।
अबो खुली इसकूल न लौकत कवनो लक्षण।
बनल विषादन अलंकार बाटे आरक्षण॥
 
ताटंक :-
सब चाहल चनसेखर के कि ई बड़की कुरुसी पावें।
ताकि सिंह मुलायम के ई सही मार्ग पर ले आवें।
लेकिन इहो मुलायम के लखि कार्य सजी सत्यानासी।
पीठि ठोकि के उनके ईहो दे तारे अब शाबासी॥
 
वीर :-
दुसरा पर बीगे के बम कुछ छिपि के रहे बनावल जात।
एगो बम तब तक ले फूटल भोंकरल बनवैयन के गात॥
मुस्लिम वोट रिजर्व करावे के बी.पी. कइले उद्योग।
बड़की कुर्सी गइल हाथ से और भाजपा के सहयोग॥
 
छन्द :-
एक चरन बरन के पाहुन ससुरारि करे जब गैले।
घर भर के बनल रसोई से सजी अकेले खैले॥
घर वालन खाति र भूजा जब चलती सासु भुजा के।
पाहुन सराहना कइले तब उनके खूब सुना के॥
सब बानि माइये के बा रउताइन जी में आइल।
खइला पर हमरा खाति र हइ भूजा हवे भुजाइल॥
तब सासु सकोची उनके झोरा भूजा से भरली।
कइसे ई पाहुन टकसी भारी चिन्ताल में परली॥
एक दिन पाहुन से कहली झूठे संदेश बना के।
राउर माई मरि गइली केहु बतलावल हऽ आके॥
तनि जाके सही सवांचीं ई कइसन खबरि सुनाता।
हम तऽ जब से सुननी हँऽ तब से ना किछु सुहाता॥
तब पाहुन रो के कहले अब के हमरा के जानी।
ओतना दुलार से हमके अब के दी खायक पानी॥
ओइसन माई मरि गइली तऽ अब का घरे जाइब।
रउरे दुवारि के दुबिया बनि के अब उमिरि बिताइब॥
 
मरजादे का दुपहरिया से बेटहा के रुख बदले लागन।
संचारी रूप धरे खाति र स्थाचयी समधीपन जागल॥
सोचले बेटा जनमवला आ पोसला के का फल पाइब हम।
जो आज बेटिहा पर सब का सोझे ना रोब देखाइब हम॥
जब भाते के आज्ञा आयी तब अगुवा के फटकारब हम।
जब होखे लगी मनावन तब जल्दीु आज्ञा न सकारब हम॥
इहे तरीका अपनौले रुपयो कुछ ज्याेदे लहि जाई।
और पसीना बेटिहा के सिर से एड़ी तक बहि जाई॥
बेटिहा जब गोड़ धरे लगिहें तब छरके लागबि कूढि़ कूढि़।
तब तक बेटिहा के घटकइली बरिसन के एक बिमार बूढि़॥
बेटिहा के चिंता दउरि परल तब बैतरनी का बाछी पर।
बेटिहा के मन के गुनल बात सब गइल तुरन्तेत गाछी पर॥
 
जब तेली एक जने अपना निर्धनता से अगुता गइलें।
तब धनी एक समधी से आपन संकट सजी बता गइलें।
सोचले कि हीत बाटे सब दुख हमार यदिा सुन पायी।
तब सुन के ओकरा कल ना परी कुछ मदद जरूरे पहुँचायी॥
ज्या दे दुख सुनि जल्दीद पसिजी ऊ अपना मन में ई जनले।
एसे अपना दुख के उहवाँ भूमिका बड़ा भारी बन्हीले॥
कहले कि रउरा से आपन सब केतना दुख बति यायीं हम।
अब तऽ ईहे चाहत बानी कि चौपारन चलि जायीं हम॥
तब ऊ कहले ठीके होई जनि एमें देर लगाईं अब।
आ एगो बात हमार सुनीं हमके दे जायीं अब॥
यदि कहीं तऽ बिहने गाड़ी पर लदवा कर के ले आयीं हम॥
रउरा अस परम हितैषी के चीन्हाक एगो पा जायीं हम॥
कोल्हूर के बात सुनत पहिला समधी धीरे से हटि गइले।
आ धनिकहवा समधी के पेड़ा भर गारी देते अइले॥
 
वंशस्थn शब्द :-
पुरान एगो घटना लिखात बा
बिवाह सम्बघन्धित जौन बा सही
छव-सात जाना वर का तलाश में
कई दुवारे पर घूमि घामि के
समाज ई आपन जाइ के कहीं
टिकान दे दीहल एक गाँव में।
 
दुवार एगो धनिकाह देखि के
इनार एगो दरिये रहे जहाँ।
पुरान थोरे चिउरा लगे रहे
दु चार भेली गुड़ साथ में रहे॥
 
रहे उहाँ लागल भूखि जोर से
अकाज एगो दहिये बिना रहे।
इहे रहे लालच ई धनी हवे
बिना दही के यदि खात देखि ली
दुवार के लाज जरुर राखि ली
बियाइलो लौकति भौंसि बा इहाँ॥
 
नगीच के नात बनाई के भले
प्रनाम पाती सब भैल भाव से
तबो न ऊ मालिक पूछले किछू
कहाउ का भोजन के प्रबन्धू हो॥
 
नहाइ के पत्तल धोई के उहाँ
लगाइ के बैठल गैल आसनो।
खेपाइ ना पावल एक का तबे
परोसते में कहले सुनाई के॥
 
कमें कमें दऽ चिउरा सम्हा॥रि के
जियान होखे जनि दऽ अनाज के।
दही न बाटे अपना लगे इहाँ
बिना दही के कइसे सधी सजी॥
 
दुवार के मालिक बोलले तवे
सनेह मानो सचहूँ जनाई के।
परोसवाई कम ना खुराक से
जियान के ना डर बा इहाँ किछू॥
 
तेयार बाड़े लरिका कई जने
सधाइ दीहें जुठवा सजी अबे।
हमार बाटे धनि भागि आजु ई
प्रसाद पैहे लरिका प्रसन्न्ू‍ हो॥
 
सुयोग ई कंचित आइ के मिले
कि जाति आ के दुवरा बईठि जा।
छछात मानीं भगवान ऊ हवे
पवित्र हऽ जूठन जाति के सदा॥
 
सुपात्र रौरा हइये हँई सभे
हमार बानीं हितवो हिसाब से।
कहाउतो बा चरितार्थ होत कि
बराम्ह नों के गति हऽ बराम्ह/ने ॥
 
अछंद :-
कुछ बरिस पहिले एगो आइल चुनाव।
त बराम्ह-नों में आ गइल एकता के भाव।
जीते खातिर वोट दियाइल रहे पाँडे तीन के।
पाँड़े लोग हारि गइल जीत भइल खुदादीन के।
* * * *
भानु प्रताप नाम के राजा विश्वलजीत केहु रहले।
अजर अमर हो कर के जग में राज्यल कल्पहशत चहले॥
चाह न पूजल राज समूचा छिना गइल अपमान उठवले।
कुल समेत लडि़ के मरि गइले और जन्मा राक्षस के पवले॥
* * * *
एक दिन ढेला पतई का आपुस में भइल इयारी।
कि एक दोसरा के संकट अब टारी पारा-पारी॥
बरखा अइला पर पतई ढेला पर करिहें छाया।
आन्हींइ अइला पर ढेला पतई के दबिहें काया॥
लेकिन ओहि दिनवें बरखा आन्हीं का साथे आइल।
ढेला दरिये गलि गइले पतई फइले उधियाइल।
 
दोहा :-
विद्या का उन्न ति बदे खुलत जात इसकूल।
लेकिन विद्या ह्रास के ई विधि बाटे मूल॥


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