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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 46 विभावना अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (वीर) :-
घटना का कारण संबंधी जब कुछ बात विचित्र कहात।
तब विभावना नामक उहवाँ अलंकार बा मानल जात॥
 
उदाहरण (सवैया) :-
पवली कबे सैनिक शिक्षा न किंतु सदा सधली ह अचूक निशाना।
अबला बनि के अइली जग में कइली बध किन्तुस कई मरदाना।
रहली जहिया ले सशस्त्रइ न पा सकली कतही ठहरे के ठेकाना।
एक नामी किला कइली कबजा धइली जहिया से निरस्त्री के बाना॥
* * * *
तिलक बरच्छाा ना भइल कनियाँ के न ठेकान।
दुलहा गइले चढ़ल पालकी बिलकुल भइल उतान॥
नया पालकी नया चाँदनी झण्डीु नया बन्हा<इल।
दुलहा खातिर नया बस्त्रण तुरते के कीनल आइल॥
गइल पालकी फूल और माला से सजी सजावल।
सिंहा संख नगारा बीगुल बाजा गइल बजावल॥
हीत मीत परिवार परोसी जे जहवें सुनि पावल।
काम धाम निज छोडि़ सजी बरियात करे के धावल॥
गन्त ब्य़ जगह पहुँचल बरात कनियाँ ना किन्तुn भेटाइल।
हो के निराश पूरा बरात अपना घर-घर चलि आइल॥
केवल एगो वर न लवटले देखे घर परिवार।
खीसिन ऊ ऊहवें हो गइले जरि मरि के अंगार॥
 
सवैया :-
बिनु बैर के आपुस में दुइ गोल बनाइ के ईंट चलावल जाला।
ईंटिया ई बने बिना माटिये के बिनु आगि के लाल पकावल जाला।
बिना चलले कई कोसवा के पेड़वा इहवाँ सपरावल जाला।
बिनु बाढि़ये के दहि बारा इहाँ नदियान में आवत पावल जाला॥
 
पहिली विभावना
 
लक्षण (दोहा) :-
बिनु कारन के कार्य कुछ जहाँ सिद्ध हो जात।
तब विभावना के उहाँ पहिला भेद कहात॥
 
उदाहरण (ताटंक) :-
बादर एक बूँद ना अरसल ना जल के छिड़काव भइल।
रामजन्म का धरती पर कीचड़ के किंतु जमाव भइल॥
तीर्थ नहाला और देवता क दरसन जे लोग करे।
ओकरा स्वार्ग मिलेला मन में इहे भावना लोग धरे॥
किन्तु् असों केहू नहा न पावल ना देवता के दरस भइल।
तबो हजारन लोग अयोध्याे से सीधे सुरधाम गइल॥
 
दोहा :-
बिनु सैनिक शिक्षा लिए बेधे लक्य्े अचूक।
फूलन बिनु लहसन रखे साथ कई बन्दू्क॥
एगो गुण बा चाय में सचमुच बड़ा महान।
करा देत बा जल बिना इच्छा भर जलपान॥
 
सोरठा :-
हाथ पाँव से हीन उलटा रुख से बैठि के।
हाँकत रथ सु प्रवीन सदा सारथी सूर्य के॥
 
दूसरी विभावना
लक्षण (ताटंक) :-
जब अपूर्ण अथवा अयोग्यू कारण भी कार्य बनावेला।
तब विभावना अलंकार के दोसर भेद कहावेला॥
 
सार :-
कम अथवा अयोग्यn कारण से जहाँ कार्य हो जाला।
तब विभावना अलंकार के दूस भेद कहाला॥
 
उदाहरण (ताटंक) :-
दाना एक सौ आठ जुटा जप माला लोग रचावेला।
ऊ माला जपि संत पुजारी शान्ति सर्वदा पावेला॥
पुलिस एक दाना कम वाला माला ना विसरावेला।
उहे एक सौ सात हाथ में माला निज सरियावेला॥
तब उहे चला के दुओ लड़ाकू दल के शान्तव बनावेला।
आा अपने भी निश्चित शान्त हो करके मौज मनावेला॥
 
दोहा :-
कौरव गुरू का मूर्ति से सीखि धनुष अभ्यारस।
एकलव्यु भइले प्रथम धनुर्वेद में पास॥
बिलकुल कम श्रम छात्र करि दरजा पास कहात।
कम्मेल श्रम करि टीचरो वेतन बा पा जात॥
नेता कुरुसी पाइ के अपने बा धनिकात।
सजी गरीबी देश के ओतने से मिट जात॥
* * *
कवनो कवनो गउवाँ में हरिजन का तिन गो परिवारे के।
पक्काo घर नया दियात एकदम बनवावल सरकारे के॥
बस एतने से आवास समस्याद हरिजन के हल हो जाता।
अब तक के घोर उपेक्षा सब सरकारी एहि में धो जाता॥
 
तीसरी विभावना
 
लक्षण (दोहा) :-
बाधा या प्रतिबंध का रहते कारज होय।
तीसरी तहाँ विभावना मानत कवि सब कोय॥
 
उदाहरण (सवैया) :-
मंदिर का बने में जे बाटे रुकावट ऊ हटे ई सबका मन भावल।
बनि गैल पलान तथा बहुसंख्यरक लोग अयोध्यान का ओर सिधावल।
दस लाख ले लोग बन्हारइल और हजार ले यत्नय में जान गँवावल।
तवनों पर जे उहाँ रोक रहे केहुवे ओह रोक के रोकि न पावल॥
 
सार :-
रोक लगावत गइल बड़ा आ पहरा कड़ा दियाइल।
पन्द्राह ट्रेन और सरकारी बस भी सजी रोकाइल।
निजी सवारी चलि ना पावल पैदल लोग पिटाइल।
तवनो पर बहुतेक भक्ताजन पुरी अयोध्या आइल॥
 
दोहा :-
यदपि नकल आ घूस पर लागल बा प्रतिबंध।
तदपि चलत बाटे दुओ होत न बाटे बन्दु॥
फूलन अपना के रखें धन बन बीच छिपाय।
लेकिन पूरा देश का चित पर गइली छाय॥
कवच बान्हि धन विभव के गइल घमण्डेय फूल।
फूलन ओही के हरें रुपया करें वसूल॥
अनसिखुवन के एक गो छोटका गोल बनाय।
फूलन कई बटालियन दिहली फौज हराय॥
* * * *
रोके के दहेज यत्नo केतने बा भइल किन्तुo
हो के और तेज ऊ समाज में चलत बा।
मूसन के मुवावे के केतने दवाई बाटे
किंतु जाति ओकनी के फूलत फलत बा।
जनसंख्यात देश के घटावे के उपाय कई
होता किंतु ऊपरे मुहें ऊ उछलत बा।
बाढि़ बा रोकात किंतु ''सारी नदी के जल-
खतरा का ऊपर '' रिपोट निकलत बा॥
 
चौथा विभावना
लक्षण (वीर) :-
जौन कार्य जौना कारण से सिद्ध होत संभव न दिखात।
पर यदि सिद्ध होय तब चौथी विभावना बा उहाँ कहात॥
या
अथवा अ-प्रत्याीशित कवनो कारण आ के करि दे काम।
तब विभावना चौथी उहवाँ अलंकार के होला नाम॥
 
उदाहरण (सार) :-
राजपूत या यादव दूनूँ अडि़यल जाति कहालें।
बाजी लगा जान के अपना टेक सदा निज पालें॥
एक और दुइ दुओ जाति में क्रमश: अइसन भइलें।
जे अपना करनी से आपन जाति कलंकित कइले॥
 
वीर :-
पहिले के प्रधानमंत्री अब काँगरेस अध्यइक्ष कहात।
उहे मुलायम के बाधा अब टारि रहल बाड़े दिन रात॥
जे नेहरू के नाम जगत का बड़का में बा सदा गनात।
उनका नाती राजिव से ई आशा रहे कइल ना जात॥
निज उपहास करावत बाड़े दिनदिन घटत प्रतिष्ठाा जात।
कुल के नाम डुबावत में ना बाड़े तनिक धिनात लजात॥
* * * *
के जानल कि फूलन में एतना कठोरता होई।
के जानल कि फूलन के दल दुख के बीआ बोई॥
के जानल कोमल दल फूलन के विक्रम ‍हित तरसी
आ फूलन से दुइ बरीस तक एतना गोली बरसी॥
के जानल कि फूलन का दल से एतना भय छायी।
आ ऊ अपना प्रति जनता का मन में घिन उपजायी॥
 
सवैया :-
पतियाय न केहू भले हमरा एगो सिंह विचित्र करेला देखाइल।
ओह सिंह का पेट से फूटि के दूइ गो केरा के खम्भ हवे बहिराइल।
रहि एक समान दुओ समानान्तइर नीचे की ओर हवे बढि़ आइल।
जब भूमि में आके छुवाइल तऽ दुओ केराका खम्भी में कंज फुलाइल॥
ओह सिंह का पीठि का ऊपर एक पावर हाउस हवे सिरिजाइल।
ओहि में बा मशीन कई गुण जेकर मुश्किल बा हमरा से कहाइल।
दहिने तथा बाएँ ओ हाउस से सटले गज सुण्डल बा दूगो टँगाइल।
एक मीटर ले निचहीं बढि़ के दुओ सुण्ड न में हवे कंज फलाइन।॥
एक शंख बा हाउस का उपरा जेकरा उपरा जल राशि देखात बा।
जहां तीनि गो कंजन का बिचवाँ निल पुष्पर संगे जल में लहरात बा।
दिन रात सजी रितु में सब फूल फुलाइले लौकत ना कुम्हिलात बा।
कबे लूह लगे नहीं सीत सतावत ऐसन फूलन के करामात बा॥
 
पाँचवी विभावना
 
लक्षण (सार) :-
जब विरुद्ध कारण से कवनो कार्य सिद्ध हो जाला।
तब विभावना अलंकार के पंचम भेद कहाला॥
 
उदहारण (वीर) :-
गरम खून से पूरी अयोध्याच के धरती जब इगल सिंचाइ।
सिंह मुलायम आ बी.पी. के तन दूनूँ के गइल जुड़ाइ॥
बी.पी. कुरुसी पर से गिरले लागल बड़ा जोर से घाव।
मित्र चन्द्रोशेखर का घर में बाजल अब आनंद बधाव॥
आइल खिजाँ अयोध्यार में तब पतझड़ भारीनर संहार।
बुलबुल भइल बुखारी के मन चहके लागल पाइ बहार॥
काँगरेस का ऊपर बरिसल पूस माघ के पाला ठार।
आँखि और मुँह दुओ मूँदि के सूतल कुकुर कुण्ड॥ली मार॥
 
दोहा :-
कइले युद्ध कलिंग में जब अशोक घनघोर।
तब उपजल मन में दया फइलल चारू ओर॥
सोडियम पानी में परत जरि के सजी बिलात।
जीयत चूना पाइ के पानी बा गरमात॥
बहुते धीकल तेल में यदि पानी परि जात।
बहुत भयंकर रूप धरि आगी बा बरि जात॥
जल पा के चूना कली उगिलत एतना ताप।
जल खौले लागत तुरत तपि के अपने आप॥
दुख देके सुख जात बा सुख देके दुख जात।
जरत बिना लखि शत्रु के आपन हृदय जुड़ात॥
शत्रु हृदय के जलन सुनि आपन हिय हरखात।
रिपु के हृदय फुलात सुनि आपन जिउ जरि जात॥
समदरसी बुझि राम के बालि गँववले प्रान।
शत्रुदूत सुग्रीव बुझि पवले सुख सम्मा।न॥
राति इहाँ से जाति बा करि के जग उजियार।
दिवस जात बा जगत के दे के घोर अन्हायर॥
 
सवैया :-
जब भीषम ग्रीषम में चिरई अति आतप से अकुलात हवे।
तब लोटत धीकल धूरि में शीतलता ओहि में मिलि जात हवे।
जब जाड़ विशेष परे ओहि में पछुवा सिहिके न सहात हवे।
चिरई जल ठार में जाके नहात त ओकर देहि दनात हवे॥
 
पुरवा के विछावन आ जहाँ भोजन पत्तल में अब ले परोसाला।
ऊहे प्रताप के पावनता सब राजन में सिरमौर गनाला।
पँतिहा सत्काेम करें तब आसन ओ सबके अति ऊँच दियाला।
शिशु के तुतरी बतिया सुनि के घरवालन के हृदया हरखाला॥
 
छठवी विभावना
 
लक्षण (दोहा) :-
कारण के उत्पदत्ति जब कारज से हो जात।
तब विभावना के उहाँ छठवाँ भेद कहात॥
 
उदाहरण (वीर) :-
बिनु करफ्यू तुरले जनता जब गइल रहे दस लाख बन्हाnइ।
तब कुछ लोग तूरि के करफ्यू तीर्थ अयोध्याख पहुँचल जाइ॥
पटना दिल्लीत और लखनऊ तीनूँ में कलमी सरकार।
एगो राजिव का पानी से चलत सिंचाई के बा कार॥
यदि राजिव से पानी वावल एको मिनिट बन्दे हो जाय।
तीनूँ कलम एकही साथे जइहें तुरते सूखि झुराय॥
असों अयोध्यास में बिनु कारन दीहल बा कुछ लोग मुवाइ।
जहिया केस कचहरी पहुँची जाई कुशल वकील रखाइ॥
ऊ पहिले सुनि के सब घटना धारा पढि़ ली ध्या॥न लगाइ।
तब कारज में जोहि जाहि के कारन कवनो दी उपराइ॥
 
कवित्त :-
बहुमत से पैदा होत कुर्सी परन्तुव अब
कुर्सी से पैदा होत बहुमत देखात बा।
कर्जा सरकारी माफ कैल जात जेकर बा
ओ सब के वोट ओही दाम से किनात बा।
दे के आरक्षण अधिकांश जनता के मत
ओही आरक्षण से समूचा बदलात बा।
अयोध्या् में मन्दिर निर्माण रोकि मीयन का
मत पर मोहर मनो आजे मरात बा॥
दोहा :-
गरुड़ ध्वरज पद पद्म से गंगा के अवतार।
उमा शंभु कर कंज से कर तोया के धार॥
गोली शालिग्राम से लाल नदी के धार।
बहल अयोध्यार में असों डूबल लोग हजार॥
कमल कबे कारन बनल ब्रह्मा भइले काज।
अब स्रष्टार बनि के रचें कमल कुसुम सिरताज॥
माटी के कारन बना ईंटा सदा गर्हात।
नुन्छाे लगि के ईंट से माटी पुनि बनि जात॥
कारन बनि के मेघ बा धरती के जल देत।
ऊहे जल पुनि भाप बनि रुप मेघ के लेत॥
ईश्व र कारण होइ के मानव रचे सचेत।
मनुज कल्पनना में पुन: ईश्व र के रचि लेत॥
* * *
 
सवैया :-
निज पित्रन के जब पानी प्रदान करे बदे बैठले पंडित ज्ञानी।
तब बोलल पितृ समूह कि ना जल लेब इहाँ अब लौटत बानी।
बहे पानी में मीन परंतु इहाँ तोहरा करे मीन बहावत पानी।
मछरी बहे पानी में पै तोहरा कर में मछरी जनमावत पानी॥


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