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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 50 व्याघात अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (दोहा) :-
कारन एक जहाँ करे दुइ गो उलटा कार।
अलंकार व्याँघात के होत उहाँ अवतार॥
 
वीर :-
यदि दुइ कार्य बिरूद्ध परस्पतर करि दे कर्ता दुइ या एक।
कारण किंतु एक ही हो तब उहाँ कहत व्यापघात विवेक॥
* * * *
एके कारण जहाँ परस्प र दुई गो कार्य विरुद्ध करेला।
अलंकार के नाम उहाँ तब सुकवि लोग व्याोघात धरेला।
कर्ता एक रहे या दुई गो अंतर ओसे कुछ न परेला।
कुछ कवि लोगन का माथा से एकर कई भेद उतरेला॥
 
उदाहरण (ताटंक) :-
फूलन देबी जवना डर से आत्मभसमर्पण कैली।
ओही डर से पुतली बाई सरिता पार परैली।
पूस माघ के सूर्य घाम से अतिशय सुख पहुँचावेले।
जेठ मास के सूर्य घाम से ब्यायकुल बहुत बनावेले॥
सूखा से भगवान धान के खेती खोरि जरावेले।
आ सूखा से कोदो बजड़ा टाँगुन खूब फरावेले॥
 
सार :-
जवना लोभो बेटिहा समधी कम देबे के चाहें।
ओही लोभे बेटहा समधी बढि़ के बहुत उगाहें॥
जवना बाम्हेन से बियाह के कर्म करावल जाला।
ओही बाम्हहन से सराध के पिण्ड परावल जाला॥
जे कारन से मुगल राज घटि के बिगहा से काठा।
से कारन से राजा भइले गोरा सिक्खा मराठा॥
 
दोहा :-
विज्ञानी विज्ञान से करत जगत उपकार।
विज्ञाने से बम बनत करे बदे संहार॥
सेवक बनले हीनता आ लागत बा लाज।
नेता सब बनि सेवके भोगत बाटे राज॥
पावस दे पानी प्रथम सबके करत प्रसन्न ।
किंतु बनावत मीन के ओसे मरणासन्नस॥
आगी अपना आँच से भोजन करत तेयार।
ऊहे अपना आँच से जरा देत घरबार॥
नदी देति निज बाढि़ से घर दुवार भहराय।
उपज खेत के बाढि़ से बहुते देति बढ़ाय॥
मड़ई खेतन में गिरा कृषक बनावत आड़।
मड़ई खेतन में गिरा आन्हीृ करत उजाड़।॥
पानी पा के अधिकतर धान सदा सरसात।
पानी पा के अधिक तर धान कबे सरिजात॥
केतने रोग मिटाइ के देता जीवन दान।
उहे विश्व संहार हित बम सिरजत विज्ञान॥
चिट से नेता करत बा वोट परीक्षा पास॥
पावस पानी पाई के सब तृण बा हरियात।
किंतु जवास मदार के डाढिपात विनसात॥
चीर बढ़ा के लाज रखि कइले जे उपकार।
कइले चीर चोराइ के नारि अनेक उधार॥
ताड़ी के कहि के नशा रोकले राढि़ बेसाहि।
पियले नीरा कहि उहे खूब सराहि सराहि॥
राउर मेहर बानिये सब के देत रिझाय।
घरवालन के दिल दुखी करति किंतु लजवाय॥
पा कर के चिट आन से नेता नृप बनि जात।
पा कर के चिट आन से दोषी छात्र कहात॥
 
हरिगीतिका :-
सम्भ्रां त जन जा के कहीं आदर अधिक पा जात बा।
संम्भ्रां त जन जा के कहीं कुछ बुद्धिहीन कहात बा॥
पाँचों अँगुरिया से चपत केहू के दिहल जाला कड़ा।
आ पीठ ओसे थपथपा गदगद कइल जाला बड़ा॥
 
वीर :- मुसलिम मत का लालच से बा होत इहाँ दुइ कार्य विरुद्ध।
मुसलिम मार्ग सुगम करि देता हिन्दू मार्ग करत अवरूद्ध॥
तजिया घूमे देत सभत्तर शस्त्र सजा के ढोल बजाइ।
किंतु राम के रथ रोकत बा सेना और पुलीस बुलाइ॥
मसजिद सजे हेतु जे दीहल छप्प न लाख रुपया दान।
पुरी अयोध्यात में रोकत बा ऊहे मंदिर के निरमान॥
मुसलिम के पद दाबि दाबि के देत मुलायम मोद अपार।
हिन्दूप के पद दाबि-दाबि के करत सदा बा अत्याrचार॥
* * *
सूझे सेवकाई में हिनाई के भाव केहु का
सेवक कहावे में घिनात बा लजात बा।
नेता लोग सेवक बनि किंतु सदा घूमऽता
सेवक कहावे में बहुते अगरात बा।
सेवक बने के चाव एतना सजोर बा कि
दे के जमानत आपुसे में टकराव बा।
लाठी भाला गोली आ गड़ाँस वाला गुण्डवन के
गोल ज्याादे मोल दे के सबका किनात बा॥


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