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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 51 श्लेष अलंकार पीछे     आगे

 


लक्षण (सार) :- एक शब्द या कई शब्द> मिलि कई अर्थ जब राखें।
श्ले ष नाम के अलंकार तब कवि सब ओके भाखें॥
 
उदाहरण (दोहा) :- नदी बाढि़ जल अमृत बा धरती पर साक्षात।
लाखन प्राणी के करत अक्षय जब आ जात॥
राउर मेहर बानिये सुनि जनता हरषात।
घर बालन के मन रहत लेकिन सदा लजात॥
पंछी चुरी कइसे भला यदि होई निष्प॥क्ष॥
चौपाई :-
अब अति भीषण पावक ज्वााला। गृह परित्याकगी कानन बाला।।
वीर रौद्र दुइ रस में पागी। फूलन देबी सरकस बागी।।
बाढि़ भयानक मघिया पाला। भूडोल सहित बहुरंगी माला।।
 
छप्पय छन्दn :- पंडित परम प्रवीन और अतिशय अभिमानी।
आ थौसल पशु बृद्ध खात ना उठि के सानी॥
दूनूँ आपन जगह छोडि़ कतहीं ना जाला।
यदि न मिले केहु आन भार के रोके वाला॥
दूनूँ के सेवा कइल मानल पुण्यक महान बा।
माघ मेघ में दुहुन के जीवन के अवसान बा॥
 
सवैया :-
यदि हाथ आ पाँव चलाइ के पेट चले तब बाउर बात न बा।
यदि पेट अकेले चले कहियो तब खाये के राय दियात न बा।
केतनों जरे आ कटे पेट तबो ओके दीहल ठीक बुझात न बा।
मुँह पेट दुओ जो चले सँग हीं त दवाई बिना फरियात न बा॥
यदि पेट टिके तब ठीके रही आ भरी तब होई विशेष बड़ाई।
रहते चली पेट सदा तब तऽ घरवा में जरुर दरिद्रता छायी।
केहु पेट में पैसि के काम निकाले त ऊ बहुते बुधिमान कहाई।
केहु पेट के साफ रही तब स्विस्थब रही पर नीति में फेल हो जाई॥
चढि़ के चले आन का कान्हस पै पाक निजी पगु से चले जानत नाहीं।
लखि आन के बस्तुक सदा ललचात तथा छरियात त मानत नाहीं।
नजदीक में जे रहे ओके बेचैन रखे केहु के पहिचानत नाहीं।
लरिकाह बा बुद्धि अत: मन में कुछ लाज हया डर आनत नाहीं॥
अर्थ के संग्रहना किछऊ करें और सजी रस के परित्याहगें।
अनलंकृत हो के रहें जग में विषयो से सुदूर निरन्तहर भागें।
यदि कानन में चलि जाय त जा के उहें रहि जाय बढ़े नहिं आगे।
सब बंधन से मिले मुक्ति इहे विधि से यती आ कविता नयी माँगे।
* * * *
हमरा के देखि के पलेट जो मंगावे केहु केहु उनके र हैजे हम सर्वदा मनाईले।
हमरा के जर और पियरी जे देला ओके मोती झरा देबे के विचार उर लाइले।
हमरा के चाह के जो काला पानी भेजे केहु ओके आजीवन हम जेले भेजवाईले।
दाद हर बात में जे हमरा के देत नाहीं ओके नीक सारी देखि हमना धधाईले॥
* * * *
जेकरा बदे भोजन बस्त्रा मकान हजामत भी जिनके बनवावल।
सरकार के जिम्मेब रहेला सजी जिनका सदा स्वािस्थन के जाँच करावल।
परि जाँय बीमार त कीमती आ बढि़याँ पथ और दवाई जुटावल।
सरकार का दाम से होत सजी कबे जात न एमे बिलम्बज लगावत॥
जिनके सतकार करे बदे आ के पुलीस के लोग खड़ा रहेला।
बन्ह ले चपरास तथा पगड़ा पहरा बहुते तगड़ा रहेला।
बइठे के न साँस मिले तनिको करतव्यप के भाव कड़ा रहेला।
अपना यदि क्षेत्रमें ऊ सब आ पहुँचे तब सोच बड़ा रहेला॥
जेकरा बा पसन्द अराजकता सदा जानेला जोर से गाल बजावल।
अपना कर से न करें श्रम आ पर द्रव्यक से जानेले मौज उड़ावल।
जनता रहे चैन से ई सब लोग जो जेल के जा मिहमान बनावल।
घर फोरे के जाने विशेष कला सब जानेले भीति के तूरि गिरावल॥


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