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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 54 समाधि (समाहित) अलंकार पीछे     आगे


लक्षण (दोहा) :-
अनचेतल कुछ मदत जब कर्ता कामिलि जात।
कार्य-सिद्धि बनि जा सुगम उहे समाधि कहात॥
 
चौपई :-
आकस्मिक कुछ कारण आय। कठिन कार्य दे सुगम बनाय॥
कर्ता सुगम कार्य ले साधि। ओही के कवि कहत समाधि॥
 
उदाहरण (दोहा) :-
कलम परीक्षा में चले रुकि रुकि के लाचार।
चिट कइलसि आके उहाँ सुग सिद्ध सब कार॥
हरिजन जब घर फूस के लगलें करे तेयार।
पक्‍का घर उनके तबे बनववलसि सरकार॥
 
वीर :-
एक बार कहियो गांधी जी कइलें आपन प्रगट विचार।
बरिस सवा सौ जीए खातिर मन में बाटे चाह हमार॥
तब निराश होके इहवाँ से करे बदे जल्‍दी प्रस्‍थान।
के दृढ़ निश्‍चय असमय ही में अपना मन में लिहले ठान॥
और रात दिन खोजे लगलें कवनो अवसर और उपाय।
तब तक नाथू राम आइ के गोली दिहले चारि चलाय॥
जे से गांधी जी का मन के सिद्ध भइल सहजे में काम।
क्षण भर भी देरी ना लागल तुरत पहुँचि गइले सुरधाम॥
 
चौपई :-
भारत माँगत आपन राज। दे न किंतु अंगरेजी राज॥
मँगवैयन के कड़ी सजाय। दे सब नीति धर्म बिसराय॥
उदित भइल सब हिटलर बीर। लखि के दुनियाँ भइल अधीर॥
इटली जर्मन और जपान। से सब राष्‍ट्र भइल हैरान॥
विश्‍व युद्ध दूसरा घनघोर। लड़ल बृटेन भइल कमजोर॥
चरमर भइल ब्रिटिश सम्राज्‍य। मुश्किल भइल बचावल ताज॥
बिना युद्ध आ बिनु एतराज। भारत के मिलि गइल सुराज॥
लेनिन का मुवला का बाद। गद्दी करे बदे आबाद॥
इस्‍टालिन का मन में चाह। भइल बनी शासक अगताह॥
लेकिन लेनिन के विश्‍वास। ट्राटस्‍की पर करे निवास॥
ट्राटस्‍की के ले के पक्ष। उनके अधिक मानि के दक्ष॥
कागज पत्र करा तइयार। कइल गइल सब बिधि व्‍यवहार॥
लेकिन इस्‍ताक्षर का बेर। बस एकाध मिनट सँवकेर॥
लकवा आ के दिहलसि मारि। लेनिन दिहले स्‍वर्ग सिधारि॥
हस्‍ताक्षर बिनु बिगड़ल कार। कइल धइल सब भइल बेकार॥
इस्‍टालिन के पथ आसान। अकस्‍मात कइले भगवान॥
गइल बिघ्‍न सब दूर दराज।इस्‍टालिन पा गइले राज॥
कुछ दिन पहिले के हऽ बात। लंदन नगर जगत विख्‍यात॥
बसल रहे बिल्‍कुल बेढंग। सड़क नगर में बहुते तंग॥
कहीं स्‍वच्‍छता के ना नाम। बुद्धि करे ना केहु के काम ॥
सोझ साफ आ चाकर राह । करे बदे सरकारी चाह॥
केतने बार भइल उत्‍पन्‍न। लेकिन हो न सकल सम्‍पन्‍न॥
केहु प्रभावशाली के भौन। परे सड़क पर तब सब मौन॥
कार उहाँ आ के रुकि जाय। ना केहु पावे भौन हटाय॥
जागल तबे नगर के भागि। अकस्‍मात जब लागल आगि॥
जरल छोट बड़ सजी मकान। पूरा शहर बनल मैदान॥
तब आसानी से सरकार। कइलसि पूरा नगर सुधार॥
नया ढंग से नगर बसाइ। दिहलसि सब के सुखी बनाइ॥
बस्‍ती बिरल सड़क चकराह। जहाँ सभत्तर पौन प्रवाह॥


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