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कविता

गीतावली
तुलसीदास


आज सुदिन सुभ घरी सुहाई
राग आसावरी


आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई |
रूप-सील-गुन-धाम राम नृप-भवन प्रगट भए आई ||
अति पुनीत मधुमास, लगन-ग्रह-बार-जोग-समुदाई |
हरषवन्त चर-अचर, भूमिसुर-तनरुह पुलक जनाई ||
बरषहिं बिबुध-निकर कुसुमावलि, नभ दुन्दुभी बजाई |
कौसल्यादि मातु मन हरषित, यह सुख बरनि न जाई ||
सुनि दसरथ सुत-जनम लिये सब गुरुजन बिप्र बोलाई |
बेद-बिहित करि क्रिया परम सुचि, आनँद उर न समाई ||
सदन बेद-धुनि करत मधुर मुनि, बहु बिधि बाज बधाई |
पुरबासिन्ह प्रिय-नाथ-हेतु निज-निज सम्पदा लुटाई ||
मनि-तोरन, बहु केतुपताकनि, पुरी रुचिर करि छाई |
मागध-सूत द्वार बन्दीजन जहँ तहँ करत बड़ाई ||
सहज सिङ्गार किये बनिता चलीं मङ्गल बिपुल बनाई |
गावहिं देहिं असीस मुदित, चिर जिवौ तनय सुखदाई ||
बीथिन्ह कुङ्कम-कीच, अरगजा अगर अबीर उड़ाई |
नाचहिं पुर-नर-नारि प्रेम भरि देहदसा बिसराई ||
अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरुप अधिकाई |
देत भूप अनुरुप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ||
सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई |
सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ||
जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई |
सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौं गाई ||
जे रघुबीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई |
अबिरल अमल अनुप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ||

 

सहेली सुनु सोहिलो रे राग जैतश्री 


सहेली सुनु सोहिलो रे |
सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज |
पूत सपूत कौसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ||
चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु |
नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ||
ब्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल|
सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ||
भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान |
जहँ-तहँ सजहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ||
सीञ्चि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार |
दल फल फूल दूब दधि रोचन, घर-घर मङ्गलचार ||
सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत |
लिये बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ||
जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिये महिदेवन दान |
तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ||
आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ |
उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहै कबि कोइ ||
सजि आरती बिचित्र थारकर जूथ-जूथ बरनारि |
गावत चलीं बधावन लै लै निज-निज कुल अनुहारि ||
असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद |
नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ||
लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति-भाँति भरि भार |
करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राजदुवार ||
गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज|
जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ||
घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार |
नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ||
नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग |
मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ||
उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान |
सुनि किन्नर गन्धरब सराहत, बिथके हैं, बिबुध-बिमान ||
कुङ्कुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल-अबीर |
नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भै मन भावति भीर ||
बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद |
दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ||
बाह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान |
निकसत पैठत लोग परसपर बोलत लगि लगि कान ||
बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषि पुर-सुमुखि समान |
बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ||
कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास |
कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस-बिबस रनिवास ||
रानिन दिए बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार |
मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ||
बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ |
सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ||
अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं |
समौ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ||
को कहि सकै अवधबासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह |
सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ||
सिव-बिरञ्चि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग |
तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ||

 

आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए
राग बिलावल


आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए |
सदन-सदन सोहिलो सोहावनो, नभ अरु नगर-निसान हए ||
सजि-सजि जान अमर-किन्नर-मुनि जानि समय-सम गान ठए |
नाचहिं नभ अपसरा मुदित मन, पुनि-पुनि बरषहिं सुमन-चए ||
अति सुख बेगि बोलि गुरु भूसुर भूपति भीतर भवन गए |
जातकरम करि कनक, बसन, मनि भूषित सुरभि-समूह दए ||
दल-फल-फूल, दूब-दधि-रोचन, जुबतिन्ह भरि-भरि थार लए |
गावत चलीं भीर भै बीथिन्ह, बन्दिन्ह बाँकुरे बिरद बए ||
कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहँ तहँ बन्दनवार नए |
भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं, सकल लोक एक रङ्ग रए ||
उमगि चल्यौ आनन्द लोक तिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए |
तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए

 

गावैं बिबुध बिमल बर बानी

जैतश्री

गावैं बिबुध बिमल बर बानी |
भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ||
मास, पाख, तिति, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी |
जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ||
बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी |
ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद रजधानी ||
अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगतबिषाद-गलानी |
मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ||
देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी |
मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ||
पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी |
"यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी ||
दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी |
भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ||
गावत-नाचत, मो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी |
देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ||
गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी |
हरि बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ||
आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी |
आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ||
बिभव-बिलास-बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी |
कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ||
छठी-बारहौं लोक-बेद-बिधि करि सुबिधान बिधानी |
राम-लषन-रिपुदवन-भरत धरे नाम ललित गुर ग्यानी ||
सुकृत-सुमन तिल-मोद बासि बिधि जतन-जन्त्र भरि घानी |
सुख-सनेह सब दिये दसरथहि खरि खलेल थिर-थानी ||
अनुदिन उदय-उछाह, उमग जग, घर-घर अवध कहानी |
तुलसी राम-जनम-जस गावत सो समाज उर आनी ||

 

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज
राग केदारा


घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज |
सगुन सोहावने मुदित-मन कर सब निज-निज काज ||
निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी |
गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकैं बिधि घनी ||
चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी |
सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ||
चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज |
उडुगन अवलि प्रकासहीं, उमगत आनँद आज ||
आनन्द उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै |
गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरषत आइकै ||
नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परसपर सचु पाइकै |
रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ||
जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि |
मङ्गल-मोद-मढ़ी मुरति नृपके बालक चारि ||
मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई |
अनुरुप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ||
तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई |
किए नीन्द-भामिनि जागरन, अभिरामिनी जामिनि भई ||
सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान |
मुनिबर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ||
बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै |
बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ||
जे देव-देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै |
ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ||
सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग |
बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ||
जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये |
जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ||
ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिङ्गे, नेवते दिये |
ते धन्य पुन्य-पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ||
भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिं |
तिय-बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिं ||
अनिमादि, सारद, सैलनन्दिनि बाल लालहि पालहीं |
भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ||
निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं |
तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लहीं ||

 

नामकरण
बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए
राग जैतश्री


बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए |
नामकरन रघुबरनिके नृप सुदिन सोधाए ||
पाय रजायसु रायको ऋषिराज बोलाए |
सिष्य-सचिव-सेवक-सखा सादर सिर नाए ||
साधु सुमति समरथ सबै सानन्द सिखाए |
जल, दल, फल, मनि-मूलिका, कुलि काज लिखाए ||
गनप-गौरि-हर पूजिकै गोवृन्द दुहाए |
घर-घर मुद मङ्गल महा गुन-गान सुहाए ||
तुरत मुदित जहँ तहँ चले मनके भए भाए |
सुरपति-सासनु घन मनो मारुत मिलि धाए ||
गृह, आँगन, चौहट, गली, बाजार बनाए |
कलस, चँवर, तोरन, धुजा, सुबितान तनाए ||
चित्र चारु चौकैं रचीं, लिखि नाम जनाए |
भरि-भरि सरवर-बापिका अरगजा सनाए ||
नर-नारिन्ह पल चारिमें सब साज सजाए |
दसरथ-पुर छबि आपनी सुरनगर लजाए ||
बिबुध बिमान बनाइकै आनन्दित आए |
हरषि सुमन बरसन लगे, गए धन जनु पाए ||


बरे बिप्र चहुँ बेदके, रबिकुल-गुर ग्यानी |
आपु बसिष्ठ अथरबणी, महिमा जग जानी ||
लोक-रीति बिधि बेदकी करि कह्यो सुबानी-
"सिसु-समेत बेगि बोलिए कौसल्या रानी ||
सुनत सुआसिनि लै चलीं गावत बड़भागीं |
उमा-रमा, सारद-सची लखि सुनि अनुरागीं ||
निज-निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि सङ्ग लागीं |
तेहि अवसर तिहु लोककी सुदसा जनु जागीं ||
चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं |
गोद मोद-मूरति, लिए, सुकृती जन जोहैं ||
सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं |
सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं ? ||
लगे पढ़न रच्छा-ऋचा ऋषिराज बिराजे |
गगन सुमन-झरि, जय-जय, बहु बाजन बाजे ||
भए अमङ्गल लङ्कमें, सङ्क-सङ्कट गाजे |
भुवन चारिदसके बड़े दुख-दारिद भाजे ||
बाल बिलोकि अथरबणी हँसि हरहि जनायो |
सुभको सुभ, मोद मोदको, राम नाम सुनायो ||
आलबाल कल कौसिला, दल बरन सोहायो |
कन्द सकल आनन्दको जनु अंकुर आयो ||
जोहि, जानि, जपि जोरिकै करपुट सिर राखे |
"जय जय जय करुनानिधे! सादर सुर भाषे ||
"सत्यसन्ध ! साँचे सदा जे आखर आषे |
प्रनतपाल ! पाए सही, जे फल अभिलाषे ||
भूमिदेव देव देखिकै नरदेव सुखारी |
बोलि सचिव सेवक सखा पटधारि भँडारी ||
देहु जाहि जोइ चाहिए सनमानि सँभारी |
लगे देन हिय हरषिकै हेरि-हेरि हँकारी ||
राम-निछावरि लेनको हठि होत भिखारी |
बहुरि देत तेहि देखिए मानहुँ धनधारी ||
भरत लषन रिपुदवनहूँ धरे नाम बिचारी |
फलदायक फल चारिके दसरथ-सुत चारी ||
भए भूप बालकनिके नाम निरुपम नीके |
सबै सोच-सङ्कट मिटे तबतें पुर-तीके ||
सुफल मनोरथ बिधि किए सब बिधि सबहीके |
अब होइहै गाए सुने सबके तुलसीके ||

 

दुलार

सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये
राग बिलावल 

सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये |
बार-बार बिधुबदन बिलोकति लोचन चारु चकोर किये ||
कबहुँ पौढ़ि पयपान करावति, कबहूँ राखति लाइ हिये |
बालकेलि गावति हलरावति, पुलकति प्रेम-पियूष पिये ||
बिधि-महेस, मुनि-सुर सिहात सब, देखत अंबुद ओट दिये |

तुलसिदास ऐसो सुख रघुपति पै काहू तो पायो न बिये ||
 

कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार 
राग आसावरी 

कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार |
बिबिध खेलौना, किङ्किनी, लागे मञ्जुल मुकुताहार ||
रघुकुल-मण्डन राम लला ||
जननि उबटि, अन्हवाइकै, मनिभूषन सजि लिये गोद |
पौढ़ाए पटु पालने, सिसु निरखि मगन मन मोद ||
दसरथनन्दन राम लला ||
मदन, मोरकै चन्दकी झलकनि, निदरति तनु जोति |
नील कमल, मनि जलदकी उपमा कहे लघु मति होति ||
मातु-सुकृत-फल राम लला ||
लघु, लघु लोहित ललिक हैं पद, पानि, अधर एक रङ्ग |
को कबि जो छबि कहि सकै नखसिख सुन्दर सब अंग ||
परिजन-रञ्जन राम लला ||
पग नूपुर कटि किङ्किनी, कर-कञ्जनि पहुँची मञ्जु |
हिय हरि नख अदभुत बन्यो मानो मनसिज मनि-गन-गञ्जु ||
पुरजन-सिरमनि राम लला ||
लोयन नील सरोजसे, भ्रूपर मसिबिन्दु बिराज |
जनु बिधु-मुख-छबि-अमियको रच्छक राखै रसराज ||
सोभासागर राम लला ||
गभुआरी अलकावली लसै, लटकन ललित ललाट |
जनु उडुगन बिधु मिलनको चले तम बिदारि करि बाट ||
सहज सोहावनो राम लला ||
देखि खेलौना किलकहीं, पद पानि बिलोचन लोल |
बिचित्र बिहँग अलि-जलज ज्यों सुखमा-सर करत कलोल ||
भगत-कलपतरु राम लला ||
बाल-बोल बिनु अरथके सुनि देत पदारथ चारि |
जनु इन्ह बचनन्हितें भए सुरतरु तापस त्रिपुरारि ||
नाम-कामधुक राम लला ||
सखी सुमित्रा वारहीं मनि भूषन बसन बिभाग |
मधुर झुलाइ मल्हावहीं गावैं उमँगि उमँगि अनुराग ||
हैं जग-मङ्गल राम लला ||
मोती जायो सीपमें अरु अदिति जन्यो जग-भानु |
रघुपति जायो कौसिला गुन-मङ्गल-रूप-निधान ||
भुवन-बिभूषन राम लला ||
राम प्रगट जबतें भए गए सकल अमङ्गल-मूल |
मीत मुदित, हित उदित हैं, नित बैरिनके चित सूल ||
भव-भय-भञ्जन राम लला ||
अनुज-सखा-सिसु सङ्ग लै खेलन जैहैं चौगान |
लङ्का खरभर परैगी, सुरपुर बाजिहैं निसान ||
रिपुगन-गञ्जन राम लला ||
राम अहेरे चलहिङ्गे जब गज रथ बाजि सँवारि |
दसकन्धर उर धुकधुकी अब जनि धावै धनु-धारि ||
अरि-करि-केहरि राम लला ||
गीत सुमित्रा सखिन्हकै सुनि सुनि सुर मुनि अनुकूल |
दै असीस जय जय कहैं हरषैं बरषैं फूल ||
सुर-सुखदायक राम लला ||
बालचरितमय चन्द्रमा यह सोरह-कला-निधान |
चित-चकोर तुलसी कियो कर प्रेम-अमिय-रसपान ||
तुलसीको जीवन राम लला ||


पालने रघुपति झुलावै
राग कान्हरा 


पालने रघुपति झुलावै |
लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ||
केकिकण्ठ दुति स्यामबरन बपु, बाल-बिभूषन बिरचि बनाए |
अलकैं कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ||
सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए |
मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ||
उपर अनूप बिलोकि खेलौना किलकत पुनि-पुनि पानि पसारत |
मनहुँ उभय अंभोज अरुन सों बिधु-भय बिनय करत अति आरत ||
तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुञ्जत, सुछबि न जाति बखानी |
मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसद सुजस बरनत बर बानी ||
पालने रघुपति झुलावै |
लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ||
केकिकण्ठ दुति स्यामबरन बपु, बाल-बिभूषन बिरचि बनाए |
अलकैं कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ||
सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए |
मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ||
उपर अनूप बिलोकि खेलौना किलकत पुनि-पुनि पानि पसारत |
मनहुँ उभय अंभोज अरुन सों बिधु-भय बिनय करत अति आरत ||
तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुञ्जत, सुछबि न जाति बखानी |
मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसद सुजस बरनत बर बानी ||


झूलत राम पालने सोहै
राग बिलावल 


झूलत राम पालने सोहैं | भूरि-भाग जननीजन जोहैं ||
तन मृदु मञ्जुल मेचकताई | झलकति बाल बिभूषन झाँई ||
अधर-पानि-पद लोहित लोने | सर-सिङ्गार-भव सारस सोने ||
किलकत निरखि बिलोल खेलौना | मनहुँ बिनोद लरत छबि छौना ||
रञ्जित-अंजन कञ्ज-बिलोचन | भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ||
लस मसिबिन्दु बदन-बिधु नीको | चितवत चितचकोर तुलसीको ||


राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम
राग कल्याण 

राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम,
कौतुकी कृपालु ब्रह्म जानु-पानि-चारी |
नीलकञ्ज-जलदपुञ्ज-मरकतमनि-सरिस स्याम,
काम कोटि सोभा अंग अंग उपर बारी ||
हाटक-मनि-रत्न-खचित रचित इंद्र-मन्दिराभ,
इंदिरानिवास सदन बिधि रच्यो सँवारी |
बिहरत नृप-अजिर अनुज सहित बालकेलि-कुसल,
नील-जलज-लोचन हरि मोचन भय भारी ||
अरुन चरन अंकुस-धुज-कञ्ज-कुलिस-चिन्ह रुचिर,
भ्राजत अति नूपुर बर मधुर मुखरकारी |
किङ्किनी बिचित्र जाल, कम्बुकण्ठ ललित माल,
उर बिसाल केहरि-नख, कङ्कन करधारी ||
चारु चिबुक नासिका कपोल, भाल तिलक, भ्रुकुटि,
श्रवन अधर सुन्दर, द्विज-छबि अनूप न्यारी |
मनहुँ अरुन कञ्ज-कोस मञ्जुल जुगपाँति प्रसव,
कुन्दकली जुगल जुगल परम सुभ्रवारी ||
चिक्कन चिकुरावली मनो षडङ्घ्रि-मण्डली,
बनी, बिसेषि गुञ्जत जनु बालक किलकारी |
इकटक प्रतिबिम्ब निरखि पुलकत हरि हरषि हरषि,
लै उछङ्ग जननी रसभङ्ग जिय बिचारी ||
जाकहँ सनकादि सम्भु नारदादि सुक मुनीन्द्र,
करत बिबिध जोग काम क्रोध लोभ जारी |
दसरथ गृह सोइ उदार, भञ्जन संसार-भार,
लीला अवतार तुलसिदास-त्रासहारी ||


आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए -तुलसीदास
राग कान्हरा 


आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए|
नील-जलद तनु-स्याम राम-सिसु जननि निरखि मुख निकट बोलाए ||
बन्धुक सुमन अरुन पद-पङ्कज अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए |
नूपुर जनु मुनिबर-कलहंसनि रचे नीड़ दै बाँह बसाए ||
कटिमेखल, बर हार ग्रीव-दर, रुचिर बाँह भूषन पहिराए |
उर श्रीवत्स मनोहर हरिनख हेम मध्य मनिगन बहु लाए ||
सुभग चिबुक, द्विज, अधर, नासिका, श्रवन, कपोल मोहि अति भाए |
भ्रू सुन्दर करुनारस-पूरन, लोचन मनहु जुगल जलजाए ||
भाल बिसाल ललित लटकन बर, बालदसाके चिकुर सोहाए |
मनु दोउ गुर सनि कुज आगे करि ससिहि मिलन तमके गन आए ||
उपमा एक अभूत भई तब जब जननी पट पीत ओढ़ाए |
नील जलदपर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनो तड़ित छपाए ||
अंग-अंगपर मार-निकर मिलि छबि समूह लै-लै जनु छाए |
तुलसिदास रघुनाथ रूप-गुन तौ कहौं जो बिधि होहिं बनाए ||


रघुबर बाल छबि कहौं बरनि -तुलसीदास
राग केदारा 


रघुबर बाल छबि कहौं बरनि |
सकल सुखकी सींव, कोटि-मनोज-सोभाहरनि ||
बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि |
रुचिर नूपुर किङ्किनी मन हरति रुनझुनु करनि ||
मञ्जु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि |
जनु सुभग सिङ्गार सिसु तरु फर्यो है अदभुत फरनि ||
भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि |
रहे कुहरनि सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ||
लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि |
जनु जलज-सम्पुट सुछबि भरि-भरि धरति उर धरनि ||
पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि |
बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि ||

नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि |
चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ||
बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि |
परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ||
झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि हठि लरनि |
तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ||
सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि |
लेति भरि भरि अंक सैन्तति पैन्त जनु दुहु करनि ||
चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि |
चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ||


छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई
राग आसावरी 

छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई |
सानुज भरत लाल लषन राम लोने लोने
लरिका लखि मुदित मातु समुदाई ||
बाल बसन भूषन धरे, नख-सिख छबि छाई |
नील पीत मनसिज-सरसिज मञ्जुल
मालनि मानो है देहनितें दुति पाई ||
ठुमुकु ठुमुकु पग धरनि, नटनि, लरखरनि सुहाई |
भजनि, मिलनि, रुठनि, तूठनि, किलकनि,
अवलोकनि, बोलनि बरनि न जाई ||
जननि सकल चहुँ ओर आलबाल मनि-अँगनाई |
दसरथ-सुकृत बिबुध-बिरवा बिलसत
बिलोकि जनु बिधि बर बारि बनाई ||
हरि बिरञ्चि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई |
सुख-समाज रघुराजके बरनत
बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ||
सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई |
तुलसिदास अनुराग अवध आनँद
अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ||

 

आँगन खेलत आनँदकन्द
राग बिलावल 


आँगन खेलत आनँदकन्द | रघुकुल-कुमुद-सुखद चारु चन्द ||
सानुज भरत लषन सँग सोहैं | सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं |
तन दुति मोरचन्द जिमि झलकैं | मनहुँ उमगि अँग-अँग छबि छलकैं ||
कटि किङ्किनि पग पैजनि बाजैं | पङ्कज पानि पहुँचिआँ राजैं |
कठुला कण्ठ बघनहा नीके | नयन-सरोज-मयन-सरसीके ||
लटकन लसत ललाट लटूरीं | दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रुरीं |
मुनि-मन हरत मञ्जु मसि बुन्दा | ललित बदन बलि बाल मुकुन्दा ||
कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं | निरखत मातु मुदित मन फूलीं |
गहि मनिखम्भ डिम्भ डगि डोलत | कल बल बचन तोतरे बोलत ||
किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिम्बनि | देत परम सुख पितु अरु अंबनि |
सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है | गावत प्रेम पुलकि तुलसी है ||

 

ललित सुतहि लालति सचु पाये
राग कान्हरा 


ललित सुतहि लालति सचु पाये |
कौसल्या कल कनक अजिर महँ सिखवति चलन अँगुरियाँ लाये ||
कटि किङ्किनी, पैजनी पायनि बाजति रुनझुन मधुर रेङ्गाये |
पहुँची करनि, कण्ठ कठुला बन्यो केहरि नख मनि-जरित जराये ||
पीत पुनीत बिचित्र झँगुलिया सोहति स्याम सरीर सोहाये |
दँतियाँ द्वै-द्वै मनोहर मुख छबि, अरुन अधर चित लेत चोराये ||
चिबुक कपोल नासिका सुन्दर, भाल तिलक मसिबिन्दु बनाये |
राजत नयन मञ्जु अंजनजुत खञ्जन कञ्ज मीन मद नाये ||
लटकन चारु भ्रुकुटिया टेढ़ी, मेढ़ी सुभग सुदेस सुभाये |
किलकि किलकि नाचत चुटकी सुनि, डरपति जननि पानि छुटकाये ||
गिरि घुटुरुवनि टेकि उठि अनुजनि तोतरि बोलत पूप देखाये |
बाल-केलि अवलोकि मातु सब मुदित मगन आनँद न अमाये ||
देखत नभ घन-ओट चरित मुनि जोग समाधि बिरति बिसराये |
तुलसिदास जे रसिक न यहि रस ते नर जड जीवत जग जाये ||


छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी
राग ललित 

छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी
नख-जोति मोती मानो कमल-दलनिपर |
ललित आँगन खेलैं, ठुमुकु ठुमुकु चलैं,
झुँझुनु झुँझुनु पाँय पैजनी मृदु मुखर ||
किङ्किनी कलित कटि हाटक जटित मनि,
मञ्जु कर-कञ्जनि पहुँचियाँ रुचिरतर |
पियरी झीनी झँगुली साँवरे सरीर खुली,
बालक दामिनि ओढ़ी मानो बारे बारिधर ||
उर बघनहा, कण्ठ कठुला, झँडूले केश,
मेढ़ी लटकन मसिबिन्दु मुनि-मन-हर |
अंजन-रञ्जित नैन, चित चोरै चितवनि,
मुख-सोभापर वारौं अमित असमसर ||
चुटकी बजावती नचावती कौसल्या माता,
बालकेलि गावती मल्हावती सुप्रेम-भर |
किलकि किलकि हँसैं, द्वै-द्वै दँतुरियाँ लसैं,
तुलसीके मन बसैं तोतरे बचन बर ||

सादर सुमुखि बिलोकि राम-सिसुरूप, अनूप भूप लिये कनियाँ |
सुदंर स्याम सरोज बरन तनु, नखसिख सुभग सकल सुखदनियाँ ||
अरुन चरन नखजोति जगमगति, रुनझुनु करति पाँय पैञ्जनियाँ |
कनक-रतन-मनि जटित रटति कटि किङ्किनि
कलित पीतपट-तनियाँ ||
पहुँची करनि, पदिक हरिनख उर, कठुला कण्ठ, मञ्जु गजमनियाँ |
रुचिर चिबुक, रद, अधर मनोहर, ललित
नासिका लसति नथुनियाँ ||
बिकट भ्रुकुटि, सुखमानिधि आनन, कल
कपोल, काननि नगफनियाँ |
भाल तिलक मसिबिन्दु बिराजत, सोहति सीस लाल चौतनियाँ ||
मनमोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन-हरनि हँसनि किलकनियाँ |
बाल सुभाय बिलोल बिलोचन, चोरति चितहि चारु चितवनियाँ ||
सुनि कुलबधू झरोखनि झाँकति रामचन्द्र-छबि चन्दबदनियाँ |
तुलसीदास प्रभु देखि मगन भईं प्रेमबिबस कछु सुधि न अपनियाँ ||


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हिंदी समय में तुलसीदास की रचनाएँ