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कविता

असल बाजार में
अरविंद कुमार खेड़े


मुझमें अपने होने का भाव नहीं है
मुझमें अपने खोने का मलाल नहीं है
जबकि नकली चीजों का बाजार गर्म है
मैं भी इस नकली बाजार में
नकली चेहरा। नकली आँखे। नकली कान लिए
घूमता-फिरता हूँ
मैं अपने असल को
अपने घर में बंद कर कुंडी लगाए
कुंडी पर मजबूत ताला जड़
कैद कर आता हूँ
जब भी निकलता हूँ घर से
एक दिन भूल से खुली रह गई थी कुंडी
मेरा असल निकल पड़ा बाजार में
मैं जब अपने नकल के साथ लौटा तो
घर से गायब था मेरा असल
मैंने घर का कोना-कोना छान मारा
सर पकड़ कर बैठ गया हताश
आज मारा जाएगा मेरा असल
इतने में लहूलुहान लौटा
हाँफ रहा था बेतहाशा
जैसे जान बचाकर भागता आया हो
आते ही अंदर से बंद कर दी कुंडी
उबल पड़ा मुझ पर -
तुमने बताया नहीं
असल को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर
इनाम घोषित किया गया है
अब तुम निश्चिंत रहो
अब तुम्हे न कुंडी लगाने की जरूरत है
न ताला जड़ने की जरूरत पड़ेगी
अब मैं शान से बाहर निकलता हूँ
नकल को धारण किए
इस सफल नकली बाजार में
दुनिया हतप्रभ है मेरी नकल पर।


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