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लेख

चीमामांडा : सूक्ष्म नस्लवाद को उधेड़ती रचनाकार
विजय शर्मा


नस्लवाद की बखिया उधेड़ने वाली, नारीवादी, नाइजीरियन, अफ्रीकन, वैश्विक रचनाकार चीमामांडा एन. अदिचि को सबसे पहले मैंने यू-ट्यूब पर देखा-सुना था। 2009 में अपने भाषण में वे बता रही थीं कि एकल कहानी खतरनाक होती है। वे कहती हैं कि हम सब एक एकल कहानी के साथ बड़े होते हैं। यह कहानी पूरी नहीं, एक पक्षीय होती है। अपने जीवन और अनुभव से वे खूब सारे उदाहरण दे कर अपनी इस बात को सिद्ध करती हैं। वे बताती हैं कि उनके घर में काम करने वाले लड़के के विषय में उनकी माँ कहा करती कि वह बहुत गरीब है, माँ उसे खाना-कपड़ा दिया करती थीं। बच्चों के मन में भी उसके लिए दया की भावना थी। एक दिन चीमामांडा को उस नौकर के घर जाने का अवसर मिला। वहाँ उस नौकर की माँ ने अपने हाथ से बनाई हुई घास की खूबसूरत डलिया उन्हें दिखाई। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि जिसे वे गरीब, बेचारा सोच रही थीं वे लोग भी इतने बड़े कलाकार हो सकते हैं। वे बेचारगी के पात्र कदापि नहीं हैं।

अपने इसी भाषण में वे एक और उदाहरण देती हैं। जब वे पढ़ने के लिए अमेरिका गईं तो उनकी रूममेट को यह जान कर बहुत आश्चर्य हुआ कि चीमामांडा बड़ी अच्छी अँग्रेजी जानती हैं। वह लड़की सोचती थी कि अफ्रीकन लोग गवारूँ-अनपढ़ होते हैं और अँग्रेजी जैसी उन्नत भाषा नहीं जानते हैं। वे इसे सीख नहीं सकते हैं। वे अपने भाषण में एकांगी कहानी के अनेक उदाहरण देती हैं। उनका यह भाषण हमें सोचने पर मजबूर करता है क्योंकि हम सब एकांगी कहानियों के साथ बड़े होते हैं। स्वयं को कहानी कहनेवाला मानने वाली चीमामांडा एन. अदिचि कहती हैं कि एकांगी कहानियाँ बहुत खतरनाक होती हैं।

मैं उनके बोलने, बोलने की अदा और विचारों तथा तर्क की मुरीद हो गई। फिर खोज-खोज कर पढ़ना शुरू किया। सूक्ष्म निरीक्षण, जीवन का गहन अनुभव, अस्मिता की तड़प, आत्मविश्वास, शब्दों - भाषा पर गजब का अधिकार सबने मुझे प्रभावित किया। कई कहानियाँ सोच के नए द्वार खोल गईं। इतनी अच्छी लगीं कहानियाँ कि कई कहानियों का एक-एक बैठक में अनुवाद कर डाला। लगा सबको पढ़ा डालूँ।

उनके उपन्यास 'पर्पल हैबिस्कस' ने हिला कर रख दिया। अक्सर उपन्यासों-कहानियों में पिता महान होता है, उसकी कोई कमी, कोई बुराई बच्चों को नजर नहीं आती है। 'पर्पल हैबिस्कस' की 15 वर्षीय कांबिली का किशोर हृदय बहुत कुछ देखता है, कुछ समझता है, कुछ नहीं। परंतु उसे पिता का दोमुँहा व्यवहार समझ में आता है। चिनुआ अचेबे भी धर्म की कट्टरता की बात करते हैं लेकिन बहुत नरम तरह से। चीमामांडा धार्मिक कट्टरता की पराकाष्ठा दिखाती हैं। अपने पोषित धर्म की राह पर पत्नी-बच्चों को जबरदस्ती, अत्याचार के साथ चलाना कहाँ की धार्मिकता है? कांबिली का पिता धर्म को ले कर इस तरह आविष्ट है कि उसे बात-बात पर पत्नी-बच्चों पर बेल्ट चलाने में कोई गुरेज नहीं है। क्या धर्म मनुष्य को क्रूर बनाता है? हाँ, अंध धर्म मनुष्य को क्रूर और शातिर बनाता है। व्यक्ति खुद इस बात से बेखबर होता है और धर्म के नाम पर शोषण-दमन करता चला जाता है।

अफ्रीका की भयंकर हारमैट्टन हवाओं से अधिक भयंकर है पापा का शाब्दिक, मानसिक और शारीरिक अत्याचार। बंद घर में क्या चलता है बाहर इसकी कोई हवा नहीं लगती है। पारिवारिक हिंसा - दहशत, घर का दमघोटू वातावरण हर पन्ने पर बिखरा हुआ है। हारमैट्टन का चित्रण कुशलता से हुआ है, पापा की करतूतें उसी योग्यता से वर्णित हैं। अफ्रीका में कई समुदाय थे, उनके अपने रीति-रिवाज, धर्म-विश्वास थे। यूरोपीय मिशनरी के साथ अफ्रीका में ईसाइयत का आगमन हुआ। मिशनरियों ने बड़े सधे और क्रमबद्ध तरीके से अफ्रीका की संस्कृति-सभ्यता-इतिहास को मिटा कर एक नई संस्कृति-सभ्यता-धर्म वहाँ रोप दिया। नया मुल्ला प्याज अधिक खाता है क्योंकि उसे खुद को मुसलमान सिद्ध करना होता है। इसी तरह नव परिवर्तित अफ्रीकी कुछ अधिक ही ईसाई होता। उसे सारी पश्चिमी चीजें-बातें उच्च स्तर की लगतीं और सारी देसी बातें-चीजें निम्न स्तर की। उसे अपने धर्मांतरण को उचित सिद्ध करना होता है। वह यह जाने-अनजाने दोनों स्तरों पर करता है। उपन्यास का पापा एक ऐसा ही व्यक्ति है जिसके लिए पश्चिमी जीवन पद्धति अपनाना जीवन की सार्थकता है।

नाइजीरिया का नया स्वर चीमामांडा एन. अदिचि का जन्म इग्बो समुदाय में 17 सितम्बर 1977 को निसुका शहर में हुआ, नाइजीरिया विश्वविद्यालय इसी इलाके में स्थित है। छह भाई-बहनों में उनका नंबर पाँचवाँ है। उनके पिता जेम्स नोई यूनिवर्सिटी में स्टैटिस्टिक्स के प्रोफेसर थे जबकि माँ ग्रेस इफ्यूमा वहाँ की पहली महिला रजिस्ट्रार थीं। अनाम्रा राज्य के आबा में उनका पैत्रिक गाँव है। विश्वविद्यालय के वातावरण में पलने-बढ़ने का नतीजा है उनकी रचनाओं में अक्सर विश्वविद्यालय का वातावरण चित्रित होना। पहले वे नाइजीरिया यूनिवर्सिटी में मेडिसिन तथा फार्मेसी की पढ़ाई कर रही थीं लेकिन बाद में उन्होंने कनेक्टीकट यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। कम्यूनिकेशन तथा पोलिटिकल साइंस उनके विषय थे। मेडिसिन की पढ़ाई करते समय वे कॉलेज की मैगजीन 'कैंपस' का संपादन कर रही थीं, यह मैगजीन कॉलेज के कैथोलिक छात्रों द्वारा निकाली जाती थी। 19 साल की उम्र में पहले वे अमेरिका की ड्रेसेल यूनिवर्सिटी में गई लेकिन बाद में उन्होंने एस्टर्न कनेक्टीकट स्टेट यूनिवर्सिटी में तबादला करवा लिया क्योंकि वहाँ पास में उनकी बहन रहती थी। बहन मैडिकल प्रेक्टिस करती थी। चीमामांडा ने 2003 में अपनी मास्टर डिग्री ली। यह उन्हें क्रियेटिव राइटिंग के लिए जॉन्स होप्किंस यूनिवर्सिटी से मिली। फिर 2008 में अफ्रीकन स्टडी में येल यूनिवर्सिटी से एक और मास्टर डिग्री हासिल की। वे शादीशुदा हैं और अपना समय नाइजीरिया तथा अमेरिका में व्यतीत करती हैं जहाँ वे लेखन से संबंधित कार्यशालाएँ चलाती हैं।

चीमामांडा ने बहुत बचपन से लिखना शुरू कर दिया था। इस विषय में पूछने पर उनका उत्तर है, "मैंने कभी सचेतन रूप से लेखन अपनाने की बात नहीं सोची। जब से मैं वर्तनी जोड़ने लायक हुई तब से लिख रही हूँ। बैठ कर लिखना मुझे अविश्वसनीय पूर्णता की अनुभूति देता है।"

बहुत कम उम्र से वे अमेरिका, ब्रिटेन तथा कनाडा की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। उनके विचारों को सुनने के लिए जगह-जगह से उन्हें आमंत्रण मिलते हैं। लेखन के अलावा वे अपने भाषणों के लिए जानी-पहचानी जाती हैं। 1997 में उनका कविता संग्रह 'डिसीजन्स' आया अगले साल नाटक 'फ़ॉर लव ऑफ बीअफ़्रा' आया। 2002 में वे कहानी 'यू इन अमेरिका' के लिए कैन प्राइज की शॉर्ट लिस्ट में शामिल थी। उनके पहले उपन्यास 'पर्पल हिबिस्कस' को 'ओरेंज प्राइज फ़ॉर फिक्शन' के लिए नामित किया गया। इसे कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज मिला। 'हाफ ऑफ ए यलो सन' को ओरेंज प्राइज मिला। इसे सन् 2002/2003 का डेविड टी. वोंग इंटरनेशनल शॉर्ट स्टोरी प्राइज (पीईएन अमेरिकन सेंटर अवॉर्ड) भी मिला। 'द थिंग अराउंड योर नेक' कहानी संग्रह है। चीमामांडा को जगह-जगह से भाषण देने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

उनकी रचनाओं में विश्वविद्यालय का वातावरण प्रमुखता से आता है इसी तरह वे अक्सर एक समझदार आंटी को अपनी रचनाओं में रखती हैं, यह आंटी प्रमुख पात्र को जिंदगी का फलसफा बताती है और नायिका इस आंटी के बहुत निकट रहती है। 'हाफ ए यलो सन' में है यही आंटी उनके पहले उपन्यास 'पर्पल हिबिस्कस' तथा 'अमेरिकानाह' में भी है।

'हाफ ए यलो सन' का शीर्षक अल्पजीवी राष्ट्र बीअफ़्रा के झंडे के आधार पर है। झंडे में उगता हुआ आधा सूर्य दीखता है। बहुत सारे इग्बो लोग एक अलग राष्ट्र चाहते थे। इसी के लिए उग्र आंदोलन चला। हजारों लोग मारे गए। तीन साल तक यह संघर्ष चला मगार तीन साल के बाद इसके समर्थकों को सपर्पण करना पड़ा। इसे फिल्म निर्देशक बीयी बेंडेले ने फिल्म में रूपांतरित किया जिसमें शिवेटेल एजिओफ़ोर तथा थांडाई न्यूटन ने प्रमुख भूमिकाएँ की हैं। इस उपन्यास में जुड़वा बहनों की अलग-अलग जीवनधारा को चीमामांडा प्रस्तुत करती हैं। सारा कार्यव्यापार बीअफ़्रा आंदोलन की पृष्ठभूमि में चलता है।

वे खुद को कहानी कहनेवाला मानती हैं लेकिन उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि लोग उन्हें नारीवादी लेखक मानते हैं। वे स्वयं स्वीकार करती हैं कि जिस तरह वे दुनिया को देखती हैं वह खासा नारीवादी दृष्टिकोण है। यही वे अपने लेखन में भी प्रस्तुत करती हैं। जेंडर को ले कर जो अन्याय है उसे लेकर वे बहुत क्रोधित हैं। उनका कहना है इस बात से सबको क्रोधित होना चाहिए। साथ ही वे आशान्वित हैं कि मनुष्यता बेहतरी की ओर जाएगी।

बचपन में परिवार द्वारा लड़के-लड़की के बीच होने वाले भेदभाव से बच्चों पर होने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव का बड़ा सटीक चित्रण उनकी कहानी 'कल बहुत दूर है' (इसका लेखिका द्वारा किया गया हिंदी रूपांतरण वर्तमान साहित्य में पढ़ा जा सकता है) में हुआ है। इस भेदभाव से आगे चल कर कई जिंदगियाँ नष्ट हो जाती हैं। नाइजीरिया में हौसा तथा इग्बो दो प्रमुख समुदायों में आए दिन दंगे होते रहते हैं। हौसा मुसलमान हैं और अधिकांश इग्बो ईसाई हैं। दंगों का सबसे अधिक नुकसान स्त्री-बच्चों को उठाना पड़ता है। 'एक निजी अनुभव' (इसका हिंदी रूपांतरण परिकथा में पढ़ा जा सकता है) में दोनों समुदाय की दो स्त्रियाँ ऐसे ही एक दंगे में फँस जाती हैं और संयोग से वे एक ही स्थान में शरण लेती हैं। दोनों की सभ्यता-संस्कृति एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है। एक मुसलमान है दूसरी ईसाई, एक पढ़ी-लिखी है दूसरी अनपढ़, एक धनी है दूसरी गरीब सब्जी बेचने वाली। एक बाल-बच्चों वाली स्त्री है दूसरी युवती। मगर दोनों एक-दूसरे की चिंता करते हुए बहुत कुछ निजी साझा करती हैं। दोनों एक-दूसरे की सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं। इस कहानी में वे बड़ी सरलता से भूत, भविष्य और वर्तमान में आवाजाही करती हैं। कहा जाता है कि गर्मियों में साँप मोर की छत्रछाया में आराम करता है जबकि साँप मोर का भोजन है। मुसीबत में वे एक दूसरे का सहारा बनते हैं। इसी तरह अनजाने में मुसीबत से भागते हुए दो व्यक्ति - एक स्त्री और एक युवती एक दूसरे का सहारा बनते हैं। वे दोनों मासूम हैं। बाहर मुस्लिम-क्रिश्चियन दंगे चल रहे हैं, मार-काट मची हुई है। एक उजाड़ दुकान के भीतर पनाह लिए विरोधी पृष्ठभूमि की ये स्त्रियाँ एक दूसरे से अपने-अपने मन की बातें करती हैं। दोनों को दंगे में अपने लोगों की सुरक्षा की चिंता है, दोनों एक-दूसरे के लोगों की सुरक्षा की कामना करती हैं। मनुष्यता हैवानियत पर भारी पड़ती है। यहाँ एक पूरी तरह से धार्मिक है, दूसरी को धर्म पर आस्था नहीं है। दोनों में कोई समानता नहीं है, एक दूसरी के बिल्कुल विपरीत। दंगों में इनका कहीं कोई हाथ नहीं है। संबंध है तो बस यही कि दोनों लड़ रहे समुदायों की सदस्य हैं। इसके बावजूद एक अनकहा बहनापा इनके बीच उत्पन्न होता है। भय अमीरी-गरीबी का भेद, धार्मिक भेदभाव नहीं रखता है। ये कठमुल्लापन है जो आदमी को आदमी से जुदा करता है अन्यथा सामान्य जन शांति से जीने में विश्वास करता है।

चीमामांडा वैश्विक कहानियाँ लिखती हैं। जहाँ धर्म, रंग, नस्ल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है केवल भावनाएँ, केवल संवेदनाएँ - सहानुभूति। वे पाठक को इस तरह स्पर्श करती हैं जैसा बहुत कम रचनाकार करते हैं। एक बार प्रारंभ करके छोड़ना कठिन है, उनका चित्रण सरल परंतु पूर्ण होता है। कहानी कहने की कला में पारंगत चीमामांडा पाठक को अपनी कहानी के साथ लिए चलती हैं। पाठक पूरी तौर से चरित्रों के साथ हो लेता है। कम-से-कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाना उनकी एक विशेषता है। वे अपने आस-पास से कहानी उठाती है, अतः चरित्र हमें अपने लगते हैं। वे जिस मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ का परिचय देती हैं वह कम लेखकों में नजर आता है। नाइजीरिया की संस्कृति की विभिन्नताओं और समृद्धि की झलक उनकी कहानियों में मिलती है। इसी तरह उनकी कहानी 'सेल वन' एक युवक के परिवर्तित होते जीवन को विस्तार से दिखाती है। जेल के बाहर और जेल में रह कर उसका मानवीय चेहरा विकसित होता है। बहन की नजर से देखा गया भाई का जीवन इस कहानी का प्रतिपाद्य है। जेल के भीतर चलने वाले कार्यव्यापार को भी यह कहानी दिखाती है। उनकी कहानी 'द शिवरिंग' हवाईजहाज दुर्घटना में हुई विभिन्न लोगों की बात करती है। एक आदमी ने दुर्घटना से ठीक पहले अपने मित्र को ईमेल भेजा था कि वह मजे में है। एक लड़की कपड़ा खरीदने जा रही थी। किसी का प्रेमी था उस जहाज पर तो किसी की बेटी। किसी की फ्लाइट किसी कारण से छूट गई थी... क्या वे खुश हो सकते थे, क्या उनके लिए खुश हुआ जा सकता था। उनके लिए भी रोती है नायिका। इस कहानी में ईश्वर पर भी काफी कुछ कहा गया है। कहानी में राजनीति की बात होती है और संस्कृति तो उनका एक प्रमुख विषय है ही। 'दि अमेरिकन एंबेसी' एंबेसी की खिड़की पर लगी कतार में खड़ी हो कर प्रारंभ होती है और इग्बो, हौसा लोग तथा संस्कृति का नजारा दीखता है। यहाँ भी नाइजीरिया की राजनीति, समाज की चर्चा है। उनकी कहानियाँ मात्र मनोरंजन न हो कर सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक मुद्दों पर प्रकाश डालती हैं। चरित्रों का मनोविज्ञान खोलती हैं। रंगभेद, नस्लभेद की पड़ताल करती हैं।

नाइजीरिया में अमेरिका पलट लोगों को 'अमेरिकानाह' कह कर पुकारा जाता है। उनका नवीनतम उपन्यास 'अमेरिकानाह' मनोरंजक है, साथ ही बड़े उद्देश्य को ले कर चलता है। एक साथ नाइजीरिया, इंग्लैंड तथा अमेरिका तीन देशों में अश्वेत जीवन को प्रदर्शित करने वाला उपन्यास इंग्लैंड और अमेरिका में प्रवासी विशेषतौर पर अश्वेत प्रवासी जीवन की कठिनाइयों, संघर्षों तथा भेदभाव को विस्तार से दिखाता है। इस उपन्यास में उनका नारीवादी रूप खिल कर दिखाई देता है। उनकी अवलोकन शक्ति की दाद देनी होगी। वे इस उपन्यास में कई संस्कृतियों का सूक्ष्म विवरण देती हैं। एक ओर इसमें अमेरिका-इंग्लैंड की सामाजिक-सांस्कृतिक, बौद्धिक, राजनैतिक कमजोरियाँ दिखाई गई हैं तो दूसरी ओर नाइजीरिया के सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक, बौद्धिक, आर्थिक जीवन की सीमाओं को भी दिखाया गया है। नाइजीरिया भ्रष्टाचार का गढ़ बन गया है। काम पाने के लिए योग्यता से अधिक आवश्यक है सही लोगों के साथ गोटी बिठा पाना। मुख्य रूप से इफमेलू और ओबिन्ज़े की प्रेमकथा होते हुए इसके कलेवर में जीवन और समाजों के विभिन्न रंग-रूप और छटा नजर आती है। उपन्यास नवीनतम सोशलमीडिया ब्लॉग को नायिका के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देता है। यह उसका आर्थिक स्रोत है साथ ही अपनी बात दुनिया भर में पहुँचाने का माध्यम भी है।

उपन्यास की शुरुआत अफ्रीका के बाहर के पाठकों को थोड़ा अटपटा लग सकता है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर यह पाठक को अपनी गिरफ्त में ले लेता है और बिना पूरा पढ़े इसे छोड़ना कठिन है। चीमामांडा इसमे कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाती हैं जैसे अमेरिका में काम पाने के लिए अफ्रीकी लोगों को अपने प्राकृतिक बालों से छुटकारा पाना क्यों आवश्यक है? बाल व्यक्ति की पहचान होते हैं, इसे कैसे रखना है इस बात को कोई दूसरा क्यों डिक्टेट करे? क्या कुछ शब्दों का प्रयोग करने से नजरिया बदल जाता है। जो शब्दों में नहीं कहा जाता है क्या वह व्यवहार में प्रकट नहीं हो जाता है? तीन महादेशों को समेटे यह उपन्यास आज की दुनिया की कहानी कहता है।

चीमामांडा लिखती हैं क्योंकि उन्होंने जिन किताबों और उपन्यासों को पढ़ा उनमें दर्शाई गई नस्ल संबंधित बातों से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली, उन्हें वे प्रस्तुतियाँ ईमानदार नहीं लगीं। वे मानती हैं कि ऐसा नहीं है कि लोग सोचते नहीं हैं, असल बात है कि वे कहते नहीं हैं। नोबेल पुरस्कृत रचनाकार ओरहान पामुक को भी पढ़ी गई किताबों में उनका और उनके लोगों का जीवन कहीं नजर नहीं आया इसीलिए उन्होंने भी लिखना शुरू किया। चिनुआ अचेबे भी मानते थे कि अभी सबकी कहानियाँ नहीं लिखी गई हैं। इसी कमी को चीमामांडा जैसे लेखक पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। वे अफ्रीका की नई पीढ़ी का स्वर हैं। चीमामांडा के लेखन ने दुनिया भर में अफ्रीकी लेखन के पाठक तैयार किए हैं। उनके लेखन में मानवीय स्वर निकलता है जो कहता है कि नस्लवाद कितना घिनौना है, खासकर आज जब दुनिया सिकुड़ कर एक ग्राम बन गई है।


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