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निबंध

बाजार का तिलिस्म और हमारा बदलता स्वभाव
गिरीश्वर मिश्र


आज बाजार का जमाना है जिसमें हमारा पूरा अस्तित्व बाजार के नियंत्रण में आ चुका है और जो शेष है जल्दी ही उसकी परिधि में दिखाई पडेगा। कोई क्या खाए, क्या पिए, कहाँ जाए, क्या पढ़े, क्या देखे, क्या सुने सब पर बाजार का पहरा है। बाजार ही यह सब तय करता है और अपने हिसाब से परोसता है। हमारा स्वाद, हमारा जायका सब ही तो आज बाजार के इशारे पर नाच रहा है। ज्ञान और कर्म की सारी इंद्रियों पर बाजार का पहरा लगता जा रहा है। ऊपर से देखने पर लगता है कि बाजार एक उन्मुक्तता देता है, चुनने की छूट देता है और एक हद तक समर्थ होने एहसास देता है। ऐसे में हम खुद को शक्तिशाली महसूस करने लगते हैं। पर यह हमारे मन का कोरा भ्रम होता है क्योंकि इसका आधार आदमी की अपनी बुद्धि या विवेक न हो कर लुभावना विज्ञापन होता है जो एक नया यथार्थ रचता है, आकर्षक और दिलासा देने वाला। आज विज्ञापन हमें रचने लगा है और विज्ञापन की डोर व्यापारी के हाथ में है जिसकी नजर केवल अपने फायदे पर ही गड़ी रहती है।

आज बीड़ी से ले कर वायुयान तक सब चीजों का विज्ञापन होता है। व्यापार के व्याकरण में विज्ञापन एक जायज व्यवहार है और केवल व्यापारी ही नहीं सामाजिक संस्थाएँ और सरकारें तक इनसे अछूती नहीं रहीं। हर व्यापार में विज्ञापन का अच्छा खासा बजट होता है और इसे बनाने वाले बड़े-बड़े प्रशिक्षित विशेषज्ञ होते हैं। ये विज्ञापन केवल सूचना ही नहीं देते, वे (नकली!) साक्ष्य भी मुहैया कराते हैं कि अमुक चीज अमुक अभिनेता, गायक, नर्तक या खिलाड़ी से जुड़ी है - वह उन्हें अच्छी लगती है या फिर वे सीधे-सीधे वस्तु की उपयोगिता की कसम खाते हैं उसे उपयोग में लाने की सलाह देते हैं। दर्शक के लिए उनके चहेते नायक की जुबान बड़ी कीमती होती है। उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ कर वह सामान एक नया अर्थ पा जाता है, बहुमूल्य हो जाता है। और फिर ऐसे सामान से अपने आप को जोड़ कर ग्राहक का मन खिल उठता है। वह मगन हो उठता है।

यहाँ गौर करें तो यह बात साफ हो जाती है कि यहाँ जरूरतों का व्यापार और सौदा हो रहा है। विज्ञापन जरूरतें बेंचता है, जरूरी और गैर जरूरी दोनों तरह की, और हम सभी इन अंतहीन जरूरतों को खरीदते जाते हैं। इनको सही ठहराने के लिए सही गलत हर तरह के तर्क गढ़े जाते हैं और हम नई जरूरतों से लैस हो जाते हैं। जरूरतें बासी पड़ रही हैं यह भी बताया जाता है। इस बदलते मिजाज के नए जमाने में अगर किसी के पास कम जरूरत हो तो वह असभ्य करार दिया जाता है। बाजार अपनी जरूरत के मुताबिक जरूरतें बेंच रहा है। आज हम विज्ञापनों की प्रखर छाया तले जीवन जी रहे हैं। अखबार, टीवी, पत्रिकाएँ, सड़कों किनारे खड़े बोर्ड, नियोन लाइट के दूधिया बल्ब सब मिल कर विज्ञापन की एक जबर्दस्त दुनिया खड़ी करते हैं जिसके असर से सामान्य व्यक्ति को अपने चंचल मन को सुरक्षित बचा ले जाना एक बेहद मुश्किल चुनौती बन जाती है। वह फँस जाता है और खरीदता है। खरीद को आसान बनाने के लिए रुपये नहीं प्लास्टिक का क्रेडिट कार्ड है जो लगता है कि बिना किसी खर्च के ही हमारा काम आसान कर देता है पर यह गलतफहमी सिर्फ खरीदारी को बढ़ावा देने के लिए ही होती है। सचाई यह भी है की लोग खरीददार हो कर बिक रहे हैं और परेशानियाँ इतनी कि लोग संतप्त हो कर आत्महत्या तक पर उतारू हो उठते हैं।

भारत देसी और विदेशी हर किस्म के व्यापारियों के लिए स्वर्ग सरीखा हो रहा है। यहाँ बढ़ती आबादी के चलते उपभोक्ताओं की कमी नहीं है। मध्य वर्ग खोखली प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए खरीदारी की और बढ़ रहा है ताकि उच्च वर्ग की नकल कर आगे बढ़ सके। बाजार बढ़ रहा है और खरीदारी प्रतिष्ठा और सभ्यता का पैमाना बनी जा रही है। खरीदारी का अब जरूरतों से उतना घना रिश्ता नहीं होता जितना औरों की तुलना में अपने लिए ऊँची जगह बनाने से और बनी हुई जगह को सुरक्षित रखने से होता है। जो है उससे ऊब कर, नए-नए फैशन और चाल-ढाल, कहीं किसी से पिछड़ न जाएँ इस डर से हम सब जरूरी गैरजरूरी या उलजलूल हर तरह की खरीदारी में लगे हुए हैं। जो है उससे संतुष्टि तो कम है और जो नहीं है उसकी असंतुष्टि ज्यादा है। और बाजार है कि चीजों के नए-नए माडल बना कर कमी और अभाव का तीव्र एहसास दिलाने से बाज नहीं आता। इस तरह की निरंतर असंतुष्टि और उससे उपजी कुंठा में जीना आज बहुतों की नियति-सी बनती जा रही है।

बाजार में बिकते चमचमाते माल के पीछे छिपी कहानी बड़ी दर्दनाक और खतरनाक ढंग से जीवन विरोधी है। कच्चे माल को नैसर्गिक पर्यावरण को नष्ट कर प्राप्त करना, पर्यावरण के संतुलन को खोना, विषैले रसायनों का प्रयोग करना, यंत्रों की सहायता से कम लागत पर अधिक मात्रा में पैदा कर आकर्षक रूप में इस तरह पेश करना जैसे वह वस्तु बेहद जरूरी है, एक बड़ी साजिश है। इसमें ऐसा क्रम बनता है कि आदमी खरीदने पर मजबूर हो जाय। पूँजीपति की लाभ की आशा के आगे सारे सच झूठ हो जाते हैं और आदमी खुद एक वस्तु बनता जाता है। बाजार का विन्यास और चरित्र बदल रहा है। कभी मेले ठेले और बाजार करना उत्सव होता था पर आज बाजार विमानवीकरण का बहाना बनाता जा रहा है। इस कठिन समय में हमें यह समझना होगा कि बाजार हमारे लिए है न कि हम बाजार के लिए। जीवन जीने का विवेक यदि नहीं होगा तो न यह धरती बचेगी न हम लोग क्योंकि धरती का कोष सीमित है।


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हिंदी समय में गिरीश्वर मिश्र की रचनाएँ