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लेख

1857 और विष्णुभट्ट गोडसे
रामकृष्ण पांडेय


1857 इधर मधुकर उपाध्याय का प्रिय विषय बना हुआ है। अवसर भी है। इसी बहाने उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए हैं और कर रहे हैं। इस सिलसिले में उनकी पहली किताब आई 'किस्सा पांडे सीताराम'। ये अंग्रेजों की फौज के एक वफादार सिपाही थे। 1857 की लड़ाई में प्रत्यक्षदर्शी। उन्होंने अवधी में अपने अनुभव लिखे। पर वे अंग्रेजों के वफादार थे इसलिए उनका लिखा उस लड़ाई के दूसरे पक्ष को ही प्रस्तुत करता है। दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजों ने अपने अफसरों को वफादारी का पाठ पढ़ाने के लिए इसका अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। उसी अनुवाद को हासिल करके मधुकर ने उसे पुनः अवधी में अनुवाद किया। यही अवधी अनुवाद प्रकाशित है। अब उसका हिंदी अनुवाद भी आ रहा है। यह भी मधुकर का ही किया हुआ है।

यह दूसरी किताब 'विष्णुभट्ट की आत्मकथा' इस देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं का पक्ष पेश करती है। विष्णुभट्ट कर्मकांडी ब्राह्मणों के परिवार से थे और लड़ाई के दौर में ही पूजा-पाठ करके कुछ अर्जित करके वरसई से मथुरा के लिए निकले थे। इस बीच लड़ाई शुरू हो गई और वे रास्ते में ही फँस गए। इसी दौर में वे रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब आदि सेनानियों के करीब पहुँचे और कई लड़ाइयों के प्रत्यक्षदर्शी रहे। बाद में उन्होंने मराठी में अपने इस प्रवास का विवरण लिखा जो 'आधा प्रवास' के नाम से छपा। मधुकर ने इसी का अनुवाद 'विष्णुभट्ट की आत्मकथा' के नाम से किया है। शायद 'बाणभट्ट की आत्मकथा' की नकल में। अमृतलाल नागर ने भी इसका अनुवाद 'आँखों देखा गदर' के नाम से किया था। दोनों ने ही नाम बदल दिया। इसी के साथ 1857 पर मधुकर की तीसरी किताब 'सितारा गिर पड़ेगा' भी आई है। यह अनुवाद या प्रस्तुति नहीं है। तथ्यों पर आधारित 1857 का किस्सा है। सीधी-सच्ची बात, कहने के ढंग और सरल-संवेदनशील भाषा के अविच्छिन्न प्रवाह ने कथा को इतना रोचक बना दिया है कि किताब एक ही साँस में पढ़ी जा सकती है।

1857 की लड़ाई को लेकर कई विवादों में एक यह भी है कि यह सिपाही विद्रोह था, या अंग्रेजों के खिलाफ जनता का विद्रोह, राजे-रजवाड़ों का अपनी गद्दी बचाने का संघर्ष था या आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई। विष्णुभट्ट के विवरणों को पढ़कर ऐसा लगता है कि अंग्रेजों के खिलाफ इस लड़ाई को जनता का समर्थन तो प्राप्त था पर लड़ाई में उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। लड़ाई सामंतों- श्रीमंतों और सिपाहियों ने ही लड़ी। जाहिर है कि सारे सामंतों और श्रीमंतों तथा सिपाहियों ने नहीं। यह भी सही है कि बागी सिपाहियों का आम जनता स्वागत, सत्कार करती थी। हर तरह से मदद पहुँचाती थी। आखिर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम से वह भी तो त्रस्त थी। चाहती थी कि अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएँ। मार्क्स और एंगेल्स ने उसी दौर में इस देश की जनता पर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम के बारे में कई लेखों में लिखा है और इनका विवरण भी प्रस्तुत किया है। इस जुल्म का ही एक उदाहरण यह भी है कि अपनी विजय के बाद अंग्रेज आम जनता को भी नहीं बख्शते थे और लूट तथा हिंसा का ऐसा तांडव मचा देते थे कि क्रूरता भी सहम जाए। इसका हृदय-विदारक दृश्य विष्णुभट्ट ने पेश किया है।

विष्णुभट्ट के विवरणों से यह भी पता चलता है कि किस तरह निहित स्वार्थ के कारण अनेक राजे-रजवाड़े और सामंत अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे बल्कि देशभक्तों और उनके बीच खूनी लड़ाइयाँ भी हुईं। इस तरह बागियों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। एक तो सीधे अंग्रेजों के खिलाफ और दूसरे अंग्रेजों के वफादारों के खिलाफ। हालाँकि, ऐसा कई बार हुआ कि शत्रु पक्ष के सैनिक अपने देश भाइयों के खिलाफ लड़ने से मना करके उनके साथ ही खड़े हो गए। पर, ऐसा भी हुआ कि कई सरदार और सामंत आजादी की उस लड़ाई से दगा करने अंग्रेजों से जा मिले।

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसकी भूमिका है। इसमें मधुकर ने इस किताब और इसके ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया है। मधुकर इरफ़ान हबीब के इस निष्कर्ष से सहमत नजर आते हैं कि ''विद्रोह बंगाल की सेना के सिपाहियों की बगावत से शुरू हुआ और धीरे-धीरे जनविद्रोह में बदल गया। सिपाही विद्रोह इस जनविद्रोह की रीढ़ की हड्डी साबित हुआ।'' पर 1857 के महायुद्ध की पृष्ठभूमि पर एक नजर डालने भर से यह स्पष्ट हो जाता है कि जन स्तर पर भी इसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी। बल्कि बंगाल की सेना के सिपाहियों की बगावत ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को ही गड़बड़ कर दिया। अर्थात जनता और नेतृत्व पहले से ही तैयारी में शामिल थे। जनता के असंतोष के साथ राजे-रजवाड़ों के असंतोष ने मिलकर ही इस विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की थी। इसलिए यह कहना भी उचित नहीं लगता कि ''सिपाही विद्रोह ने जनभावना को छुआ। अलग-अलग ढंग से सबको। लेकिन उद्देश्य साझा बना रहा।'' एक बड़े इलाके में ''उसका स्वरूप किसान क्रांति का हो गया।'' विष्णुभट्ट के विवरणों से सिपाही विद्रोह से किसान क्रांति होने की प्रक्रिया का पता नहीं चलता है।

विष्णुभट्ट की अपनी सीमा थी। वे जजमानी के लिए निकले थे। बचते-बचाते घर वापस लौटने की जुगत में थे। यह उनका सौभाग्य था कि लड़ाई को उसके नायकों के करीब रहकर देख सके। समर्थक थे पर शामिल नहीं। किताब से यही पता चलता है। रियासतों की आम जनता की भी यही स्थिति थी। अंग्रेज विजेताओं के हाथ लुटने के लिए मजबूर। अंग्रेजों ने उन पर अकथनीय जुल्म ढाए। किताब इसका प्रामाणिक दस्तावेज पेश करती है। जनता विद्रोह का समर्थन कर रही थी, तभी तो उसे उतना अत्याचार सहना पड़ा। इसी रूप में 1857 जनविद्रोह था।

मधुकर ने इस बात का उल्लेख किया है कि मार्क्स ने इसे सबसे पहले राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में देखा। मार्क्स लगातार भारत की स्थिति पर नजर रख रहे थे। उन्होंने कई लेख इस सिलसिले में लिखे हैं। इनसे 1857 में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों के बारे में पता चलता है। पृष्ठभूमि के बारे में ही नहीं, तत्कालीन और बाद की स्थितियों के बारे में भी। उन्होंने युद्ध नीति की भी विशद व्याख्या की है। मधुकर लिखते हैं कि ''भारत के टिप्पणीकार इस पर चुप रह गए।'' जाहिर है कि अंग्रेजों का आतंक भारतीय समाज के दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था। अनेक सामंत और नवाब इसी कारण अंग्रेजों के खिलाफ नहीं गए। लड़ाई की सारी तैयारी गुपचुप तरीके से करनी पड़ी थी। 1857 के बाद तो यह आतंक और गहरा गया। स्वयं विष्णुभट्ट ने यह किताब वर्षों बाद लिखी और छपी भी उनकी मृत्यु के बाद। भारतेंदु जैसे अंग्रेजों के कटु आलोचक को भी महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा में लिखना पड़ता था। पर, भारतीय जनता इस पूरे प्रसंग पर टिप्पणी करने से नहीं चूकी। उसने 1857 के वीरों को नायक का दर्जा दिया। उनकी गाथाएँ अपने मन में बसा लीं। लोकगीतों और भाषाओं में उन्हें शामिल कर लिया। टिप्पणीकारों ने भले ही इन घटनाओं पर टिप्पणी नहीं की और चुप रह गए, पर आम जनता ने इसमें कोताही नहीं बरती।

मधुकर 1857 के एक खास संदर्भ का अपनी भूमिका में बार-बार उल्लेख करते हैं और वह है उस दौर में व्याप्त सांप्रदायिक सद्भाव का। मधुकर उसे बेमिसाल बताते हैं। शायद आज हमें यह अजूबा लग सकता है क्योंकि विभिन्न संप्रदायों के बीच विभाजन की गहरी खाई बना दी गई है। पर, पहले के गाँव-समाज इस तरह बँटे हुए नहीं थे। कम-से-कम घृणा और कट्टर विरोध के आधार पर तो नहीं ही। हिंदू राजे-रजवाड़ों के यहाँ मुसलमान वफादारों और मुसलमान नवाबों के यहाँ हिंदू वफादारों की फौज अनायास नहीं बन गई होगी। मधुकर ने खुद भी इस संदर्भ में नाना साहब और लक्ष्मीबाई का उदाहरण दिया है। विष्णुभट्ट की इस किताब में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया जाना भी इसी का प्रमाण है कि पहले के गाँव-समाज इस तरह बँटे हुए नहीं थे।

अंत में किताब के बारे में। यह उतना ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण है। अपनी भूमिका में मधुकर ने इस पर विस्तार से लिखा है। विष्णुभट्ट अपनी यात्रा से 1959 में अपने गाँव लौटे। पर तुरंत उन्होंने किताब नहीं लिखी। चौबीस साल बाद लिखी। लिखने के बाद भी एक-दो लोगों तक ही सीमित रही। छपी 1907 में। उनकी मृत्यु के बाद। उस महायुद्ध की पचासवीं वर्षगाँठ पर। लिखने और छपने में इस फर्क का कारण अंग्रेजों का आतंक था। 1907 तक आते-आते आतंक काफी घट गया था। मधुकर ने अपनी भूमिका में इस बात का भी उल्लेख किया है कि कैसे किताब में प्रक्षिप्त अंश जुड़े। पहले उसी रूप में छपी। फिर उसका संपादन हुआ। और अट्ठारह साल बाद विष्णुभट्ट की भाषा में पुस्तक फिर से छपी। मधुकर ने इसी संपादित-संशोधित विष्णुभट्ट की भाषा में प्रकाशित पुस्तक से यह अनुवाद किया है। मधुकर लिखते हैं कि संपादन-संशोधन के जरिए पुस्तक के साथ हुए अन्याय की जानकारी के बावजूद अमृतलाल नागर ने लगता है उसी प्रति का इस्तेमाल किया था।

पत्रकार मधुकर उपाध्याय विष्णुभट्ट गोडसे को मराठी का पहला संवाददाता और पहला युद्ध संवाददाता मानते हैं। लिखते हैं ''विष्णुदत्त पहले बखरची हैं।'' अर्थात खबरची। खत लिखनेवाले। ''मराठी में खबर को बखरची कहते हैं।'' स्वाभाविक है एक बखरची ने दूसरे बखरची की बखर ली।

( पुस्तक : 1857 विष्णुभट्ट की आत्मकथा , लेखक : मधुकर उपाध्याय , प्रकाशक : वाणी प्रकाशन , संस्करण: 2001 )


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