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कविता

पुनर्निर्माण का मिथक
सुकृता पॉल कुमार
संपादन - सरिता शर्मा


छाल का सफेद हिस्सा
श्वेत लोगों का जमा हुआ दिल है
कोलंबस किनारे पर उतरा तो फक्क पड़ गया
मसालों के देश के बारे में उसने क्या सोचा होगा
तब से हर पतझड़ में पत्तियों का रंग गाढ़ा सुर्ख है
लडकी का अचानक शर्माना नहीं है यह
भारतीयों का रक्त है ऊपर उठता हुआ
धरती की कोख से
सर्वदा गर्भवती रहती है जो
अलिखित नरसंहार के लावे से
पत्ते आँसुओं की शक्ल में बहते हैं

हर अंग अनगढ़ता से विकसित
सौंदर्य नृशंसता का रूपक
खुशी के क्षण
वेंटिलेटर पर फेफड़ों से उलीचे गए
प्रेमरत आदमी और औरत
पेसमेकर पर धड़कते उनके दिल

हमारे कैसीनो में अपना धन दाँव पर लगा कर
वे हार जाएँगे
नेता ने हर साल कहा
हमें अपनी जमीन वापस मिल जाएगी
उसके पैसे से,
मौसम को गुजरने दो।


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