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लेख

पंचायत का सपना
राजकुमार


प्रेमचंद की कहानी ' पंच परमेश्वर ' का यह शताब्दी वर्ष है। यह कहानी 1915 में प्रकाशित हुई थी। कुछ वर्ष पहले मैंने कथादेश में ' पंचायत के किस्से ' नाम से एक लेख लिखा था , जिसमें इस कहानी की विशेष रूप से चर्चा की थी। पिछले दिनों सलमान खान को उच्च न्यायालय से आनन-फानन में जमानत दे दी गई तो अर्चना वर्मा ने उस लेख को फेसबुक पर नए सिरे से याद किया। उनके प्रति आभार। यह लेख उस लेख की अगली कड़ी है। ये सारे लेख भारत में ' लोक-न्याय ' की परिकल्पना से संबंधित हैं। यह लेख प्रेमचंद की कहानी ' पंच परमेश्वर ' की स्मृति को समर्पित है।

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प्रत्येक समाज अपने वैचारिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप विधि-विधान और न्याय-प्रणाली का विकास करता है। जैसे पूँजीवादी व्यवस्था में तत्कालीन कायदे-कानून का पालन करते हुए कोई भी व्याक्ति अरब-खरबपति बन सकता है। उसके अरब-खरबपति बनने की तब तक आलोचना आप नहीं कर सकते जब तक यह साबित न कर दें की उसने यह संपत्ति अवैधानिक तरीके से अर्जित की है। अंग्रेजीराज कायम होने से पहले भारत में आम आदमी अपने विवादों का निपटारा अक्सर पंचायत के जरिए करता था। पंचायत तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप लोगों को घर बैठे न्याय दिला देती थी। यह न्याय न तो ज्यादा खर्चीला था और न ही इसमें ज्यादा समय लगता था। क्योंकि इसे कानूनी दाँव-पेंच में नहीं उलझाया जा सकता था।

अंग्रेजी शासन कायम होने के बाद जिस नई न्याय-प्रणाली का सूत्रपात हुआ उसके तौर-तरीके से गाँव के लोग बिल्कुल अपरिचित थे। इसीलिए इन अदालतों से उन्हें न्याय नहीं मिल पाता था। इन्साफ पाने की उम्मीद में वे बर्बाद और कोर्ट-कचहरी से जुड़े हुए लोग मालामाल जरूर हो जाते थे। असल में आधुनिक न्याय-प्रणाली शिक्षित मध्यवर्गीय व्यक्तियों के लिए तो उपयुक्त हो सकती है, लेकिन एक ऐसे समाज के लिए जिसकी बहुसंख्यक आबादी गाँव में बसती है, यह व्यवस्था विनाशकारी ही साबित हुई है। भारत ही नहीं, पश्चिमी देशों में भी किसान विद्रोहों के दौरान ऐसे दस्तावेजों को जलाने के साक्ष्य मिलते हैं जिनके बारे में किसानों का विश्वास था कि उनमें जिसका नाम दर्ज होगा, जमीन उसी की हो जाएगी। रंजीत गुहा ने अपनी पुस्तक 'एन एलिमेंट्री एस्पेक्ट्स आव पीजेंट्स इनसर्जेन्सी इन कालोनियल इंडिया' में इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है। 1857 के विद्रोह के दौरान भी किसानों द्वारा इस तरह के दस्तावेजों को नष्ट करने के प्रमाण मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कृषक संस्कृति प्रायः परंपरा और लोक-विश्वासों के सहारे चलती है और लिखत-पढ़त को किसान अपने विरुद्ध किए जा रहे षड्यंत्र के रूप में संशय की दृष्टि से देखते हैं। आधुनिक न्याय-प्रणाली की चाहे जो भी खूबियाँ हों, वह ग्रामीण जीवन के उपयुक्त नहीं लगती। यदि ऊपर लिखी गई बातें ठीक हैं तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किसी न्याय-व्यवस्था की सार्थकता समाज-सापेक्ष होती है। एक ही न्याय-प्रणाली किसी समाज के लिए उपयोगी हो सकती है और किसी दूसरे समाज के लिए बर्बादी का सबब बन सकती है।

ब्रिन्सले समारो और एन मारी बिसेसर द्वारा संपादित पुस्तक 'द कन्स्ट्रक्सन आव एन इंडो-कैरिबियन डायस्पोरा' में नताशा सबरीना रामनारायन का एक लेख है 'द पंचायत सिस्टम ऐज एन अर्ली फार्म आव कन्फ्ल्क्टि रिसोल्युशन इन त्रिनिदाद'। न्याय-प्रणाली की समाज सापेक्षता को समझने की दृष्टि से यह लेख आँख खोलने वाला है। इस लेख में नताशा रामनारायन ने त्रिनिदाद के गाँवों में प्रचलित एक कहावत का उल्लेख किया है - 'यदि पंचायत के सामने झूठ बोलते हैं तो आप मूर्ख हैं, और यदि सरकारी न्यायालय के सामने झूठ नहीं बोलते तो आप मूर्ख हैं।' इस कहावत पर कोई टिप्पणी करने से पहले मैं निर्मल वर्मा के 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया', नवंबर 20, 1983 में प्रकाशित साक्षात्कार का उल्लेख करना चाहूँगा। इस साक्षात्कार में निर्मल वर्मा ने ब्रिटिश दंडाधिकारी कोल्वो के एक कथन का उल्लेख किया है - 'हर हिंदू जो मेरे न्यायालय में आता है, झूठ बोलता है, पर जब वह ग्राम पंचायत में जाता है, तो सच बोलता है।' निर्मल वर्मा ने इस बात पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारतीय संस्कृति कई प्रकार के झूठ और अत्याचारों का शिकार हुई है और उसने आत्मरक्षा के लिए अपना तंत्र गढ़ लिया है। विडंबना यह है कि झूठ बोलकर भी उसकी जान नहीं बचती और वह बर्बादी का शिकार होती है। झूठ बोलने की मजबूरी धीरे-धीरे आदत में शुमार हो जाती है और फिर कई बार तो चाह कर भी सच नहीं बोला जाता।

सबसे पहले तो हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि लोग पंचायत के सामने झूठ क्यों नहीं बोल पाते थे। उल्लेखनीय है कि पंचायत राज्य के द्वारा मान्यता प्राप्त न्यायधिकरण नहीं था। इसके द्वारा लिए गए फैसलों को पुलिस या ऐसे ही किसी सरकारी तंत्र के द्वारा लागू नहीं किया जाता था। लेकिन इसके बावजूद पंचायत द्वारा लिए गए निर्णय प्रायः प्रभावी होते थे। यह सही है कि पंचायत के द्वारा दिए गए निर्णय पर बड़ी पंचायत बुलाकर पुनर्विचार किया जा सकता था, लेकिन पंचायत द्वारा लिया गया अंतिम निर्णय इतना प्रभावी होता था कि वह सरकारी अदालत द्वारा दिए गए फैसले को भी दरकिनार कर देता था।

पंचायत में वादी-प्रतिवादी और पंच सभी लोग एक-दूसरे से परिचित होते थे। किसी के लिए झूठ बोल पाना आसान नहीं रहता था। वे उस व्यक्ति के इतिहास और संबंधित घटना-प्रसंग से भली-भाँति परिचित होते थे। यही नहीं, व्यक्ति की मानसिक बुनावट ऐसी होती थी कि 'आधुनिक व्यक्ति की तरह झूठ बोल पाना उसके लिए आसान नहीं था। पंचायत का अस्तित्व बहुत कुछ परंपरा की निरंतरता और उससे जुड़े हुए सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करता है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक होने के साथ व्यक्ति में जागरूकता आती है और पारंपरिक आस्थाएँ एवं मान्यताएँ शिथिल पड़ने लगती है। लेकिन इसी के साथ ही वह झूठ बोलना, कुतर्क करना भी सीख जाता है। आधुनिक होना एक ऐसा पैकेज या दुधारी तलवार है जिसमें ये दोनों चीजें एक साथ आती है। गैर-आधुनिक व्यक्ति के लिए उसकी अंतरात्मा बहुत मायने रखती है। इसीलिए कई बार वह चाह कर भी झूठ नहीं बोल पाता।

पंचायत की भूमिका ग्रामीण जीवन के संदर्भ में ज्यादा प्रभावी दिखाई पड़ती है। ऊपर हमने नताश सबरीना रामनारायन के लेख का उल्लेख किया है। इस लेख में उन्होंने अप्रवासी भारतीयों द्वारा त्रिनिदाद में पंचायती व्यवस्था को नए सिरे से कायम करने और उसके परवर्ती इतिहास का अध्ययन किया है। इन गिरमिटिया मजदूरों का शुरुआती जीवन तो बहुत मुश्किल था लेकिन जैसे ही उन्हें शहरी इलाके से दूर समूह में बसाना शुरू किया गया, वैसे ही नए गाँव आबाद हो गए। नए गाँव आबाद होने के साथ अपने बिछड़े देश की सांस्कृतिक परंपराओं को पुनर्जीवित होने का अवकाश मिल गया। इसी के साथ आपसी झगड़े निपटाने के लिए पंचायती व्यवस्था भी आ गई। असल में औपनिवेशिक सत्ता इन गाँवों में आबाद हुए भारतीयों की खुशहाली के लिए कुछ भी नहीं करती थी। कोई उल्लेखनीय सरकारी संस्था भी गाँव के आस-पास नहीं थी। इसलिए सरकारी अदालतों के भँवरजाल में फँसने के बजाय गिरमिटिया मजदूरों ने आपसी झगड़े निपटाने के लिए पंचायती व्यवस्था का सहारा लिया। इन पंचायतों में हिंदू-मुसलमान सभी शामिल होते थे। लेकिन जैसे-जैसे नगरीकरण और शिक्षा का विस्तार हुआ, पंचायती-व्यवस्था कमजोर होने लगी। आधुनिक शिक्षा पाने वाले और मध्यवर्गीय पेशों में जाने वाले लोगों ने पंचायती व्यवस्था से अपना नाता तोड़ लिया।

त्रिनिदाद में पंचायती व्यवस्था के पुनर्जन्म और फिर मृत्यु के इतिहास से हम कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इस लेख के प्रारंभ में ही हमने इस बात का उल्लेख किया था कि असल में किसी भी न्याय-व्यवस्था की सार्थकता देशकाल-सापेक्ष होती है। ग्रामवासियों के आपसी झगडों को निपटाने में पंचायती व्यवस्था बहुत कारगर थी। इसीलिए गांधी और प्रेमचंद ने अदालतों की इतनी सख्त आलोचना की थी और खुशहाल ग्रामीण जीवन के लिए पंचायतों के महत्व को रेखांकित किया था।

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लुई डूमो ने अपनी पुस्तक 'एस्सेज आन इंडिविजुअलइज्म' में पंचायत से संबंधित साहित्य का सर्वेक्षण करने के दौरान टिप्पणी की है कि पंचायत की भूमिका दंडात्मक के बजाय सुलह-समझौता कराने वाली थी। किसी को गलत और किसी को सही साबित करने के बजाय पंचायत अक्सर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करती थी जिसमें न तो कोई हारता था और न कोई जीतता था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि पंचायत किसी के खिलाफ सख्त फैसले नहीं सुनाती थी।

अंग्रेजीराज कायम होने से पहले भारत में न्याय-व्यवस्था शास्त्रीय और लोक-परंपराओं के सहारे चलती थी। किंतु यदि शास्त्रीय और लोक-परंपरा की मान्यताओं में भेद हो तो लोक-परंपरा को तरजीह दी जाती थी। शास्त्रीय और लोक-परंपराएँ सर्वत्र एक जैसी नहीं थीं। देश-भेद से उनमें पर्याप्त भिन्नता दिखाई पड़ती है। लेकिन एक भाषा, समान कानून के आधार पर निर्मित राष्ट्र की अपनी अवधारणाओं को अंग्रेज-शासक भारत में भी लागू करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारतीय न्याय-प्रणाली की बहुलता को नष्ट कर समूचे भारत के लिए एक जैसे कानून बनाए। यद्यपि प्रारंभ में जॉन मैलकम जैसे अंग्रेजों ने पंचायती-व्यवस्था की अहमियत को स्वीकार किया था। लेकिन निजी मामलों को छोड़कर और सभी संदर्भां के लिए उन्होंने अंततः समान न्याय-संहिता को ज्यादा उपयोगी समझा और उसे लागू किया।

आधुनिक न्यायशास्त्र प्रत्यक्षवादी सेक्युलर दर्शन पर आधारित है, जिसका विकास पश्चिम के ईसाई परंपरा के बीच से हुआ था। इसीलिए इसमें ईसाई परंपरा से इतर किसी अन्य परंपरा के न्यायशास्त्र को कोई तरजीह नहीं दी गई। अपने सार्वभौमिक महत्व का दावा करने के बावजूद इस न्यायशास्त्र में भारतीय, चीनी, जापानी, अफ्रीकी और इस्लामी परंपरा में विकसित न्यायशास्त्र को कोई जगह नहीं दी गई। इस न्याय-प्रणाली में तथ्यों-साक्ष्यों के विवेचन और दोनों पक्षों के वकीलों की बहस को सुनकर तटस्थ न्यायाधीश कानून के मुताबिक फैसला करता है कि कौन सही और कौन गलत है। तथ्य गढ़े जा सकते हैं, झूठे गवाह खड़े किए जा सकते हैं। महँगे किंतु कानूनी दाँव-पेंच में दस वकीलों के जरिए मुकदमा जीता जा सकता है जिस मुकदमें में हारने की संभावना हो उसे अनंत काल तक खींचा जा सकता है। तटस्थ न्यायधीश को अपने पक्ष में झुकाया जा सकता है। अगर कोई न्यायाधीश के फैसले से संतुष्ट न हो तो वह ऊपर की अदालत में जा सकता है। प्रत्यक्षवाद का उन्नीसवीं सदी में बहुत गहरा प्रभाव था। शायद ही ऐसा कोई अनुशासन हो जो इसके प्रभाव से अछूता रह गया हो। विज्ञान से लेकर साहित्य-कला तक इसके प्रभाव का विस्तार था। यह कहना तो उचित नहीं होगा कि प्रत्यक्षवाद का असर अब पूरी तरह से खत्म हो गया है, लेकिन इसकी आलोचना बीसवीं सदी में ही शुरू हो गई थी। इक्कीसवीं सदी में इसके मुरीद खोजने पर भी नहीं मिलेंगे। दर्शन और ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में इसका वजूद मिट गया है लेकिन सामान्य-ज्ञान/वैज्ञानिक दृष्टि के रूप में इसका असर अभी भी कायम है। ज्यादातर अदालतों में आज भी प्रत्यक्षवादी तौर-तरीकों के सहारे ही फैसले लिए जाते हैं।

उत्तर-औपनिवेशिक दौर में पश्चिम से आई आधुनिकता और उसके निहितार्थों की भरपूर आलोचना की गई। लेकिन दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनके बारे में उत्तर-औपनिवेशिक चिंतकों ने लगभग न के बराबर विचार-विमर्श किया है। एक है आधुनिक न्याय-व्यवस्था और दूसरी भाषा-विज्ञान। उपेंद्र बख्शी जैसे विद्वान कम हैं जिन्होंने भारत में आधुनिक न्याय-प्रणाली की समस्याओं पर विचार किया हो। यह अकारण नहीं है कि ज्यादातर गैर-पश्चिमी देशों में आजादी के बाद भी इस न्याय-व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं किया गया। अपवाद हैं तो सिर्फ कुछ अफ्रीकी देश जिन्होंने इस न्याय-व्यवस्था के समानांतर न्याय के अपने पारंपरिक तौर-तरीकों को भी आजादी के बाद जगह दी। आधुनिक भारत के अनुरूप न्याय-व्यवस्था का कौन सा रूप उपयुक्त और कारगर हो सकता है, यह तय करना तो विधिवेत्ताओं का काम है; लेकिन इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि मौजूदा न्याय-व्यवस्था समकालीन भारतीयों की जरूरतों को पूरा करने में प्रायः असफल ही साबित हुई। तुलनात्मक दृष्टि से सोचने पर यह अवश्य लगता है कि राजनीतिक व्यवस्था की स्थिति तो उससे भी बदतर है। लेकिन इस लेख में मैं इस बहस से उलझने नहीं जा रहा।

पंचायत में तथ्यों-साक्ष्यों और तर्क-प्रतितर्क की प्रक्रिया का निषेध नहीं होता। सच तो यह है कि यहाँ तथ्यों-साक्ष्यों को तोड़-मरोड़ कर और आंशिक रूप से पेश करने और उनकी मनमाफिक व्याख्या करने की गुंजाइश कम रहती है। क्योंकि पंचायत में भाग लेने वाले ज्यादातर लोग इस समूचे घटनाक्रम से वाकिफ होते हैं। पंचायत यह भरोसा करके चलती है कि वादी-प्रतिवादी पंचायत के सामने झूठ नहीं बोलेंगे। इसीलिए पंचायत में व्यक्ति को बोलने से पहले सच बोलने की शपथ नहीं लेनी होती। पंचायत में वह बिना शपथ लिए सच बोलता और सरकारी अदालत में शपथ लेकर भी झूठ। कसम खाने-खिलाने का चलन हमारे यहाँ था, लेकिन पंचायत के दौरान इसकी जरूरत कम ही पड़ती थी। कसम खिलाकर, गंगाजली उठवाकर सच-झूठ, गलत-सही का फैसला दो व्यक्ति आपस में ही कर लेते थे। छोटे-मोटे विवादों के निपटारे के लिए पंचायत तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसी तरह, हर क्षेत्र में कुछ ऐसी जगहें होती थीं जिनका इस्तेमाल झगड़ों निपटाने के लिए किया जाता था। ऐसी मान्यता थी कि वहाँ पहुँचकर झूठ बोलने वाले व्यक्ति का कुछ न कुछ अनिष्ट जरूर होगा। आपसी झगड़े निपटाने के इस तरह के बहुत सारे तरीके लोक-मानस ने ईजाद किए थे। यह एक ऐसा स्वायत्त क्षेत्र था जिसमें तत्कालीन सत्ता की नियामक भूमिका नहीं थी। इस क्षेत्र का दायरा घटता बढ़ता रहा लेकिन ज्यादातर शासकों ने इसके महत्व को समझते हुए इस प्रक्रिया में दखल देना मुनासिब नहीं समझा। ऐसा उल्लेख मिलता है कि अकबर ने इसके महत्व को समझा और उसे बदलने की कोशिश नहीं की। यहाँ तक की अंग्रेजी शासन ने भी अपने शुरुआती दौर में इसकी भूमिका को कम करने की कोशिश नहीं की।

आधुनिक पश्चिमी समाज एक बहुत ही निर्मम और हिंसक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया। औद्योगीकीकरण के शुरुआती दौर में ही गाँव के किसानों को बहुत हिंसक तरीके से उजाड़ दिया गया। औद्योगीकरण के लिए जितनी श्रमशक्ति की जरूरत थी उसके मुकाबले गाँव से बेदखल किए गए किसानों की संख्या कहीं ज्यादा थी। इसलिए इन्हें आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भेज दिया गया। इस लंबे किस्से को छोटा कर फिलहाल इतना कहकर काम चलाया जा सकता है कि पश्चिमी औद्योगिक समाजों ने ग्रामीण आबादी को न्याय सुलभ कराने की समस्या का सामना ही नहीं किया। यह समस्या मूलतः गैर-पश्चिमी समाजों की है, जहाँ बहुसंख्यक लोग अब भी गाँव में रहते हैं। हम उस न्याय-प्रणाली के जरिए, जो मुख्यतः शहरी मध्यवर्ग के अनूकूल है, बहुसंख्यक ग्रामीण आबादियों को न्याय दिला पाने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं!

पश्चिमी औद्योगिक समाजों में व्यक्ति के सामाजिक संबंध बहुत ही औपचारिक किस्म के रह गए है। घर-परिवार, रिश्तेदारियों और पास-पड़ोस के मायने ही उनके यहाँ बेमानी हो गए हैं। धार्मिक आस्थाएँ भी वैसी नहीं रह गईं कि उन्हीं के सहारे कोई अपनी जिंदगी गुजार ले। समस्याओं के समाधान के लिए राज्य द्वारा निर्मित संस्थाओं का सहारा लेने के अतिरिक्त उनके पास अब और कोई विकल्प नहीं रहा। व्यक्ति-केंद्रित इस समाज में समाज की सामाजिकता कानून के शासन को सख्ती से लागू करने पर ही बची रह सकती है। अन्यथा यह समाज बिखर जाएगा और मत्स्य-न्याय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वस्तुतः कानून के शासन को सख्ती से लागू किए बिना आधुनिक औद्योगिक समाज का निर्माण असंभव है। लेकिन जब तक गाँव और किसान खत्म नहीं होते और 'फालतू आबादी' को ठिकाने नहीं लगाया जाता, तब तक कानून का शासन कायम कर पाना लगभग नामुमकिन है। पश्चिमी समाजों में यह काम औद्योगीकीकरण के शुरुआती दौर में लोकतंत्र के आगमन से पहले ही पूरा कर लिया गया था। यही नहीं, इस काम को अंजाम देने में उन्हें औपनिवशिक देशों की लूट का लाभ भी मिला था। भारत के शासक-वर्ग के सामने चुनौती यह है कि लोकतंत्र को कायम रखते हुए, अपनी आबादी के बड़े हिस्से को वह कहाँ ले जाए। पश्चिमी देशों की तरह अपनी 'फालतू आबादी' को किसी महाद्वीप में विस्थापित करने और उपनिवेशित देशों को लूट कर अपना घर भरने की सहूलियत इतिहास ने उसे नहीं दी है।

आधुनिक युग में नागरिक समाज का जन्म उस लोकवृत्त से हुआ जो आधुनिक राज्य के सीधे नियंत्रण से कमोबेश मुक्त था। नागरिक समाज की गतिविधियाँ राज्य द्वारा कायम की गई किसी संस्था के सहारे नहीं चलतीं। यह लोगों की स्वतःस्फूर्त गतिविधियों का स्वैच्छिक वृत्त है जो राजकीय और व्यक्तिगत दायरे से बाहर पड़ता है। पंचायत का चरित्र भी लगभग ऐसा ही था। लोगों ने स्वयं अपनी सहूलियत के लिए इस संस्था का विकास किया था। त्रिनिदाद में इस संस्था को पुनर्जीवित करने के प्रयास से ऊपर कही गई बात की पुष्टि होती है। जबकि पंचायती-राज-व्यवस्था राज्य द्वारा कायम की गई व्यवस्था है और यह राज्य के शासन-प्रणाली का ही विस्तार है और इसे लोकवृत्त के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इसके निर्माण और संचालन में लोगों की स्वतःस्फूर्त सक्रियता की कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं है। लेकिन यदि आज की तारीख में पुराने ढंग की पंचायत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए तो इसके सफल होने की संभावना बहुत कम है। समकालीन राजनीतिक सांस्कृतिक परिवेश इसे भी अपने रंग में रंग डालेगा।

जब जाति का राजनीतीकरण हुआ और राजनीतिक दलों द्वारा इसका इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए किया जाने लगा तो कुछ जातियों को अपनी संख्या-शक्ति का नए सिरे से एहसास हुआ। उन्होंने जातीय पंचायतों के माध्यम से कुछ ऐसे फैसले लेने शुरू किए जिन्हें आज के दौर में किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। किसी चीज का भविष्य में विकास किस रूप में होगा, यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल किस रूप में करना चाहते हैं। पुरानी पंचायत का विकास एक ज्यादा लोकतांत्रिक, लोकहितकारी और प्रगतिशील संस्था के रूप में भी किया जा सकता था। इस तरह की संस्था बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी के लिए ज्यादा उपयोगी साबित होती। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय चुनावी राजनीति ने कुछ शक्तिशाली और संख्या-शक्तिसंपन्न जातियों को पंचायत के नाम पर मनमानी करने की छूट दे दी। लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर गाँवों में पंचायत की पहले जैसी भूमिका अब नहीं रही। पुरानी पंचायत के कुछ तौर-तरीके आज भी इधर-उधर बिखरे मिल जाएँगे। कोर्ट कचहरी से बाहर रहकर आपसी झगड़ों के निपटारे के साक्ष्य दूर दराज के गाँवों में ही नहीं, शहरों में भी मिल जाते हैं। लेकिन एक अनौपचारिक संस्था के रूप में न तो उसका पहले जैसा वजूद बचा है और न उसके पास पहले जैसी कोई ऐसी नैतिक शक्ति रह गई है। उसके द्वारा लिए गए फैसलों को अब कोई क्यों माने? असल में यह संस्था तभी तक अस्तित्व में रही जब तक राज्य ने इसे नियंत्रित या खत्म करने की कोशिश नहीं की। त्रिनिदाद के अनुभव से यह सूझ भी मिलती है कि राज्य अपनी तरफ से कोई प्रयास न करे तब भी ये संस्था तभी तक चल सकती है जब तक ग्रामीण समाज बचा रहता है। विडंबना यह है कि भारत में ग्रामीण समाज अभी भी बचा रह गया है और निकट भविष्य में भी उसके खत्म होने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही। इसके बावजूद यह संस्था छिन्न-भिन्न हो गई है। बहुसंख्यक आबादी को शीघ्र न्याय सुलभ कराने का क्या कोई आसान और कम खर्चीला तरीका खोजा जा सकता है ?


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