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लेख

एक दिन किताबों के लिए भी
महेश्वर


1995 में पेरिस में हुए यूनेस्को के एक बैठक में यह तय किया गया कि किताबों और लेखकों को श्रद्धांजलि देने के लिए किसी एक तिथि को मान्य किया जाए। इसके माध्यम से लोगों को खास कर युवावर्ग को प्रोत्साहित किया जाए कि मानवता के इस अनमोल सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का सम्मान करें। इसी उद्देश्य से 1995 में 23 अप्रैल को पहली बार व्यापक स्तर पर 'विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस के रूप में मनाने की आधिकारिक घोषणा की गई और पहली बार मनाई गई।

विश्व साहित्य में 23 अप्रैल को सांकेतिक रूप से दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। इसी दिन 1616 में स्पानी उपन्यासकार सर्वांतीस, शेक्सपीयर, इनका गारसिलासो दे ला वेगा की मृत्यु हुई थी। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यह दिन अलग-अलग वर्षों में कई लेखकों के जन्म और मृत्यु के तिथि के रूप में भी अंकित है। फ्रांसीसी लेखक मॉरिस द्रून, हालदर के. लेक्सनेस, ब्लादिमीर नबाकोव, जोसेफ प्ला, मैनुएल मेजिया वेलाजो का भी इस तिथि से संबंध है।

लगभग 100 देशों में करोड़ों लोगों ने इसे सेलीब्रेट किया। सैकड़ों स्वयं सेवी संस्थाओं, विद्यालयों, व्यावसासिक संघों, प्रकाशनों ने इस तिथि को पुस्तक और कॉपीराइट के हित हेतु मनाया। छठे विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस के अवसर पर पहली बार मैडरीड शहर को 'वर्ल्ड बुक कैपिटल' का खिताब दिया गया।

जहाँ तक कॉपीराइट कानून की बात है इतिहास से ज्ञात होता है कि विश्व का पहला कॉपीराइट कानून इंग्लैंड में 1710 में बना था। वहीं 1790 में कला, लेखकों, आविष्कारकों के अधिकारों के हित के लिए अमेरिका में भी कानून बनाया गया। आगे चलकर विश्व के तमाम देशों ने कॉपीराइट कानून बनाए। कॉपीराइट को भारतीय संदर्भ में देखें तो पाते हैं कि हमारा कॉपीराइट कानून भी लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराना है जिसे 1847 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनाया था। लेकिन 1914 में इसमें कुछ आवश्यक बदलाव के साथ नए कॉपीराइट कानून के रूप में लागू किया गया। आगे चलकर क्रमशः 1957 और 1983 में इसमें कुछ बदलाव कर नए अनुच्छेद जोड़े गए। 1994 और 1999 में भी इस कानून में कुछ अनुच्छेद जोड़े गए।

छपाई की शुरुआत

पुस्तकों के सफर पर दृष्टि डालने से पहले हमें प्रिंटिंग के विकास क्रम पर भी नजर डाल लेना चाहिए। प्रिंटिंग की शुरुआत प्राथमिक तौर पर मेसोपोटामिया में 3000 बीसीई से पहले गोल सील के द्वारा मिट्टी की वस्तुओं पर आकृति उकेरने की कला से हुई। इसके साथ ही पूर्वी एशिया में भी ब्लॉक प्रिंटिंग की शुरुआत हुई जो कपड़ों के अतिरिक्त आगे चलकर कागज तक पहुँची। 220 एडी से पहले चीन के 'हान राजसत्ता' के दौरान लकड़ी के ब्लॉक से सिल्क पर छापने की शैली विकसित होती चली गई। उस समय तक उन्होंने तीन रंगों में फूलों की छपाई की विशेषज्ञता हासिल कर लिया था। बौद्ध धर्म के विकास के साथ ही उन्होंने इस छपाई की शैली को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु प्रयोग करना शुरू किया।

ज्ञात तथ्यों के अनुसार 1040 में चीन में वी शेंग ने पहली बार लकड़ी के टाइप का आविष्कार किया और स्याही का प्रयोग भी। 1377 में 'गारियो राजसत्ता' के दौरान ही विश्व की सबसे पुरानी विद्यमान पुस्तक मेटल टाइप से छपे हैं। 15वीं शताब्दी में जर्मनी में जब गुटेनबर्ग ने आधुनिक छपाईखाने की शुरुआत की तब किताबें बड़ी मात्रा में और सुंदरता में छपने लगीं।

छपाई तकनीक लिथोग्राफी, रोटरी प्रिंटिंग प्रेस, स्क्रीन प्रिंटिंग, ऑफसेट प्रिंटिंग, फ्लेक्सो प्रिंटिंग, थर्मल प्रिंटिंग से होते हुए आज डिजिटल प्रिंटिंग तक आ पहुँची है।

सफर पुस्तकों का

प्रकाशन की शुरुआत 1455 में जोहांस गुटनबर्ग द्वारा प्रकाशित गुटनबर्ग बाइबिल से माना जाता है। गुटेनबर्ग के प्रयास से ही पुस्तक प्रकाशन की नींव पड़ी। 18वीं शताब्दी में यूरोप में पुर्नजागरण के दौरान धार्मिक कृतियों का बहुतायत से प्रकाशन होने लगा। यह ऐसा काल था जहाँ प्रिंटिंग प्रेस को आधुनिक बनाने का प्रयास किए जा रहे थे और दिन प्रति दिन उसमें बदलाव भी देखे जा रहे थे। समय के साथ साथ प्रकाशन व्यवसाय में बदलने लगा और उसके वितरण आदि की व्यवस्था बनाई जाने लगी। साथ ही साथ प्रिंटिंग शैली में भी नए नए प्रयोग किए जाने लगे। सुंदर पुस्तकें छपने लगीं। आवरण, जिल्दसाजी की ओर विशेष ध्यान दिया जाने लगा।

पेपरबैक की शुरुआत

19वीं शताब्दी में ब्रिटेन में रॉटलेज ऐंड संस और वार्ड ऐंड लॉक ने पुस्तकों को सस्ती दरों में जन-जन तक पहुँचाने के लिए येलोबैक और पेपरबैक संस्करणों की शुरुआत की। बिक्री के लिए रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों को मुख्य केंद्र बनाया गया। पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए विषय भी मनोरंजक चुने जाने लगे। आकार छोटा रखा गया ताकि एक बैठक या एक यात्रा में पूरी किताब पढ़ना संभव हो। आगे चलकर इसने पूरे विश्व में अपनी पकड़ बना ली। आज भी पेपरबैक संस्करण लोगों में प्रिय हैं, कारण कीमत का कम होना ही है।

ई-बुक्स

20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में इंटरनेट के कारण ई-रीडिंग की शुरुआत हुई। देश में 1990 के दशक में इंटरनेट का आगमन हुआ। नए नए वेबपोर्टल बनने लगे, वेबसाइट्स बनने लगीं जिनके कारण ई-लर्निंग की शुरुआत हुई। अचानक से पढ़ने-लिखने की शैली में परिवर्तन आ गया। अखबारों-पत्रिकाओं ने अपने ई-संस्करण शुरु किए। आगे चलकर स्मार्ट क्लास जैसी अत्याधुनिक तकनीक स्कूल-कॉलेजों में अपनाई जाने लगी। ई-बुक्स की माँग बनने के कारण प्रकाशन गृहों का विशेष ध्यान इस ओर जाने लगा है। अब कंप्यूटर, मोबाइल, टैबलेट आदि में ई-बुक पढ़ना आसान हो गया है। छोटी की-डिवाइस में सैकड़ों पुस्तकों को रखना संभव है। पाठकों की जरूरत और सुविधा को ध्यान में रखकर प्रकाशनों ने प्रिंट संस्करण के साथ-साथ ई-बुक्स संस्करण को भी लाना शुरू कर दिया है। ई-बुक्स का सस्ता होना इसके भविष्य को उज्जवल तो बना ही रहा है साथ ही इसके व्यवसायिक पक्ष को भी मजबूत करता है।

देश में पुस्तक दिवस का उत्सव तो मनाना ही चाहिए। जहाँ वर्ष भर में लाखों पुस्तकें प्रकाशित होती हों, हजारों पुस्तकों का पुर्नमुद्रण होता हो और करोड़ों पाठक हों वहाँ पुस्तक के नाम एक दिन तो बनता ही है।


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