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सिनेमा

कोई भी सच अंतिम नहीं होता : कानून
विमल चंद्र पांडेय


बॉलीवुड में थ्रिलर फिल्मों की समृद्ध परंपरा नहीं रही है, कुछ फिल्में बीच-बीच में बनी जरूर हैं लेकिन ये सिलसिला लगातार नहीं रहा है। कारण वही रहा है जो हिंदी साहित्य में सिनेमा पर गंभीर लेखन की कमी का रहा है, अच्छे माने जाने वाले निर्देशकों ने प्रायः थ्रिलर और हॉरर फिल्मों को दोयम दर्जे का काम माना है जैसे हिंदी के आलोचक और चिंतक फिल्मों पर लिखने को अगंभीर किस्म का काम मानते रहे हैं। नई पीढ़ी के लेखकों में सिनेमा को लेकर जो गंभीर नजरिया है वह स्वागतयोग्य है और गंभीर सिनेमा के साथ-साथ लोकप्रिय लेकिन सार्थक सिनेमा पर अब चर्चे और बातचीत की गुंजाइश बढ़ती दिखाई दे रही है।

मगर हमेशा किसी भी बात का सरलीकरण नहीं किया जा सकता क्योंकि सरलीकरण सबसे बड़ा अपराध है। हिंदी सिनेमा में अच्छे-अच्छे निर्देशकों ने बीच-बीच में थ्रिलर और हॉरर फिल्मों पर हाथ आजमाया है और इस विधा को समृद्ध किया है। बात बी.आर. चोपड़ा की गीतरहित क्राईम थ्रिलर फिल्म 'कानून' की हो रही है जिनकी खूबी थी उनकी विविधता; हर दौर की फिल्मों में अपने आप को साबित करने वाले बी.आर. चोपड़ा समय से आगे के फिल्मकार थे। 'वक्त' फिल्म के निर्माता के रूप में उन्होंने लोकप्रिय सिनेमा को भाइयों के बिछुड़ने-मिलने का फार्मूला दिया जिसे बाद में मनमोहन देसाई ने सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया और कई सफल फिल्में दीं। बी.आर. चोपड़ा की 'नया दौर' आज भी इस दौर की सबसे प्रासंगिक फिल्म है। मशीनों और इनसानों के बीच का संघर्ष इस फिल्म में जितने बेहतरीन तरीके से सवाल उठता है वो आज भी अनुकरणीय है। इसी तरह 'कानून' में जिस तरह और जिस समय में मृत्युदंड की अवधारणा पर सवाल उठाए गए हैं वह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर चोपड़ा साहब कितने दूरंदेशी थे। जिस समय यह फिल्म बनी उस समय मृत्युदंड को लेकर कोई खास बहस या चर्चा नहीं थी लेकिन सच्चा कलाकार वही होता है तो अपने दिल की आवाज पर रचना करे और सवाल उठाए चाहे समाज में उसकी धमक सुनाई दे रही हो या फिर बरसों बाद सुनाई देने वाली हो। चोपड़ा साहब ने हमेशा वही फिल्में बनाईं जिनमें वह कुछ सामाजिक मुद्दों को छू सकें।

कानून हिंदी सिनेमा के उस खूबसूरत अध्याय का एक पन्ना है जहाँ एक फिल्मकार बिना किसी के दबाव के अपनी मर्जी की फिल्म बनाता है और उसमें गानों की गुंजाइश नहीं है तो गाने नहीं डालता। वैसे तो हिंदी सिनेमा में होमी वाडिया की फिल्म 'नौजवान' बिना गानों वाली हमारी पहली फिल्म कही जाती है लेकिन चोपड़ा साहब की यह फिल्म सिर्फ इसलिए अच्छी नहीं कही जा सकती की इसमें गाने नहीं है, फिल्म एक दूरदर्शी सवाल उठाती है कि क्या जो कानून सबूतों और इनसानों की गवाही पर टिका है वह इतना निश्चित हो सकता है कि किसी को मौत की सजा सुना दे। फिल्म ऐसे ही एक केस से शुरू होती है जिसमें एक व्यक्ति, जो कुछ ही दिनों पहले एक कत्ल के इल्जाम में जेल की सजा काट के वापस लौटा है फिर से उसी कटघरे में खड़ा है। उसे इसी व्यक्ति के कत्ल के इल्जाम में सजा सुनाई गई थी। उसने इस बार उस व्यक्ति का कत्ल कर दिया है और अदालत में सीना ठोक कर कहता है, 'मैंने उसका कत्ल किया है जज साहब लेकिन आपका कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि किसी को भी एक ही जुर्म के लिए दो बार सजा नहीं डी जा सकती'। उसे हार्ट अटैक आता है और वो वहीं मर जाता है लेकिन अपने पीछे एक अंतहीन बहस छोड़ जाता है। यह बहस जजों के कमरों तक जाती है और बहुत काबिल माने जाने वाले जज बद्री प्रसाद इस हक में हैं कि फाँसी की सजा को खत्म किया जाना चाहिए क्योंकि कानून जिस चीज को वापस दे नहीं सकता उसे लेने का उसे कोई हक नहीं है। उनका विरोध एक जज करता है जिसका मानना यह है कि मृत्युदंड का भय अपराधियों को अपराध करने से रोकता है। यह दरअसल समाज के दो हिस्सों की बहस है जो उस समय तो मुखर रूप में नहीं थी लेकिन अब बहुत जोर शोर से इस पर बहस चल रही है। मृत्युदंड की सजा सुनाया जाना वाकई कानून का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है और हम आसानी से देख सकते हैं कि अदालतों में गवाह कैसे खरीदे और बेचे जाते हैं, उससे भी अधिक यह कि फाँसी की सजा होने पर भी कहीं भी अपराधों में कोई कमी नहीं आई है ना आने की कोई उम्मीद दिखाई देती है इसलिए फाँसी की सजा को खत्म कर देना चाहिए। जज बद्री प्रसाद का यही नजरिया है लेकिन उनसे लोग सहमत नहीं होते। बद्री प्रसाद हँसी-हँसी में दावा करते हैं कि वह खून करके आसानी से निकल सकते हैं।

बात आई गई हो जाती है लेकिन तभी एक दुर्घटना घट जाती है। बद्री प्रसाद की बेटी मीना सरकारी वकील कैलाश से प्रेम करती है और उसका जज साहब के घर आना जाना है। दोनों की शादी भी तय हो चुकी है। जज साहब का बेटा विजय अय्याश है और बहुत सारे पैसे अपनी अय्याशियों पर उड़ा चुका है। इसके लिए उसने शहर के जाने माने साहूकर से उधार भी लिया है जिसने उससे एक सादे कागज पर दस्तखत करा लिए हैं और अब पैसे एक निश्चित समय में न चुकाने पर उसके बाप की यानी जज बद्री प्रसाद की सारी जायदाद अपने नाम लिख लेगा। मीना यह बात कैलाश को बताती है कि वो साहूकर के यहाँ जाए और उसे समझा बुझा कर यह मामला हल करे। कैलाश वहाँ जाता है और साहूकर उसे पेपर्स दे भी देता है लेकिन उसी समय जज साहब भी आते दिखाई देते हैं। कैलाश छिप जाता है और एक आश्चर्य उसकी आँखों के सामने उभरता है। जज साहब उस साहूकर का खून करते हैं, ठंडे दिमाग से बत्तियाँ बुझाते हैं, अपने दस्ताने उतारते हैं और सारे सबूत मिटा कर आराम से चलते बनते हैं। कैलाश सन्न वहीं खड़ा रह जाता है। इसके बाद उसका अंतर्द्वंद्व शुरू होता है। खून के इल्जाम में एक साधारण चोर को पकड़ लिया गया है और अब कैलाश की आत्मा उसे कचोटती है कि उसे बेगुनाह चोर की जिंदगी बचा लेनी चाहिए। यहाँ जिंदगी और जान की कीमत का सवाल बहुत मार्मिक ढंग से सामने आता है, भले ही वह एक साधारण चोर है लेकिन उसने कुछ नहीं किया है इसलिए उसकी जान हर कीमत पर बचाई जानी चाहिए। जज बद्री प्रसाद के खिलाफ वह कुछ नहीं कह पाता क्योंकि उसे डर है कि मीना यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। वह एक स्टैंड लेता है और सरकारी वकील के ओहदे से त्यागपत्र देकर उस चोर का केस लड़ता है। वह बार-बार कोशिश करता है कि जज साहब की आत्मा उन्हें धिक्कारे और वह खुद अपना जुर्म स्वीकार कर लें लेकिन ऐसा नहीं होता।

फिल्म अपने एक फिल्मी लेकिन बेहतरीन इत्तफाक के साथ अपने अंजाम तक पहुँचती है और फिर से वही सवाल उठाया जाता है कि क्या अदालत को किसी व्यक्ति की गवाही पर किसी की जान लेने का हक है? अदालत ने एक ज्यूरी बनाई थी जिसने जज बद्री प्रसाद को मौत की सजा सुना ही दी थी कि अदालत में वह इत्तफाक पेश होता है। जब बद्री प्रसाद मृत्युदंड के बारे में सवाल उठाते हैं और अपने केस का उदाहरण देकर उस जज से पूछते हैं कि अगर मुझे फाँसी पर चढ़ा दिया गया होता तो मेरी मौत का जिम्मेदार कौन होता। वह जज भी बद्री प्रसाद के तर्कों से सहमत होता है।

फिल्म अपने सवालों की वजह से बहुत प्रासंगिक है और कल से कहीं ज्यादा आज। अशोक कुमार जज की भूमिका में फिल्म की जान हैं तो चोर कालिया की भूमिका में नाना पलसीकर फिल्म की रीढ़ हैं। एक अच्छा अभिनेता कैसे छोटी भूमिका और छोटे दृश्यों में से भी आकर्षण चुरा लेता है, नाना इसकी मिसाल हैं, फिल्म के एक दृश्य में जब जेल का डाक्टर उनका चेक-अप कर रहा है तो वह उससे अपना दुखड़ा सुनाते हैं और डाक्टर से कई सवाल पूछते हैं। डाक्टर एक मशीन की तरह उनका चेक-अप करते हुए कहता है उठ के बैठ जाओ। वह बैठ जाते हैं और कहते हैं, "जैसे तुम्हारा कानून गूँगा बहरा है वैसे ही तुम भी हो।" यह दृश्य नाना के सहज अभिनय की वजह से अद्भुत बन गया है।

नंदा ने अपनी भूमिका को इंटर्नशिप की तरह पूरा किया है तो फिल्म के हीरो राजेंद्र कुमार को हर फ्रेम में देख कर एक ही आवाज आती है कि किस्मत हो तो आदमी क्या नहीं कर सकता। उनकी बॉडी लैंग्वेज इतनी खराब है कि चिढ़ होने लगती है। ज्यादातर दृश्यों में वह अच्छे अभिनय की कोशिश करते दिखाई तो देते हैं पर दुख यह है कि उनकी कोशिश एक भी दृश्य में कामयाब नहीं होती। फिल्म की कहानी अख्तर-उल-इमान और सी. जे. पावरी की है। इस फिल्म के लिए चोपड़ा साहब को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड मिला था तो नाना पलसीकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का। फिल्म आज भी थ्रिलर और कोर्टरूम ड्रामा पसंद करने वाले दर्शकों की पसंदीदा फिल्मों में शुमार है।


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