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लेख

दरकती अस्मिताओं के दौर में राष्ट्रभाषा हिंदी की चुनौतियाँ
राजनारायण पाठक


उत्तरआधुनिक काल में बही भूमंडलीकरण, उदारीकरण और बाजारीकरण की बयार ने पूरे विश्व के जनजीवन को प्रभावित किया है। लोगों की जीवनशैली तथा जीवनदृष्टि पर इसका व्यापक असर पड़ा है। परंपरागत जीवन मूल्यों में गंभीर बदलाव आए हैं। लोगों का रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा भाषा-संस्कृति और रीति-रिवाज भी इससे प्रभावित हुआ है। आज मानवीय संवेदना और सृजनात्मक संभावनाओं का स्थान उस उपभोक्ता-संस्कृति ने ले लिया है, जिसके केंद्र में समाज के समृद्ध तबकों की भौतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का लक्ष्य निहित है। न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति द्वारा अधिकतम सुख-संतोष में विश्वास करनेवाला आमजन वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति के निशाने पर है। उसे काफी योजनाबद्ध ढंग से उत्पादक और सर्जक के स्थान पर उपभोक्ता में तब्दील किया जा रहा है, और वह जाने-अनजाने ही पूँजीपतियों का हित-पोषक बन जाता है।

परिवर्तन की उक्त बयार, कहना न होगा कि अब आँधी का रूप ले चुकी है। संसार के भौतिक कलेवर में आमूल-चूल बदलाव लाने के साथ ही उसने भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि अभौतिक तत्वों से संबंधित अस्मिताओं को भी अपने लपेटे में ले लिया है। यहाँ हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के परिप्रेक्ष्य में इस नए अनुभव का आकलन करते हुए आसन्न चुनौतियों के प्रतिकार पर विचार करेंगे। भाषा की उत्पति जनमानस की अपने जीवन-यथार्थ और परिवेश के साथ अंतःक्रियाओं से होती है। एक व्यापक जन-समूह की स्वीकृति से समृद्ध होकर वह किसी समाज की संपत्ति बन जाती है। किसी भाषा का उसके समाज के साथ नाभि-नाल संबंध होता है। भाषा समाज के लिए होती है और समाज भाषा के लिए। किसी समाज को अपनी भाषाई क्षति से जो पीड़ा होती है, उसकी तुलना अन्य किसी भी कष्ट से नहीं की जा सकती। इसी प्रकार, उसके समक्ष जब कभी भी अस्तित्व अथवा अस्मिता का संकट आता है, तो उसे सबसे बड़ा संबल अपनी भाषा से मिलता है। दूसरे शब्दों में, किसी समाज की स्थिति और प्रगति का मूल आधार उसकी अपनी भाषा ही होती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में -

            "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कर मूल।
             बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल॥"

आज वैश्वीकरण के वात्याचक्र में अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ हमारी भाषा भी प्रभावित हुई है। बाजारवाद के दौर में आर्थिक उपक्रमों, विज्ञापनों तथा संचार-माध्यमों में भाषा के साथ जो मनमानी की जा रही है, उसके कारण आज हमारी भाषाई अस्मिता तार-तार हो रही है। इन क्षेत्रों में हिंदी का जो स्वरूप दिखलाई पड़ रहा है, उसने हमारी भाषाई समृद्धि और सांस्कृतिक पहचान को संकटापन्न कर दिया है। जिस अनुपात में आज हमारे बाजार उपभोक्ता-सामग्रियों से अँटे पड़े हैं, उसी अनुपात में हमारे संचार-माध्यमों में उनसे संबंधित विज्ञापनों की भी भरमार है। इन विज्ञापनों की भाषा में घोर अराजकता विद्यमान है। संचार-माध्यमों, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया में वाक्य-विन्यास, शब्दावली एवं अभिव्यंजना-शैली के स्तर पर जो गड़बड़झाला दिखाई पड़ रहा है, वह दिनोंदिन चिंताजनक होता जा रहा है।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का चयन कोई एक दिन की घटना नहीं हैं। वस्तुतः आज हिंदी जिस रूप में है, वहाँ तक पहुँचने में उसे लंबी यात्रा तय करनी पड़ी है। सच तो यह है कि देश की आजादी की लड़ाई के समानांतर ही हिंदी भाषा के विकास का अभियान भी चलता रहा है। बल्कि यह कहना अधिक संगत होगा कि आजादी की लड़ाई की बड़ी परियोजना के भीतर ही हिंदी भाषा की अभिव्यंजना-शक्ति और जनमानस में इसकी व्यापक ग्राह्यता का अभियान भी चलता रहा है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने देशवासियों के साथ प्रभावी संपर्क और संवाद के लिए जिस भाषा का सर्वाधिक उपयोग किया, वह भाषा हिंदी ही थी। आजादी की लड़ाई के दरम्यान जब यह विचार आया कि स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा क्या हो तो, हिंदी भाषा को ही इसके योग्य समझा गया। इस प्रकार, हिंदी भाषा की पहचान न केवल भारत की एक सर्वाधिक स्वीकार्य तथा व्यवहृत भाषा के रूप में हुई, बल्कि इसे हमारे स्वाधीनता-आंदोलन के एक आधारभूत उपकरण के रूप में भी देखा गया।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का विचार हमारे जिन तत्कालीन राष्ट्रनायकों ने दिया, उनमें प्रमुखता वैसे नेताओं की रही जो अहिंदी-भाषी प्रांतों से संबंधित थे। यथा, गुजरात प्रांत से महात्मा गाँधी, महाराष्ट्र से आचार्य विनोबा भावे तथा प. बंगाल से श्री सुनीति कुमार चटर्जी आदि। हिंदी को स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा बनाए जाने के विचार के पीछे इस भाषा की जो विशेषताएँ काम कर रही थीं, वे थीं समृद्ध साहित्य, समावेशी भाषा, वैज्ञानिक लिपि, प्रभावी अभिव्यंजना-शक्ति तथा लोगों में व्यापक स्वीकार्यता। हिंदी का साहित्य इतना विपुल और वैविध्यपूर्ण है कि इसकी तुलना विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य से की जा सकती है। इसकी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्दों और मुहावरों का समावेश करने की अद्भुत क्षमता है। इसमें एक ओर जहाँ भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रचुरता है, वहीं इसमें तद्भव रूपों का भी व्यापक प्रयोग होता है। इस भाषा में क्षेत्रिय भाषाओं और स्थानीय बोलियों के शब्दों का भी सुंदर संयोजन है। इसी प्रकार, इस भाषा की प्रकृति ऐसी है कि इसमें अँग्रेजी, फारसी, चीनी, जापानी आदि विदेशी भाषाओं के शब्दों-मुहावरों का भी सहज समावेश हो जाता है। इन्हीं कारणों से भारत की राष्ट्रभाषा तथा राजभाषा के रूप में हिंदी को व्यापक मान्यता प्राप्त है। इतना ही नहीं, अब तो इसे विश्वभाषा का दर्जा दिलाने की भी कोशिश हो रही है।

संरचना के स्तर पर स्वयं को काफी हद तक संयोजित और संपन्न बना चुकी राष्ट्रभाषा हिंदी को आज बाजारवाद की मार झेलनी पड़ रही है। इस भाषा की अभिव्यंजना शक्ति को नजरंदाज कर इसके स्वरूप एवं शिल्प के साथ लगातार छेड़-छाड़ की जा रही है। संप्रति इस भाषा को मुख्यतः तीन प्रकार की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। पहली चुनौती स्वयं इसके पक्षधरों द्वारा दी जा रही है। हिंदी में आज भी एक ऐसा वर्ग है जो शुद्ध हिंदी के नाम पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थक है। यदि उनकी बात मान ली जाए, तो हिंदी भारत के आम लोगों की पहुँच के बाहर हो जाएगी और यह केवल वैसे लोगों की भाषा बनकर रह जाएगी, जो संस्कृत पृष्ठभूमि के हैं अथवा कुछ अन्य कारणों से इसे विशिष्ट तथा क्लिष्ट बनाए जाने के हिमायती हैं। दूसरी चुनौती उन लोगों द्वारा खड़ी की जा रही है, जो राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिद्वंद्विता में अँग्रेजी को लाना चाहते हैं। अपने संकीर्ण स्वार्थों के कारण, विदेशी भाषा के प्रति अतिरिक्त व्यामोह और स्वभाषा के प्रति आत्महीनता से ग्रस्त होने के कारण हिंदी को उसके नैसर्गिक अधिकार से वंचित रखना चाहते हैं। तीसरी चुनौती उन लोगों द्वारा पेश की जा रही है, जो हिंदी भाषा के सरलीकरण और बाजार की आवश्यकता के नाम पर इसमें बेमेल और विजातीय शब्दों-मुहावरों का बेशुमार घाल-मेल कर रहे हैं। अँग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़े तथा अँग्रेजीदाँ लोगों के वारिसों में भी अँग्रेजी भाषा के प्रति अतिरिक्त आग्रह विद्यमान है और ऐसे ही लोग तथा उनके देखादेखी कुछ अन्य लोग भी हिंदी में अँग्रेजी शब्दों और वाक्यों का वीभत्स प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे लोगों द्वारा हिंदी का जो स्वरूप पेश किया जा रहा है, उसे 'हिंग्लिश' कहा जा रहा है। इसमें हमारे संचार-माध्यमों की भी खासी भूमिका है। आज हमारे अखबारों में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है, उसमें किसी प्रकार की भाषाई प्रतिबद्धता का घोर अभाव है। हिंदी में अँग्रेजी शब्दों के प्रयोग में उनके द्वारा जो स्वच्छंदता और फूहड़ता बरती जा रही है, वह चिंतनीय है। इस दृष्टि से इलेक्ट्रानिक मीडिया का हाल सबसे बुरा है। दूरदर्शन, खासकर निजी चैनलों द्वारा अत्यंत विकृत बाजारू और भ्रष्ट भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। आजकल तेजी से पाँव पसार रहे सोशल मीडिया का तो कहना ही क्या! इंटरनेट, फेसबुक, ट्विटर आदि पर व्यवहृत भाषा में कोई तारतम्य अथवा व्यवस्था ढूँढ़ पाना टेढ़ी खीर है। संचार-माध्यमों में आमफहम हिंदी के नाम पर जो 'हिंग्लिश' पेश किया जा रही है, उसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए जाने-माने पत्रकार श्री राहुल देव कहते हैं, "हिंदी चैनलों और अखबारों में हिंग्लिश लगातार बढ़ती जा रही है। इसके कई कारण हैं। पहला तो इस आत्मलज्जित, स्वाभिमानहीन, घटिया समाज में अँग्रेजी का ऐसा ऐतिहासिक आतंक है कि आम हिंदीवाला अँग्रेजी और अँग्रेजीवालों के सामने हीन, दीन और दुर्बल महसूस करता है। इस आत्महीनता, दीनता की कमी वह अपनी हिंदी में अधिक-से-अधिक अँग्रेजी ठूँस कर करता है। यह बात और है कि इससे वह अँग्रेजीदाँ लोगों के बीच अपने को हास्यास्पद ही बनाता है।" अच्छी हिंदी के अभाव का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं, "अच्छी हिंदी अब केवल हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों, पुस्तकों, अखबारों के संपादकीय पन्नों, साहित्यिक-बौद्धिक पत्रिकाओं में ही पाई जाती है। अच्छी प्रांजल हिंदी सुनना अब एक दुर्लभ सुख बन गया है।" इसके पूर्व कि संचार-जगत में तेजी से फैल रही विकृति हमारी भाषाई संस्कृति बन जाए, हमें इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।

उपर्युक्त विवेचन राष्ट्रभाषा हिंदी के भविष्य और हमारी भाषाई अस्मिता पर मँडरा रहे खतरे को स्पष्ट कर देता है। भूमंडलीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के वर्तमान बवंडर ने न केवल हमारी भाषाई अस्मिता बल्कि जीवन की अन्य अस्मिताओं के समक्ष भी अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के लक्ष्य को पाने के रास्ते में यह एक बड़ी बाधा है। चूँकि भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को उसका उचित स्थान दिया जाना हमारी संवैधानिक प्रतिश्रुति है, अतः इस दिशा में हमें विशेष सचेत होने की जरूरत है। 14 सितंबर, 1950 को हमारे देश ने इस संबंध में जो संकल्प लिया, वह तभी पूरा हो सकता है, जब हम समय रहते हिंदी के एक सर्वमान्य एवं सर्वग्राह्य रूप का विकास, संवर्द्धन और संरक्षण कर सकें। इसके लिए हमें अपने संकीर्ण आग्रहों और कमजोरियों से ऊपर उठना होगा। राष्ट्रभाषा हिंदी के राष्ट्रव्यापी प्रसार और व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए हमें अँग्रेजी को उसकी औकात में रखना होगा और क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करना होगा।

राष्ट्रभाषा हिंदी की विरासत अत्यंत गुरु-गंभीर है। इसके साथ हमारे मनीषियों, आचार्यों एवं साहित्य-सेवियों की सुदीर्घ परंपरा जुड़ी हुई है। हिंदी भाषा का शब्द-भंडार काफी समृद्ध है और इसे और अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है। देश की अन्य भाषाओं के प्रति इसका संबंध मैत्रीपूर्ण है। हमारी क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय बोलियों से इसे ताकत मिलती है। अतएव भारत की राष्ट्रभाषा, राजभाषा एवं संपर्क भाषा के गुरुतर दायित्व का निर्वहन हिंदी और केवल हिंदी ही कर सकती है, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को उसके अभीष्ट की प्राप्ति का प्रयास केवल भाषा के स्तर पर ही संभव नहीं है। वस्तुतः हमें इसे अपने देश और समाज की विद्यमान जीवन-स्थितियों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। इसे अपनी राष्ट्रीय पहचान और स्वाभिमान और समृद्धि की बड़ी परियोजना के एक अंग के रूप में अपनाना होगा। समकालीन परिवर्तनों से प्रभावित हो रहे हमारे जनजीवन के आर्थिक सांस्कृतिक, राजनीतिक संतुलन और विकास के एक सहगामी उपक्रम के रूप में देखना होगा। न्याय एवं समता-आधारित समाज-व्यवस्था, जनोन्मुख शासन-व्यवस्था, जाति-वर्ग-लिंग भेद से परे सभी लोगों के सांवैधानिक अधिकारों की रक्षा, मानवधिकार, समावेशी विकास, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसे आधुनिक जीवन-मूल्यों के संरक्षण एवं साहचर्य में ही हम अपने राष्ट्र के भाषाई दायित्व को पूरा कर पाएँगे।


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