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नाटक

विषस्यविषमौषधम्
भारतेंदु हरिश्चंद्र


 

 प्रहसन

 


भाण

परतिय-रत रावन बध्यौ, पर-धन-रत तिमि कंस।
राम कृष्ण जय सूर ससि, करन मोह अघधंस ।। 1 ।।

(भण्डाचार्य आता है)
भण्डाचाय्र्य : (लम्बी सांस लेकर)
”पर नारी पैनी छुरी, ताहि न लाओ अंग।
रावनहू को सिर गयो, पर नारी के संग ।। 1 ।।
हमारी दशा भी अब रावण की हुआ चाहती है, तो क्या हुआ, होय।
रावन ने दस सिर दिए, जनक-नन्दनी-काज।
जौ मेरो इक सिर गयो, तो यामें कहं लाज ।। 3 ।।


देखो पर-स्त्री संग से चन्द्रमा यद्यपि लांछित हैं तौ भी जगत को आनन्द देता है वैसे ही मोछों पर हाथ फेरकर, हम बड़े कलंकित सही पर हमी इस नगर की शोभा हैं। भला दुष्ट बाबाभट्ट क्या हुआ तुम ने हमारा सब भेद खोल दिया, इस भेद खुलने पर भी हम ने तुम्हैं और कृष्णाबाई, दोनों को न छकाया तो मेरा नाम भण्डाचाय्र्य नहीं। अब भी क्या खंडेराव का राज्य है कि पहलवानों की पूछ होगी अब तो जो कुछ हमीं लोग हैं ऊपर देखकर, क्या कहा कि ‘इसी उपद्रव से न यह गति हुई’ किसकी किसकी? महाराज मल्हार राव की? ए भाई जरा हाल तो कहे जाओ ऊपर देखकर, हैं चला गया, कौन गति हुई, इतना तो हमने भी सुना था कि कुछ दिन हुए एक खबीसन आई थी, क्या जानै कौन साहेब उसके मालिक थे। उं: अरे वह तो इसी बात पर न आई थी कि महाराज की भेड़ियां उन से अच्छी तरह नहीं चराई जातीं, तो फिर इस से क्या? अपनी नाक ठहरी चाहे जिधर फेर दिया और फिर उस का प्रबन्ध करने तो उनके साढ़े-तीन नातेदार आए न थे एक दादा दूसरा भाई तीसरा पति (नौरा) और आधी जीजी, क्या उनसे भी कुछ न हुआ ऊपर देखकर, क्या कहा, होता कहां से मलहर जी कुछ करने देते तब तो। अजी बावले हुए हो करने क्या देते? राजा होता है प्रभु और ”कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तु समर्थः प्रभुः“ यह प्रभु का लक्षण है, उनकी बकरी थी, चाहे जिस घाट पानी पिलाया। हम तो अपने नौकरों से रात दिन जो चाहते हैं, काम लेते हैं। और फिर सुख भी तो हिंदुस्तान में तीन ही ने किया, एक मुहम्मदशाह ने दूसरे वाजिदअली शाह ने तीसरे हमारे महाराज ने। मुहम्मदशाह के जमाने में नादिरशाही हुई, वाजिदअली से लखनऊ ही छूटा, अब देखैं इन की कौन गति होती है। इसका तो यही फल है, पर फिर कौन इस रंग में नहीं है बड़े-बड़े ऋषि मुनि राजा महाराज नए पुराने सभी तो इस में फंसे हैं। अहा स्त्री वस्तु भी ऐसी ही है।

पुरुष जनन के मोहन को विधि यंत्र बिचित्र बनायो है।
काम अनल लावन्य सुजल बल जाको बिरचि चलायो है ।।
कमर कमानी बार तार सों सुन्दर ताहि सजायो है।
धरमघड़ी अरु रेलहु सों बढ़ि यह सबके मन भायो है ।।

यह तो कल के अर्थ में यंत्र हुआ अब हिन्दुस्तानी तन्त्र का यन्त्र वर्णन सुनिए।

पुरुष जनन के मोहन को यह मंगल यन्त्र बनायो है।
कामदेव के बीज मन्त्र सों अंकित सब मन भायो है ।।
ग्रहण दिवारी कारी चैदस सारी रात जगायो है।
सिद्ध भयो सब को मन मोहत नारी नाम धरायो है ।।

(ऊपर देखकर) क्या कहा? इसी यंत्र में अनुष्ठान का न यह फल हुआ कि सिर पर इतनी भारी जवाबदेही आय पड़ी। किसके किसके? किसके बल हम कूदते हैं! अरे महाराज के? क्या हुआ (ऊपर देखकर) क्या कहा? ”तुमको क्या नहीं मालूम“ हमको यहाँ तक मालूम है कि पहिले एक कमीशन आया था और फिर कुछ आया के आया जाया की गड़बड़ सुनी थी। छिः छिः स्त्री ऐसी ही वस्तु है उस पर भी कुमारी। बिजली को घन का पच्चड़। स्त्री और बिजली जिससे छू गई वह गया (ऊपर देखकर) क्या कहा ”गया भी ऐसा कि फिर न बहुरैगा“ अरे कौन-कौन? क्या कहा? वही जिसका तुम सवेरे से पचड़ा गा रहे हो! हाय! हाय! महाराज! अरे क्या हुए? गद्दी से उतारे गए? हाय! महा अनर्थ हुआ। महाराज नहीं गए हिन्दुस्तान गया। भला पूरा हाल तो कहो (कुछ ठहरकर ऊपर देखकर) हां समझा। हाय बहुत ही बुरा हुआ बुढ़िया मरने का डर नहीं जम परचने का डर है। परचल गोह करौंदा खाय। वाजिदअलीशाह भी तो इसी खुराफात से उतरे थे। ”माँ और भाई मलिकः से इनसाफ चाहने के लिए विलायत पहुँचे वह कुछ सुनाती (न?) दोनों आपनी जान मलिकः पर निछावर कर गुजरे“ ”सो बातैं सुनि राजसभा में ह्नै निशंक विसतारी जू“ भाई यस्यास्ति भाग्यं स नरः कुलीनः स पण्डितः श्रुतिमान् गुणज्ञः स एव दासा स च दर्शनीयः सव्र्वेगुणाः भाग्यवतामधीना। हमारा तो सुनकर जी जल गया कि कविवचन सुधा नाम का कोई अखबार सोने के और लाल टाइप में उस दिन छपा था जिस दिन महाराज उतारे गए। वाहरे शिफारशियो? अरे खुशामद की भी कुछ हद होती है। एक बादशाह ने हुक्म दिया बड़े-बड़े खुशामदी लाओ। तीन आदमी हाजिर किये गए। बादशाह ने पूछा तुम खुशामद कर सकोगे। पहिला बोला हुजूर क्यों नहीं। बादशाह ने उसे निकाल दिया। दूसरे से पूछा तुम खुशामद कर सकोगे? उसने कहा जहाँपनाह जहाँ तक हो सकेगी, बादशाह ने उसे भी निकाल दिया। तीसरे से भी पूछा तुम खुशामद कर सकोगे। बोला गरीब परवर क्या मजाल भला मेरी ताकत है कि हुजूर की खुशामद कर सकूं। बादशाह ने कहा हाँ यह पक्का खुशामदी है। ठीक वही हाल है और निबाह भी इसी से है हजार जान दे मरो शिफारश नहीं तो कुछ भी नहीं। जान भी दे तो बादशाह ही न था। फिर भी भाई शिफारशियों का कल्याण है। तो हमहुं कहब अब ठकुर सोहाती। हसब टठाव फुलाउब गालू, पर हम से न होगा। भला कहाँ हिन्दुस्तानी शिफारशी दरबार, कहाँ हमसे पण्डित। ”हरि संग भोग कियो जा तन सों तासों कैसे जोग करैं।“ पक्षपात नहीं है ऐसा ही है। लाखों सबूत दे सकते हैं पर कोई सुनै भी। हाय! कोई सुनने वाला भी तो नहीं प्रानपियारे तिहारै बिना कहो काहि करेजो निकासी दिखाऊँ’ ए भाई कुछ कहना भी तो झख मारना है। पासा पड़ै सो दाव, राजा करै सो न्याव। कहैं जो लोग बस उस को बजा कहिए। इन का राज गया तो क्या आश्चर्य है यह कुछ आज ही थोड़े हुई है सनातन से चली आई है और फिर राजनीति रक्षा भी तो इसी से होती है। पर ऐसे ही सारे भारतवर्ष की प्रजा सर्कार ध्यान नहीं रखती। रामपुर में दुरंत यवन हिन्दुओं को इतना दुख देते हैं पूजा नहीं करने देते शंख नहीं बजता पर सर्कारी इस बात की पुकार नहीं सुनती। यद्यपि यह अनर्थ वहाँ है जहाँ पहिले सर्कारी राज्य था और जिस देश के विषय में पक्का अहदनामा हो चुका है। अहदनामे पर क्या, जैसे अधिकारी आते हैं वैसा बरताव होता है। सर्कारी विचारी कुछ देखने थोड़े ही आती है। धन्य है ईश्वर! सन् 1599 में जो लोग सौदागरी करने आये थे वे आज स्वतंत्र राजाओं को यों दुध की मक्खी बना देते हैं। वा या तो बुद्धि का प्रभाव है। साढ़े सत्रह सौ के सन् में जब आरकाट में क्लाइव किले में बन्द था तो हिन्दुस्तानियों ने कहा कि रसद घट गई है सिर्फ चावल है सो गोरे खांय हम लोग मांड़ पीकर रहेंगे। सन् 1617 में जब सर्कार से सब मरहठे मात्र बिगड़े थे तब सिर्फ बड़ौदे वाले साथ थे। उन के कुल की यह दशा! यह तो जब पहिले कमीशन आया था तभी हम समझे थे। यदाऽश्रौषं माधवं बासुदेवं सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टं। यस्येमां गां विक्रममेकं माहुस्तादानाशंसे बिजयाय संजय। जो हो मलहर की यह करतूत भी कभी न भूलैगी। कलकत्ते के प्रसिद्ध राजा अपूव्र्य कृष्ण से किसी ने पूछा था कि आप लोग कैसे राजा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया जेसे शतरंज के राजा, जहाँ चलाइए वहाँ चलैं। ऊपर देख कर, क्या कहा? यह सब ठीक, पर कहे कौन? सो तो ठीक है ”कोनसाहिबनूअक्खे“ यों नहीं यों कर। राजा और दैव बराबर होते हैं ये जो करैं सो देखते चलो बोलने की तो जगही नहीं। मलहर सुनते ही तो यह नौबत काहे को होती। राजा बनारस के अधिकार के विषय में जब कौन्सिल में चर्चा हुई तो हेस्टिङ्स साहिब ने रेजिडेण्ट न मुकरर्र हों, वे कम्पनी को पटने के इलाके में मालगुजारी दिया करैं। क्योंकि रेजिडेण्ट मुकरर्र होने से वह राजा और राज्य पर अपना अखतियार जारी करने की कोशिश करेगा और इन से राजा के साथ उस का विवाद होने से कौन्सिल में हमेशा नालिशैं आवैंगी, जिसमें कि निस्सन्देह रेजिडेण्ट की बात पर विश्वास कर के राजा के विपक्ष फैसला होगा और पश्चात् एतद् द्वारा उन का सब नुकसान होकर उन को साधारण जमींदारी की अवस्था भोगनी पड़ैगी“ ’सो उन्हीं रेजिडेण्ट से मलहर ने बिगाड़ कर लिया। ठीक है, ठीक है, अरे भाई अपने हिन्दुस्तानियों का चाल व्यवहार जितना हिन्दुस्तानी समझेंगे उतना और कोई क्या समझैगा? वरंच ऐसे मामलों का अन्तःसार हिन्दुस्तानी ही लोग जानते हैं, ”सहवासी विजानीयात् चरितं-सह्वासिनः“। हाय! ऐसे बड़े वंश की यह दुर्दशा! सच है, कुपुत्र बुरा होता है। इन का पुरखा दमाजी गायकवाड़ कैसा प्रतापी था, जिसके बल से पेशवा रघुनाथराव निशंक रहता था। सन् 1768 में जब माधवराव रघुनाथराव से जूती उछली थी तो इसी दमा ने अपने बेटे गोविन्दराव को भेजा था। सुना है कि दमा के 4 बेटे थे, बड़ा, पर छोटी रानी से तो सियाजी छोटा, पर बड़ी रानी से गोविन्दराव। सब से छोटकी रानी से फते सिंह और माणिक जी। यही गोविन्दराव बाप के मरने पर साढ़े पचास लाख रु. देकर और हरसाल उनहत्तर हजार रुपया और तीन हजार सवार, समय पड़े पाँच हजार देने के करार पर सैना खास खेल हुआ ऊपर देखकर, क्या कहा? फतेसिंह भी तो लड़ा था? हाँ सिया जी को राजा बना कर लड़ता भिरता रहा, पर बाजीराव ने पेशवा होकर गोविन्दराव को पक्का न कर दिया, वरञच हरिफड़ के चढ़ाव के समय फौज लेकर आप बड़ोदे गया और गोविन्दराव को राजा बनाया। सरकार ही ने तो इन दोनों की कलह मिटाई थी जिसमें तै कर दिया था कि 26 लाख रु. तो तीन महीने में गायकवाड़ पेशवा रघुनाथ को दे और पेशवा उसको दश लाख की दक्षिण में जागीर दे और दो लाख तेरह हजार की जमीन गायवाड़ सर्कार को दे ऊ. दे., क्या कहा? कभी कर्नल गाड ने बड़ोदे का भी तो कुछ हिस्सा ले लिया था? हाँ फतेसिंह ने कुछ गड़बड़ किया था उस पर कर्नल गाड ने हुमायूँ का शहर ले लिया था ऊ. दे., क्या कि फिर क्या हुआ? फिर यह तै हुआ कि मायी नदी के उत्तर की पृथ्वी पेशवा फतेसिंह ले और सर्कार को भरोच अठाविशी ने अठाइसो परगने, शिनोर परगना और कुछ जमीन मिलै। यह फतेसिंह नानाफड़नवीस के दौर दौरा में साढे़ पंद्रह लाख रु. दीवान को देकर सैना खास खेल हुआ। बिचारा सन् 1791 ई. में गिर कर मर गया और उस का छोटा भाई मानिक जी सिया जी को नांव का राजा बना कर राज चलाने लगा। पर गोविन्द राव ने, जो तब खेड़े गाँव में पूने के पास रहता था, पेशवा से कहा कि हमारा राज अब हम को मिलै। यह सुनते ही माणिक जी ने तैंतीस लाख तेरह हजार रुपया नजर और 38 लाख की बाकी देकर फड़नवीस से राज की सनद ले ली और इधर गोबिन्दा ने महाजी सेंधिया के पूना आने पर उन के द्वारा सनद पायी। इसी बखेड़े में माणिकराव आप ही मर गया तब भी नाना ने गोबिन्द को पहिली नजर दिए बिना जाने न दिया, देखो इन्हीं अँगरेजों ने पहिले तै हुई बात के विरुद्ध समझ कर उस समय गोबिन्दा की सहायता की और नाना को समझाया कि सालपी में जो तै हो चुका है उस के बरखिलाफ अब नया तापी के दक्षिण का मुल्क बिचारे गोविन्दा से क्यों मांगते हो और इन्हीं के बदौलत बिचारा गोबिन्दा सन् 1792 दिसम्बर को 19 तारीख को राजा हुआ और सन् 1799 में बम्बई के गवर्नर डंकन साहब से मिलकर शिष्टाचार करके सूरत का चैथाई हिस्सा और चैरासी परगना दिया ऊ. दे., क्या हुआ? हाँ कुछ बड़ोदा का हाल और भी कहो? सुनो, हम तो इस वंश के पुराने पुरोहित हैं सब शाखोच्चार करैं। हाँ तो सबसे पहिले गोबिन्दा राव गद्दी पर बैठे, फिर आबा शेलूकर जो नाना के साथ कैद में पड़ा था सो सेंधिया को दस लाख रु. देकर छूटा और अहमदाबाद का हाकिम हुआ, बाजीराव ने गोबिन्दराव से और उससे बिगाड़ कराया जिससे इन दोनों में रात दिन धौल धप्पड़ होती रही पर डøन साहब से गोविंदराव से मेल होने से आबा मन्द पड़ गया, बिचारा गोबिन्दराव 1810 सन् मंे मर गया, कुछ मल्हारराव ही पुरुषार्थी नहीं हैं। गोबिन्दराव के समय में यह बात है क्योंकि वह चार औरस ओर 7 दासी-पुत्र छोड़ गए थे, आनन्दराव सब में बड़ा था उसी को राज वाले मालिक समझते थे पर वह बुद्धिमान नहीं था इससे दूसरे हिस्सेदारों ने अपना तार जमाना चाहा गौविन्दराव ने दूसरे लड़के कान्हों जी को फसादी जान कर अपने सामने से कैद किया था। पर पीछे आनन्दराव से बहुत मिन्नत करके और फौज के अफसरों को बीच में डालकर छूटा और मुख्य दीवान हुआ पर उस पर संतोष न कर के सारे राज पर सत्ता बढ़ाने लगा अन्त में रावजी आपा परभू पुराने कारिन्दे ने प्रबल हो कर उस को पदच्युत किया। इन दोनों ने सरकार से सहायता चाही। जिस में कान्होजी ने पुराने करार के सिवाय चिखली का परगना देने को कहा। आनन्दराव और उस के दीवान आपा की मदद को सात हजार अरब सवार थे क्योंकि आपा का भाई बाबा जी उन का सरदार था, कान्होवा का पक्षपाती कड़ीं का जमींदार मल्हारराव गायकवाड़ था और यह मनुष्य शूर चतुर था इसने आनन्दराव के राज में जब बहुत उपद्रव किया और बहुत से किले भी ले लिए तब आपा ने बम्बई के गवर्नर को मदद के वास्ते लिखा और पाँच पल्टन इस शर्त पर माँगी कि उन का खर्च वह देगा। बम्बई के गवर्नर ने बिना गवर्नर जेनरल से पूछे पूरी मदद कैसे दें यह सोच कर मेजर बाकर साहब की मुहतमी में 1600 आदमी भेजे जो आनन्दराव पल्टन से मिल के कड़ी पर चढ़ दौड़े। उस समय मल्हारराव ने, मुझ से चूक हुई हम सब फेर देंगे, यह कह के मेल का पैगाम डाला। पर उस के जी में छल था। इसी से जब ये लोग बेखबर थे तब छापा मारा पर बाकर साहब की बुद्धिमानी से फौज बच गई। थोड़े दिन में मालूम हुआ कि मल्हार ने आनन्दराव के बहुत से लोग मिला लिए जिस से बाकर साहब को उस समय अपनी रक्षा के सिवा और कुछ न सूझी और बम्बई कुमक भेजने को लिखा। एप्रिल की 23 तारीख को बम्बई से कुछ लोगों को मदद आ गई और वे लोग खाई खोद कर कड़ी का किला घेर कर पड़े रहे। गायकवाड़ और सर्कार की फौज ने मिल कर कड़ी जीत लिया जिसमें 113 सर्कारी आदमी मरे, मल्हारराव सर्कार के आधीन हुआ और सवा लाख रु. साल नरियाद की आमदनी में से दे कर वहीं उस को नजरबन्द रक्खा और कड़ी का किला गायकवाड़ के अधिकार में आया। मल्हारराव का पक्षपाती गणपतराव गायकवाड़ बड़ोदे के पास लड़ता था सो संकरे के किले में बन्द हुआ। सर्कार ने वह किला भी छीन लिया और गणपतराव और गोविन्दराव का दासी पुत्र मुरारराव ये दोनों धार भाग गए और वहाँ के पवांर राजा के आश्रय में रहे, थोड़े दिन पीछे अरब लोगों ने अपनी तनखाह न मिलने के बहाने बड़ा उपद्रव किया आनन्दराव को कैद कर लिया और कान्होवा को कैद से छोड़ दिया। मेजर बाकर ने पहिले तो उन्हें बहुत समझाया फिर दस दिन तक खूब लड़े और अन्त में जब किले की दीवार तोड़ा तब अरब लोगों ने हार कर मेेल करना चाहा। इस लड़ाई में अच्छे-अच्छे अगरेजी सरदार मारे गए। सवा सत्रह लाख तनखाह बाकी दे कर इस करार पर मेल हुआ कि वे लोग अपने देश या राज के बाहर चले जायं। उस में बहुत तो चले गए पर आबू जमादार राज पिंपली गाँव में कान्होवा से जा मिला। कान्होवा ने फिर मार-धाड़ लूट खसोट शुरू की, पर अन्त में होम्स साहब से हारकर उज्जैन में जा रहा। हाँ-हाँ, इस के सिवा एक बार और भी है। एक दफे बड़ोदा के वकील बाप मैराल को बाजीराव ने कहा कि बड़ोदा वालों के यहाँ हमारा एक करोड़ रुपया बाकी है सो उस में से सत्रह लाख हम छोड़ देते हैं बाकी इनसे दिलवा दो। बाजीराव ने केवल दगाबाजी से बड़ोदे पर हाथ डालने को यह युक्ति की थी, बड़ोदे वाले कहते थे कि हम ने जो बहुत से पेशवा के काम किए हैं उसके बदले हमी को अभी कुछ चाहिए, गंगाधरशास्त्री पट्टबर्धन के गायकवाड़ ने सर्कार की रक्षा में पेशवा के यहाँ भेजा। पेशवा ने कुछ बात तै नहीं की और शिष्टाचार में लगा कर शास्त्री को लेकर अपने सलाही त्रिंवक जी डेंगला के साथ पंडरपुर गया और वहाँ छल से 1815 की चैदहवीं जुलाई को शास्त्री को किसी सिपाही से मरवा डाला। सरकार ने इस बात पर अत्यन्त क्रोध किया और चारों ओेर से पेशवा पर फौज भेजी जिस से पेशवा ने अन्त में हार कर त्रिंवक को सरकार के हवाले कर दिया और आगे से बड़ोदा वालों को छेड़ने से हाथ उठाया। हाय! यह बड़ी बड़ौदा है जिस पर सरकार की सदा से ऐसी छाया रही।
ऊपर देखकर, क्या कहा ”हाँ कहे चलो“ जाने दो इन पुराने पचड़ों को लेकर कौन रोवै पर भाई आर्चसन साहब ने अपने अहदनामों में लिखा है कि खंडेराव और मल्हारराव के सिवाय पीलजी गाइकवाड़ के असली और नकली वंश में और कोई नहीं है; तब मल्हारराव का वंश राज पर बैठने से रोका जाय यह तनिक अनुचित मालूम होता है। अनुचित काहे को है सन् 1802 में जो अहदनामें हुए हैं उन में तो सरकार को गायकवाड़ की खानगी बातों में बिलकुल अधिकार है। फिर यह रोना क्या। हम तो जानते हैं कि जब मल्हारराव ने लक्ष्मीबाई से विवाह किया तभी से उस की बड़ी बहिन दरिद्राबाई भी इनके ताक में थी और समय पाकर अपनी बहिन के पास आ गई। शास्त्रों में लिखा है कि लक्ष्मी दरिद्रा दोनों बहिन हैं। पर भाई! यह कन्या फली नहीं मुद्राराक्षस की विषकन्या हो गई। अत्त भी तो बड़ी हुई। सुना है कि जब महाराज शहर के अमीरों के घर में जाते थे तो उन के डर के मारे औरतें कूएँ में उतारी जाती थीं। क्या हुआ सनातन से चली आई है। अग्नि वर्णन भी तो ऐसा ही था।

”अमपरिवत्र्तनोचिते तस्य निन्यतुरशून्यतामुभे।
वल्लकी च हृदयगमस्वना वल्गुवागपिच वामलोचना“ ।।

और नहीं तो क्या। या बगल में माहताब हो या आफताब या साकी हो या शराब। भला रावन इन से बढ़ के था कि ये रावन से बढ़ के? एक बात में तो ये रावन से बढ़ गये कि ऐसे काल में और सरकार के राज्य में इन्होंने ऐसा उपद्रव किया! धन्य भारत भूमि! तुझै ऐसी ही पुत्र प्रसव करने थे! हाय! मुहम्मदशाह और वाजिदअलीशाह तो मुसलमान हो के छूटे पर मल्हारराव का कलंक हिन्दुओं से कैसे छूटेगा। विधवा विवाह सब कराया चाहते हैं पर इसने सौभाग्यवती विवाह निकाला। भला मुसलमान होता तो तिलाक दिलवा के भी हलाल कर लेता। पर तिलाक कहाँ, लक्ष्मीबाई के खसम ने तो नालिश की थी। सच है यह ऐसे ही हजरत थे। हमारे सरकार के विरुद्ध जो कुछ है वह झख मारै। यदि ऐसे लोगों के उचित दंड न हो तो वे लोग न जानैं क्या अनर्थ करैं। कहा भी तो है।

”अदंड्यान् दण्डयेत् राजा दंड्यानेवाभिनन्दयन्।
अयशोमहदाप्नोति नारकींचगतिंपरां ।। 1 ।।“

ऊपर देखकर, क्या कहा? और खानदेश का एक कुमार गद्दी पर बैठा भी तो दिया गया। लो भया तब क्या हहाहा! भला तब हम क्या इतना झँखते थे। अहा धन्य है सर्कार! यह बात कहीं नहीं है। दूध का दूध और पानी का पानी। कोई बादशाह होता तो राज जप्त हो जाता। यह इन्हीं का कलेजा है। हे ईश्वर, जब तक गंगा जमुना में पानी है तब तक इनका राज स्थिर रहे। अहा! हमारी तो पुरोहिती फिर जगी। हमें मल्हारराव से क्या काम, हमैं तो उस गद्दी से काम है 'कोउ नृप होउ हमैं का हामी' धन्य अंगरेज! राम और युधिष्ठिर का धम्र्मराज्य इस काल में प्रत्यक्ष कर दिखाया, अहाहा! (ऊपर देखकर) क्या कहा? कहो और क्या चाहते हो। भला और क्या चाहेंगे हमारा भंडपना जारी ही रहा बढ़ोदा का राज फिर सुख से बसा तो अब और क्या चाहिए और मल्हारराव का जो कहो तो उस का कौन सोच है, जैसे व्रत जैसे उद्यापन। विषस्यविषमौषधं, तो भी यह भरत वाक्य सफल हो।

परतिय परधन देखि न नृपगन चित्त चलावैं।
गाय दूध बहु देहिं, मेघ सुभ जल बरसावैं ।।
हरि पद में रति होइ न दुख कोऊ कहं व्यापै।
अंगरेजन को राज ईस इतं थिर करि थापै ।।
श्रुति पन्थ चलैं सज्जन सबै सुखी होहिं तजि दुष्टभय।
कबिबानी थिर रस सों रहै भारते की नित होइ जय ।।
जवनिका गिरती है।


इति विषस्यविषमौषधम् नाम भाणं।


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हिंदी समय में भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएँ