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यात्रावृत्त

‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’*
गरिमा श्रीवास्तव


दिल्ली से मास्को की हवाई यात्रा बहुत सुखद नहीं रही है, शेरमेट हवाई अड्डे पर बर्फ की मोटी चादर ने ज्यों दृष्टि बाधित कर दिया है - जहाज के चौड़े पंखों पर जमी बर्फ को लगातार गर्म पानी की बौछारों से पिघलाया जा रहा है। बर्फ की सफेदी और विस्तारभय कारक सा है, ढेर सारे टर्मिनल और उनके बीच की लंबी दूरियाँ जो अपने पैरों ही तय करनी हैं - प्रतीक्षा पंक्तियाँ, संप्रेषण की भाषा रशियन, अब तक की सीखी भाषाएँ दामन छुड़ा असहाय कर गई हैं। कदम-कदम पर कड़ी सुरक्षा जाँच - आपकी मनुष्यता पर विश्वास करने को कोई तैयार नहीं। जाग्रेब के लिए यहीं से दूसरी उड़ान लेनी है, पर अभी तक मालूम नहीं कि पहुँचना किस टर्मिनल पर है, यूरोप जाने का उत्साह मंद हो चला है जबकि यात्रा तो अभी शुरू ही हुई है। टी.एस. इलियट ने कभी पूछा था - डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स, वही बात खुद से पूछती हूँ - मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है -दुनिया में सैकड़ों लोग अपने अनुभव, सुख-दुख, उपलब्धि संघर्ष, रागद्वेष की गाथाएँ लिखकर चले गए। उन्हें कभी यह मालूम ही नहीं कि उनका लिखा किसने पढ़ा - किसका जीवन उससे बना-बिगड़ा या किसी को जीवन पाथेय मिला। जो भी हो अनुभूतियाँ बाँटने के लिए होती हैं लेकिन उन्हें व्यवस्थित और तरतीबवार ढंग से रख पाना संभव होता है क्या? क्योंकि तरतीब तो उनके आने में भी नहीं होती।

पिछले डेढ़ महीने से यहाँ हूँ। दक्षिण मध्य यूरोप के एड्रियाट्रिक समुद्र के किनारे छोटे से शहर जाग्रेब में। परिचित मित्रों में से कुछ क्रोएशिया को एशिया समझते हैं। उनका कहना है कि इतनी ठंड में यूरोप जाने की जरूरत भी क्या है? कैसे बताऊँ कि अपने ही कदमों से दुनिया को नाप लेने की तमन्ना मुझे यहाँ ले आई है। बचपन में चार साल बड़ी बहन को स्कूल-ड्रेस, जूते बस्ते समेत स्कूल जाता देख मेरा मन मचल जाता, माँ ने ढाई साल के उम्र में स्कूल भेजना शुरू कर दिया था। समय के पहले, पाँव में पहने कद से बड़े जूतों ने स्कूल के बंद अनुशासन के बीच खड़ा कर दिया - बचपन का खेल हो ही नहीं पाया। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, जाग्रेब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खोलना चाहता था। मुझे वही अवसर मिला है कि मैं दो वर्षों तक यूरोप में रह सकूँ। छात्र उत्साहित हैं - अतिथि गृह से विश्वविद्यालय सिर्फ दो किलोमीटर पर है इसलिए पैदल चलना अच्छा लगता है। यातायात और संचार सुविधा काबिले तारीफ है, समूचा क्रोएशिया आंतरिक तौर पर आठ राष्ट्रीय राजमार्गों से संबद्ध है। विश्वविद्यालय इवाना येलाचीचा में है और भारतीय दूतावास कुलमरेस्का पर। गनीमत है कि दूतावास बार-बार जाने की जरूरत नहीं पड़ती। राजदूत प्रदीप कुमार विनम्र और अनुशासन प्रिय हैं जो अक्सर भारत के दौरे पर रहते हैं और द्वितीय सचिव दूतावास की व्यवस्था देखते हैं। कर्मचारी और अधिकारी शालीन हैं - श्रीमती पासी हैं, आर्यन हैं, जिनसे हिंदी में बात करने का सुख है। तीन मंजिला सफेद इमारत, साफ सुथरी सजी-सँवरी लेकिन जिंदगी ज्यों धड़कना भूल गई हो यहाँ, इसलिए इंडोलॅाजी विभाग के मुखिया प्रो. येरिच मिस्लाव से अनुरोध किया है कि वे मेरी व्यवस्था विश्वविद्यालय के नजदीक ही करें। सिएत्ना सेस्ता (फूलों की गली) की पाँचवीं मंजिल पर एलविरा मेस्त्रोविच के फ्लैट में मुझे ठहरने को कहा गया है - फ्लैट सुंदर और सुख-सुविधा वाला है। यह पर्याप्त है मेरे लिए। भारत से लाई सभी चीजें जमा ली गई हैं। लैपटॉप को विशेष जगह दी गई है क्योंकि आने वाले दिनों में वही एकमात्र दोस्त बचा रहने वाला है। अक्सर तापमान शून्य से चार-छह डिग्री कम रहता है। धूप कभी-कभी निकलती है वो भी थोड़ी देर के लिए। धूप में भी कँपा देने वाली ठंड होती है। रविवार का दिन है, घड़ी को मैंने भारतीय समय पर ही रहने दिया है। भारतीय समय से साढ़े चार घंटे पीछे - नाश्ता लिया है। दलिया और फ्रूट कर्ड, थोड़ा सोने को जी चाहा है। नींद में अपने देश में हूँ कभी भाई-बहनों के साथ, कभी शांतिनिकेतन में मंजू दी के साथ। रतन पल्ली वाले घर में चैताली दी के साथ साईं बाबा को लेकर उनकी शाश्वत अडिग आस्था का मजाक उड़ाना चल रहा है। दूध के पतीले में अचानक उबाल आने पर वे 'जयसाईं', 'जयसाईं' कहते हुए फूँक मारने लगतीं, मेरे कहने पर कि गैस की नॅाब बंद कीजिए, उसके लिए साईं बाबा अवतार नहीं लेंगे, वे मुझपर नाराज हो जाया करती हैं। दिल्ली में माँ होली पर पुए बना रही हैं। मैदा, घी, चीनी, दूध मेवे के घोल को खूब फेंटकर सधे हाथों से गर्म घी में छोड़ती हैं - छन्न की आवाज के साथ फूल जैसा पुआ आकार लेने लगता है, उसके बाद बारी आती है गर्म मसाले में पके कटहल के सालन की और लिट्टी वह जो दादी बनाती हैं उसका कोई जवाब नहीं। बैंगन के चटखदार चोखे के साथ खूब सत्तू, लहसुन और अजवाइन से भरी-पुरी जवाँ लिट्टी - स्वाद के लिए सुर नर मुनि भी तरसें वैसी लिट्टी। ये सारे व्यंजन अपने रूप-रस गंध के साथ आँखों के आगे परसे चले आ रहे हैं। मंजू दी शांतिनिकेतन में मटर की कचौड़ी बनाती थीं, गांधी पुण्याह पर हरिश्चंद्र जी का बनाया सुगंधित सूजी का हलवा ...जुबाँ पर स्वाद के कण अभी भी बाकी हैं ...जोर की घरघराहट के साथ चौंक कर आँखें खुलती हैं। कमरे में घुप्प अँधेरा कहीं कोई नहीं अपना होना ही शंकालु बना रहा है -

काबे की है हवास कभी कुए बुताँ की है
मुझको खबर नहीं, मेरी मिट्टी कहाँ की है
                          - दाग देहलवी

कहाँ हूँ मैं? मेडिकल की तैयारी कर रही दीदी ने कहीं बत्ती तो नहीं जला दी, वो दिन में सोती है, सारी रात पढ़ती है। मुझे पुकारकर कहती है - सोनी तू सोती ही रहेगी पढ़ेगी कब? उक्की कहाँ है? अमरूद के पेड़ के नीचे सहेली के साथ लकड़ी का स्कूल उल्टा करके गुड़िया का खेल रच रही होगी ...देखो उसने फिर उल्टी चप्पल पहन ली, इतनी छोटी है लेकिन बहुत स्वाभिमानी और स्वतंत्र चेतना, किसी के साथ नहीं सोती ...मम्मी के जाने के बाद बुआ के साथ भी नहीं। चार साल की उम्र में ही उसकी अकेली दुनिया है। चप्पल पहनूँ, उठूँ कि हिंदू कॉलेज के दोस्त बुलाने आए हैं - दो अध्यापकों - डॅा. हरीश नवल और सुरेश ॠतुपर्ण ने अपने घर बुलाया है। खाना पीना, मौज मस्ती करके शाम ढले स्मिता दी के साथ घर लौटती हूँ। लो आज आ गई शामत - डॅा. कृष्णदत्त पालीवाल की क्लास है। उन्होंने दुर्वासा सी भविष्यवाणी कर दी है - तुम सब कहीं नहीं पहुँचोगे ...कहीं नहीं ...कहीं नहीं ...तो पहुँची कहाँ हूँ ...करवट बदलकर, जोर लगाकर उठने की कोशिश में आँखें मुँदी चली जा रही हैं - टोंस वैली से लगातार बंदूक की गोलियाँ दागने की आवाजें आ रही हैं। यह मेरी पहली नौकरी है। भारतीय सैन्य अकादमी में, अफसर बनाने के लिए जेंटिलमैन कैडेट्स को पढ़ाना है। सुबह का सायरन बज रहा है। बैरक से निकलकर आर्मी कैडेट कॅालेज विंग की ओर जाने वाली गीली सड़क पर अँधेरे में चल रही हूँ। सड़क के किनारे लैंप पोस्ट टिमटिमा रहे हैं। बारिश की बूदें पोस्ट पर चिपक सी गई हैं। कैडेट्स समस्वर कदमताल करते हुए सैल्यूट देकर आगे बढ़ जाते हैं। झुंड के झुंड गुजर रहे हैं ...कहाँ हूँ मैं, घंटी की आवाज है। उठकर दरवाजा खोलना पड़ता है मुझे भौंचक देख कर मुस्कुराकर क्रेशो कर्नित्ज हाथ मिलाते हैं। यह दोस्ती की गर्माहट से भरा पुरसुकून स्पर्श है। वे जाग्रेब विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते हैं - कांट्रेक्ट पर। दरवाजे के खुलने से ठंडी बर्फीली हवा का झोंका भीतर आ गया है, जिसने अवचेतन से चेतन में ला पटका है। क्रेशो मेरी छोटी-मोटी दिक्कतें समझते हैं। लैपटॉप पर स्काइप इन्स्टाल कर रहे हैं और भारत में फोन पर बात करने के लिए व्हॅाइप भी। अभी दिन के सिर्फ तीन बजे हैं लेकिन अँधेरा घिर आया है। कौएनुमा एक बड़ा-सा पक्षी लैंप पोस्ट पर आ बैठा है। ओवरकोट में ढके-लिपटे इक्का-दुक्का लोग सड़क पर दिख रहे हैं। मैं जाग्रेब में हूँ और यहीं रहना है दो साल तक। सोचती हूँ दो साल बहुत लंबा समय है। मौसम हमेशा धुंधलाया-सा रहता है। कैंटीन में शाकाहारी भोजन की दशा ठीक नहीं। यहाँ के लोगों को भारतीय व्यंजन बहुत पसंद हैं। कहते हैं कभी तुर्केबाना येलाचीचा (जाग्रेब का केंद्र) में किसी ने भारतीय रेस्टोरेंट खोला था। किसी वजह से काल कवलित हो गया। वैसे मांसाहारी भोजन के लिए क्रोएशिया पूरे यूरोप में प्रसिद्ध है। ताजा पानी की मछली, गोमांस, सूअर का मांस और मेडीटेरियन ढंग से बनी सब्जियाँ यहाँ की खासियत हैं। ठंडे मौसम में पशु-मांस के बड़े-बड़े टुकड़ों को लोहे के हैंगरों में टाँग दिया जाता है। बंद कमरे में जलती लकड़ियों के धुएँ में वह टँगा मांस पकता है। धुएँ की परत संरक्षक का काम करती है। इसे 'स्मोक्ड मीट' कहा जाता है। इसकी पाक विधि-काफी प्राचीन है और लोकप्रिय भी। जैतून का तेल भी यहाँ काफी प्रयोग होता है।

सिएत्ना-सेस्ता में घरों के दरवाजे काफी चौड़े और मोटे हैं। मुख्य द्वार स्वतः बंद हो जाते हैं। अभ्यास न होने के कारण फ्लैट का दरवाजा बाहर से दो बार लॅाक हो चुका है। सामने के फ्लैट में द्रागित्ज़ा रहती हैं। जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती और मुझे क्रोएशियन। उनका लंबा समय इटली में बीता है। जर्मन और इतावली जानती हैं। वे क्रोएशियन-अंग्रेजी शब्दकोश खरीद लाई हैं। लगभग सत्तर वर्ष की चाक-चौबंद युवा हैं। हाँ युवा ही, क्योंकि जीवन के इस पड़ाव पर ही पहली बार तनावमुक्त, उन्मुक्त जीवन जी रही हैं। सुंदर गोल चेहरा, रोमन नाक और कटे हुए सुनहरे बाल। हमेशा व्यस्त रहती हैं। उन्होंने फ्लैट के सामने फूलों के पौधे लगा रखे हैं। बेटी तान्या और नातिन नादिया सप्ताहांत में आती हैं। पैंतीस वर्षीय बेटा इगोर कलाकार है। जिसे बेरोजगारी के आलम ने उदास और तिक्त बना दिया है। द्रागित्ज़ा के पास फ्लैट की अपनी चाबी है, इगोर की अनियमित दिनचर्या का ज्यादा प्रभाव उनपर नहीं पड़ता। ऐसा वे कहती हैं लेकिन आँखें कुछ और कहती हैं। ये धुर पश्चिम है जहाँ माता-पिता 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को मित्र मानते हैं। देख रही हूँ दिनोंदिन यह अंतराल कम ही होता जा रहा है। नादिया के ऊपर इम्तहान पास करने का तनाव इतना है कि सिगरेट के बिना नहीं रह पाती। इम्तहान में फेल होने पर क्या करेगी, वह जानती नहीं। कहती है - "आप क्या सोचती हैं, बड़े लोग ही तनाव ग्रस्त होते हैं। मुझे घर में रहना, पढ़ना, बिल्कुल पसंद नहीं, सोचती हूँ कब बड़ी होकर संगीतकार बनूँ या फिल्म में काम करूँ। उसकी माँ तान्या बेटी के लिए बहुत चिंतित रहती है। वह दुबरावा के सरकारी अस्पताल में रेडियोलॉजी विभाग में तकनीकी सहायक है। दो तलाक हो चुके हैं और 'रिएका' के म्लादेन नामक व्यक्ति से भावात्मक जुड़ाव है। अपने संबंध को लेकर सदैव सशंकित रहती है। नौकरी से छुट्टी मिलते ही 'रिएका' चली जाती है। इधर उसकी बेटी नादिया रात-भर घर से गायब रहने लगी है। तान्या कहती है जो गलतियाँ मैंने कीं, चाहती हूँ मेरी बेटी न करे। तुम्हारा देश अच्छा है जहाँ बच्चों पर अभिभावकों का कठोर नियंत्रण रहता है। वह नादिया को डाँटने-फटकारने से डरती है।

हम समुद्र के किनारे-किनारे लांग ड्राइव पर जा रहे हैं बाईं तरफ ड्राइविंग व्हील अटपटा लगता है। पास में अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी नहीं है। तान्या लगातार अपनी व्यथा कथा कह रही है। उसे अंग्रेजी में बात करना सुहाता है। कई बार क्रोएशियन शब्दों के अंग्रेजी पर्याय ढूँढ़ने के चक्कर में बातचीत बाधित भी होती है। समुद्र के किनारे-किनारे लैवेंडुला (लैवेंडर) की झाड़ियाँ हैं। पौधे दो से ढाई फुट ऊँचे। लैवेंडर की गंध समुद्र की नमकीन गंध के साथ मिलकर पूरे दक्षिण यूरोप की हवा को नम बनाए रखती है। फ्रांस में तो लैवेंडर को भोजन में भी प्रयुक्त किया जाता है। कीटाणुनाशक सुगंधित लैवेंडर क्रोएशिया और यूरोप के अन्य भागों में निद्राजनित रोगों की औषधि है। वैसे क्रोएशिया पर्यटन और शराब उत्पादन के लिए मशहूर है। तान्या ने यह सूचित करते हुए पीने की इजाजत माँगी है। उसका गला सूख रहा है। लगभग 641.355 वर्ग मील में फैला जाग्रेब क्रोएशिया का सांस्कृतिक-प्रशासनिक केंद्र है जो मूलतः एक रोमन शहर था जो सन 1200 में हंगरी के नियंत्रण में आ गया। सन 1094 में पहली बार पोप ने जाग्रेब में चर्च की स्थापना कर जाग्रेब नाम दिया। जर्मन में इसे 'अग्रम' कहा जाता है।

जाग्रेब और क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है, सन 1991 तक संयुक्त युगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिन कहानियों को लिए मौन है। स्लोवेनिया, हंगरी, सर्बिया, बोस्निया, हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएँ घिरी हैं। आज के 21,851 वर्गमील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी। 15 फरवरी 1992 को यूरोपीय आर्थिक संगठन और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसे लोकतांत्रिक देश के रूप में मान्यता दी। इसके बाद भी तीन वर्ष तक अपनी भूमि वापस पाने के लिए 1 अगस्त 1995 तक उसे सर्बिया से लड़ना पड़ा और यूरोपीय यूनियन की सदस्यता तो उसे अभी हाल में 1 जुलाई 2013 को मिल पाई। इतने लंबे युद्ध के निशान अभी तक धुले-पुछे नहीं हैं। उनकी शिनाख्त के लिए मुझे दूर नहीं जाना पड़ा। इटली और फ्रांस घूमने की इजाजत मिलने पर दूतावास ने मुझको दुशांका सम्राजीदेवा की टूरिस्ट कंपनी का पता दिया।

दुष्का का जीवन क्रोएशियाई सर्ब युद्ध का जीता जागता इतिहास है। कहीं पढ़ा था, युद्ध कहीं भी हो, किसी के बीच हो, मारी तो औरत ही जाती हैं। युद्ध ने दुष्का के जीवन को ही एक युद्ध बना दिया। युद्ध में सर्बों ने क्रोआतियों को मारा उनके घर जला दिए, बदले में क्रोआतियों ने पूरे क्रोएशिया को सर्ब विहीन करने की मुहिम छेड़ दी। लोग भाग गए या मारे गए। दुष्का के माँ-बाप युद्ध के दौरान बेलग्रेड होते हुए अपनी बेटियों के पास पहुँच नहीं पाए। दुष्का को बिना नोटिस दिए नौकरी से निकाल दिया गया। अब वह केवल 'सर्ब' थी मनुष्य नहीं, अड़ोसी-पड़ोसी घृणा से इन दो बहनों को देखते थे। जंग जोरों पर थी, अमेरिका की पौ-बारह थी। ऊपर से युद्ध विराम और भीतर से घातक हथियारों की आपूर्ति - युद्ध विराम होते थे, वायदे किए जाते। जो तुरंत ही तोड़ भी दिए जाते। राजधानी होने के नाते जाग्रेब शहर में पुलिस और कानून व्यवस्था कड़ी थी, लेकिन लोगों के दिल-दिमाग से घृणा और नफरत को निकालना असंभव था। बसों में, ट्रामों में लोग सर्बों को देखते ही वाही-तबाही बकते, थूकते, घृणा प्रदर्शन करते। दुष्का ने कई साल पहले अपनी ट्रैवल एजेंसी का सपना पाला था। युद्ध ने दुनिया बदल दी। कुछ लोग रातों-रात अमीर हो गए और कुछ सड़क पर आ गए युद्ध के थमने और गर्भ ठहरने दोनों की सूचना दुष्का को एक साथ मिली। दौड़ी थी उस दिन वह त्रयेशंवाचकात्रा से यांकोमिर तक, पैदल चलकर गई सेवेस्का तक। कोई डॅाक्टर सर्ब लड़की का केस हाथ में लेने को तैयार नहीं हुआ। क्रोएशियन प्रेमी ने दुष्का को पहचानने से इनकार कर दिया, सर्ब कहकर गाली दी और उससे बात तक न की। दुष्का अविवाहित माँ बनी और पिछले पंद्रह वर्षों में अपने माँ-बाप का सहारा भी।

इवाना, मिरता, वैलेंटीना, बोजैंक अक्सर मिलने जुलने वाले विद्यार्थी हैं। लेकिन सप्ताहांत में जब चारों ओर बर्फीला सन्नाटा पसर जाता है इनमें से कोई फोन नहीं उठाता। बृहस्पतिवार की शाम से 'वीक एंड' की तैयारी शुरू हो जाती है। भारत की अपेक्षा लड़कियाँ यहाँ ज्यादा स्वतंत्र और उन्मुक्त हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं। ये आर्थिक तंगी के दौर का यूरोप है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने पूरे ताम-झाम के साथ मैकडोनॅाल्डस, रीबॅाक, वॅान हुसैन, एडीडास जैसे ब्रांडों में मौजूद हैं। सप्ताह के पाँच दिन यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्र सप्ताहांत में दुकानों के कर्मचारी बन जाते हैं। पचीस, तीस कूना (मुद्रा) प्रति घंटे के हिसाब से उनसे खूब जमकर काम लिया जाता है। मेरी प्रतिभाशाली छात्रा कार्मेन वुग्रिन मैकडोनॅाल्डस में सप्ताहांत और ग्रीष्मावकाश में बर्तन धोती, झाड़ू-पोछा कर खाना पकाती है। मरियाना जिसके घर में अभिभावक के नाम पर सिर्फ एक नाशपाती का पेड़ है। नाक-कान में असंख्य बालियाँ पहने, बालों में बहुरंगी रिबन बाँधे दुब्रोवा और तुर्केबाना येलाचीचा की गलियों में गिटार बजाती है। उसने कई भारतीय गाने सीख रखे हैं। धुन बजाती है, आने-जाने वाले लोग सड़क पर बिछे कपड़े पर कुछ सिक्के डालकर आगे बढ़ जाते हैं। आंद्रियाना और बोजैक तरह-तरह की पोशाकें, नकली नाक लगाकर पर्यटकों को रिझाते हैं। बोजैक तुर्केबाना में मुझे देखकर चौंकता है। फिर लजाकर गलियों में गायब हो जाता है। यहाँ 'क्रेशो' नाम बहुत आम है। जो यहाँ के राजा क्रेशीमीर के नाम का संक्षिप्त रूप है। रोमन नाक नक्श, गोरा रंग, लंबी स्वस्थ कद काठी और सीधी सतर चाल क्रोएशियंस का वैशिष्ट्य है। हम भारत में रहते हुए यूरोप की समृद्धि से कुंठित होते रहते हैं। यहाँ आकर देखती हूँ बाजार है, खरीदार नहीं। बड़ी-बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं। वे वीरान हैं - सामान है, सजावट भी ...खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा है। आम-आदमी की क्रय-शक्ति कमजोर हो चली है। छात्र-छात्राएँ 'सेल' के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं। पुराने कपड़ों को खूब जतन से पहनते हैं। जाग्रेब के बाहरी हिस्से में पूर्व की रेलवे लाइन के किनारे 'सेकेंड हैंड' मार्केट लगता है। जिसे देखकर लाल किले के पीछे का बाजार याद आता है। मृतकों के इस्तेमाल किए हुए कपड़े, बैग, जूते, बेल्ट, चादरें, तकिए सब मिलते हैं। अच्छी-अच्छी कमीजें पाँच कूना में उपलब्ध हैं। देखती हूँ। इस बाजार में खरीदारों की संख्या बहुत बड़ी है। काला, सफेद और सलेटी यहाँ के प्रचलित रंग हैं। विशेषकर सर्दियों में, जो वर्ष के लगभग सात महीने रहती हैं।

यूरोप के आंतरिक भागों में सफर के लिए रेल अपेक्षाकृत सस्ता और सुरक्षित माध्यम है। जाग्रेब स्लोवेनिया से सटा हुआ है। लेकिन वहाँ जाने के लिए शेनजंग वीसा की जरूरत है। मैंने दूतावास में वीसा की अर्जी दे दी है। तान्या के साथ मुझे स्लोवेनिया जाना है, लेकिन उससे भी पहले 'रिएका' शहर जहाँ क्रेशो कर्नित्स और उनकी पत्नी साशा के प्रकाशन गृह से रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक 'चित्रा' का क्रोएशियन रूपांतरण छपा है।

हमें कार से दिन भर का सफर करना पड़ा है। समुद्र तट पर धूप खिली हुई है और तट के समांतर चौड़ी सड़क 'रिएका' की ओर जा रही है। साशा और क्रेशो बारी-बारी से कार चला रहे हैं। एक-दो जगह हम पेट्रोल लेने के लिए रुकते हैं। साशा दुबली-पतली है। निरंतर सिगरेट पीने से, उन्हें भूख भी कम लगती है। उनके पास कार में वाइन है, लेकिन मुझे तेज भूख लगी है। पेट्रोल स्टेशन पर ही मैंने सैंडविच खरीदा है। कभी-कभी घर की सूखी रोटी और आलू की भुजिया अपनी साधारणता में भी कितनी असाधारण और दुर्लभ हो जाती है। राजा क्रेशीमिर का किला रास्ते में पड़ा है और किले के भीतर बाजार लगा है। गहने, तस्वीरें, मदर मेरी की मूर्तियाँ, खूब मोटी मुगदरनुमा जंघाओं वाले मध्यकालीन सैनिकों के बुत, किताबें, कैसेट्स, गीत-संगीत और पर्यटक। यहाँ 'बैक वाटर' पोर्ट है जहाँ से 'वेनिस' के लिए नावें चलती हैं। जहाँ कुछ ही घंटों में पहुँचा जा सकता है। दोपहर तीन बजे हम लोग विमोचन स्थल पर पहुँचते हैं। पुस्तक के विमोचन के साथ नाश्ते का भी इंतजाम है। लोग पंक्ति में खड़े होकर प्लेटों में नाश्ता ले रहे हैं। सबकी आँख व्यंजनों पर केंद्रित है। मिलना-जुलना बाद में, पहले पेट-पूजा। नाश्ते का इंतजाम न होता तो इतनी भीड़ जुट पाती यहाँ, पता नहीं। भीड़ में, एक बुजुर्ग ललछौंहें चेहरे और चौड़ी नाक लिए इधर-उधर देख कर जेब में बिस्कुट के टुकड़े छिपाते जा रहे हैं। कोट की जेबें फूलती चली जा रही हैं। मैंने जल्दी से, उधर से नजर हटा ली है। पता नहीं मन करुणा से भर आया है।

'रिएका' या 'रिजेका' क्रोएशिया का तीसरा बड़ा शहर है। समुद्र के किनारे बसा यह शहर बड़े-बड़े पानी के जहाज बनाने के लिए प्रसिद्ध है। अपने भीतर बड़ा दिलचस्प बहुभाषिक इतिहास लिए हुए है। पाँचवीं शताब्दी से ही यहाँ आस्टोगोथ, लोंबार्ड, अवार, फ्रैंक और क्रोआत रहे हैं। इसलिए रिएका में बहुत सी भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के पहले तक यह पूरी तरह इतावली शहर था। गोरिल्ला युद्ध और छापामार झड़पों में बहुत-से नागरिक हताहत हो गए और लगभग 800 लोगों को यातना-शिविरों में बंद कर दिया गया। आज इस शहर में लगभग बयासी प्रतिशत क्रोआत, छह प्रतिशत सर्ब, दो-ढाई प्रतिशत बोस्नियाई और दो प्रतिशत इतावली रहते हैं। 'चित्रा' के विमोचन का कार्यक्रम रिएका के सार्वजनिक पुस्तकालय में है। पुस्तकालय बड़ा और व्यवस्थित है, लेकिन ऊपरी मंजिल पर कई कमरे बंद हैं। जिनमें प्राचीन पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष का कहना है कि सरकारी अनुदान इतना कम है कि सभी कमरों का रख-रखाव संभव नहीं। विमोचन कार्यक्रम की भाषा क्रोएशियन है। इतना तय है कि टैगोर यहाँ बहुत लोकप्रिय हैं। मुझे बताया गया है कि सन 1926 में टैगोर जब जाग्रेब आए थे तब उन्होंने 'रिएका' का दौरा भी किया था। दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने 'गीतांजलि' का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक 'भोर का पत्ता' में 1914 की जनवरी में धारावाहिक रूप में छपा था। बाद में पावाओ ने 'चित्रा' 'मालिनी' और 'राजा' का अनुवाद भी किया। 'चित्रा' का मंचन क्रोएशियन नेशनल थिएटर में 1915 में कई बार हुआ। यहाँ के उदारवादी बौद्धिक प्रथम विश्वयुद्धोत्तर अवसान काल में टैगोर को आध्यात्मिक और शांति के प्रतिनिधि के रूप में देखते थे। विमोचन समारोह में 'चित्रा' के पहले प्रदर्शन में अभिनय करने वाले क्रेशीमिर बारनोविच (1894-1975) का स्मरण किया जा रहा है। टैगोर की लोकप्रियता के जो भी कारण रहे हों। एक बात तो तय है कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें नोबल मिलना और स्काटलैंड में नोबल के लिए जर्मन राष्ट्रवादी लेखक पीटर रोसेगर का नाम चलना ये दो कारण थे जिन्होंने टैगोर को इस क्षेत्र में लोकप्रियता दिलाई। भले ही टैगोर इस बात से अनभिज्ञ रहे हों, फिर भी यहाँ के लोग बताते हैं कि 'नोबेल' की घोषणा के बाद जर्मन प्रेस ने टैगोर पर हमला बोल दिया था। आज क्रोएशियंस पीटर को भूले से भी याद नहीं करते और उनकी पूरी सहानुभूति के पात्र रवींद्रनाथ टैगोर हैं। ईसाई बौद्धिकों में से बहुत कम ऐसे थे, जो 'गीतांजलि' को केवल एक साहित्यिक कृति के रूप में सराहते थे। वे तो टैगोर के रहस्यवाद से प्रभावित थे। सन 26 में यूरोप की यात्रा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर को क्रोएशियंस ने युद्धोत्तर क्षत-विक्षत मानस को आध्यात्मिक नेतृत्व देने वाले व्यक्ति के रूप में देखा। उनकी कई कृतियों मसलन 'घरे बाइरे' का क्रोआती में अनुवाद इसी दौर में हुआ, क्रोएशियन म्यूजिक कंजरवेटरी के सभागार में उन्होंने दो दिन भाषण दिए, जिनका आशु अनुवाद क्रोआती में किया गया, लेकिन रवींद्रनाथ को यह नागवार गुजरा। ये प्रसंग इसलिए क्योंकि यहाँ मुझे जो बातें कहनी हैं - उनका क्रोआती में सतत अनुवाद होगा। गुरुदेव के रचनाकर्म और क्रोएशिया से उनके संबंधों पर टिप्पणी करते हुए मुझे बार-बार रुकना पड़ रहा है। मेरे वक्तव्य पर श्रोताओं के चेहरे निर्विकार और भावशून्य हैं। आशु अनुवाद की बात पर ही उनकी आँखें झपकती और कभी चौड़ी होती, कभी सिकुड़ती हैं। श्रोता-वक्ता का संबंध उचित संप्रेषण पर टिका होता है। मुझे मालूम ही नहीं चल रहा कि मेरी बात कहाँ और किस सीमा तक संप्रेषित हो रही है। साशा मंच-संचालन कर रही हैं और मुझे बताया जाता है कि श्रोता टैगोर की कविता सुनना चाहते हैं। मालूम नहीं टैगोर के कई गीतों को छोड़कर मुझे 'ध्वनिलो आह्वान' सुनाने की इच्छा ही क्यों हो आई है -

ध्वनिलो आह्वान मधुर गंभीर प्रभात अंबर माझे
दिके दिगंतरे भुवन मंदिरे शांतिसंगीत बाजे
हेरो गो अंतरे अरूपसुंदरे - निखिल संसार परम बंधुरे
ऐशो आनंदित मिलन - अंगने शोभन - मंगल साजे
कलुष - कल्मष विरोध विद्वेष होउक निःशेष
चित्ते होक जोतो विघ्न अपगत नित्य कल्याणकाजे
स्वर तरंगिया गाओ विहंगम, पूर्व पश्चिम बंधु-संगम
मैत्री-बंधन पुण्य मंत्र पवित्र विश्वसमाजे।

ये फरवरी का अंतिम सप्ताह है। धूप खिली हुई है। रात को गिरी बर्फ के फाहे सड़कों के किनारे-किनारे रूई से रखे हुए हैं, हवा में नरमाहट की जगह तुर्शी है, बिल्कुल ठंडी, बर्फीली हवा जो एड्रियाटिक सागर को छूने के पहले पाइनवृक्षों की टहनियों पर जमी बर्फ को थोड़ा हिला भर देती है। सफेदी को झाड़ती नहीं। अंजीर और चेरी वृक्षों की सारी पत्तियाँ झड़ चुकी हैं। असमय ही बुढ़ाए ठूँठों को बर्फ ने नीचे से ऊपर तक ढक लिया है। खिली धूप में 'सिएत्ना सेस्ता' के सामने की सड़क के दोनों किनारों पर खड़े पेड़ बेजान से दिख रहे हैं। जब तक हम बर्फ से रूबरू नहीं होते, वह हमारे भीतर अपनी पूरी सफेद मोहकता के साथ पिघलती है। रग-रेशों में उतर कर रोमैंटिक कल्पना के सहारे, बर्फ के जूते, बड़ी जैकेटें पहने हम उसकी सफेद फिसलन पर उठ-गिर रहे होते हैं और जब वही बर्फ दिन-रात, सुबहो-शाम का हिस्सा बन जाती है, सारे चिड़िया-चुरुंग न जाने कहाँ छिप जाते हैं, तो उसकी मोहकता को सन्नाटे में तब्दील होते कतई देर नहीं लगती। खिड़की के पर्दे हटाते ही दिल बैठ जाता है। इतनी अफाट, निरभ्र सफेद परत-पाँचवीं मंजिल से नीचे देखती हूँ। पार्किंग में खड़ी गाड़ियाँ बर्फ में एकसार हो गई हैं। एक आदमी हाथ में फावड़ा लिए बर्फ हटाने में जुटा है। बर्फ खखोर-खखोर कर सड़क के किनारे डालता है, जहाँ भूमिगत नाली का मुहाना है। बर्फ के थक्के बड़े-बड़े हो जाते हैं। निचली सड़क गीली हो गई है, पर बर्फ पिघलाने भर का ताप सूरज में अभी आया नहीं, और पहर ढलने का समय भी हो गया। 'सिएत्ना सेस्ता' और सभी बहुमंजिली इमारतों के पिछवाड़े कतार में लोहे के पहियेदार कंटेनर रखे हुए हैं। ये कूड़ादान हैं। नगर निगम शहर के रख रखाव के लिए नागरिकों से कर वसूलता है। जिसके निवेश में व्यवस्था और ईमानदारी दोनों है। भारत मे जिसका अभाव सिरे से महसूस किया जाता है। अलस्सुबह बड़े ट्रकों में पिछले दिन का कूड़ा खाली कर दिया जाता है। खाली कंटेनर दिन भर पेट भरने के इंतजार में वहीं खड़े रहते हैं। जिन पर क्रोआती में सूखे और गीले अवशिष्ट पदार्थों के संदर्भ में निर्देश लिखे हुए हैं।

विश्वविद्यालय में सुबह आठ बजे कक्षाएँ शुरू हो जाती हैं। प्रोफेसर येरिच ने मुझसे कहा था कि या तो सुबह आठ बजे कक्षा लूँ या रात के आठ बजे। रात आठ बजे कक्षा पढ़ाने की अवधारणा ही मुझे अजीब-सी लगती है। दिन भर की थकान के बाद अंत में कक्षा पढ़ाना... उफ। मैंने भारत में भी हमेशा सुबह-सुबह ही पढ़ाया। दोपहर होते-होते कक्षा पढ़ाने का उत्साह मंद हो जाया करता है। शांतिनिकेतन में तो सुबह साढ़े छह बजे ही, वैतालिक की प्रार्थना के तुरंत बाद कक्षाएँ शुरू हो जाती थीं। दिन का एक बजा नहीं कि कक्षाएँ समाप्त। आधा दिन अपना था। पुस्तकें पढ़ना, पुस्तकालय जाना, कंकाली तल्ला, अजय नदी का पुल, खोवाई, आमार कुटीर जैसी जगहों पर जाना और शाम ढले लौट आना। उसी अवकाश का सुफल था। भारतीय विश्वविद्यालयों - विशेषकर मानविकी और समाज विज्ञान में शाम पाँच-छह बजे तक पढ़ाई समाप्त हो जाया करती है। सूरज अस्त, अध्यापक मस्त और विद्यार्थी पस्त। अभ्यास ही संस्कार बन जाया करता है। रात देर तक पढ़ना और सुबह उठकर पढ़ाने को तैयार होना, इससे लगता है - एक नया खूबसूरत-सा दिन आप शुरू करने जा रहे हैं। सुबह एक नई ऊर्जा और मुस्तैदी देती है। इसलिए मैंने जाग्रेब में भी सुबह आठ बजे की कक्षाएँ ही चुनी हैं। नब्बे मिनट की एक कक्षा बीच में अवकाश फिर कक्षा। अक्सर दिन के डेढ़ बजे तक मैं अपने आवास पर लौट आती हूँ। शाम में अक्सर पुस्तकालय। आजकल वहीं देर हो जाया करती है। पुस्तकालय खूब व्यवस्थित है। अंग्रेजी, क्रोआती (हर्वास्त्की) और फ्रेंच पुस्तकें - लाल, नीली जिल्द चढ़ी, विपुल, खूबसूरत किताबों का वृहत संसार। तापमान नियंत्रित किया रहता है - 20 से 22 डिग्री से., आरामदेह, पुरसुकून माहौल - लगता है इसके बाद कोई दुनिया नहीं। कई विद्यार्थी 'अर्न व्हाइल लर्न' परियोजना के तहत घंटे के हिसाब से कार्य करते हैं। कैटलॅाग बनाते हैं। किताबें झाड़ते-पोंछते हैं बदले में उनका जेब खर्च निकल आता है। सन 1669 में स्थापित 'स्वेस्लिस्ते उ जाग्रेबु' दक्षिण-मध्य यूरोप के प्राचीनतम विश्वविद्यालय में से एक है। इवाना उलीचीचा के दसवें मार्ग पर यही पुस्तकालय मेरी शरणस्थली है। धूप की हल्की किरणों को, दिन के किसी भी समय घेरकर बादल दिन में अँधेरा कर देते हैं, बर्फीली बारिश बेआवाज टपकती रहती है। सब शांत, पेड़ पौधे स्वच्छ और श्वेत बर्फ की चादर तले दिन और रात का फर्क कहीं गुम हो जाता है। आजकल मैंने 'सिमोन द बोउवार' को नए सिरे से पढ़ना शुरू किया है उसका लिखा घर से दूर होने की बेचैनी को कभी बढ़ाता तो कभी शांत करता है। उनके उपन्यासों और आत्मकथाओं से गुजरना मधुर त्रासदी से गुजरना है। पुस्तकालय की गर्माहट, सिमोन की किताबें इन्हें छोड़कर फ्लैट के सन्नाटे की ओर लौटने का जी नहीं करता, काफी हाउस का अपरिचित शोर समझ में आने लगा है। धुएँ के छल्लों के बीच टेबुल पर सिर झुकाए, चाइना क्रेप की फ्रॅाक पहने सीमोन लिखती दीखने लगी है। मैंने सेर्गेई के कहने से आत्मकथात्मक उपन्यास 'ए वेरी ईज़ी डेथ' का हिंदी अनुवाद शुरू किया है। सीमोन को पढ़ना एक ऐसे अनुभव लोक से होकर गुजरना है। जहाँ से स्त्रीवाद का वैचारिक और राजनीतिक उत्स देखने को मिलता है। जहाँ 'सेकेंड सेक्स' मनुष्य की स्वतंत्रता की, मनुष्य के रूप में स्त्री पराधीनता के कारणों की पड़ताल करता है, वहाँ 'ए वेरी ईज़ी डेथ' प्राइम ऑफ लाइफ, ऑल सेड एंड डन, स्त्रीवाद के व्यावहारिक पक्ष की पड़ताल करती हैं। सीमोन ने सन 1964 में 'ए वेरी ईज़ी डेथ' की रचना की, जिसका प्रकाशन उसकी माँ की मृत्यु के साल भर बाद हुआ था, छह सप्ताह के कालखंड में मरण-शय्या पर मामन और सीमोन के साथ बातचीत में यह आत्मकथ्य गहरा निजत्व दुख, पश्चाताप, पीड़ा के क्षणों का आख्यान है। माँ-बेटी की बदलती भूमिकाएँ, स्त्री की यातना में उसकी निज की भूमिका, पति-पत्नी संबंध, डाक्टर और मरीज का संबंध, अस्पतालों की आंतरिक राजनीति के विविध पड़ावों से गुजरती हैं। मामन पिछले चौबीस वर्षों से विधवा और एकाकी है। सीमोन भी अपने स्वतंत्र लेखन और जीवन में व्यस्त है। मामन को अंत तक मालूम नहीं कि उसे प्राणघातक 'कैंसर' है। वह मरना नहीं चाहती। ठीक होकर 78 वर्ष की अवस्था में, फिर से जीवन नए सिरे से जीना चाहती है। सीमोन को पढ़ने और अनुवाद करने की प्रक्रिया मुझे भीतर से कभी-कभी बहुत अकेला कर देती है। भीतर कभी-कभी घुप्प अँधेरों के साए चहलकदमी करते हैं, कभी सीमोन ही हाथ में कलम पकड़ाकर लिखवाती चलती है। नित्यानंद तिवारी से बात हुई है। अनुवाद के कुछ अंश भेजे थे उन्हें। वे बहुत प्रभावित हैं लेकिन रचनात्मक अवसाद से बचने की सलाह देते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी अनुवाद का प्रथम प्रारूप पढ़ा है। ए वेरी ईज़ी डेथ उन्हें मर्मस्पर्शी लगा है और सिंधु आंटी तो पढ़कर रो ही दी हैं।

शाम ढले सिएत्ना सेस्ता पहुँचती हूँ, पिछवाड़े का रास्ता छोटा है। शाम का झुटपुटा है, अभी थोड़ी ही देर में गलियों की बत्तियाँ जल जाएँगी। हवा तेज और नम है। आकाश ज्यों झुका चला आ रहा है। लगता है रात में बारिश होगी। बर्फ वाले जूते पहनने के कारण तेज-तेज कदम बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा, ओवर कोट और कई स्वेटरों की तहें शरीर को अतिरिक्त बोझिल बना देती हैं। रास्ते में 'माली दुचान' (छोटी दुकान) पड़ती है। शीशे के दरवाजे बंद हैं। काउंटर पर बैठी लड़की के बाल ललछौहें हैं। शायद 'बरगंडी कलर' से रंगे हैं। लाल नेलपालिश वाली पतली लंबी गोरी उँगलियों में सिगरेट फँसी है। दुकान में कोई ग्राहक नहीं। उसने 'दोबर दान' कहकर चलताऊ मुस्कान फेंकी है। यह छोटी दुकान है जहाँ सब्जियाँ, ब्रेड और वाइन उपलब्ध है। मुझे ब्राउन चाकलेट्स लेनी हैं। कहीं पढ़ा है कि चाकलेट्स मूड बूस्टर का काम करती हैं। इन दिनों अक्सर चाकलेट्स की जरूरत मुझे पड़ती है। लड़की अंग्रेजी नहीं जानती। मैंने प्लास्टिक ट्रे में फ्रूट कर्ड, रेड वाइन और चाकलेट्स रख ली है। उसने कंप्यूटर पर हिसाब करके मुझसे कार्ड ले लिया। सामान लेकर 'ख्वाला' (धन्यवाद) कहना अब सीख लिया है मैंने। इस हफ्ते दुष्का मेरे घर आमंत्रित हैं। वाइन के बिना आमंत्रण वैसा ही, जैसे लवण हीन भोजन। जल्द पैर बढ़ाकर मैं घर के पिछले हिस्से में हूँ, सन्नाटा पसरा है। पड़ोस के फ्लैट की खिड़की के सफेद पर्दों के भीतर से पीली रोशनी छन कर बाहर आ रही है। कूड़ेदानों के पास हल्की खुरखुराहट है। जिज्ञासावस मेरी नजर वहाँ चली गई है। काले बूट और लंबा फ्रॅाकनुमा कोट पहने जो औरत अक्सर उस अपार्टमेंट में अक्सर आती-जाती दीखती है। वो सूखे कूड़ेदान के अंदर लगभग आधी लटकी हुई है। मैं अंजीर वृक्ष की ओट में हूँ। जहाँ लगभग अँधेरा है। जो दिन के उजाले में, ऊँची एड़ी के जूते चटखाती, तिरछा हैट पहने, हाथ में पालतू कुत्ते की चेन पकड़े इठलाती चलती है। वह शाम ढले कूड़ेदान में...? मुझे उत्सुकता है, थोड़ी ही देर में औरत के दस्ताने पहने हाथ बाहर निकलते हैं और नीचे रखे बड़े से पॅालीथीन में इस्तेमाल कर फेंके जूते, पुराने कपड़े, छाते, बर्तन और यूँ ही कई तरह का सामान रख देते हैं। कूड़ेदान में अधलटकी औरत बाहर आ चुकी है। हौले-हौले, बेआवाज, पॅालीथीन बैग की चुरमुराहट को भरसक नियंत्रित करते हुए बैग उठाती है। बड़ा है, शायद भारी भी लेकिन सँभाल लेती है और सधे कदमों से अपने फ्लैट की ओर! यहाँ बुजुर्गों को मामूली सरकारी पेंशन मिलती है। बेरोजगारी भत्ता भी लेकिन टैक्स का दबाव, महँगाई में वह पेंशन कुछ ज्यादा काम नहीं आती। द्रागित्सा से पूछने पर उसने मुस्कुराते हुए बात को टाल दिया, क्रोएशियन बहुत स्वाभिमानी होते हैं। विदेशी के सामने पड़ोसी के बारे में कुछ कहना उन्हें गवारा नहीं। भारत में आबोहवा के कारण घर में कभी कैद होने की नौबत ही नहीं आई। स्वेच्छा से घर में रहना और बाहरी दबाव से घर में कैद रहना दोनों में बहुत अंतर होता है। तब आप भीतर होकर भी बाहर ही होते हैं। कभी ठंडी खिड़की के पल्ले से नाक सटाए बारिश देख रहे होते हैं। कभी बर्फ से जम चुकी सावा नदी की ओर देखते हुए उसमें बहते पानी की कल्पना करते हैं। सावा के पुल पर गाड़ियों की आवाजाही है। लोग पार्क में पालतू कुत्ते और बिल्लियों को घुमाने ले आए हैं। बेंचों पर लोग अकेले दुकेले बैठे हैं। कोने के मैदान में कुत्तों को पालतू बनाने का प्रशिक्षण चल रहा है, कुत्ते अलग-अलग प्रजाति के हैं। जिनकी देख-रेख और सरंजाम काबिले तारीफ है लेकिन लोग इस बात का बहुत खयाल रखते हैं कि उनका पालतू कुत्ता किसी के लिए परेशानी का सबब न बने, शिकायत दर्ज होने पर जुर्माना बहुत कड़ा है। वैसे तो भारत में भी श्वानप्रेमी लोग हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में एक प्राध्यापक इतने श्वानप्रेमी हैं कि अपने क्वार्टर के सामने रात में कुत्तों के लिए सामूहिक भोज रख देते हैं। परिसर के सारे आवारा कुत्ते अपने भूले-भटके साथियों को समवेत स्वर में आमंत्रित करने लगते हैं। भोजन कभी पर्याप्त नहीं, वंचित रह गए 'प्रोलेतोरियत' की तरह बुर्जुवाओं की ओर गुर्राते, भूँकते हैं। शक्तिशाली भोजन का बड़ा हिस्सा उदरस्थ कर श्वान सिंह हो जाते हैं और अब मध्यरात्रि तक चलने वाला कर्णभेदी श्वान-संगीत शुरू होता है। यहाँ की 'भौंक' कैंपस के बाहर वालों को भी भौंकने की कला-प्रदर्शन के लिए प्रेरित उत्तेजित करती है। पशुप्रेमी प्राध्यापक 'सर्वेभवंतु सुखिनः' के भाव से आराम फरमाते हैं और पड़ोसी संगीत-सम्मलेन की समाप्ति की प्रतीक्षा क्योंकि श्वानों को प्रताड़ित करना मेनका गांधी की टीम को आमंत्रित करना है। परिसर में श्वान प्रेम 'सुसंस्कृत' होने की पहचान भी है। एक अध्यापिका इतनी श्वान प्रेमी हैं कि कहीं भी रुककर उन्हें पुचकारने लगती हैं। अपरिचयीकरण के दौर में शायद यह व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा हो, अपने परिचितों की अनदेखी करने का एक हथियार। उस क्षण हो सकता है कई मनुष्य श्वान रूप धरने को तरस जाते हों, जो भी हो। एक सप्ताह से तबियत नासाज है। दूतावास ने जिस डॅाक्टर के पास भेजा था उसे तगड़ा बिल बनाने के अलावा सिर्फ मुस्कुराना आता है, इसलिए दुबरावा के बड़े अस्पताल जाना पड़ा है। अस्पताल बहुमंजिला, साफ सुथरा, नर्स-डॅाक्टर चाक-चौबंद बाहरी हिस्से में कुछ दुकानें हैं जहाँ खूबसूरत चीजें बिक रही हैं। खुले आसमान के नीचे बेंचें लगी हुई हैं। क्यारियों में पौधे, फूल, लतरें, हवा में लैवेंडर की पत्तियों की गंध फैली हुई है। मैं यहाँ दो दिनों से हूँ। डॅाक्टर मिरनोविच गले-छाती के संक्रमण-विशेषज्ञ हैं। बताते हैं कि टाँसिलों में सूजन के कारण ज्वर आ रहा है।

अस्पताल का काम खत्म हुआ। अस्पताल की यात्रा मेरे लिए 'ए वेरी ईजी डेथ' की यात्रा भी थी, जिसने मुझे सीमोन और उसकी माँ के आपसी संबंधों को नई रोशनी में पहचनवाया। सीमोन के उपन्यास 'शी केम टू स्टे' और 'द मेंडरीन' ने नए दौर के स्त्रीवादी चेहरे को पहचानने में मदद की। उनके आत्मकथात्मक उपन्यासों से होकर गुजरना एक दिलचस्प और ईमानदार अनुभव रहा है। अस्पताल और बीमारी का यह समय मुझे सीमोन के और करीब ले आया है। 'मेमोआयर्स ऑफ अ ड्यूटी फुल डॉटर' में विश्वविद्यालय के पढ़ने के दौरान 'पुरुष की तरह दिमाग' होने की इच्छा व्यक्त करते हुए अपनी तुलना वह सार्त्र से करती हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि स्त्री के लिए पुरुष जैसी सोच होना संभव नहीं। 'प्राइम ऑफ लाइफ' में सीमोन ने होटलों में रहकर लिखने पढ़ने, एक के बाद दूसरा होटल बदलने का जिक्र किया है सोचती हूँ सीमोन अपनी आर्थिक जरूरतें कैसे पूरी करती होगी, यह भी कि होटलों में रहने का अर्थ हुआ कि आप हमेशा मेहमान हैं। बिस्तर, परदे, कुर्सी टेबल कुछ भी आपका अपना नहीं। सीमोन के अनुभव पढ़ते हुए पाठक सीखता है कि कैफेटेरिया में कैसे बैठना चाहिए, लोगों से कैसे मिलना चाहिए, बहसें, पढ़ना-लिखना और सोचने का सलीका भी। सीमोन कहती है कि कैफे में घुसते हुए यदि आप अपने ही दो आत्मीय मित्रों को आपस में बात करते हुए देखें तो उनके निकट बैठकर बातचीत में बाधा न डालें, बेहतर हो चुपचाप वहाँ से हट जाएँ। 'कहवाघर' भी पढ़ने लिखने की जगह हो सकती है। इसे सीमोन साबित करती है और यह भी कि कैसे वह बिना संग साथ की अपेक्षा के सन 1930 के आसपास मार्सिले और रोउन जैसे कस्बों में अध्यापन के वर्षों में लंबी सैरों के लिए निकल जाया करती थी। सोचती हूँ कि आज भी स्त्रियों के लिए उनका अपना 'स्पेस' खोजना मुश्किल होता है। भारतीय माहौल में कोई स्त्री कॅाफी हाउस में बैठकर लिखे, वो भी अकेली तो न जाने कितनी जोड़ी आँखें उसे बरजने को तत्पर हो जाएँगी। अब मेरी तबीयत बेहतर हो चली है। इन दिनों 'फोर्स टू सरकमस्टांसेज' पढ़ रही हूँ जिसमें सीमोन द बोउवार ने युद्धोत्तर पेरिस का चित्रण किया है। जिसमें नए और बेहतर समाज के निर्माण का स्वप्न है। स्वतंत्रता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध है। आत्मकथा के इसी भाग में उन्होंने नेल्सन एल्ग्रेन से अपने संपर्क की चर्चा की है। नेल्सन के साथ फायर प्लेस के समक्ष संभोग और फिर पेरिस और शिकागो में दोनों का अलग-अलग जीवन बिताना भी वर्णित है। भौगोलिक दूरी अपनी सात्यता में कैसे आत्मीय संबंध का अंत कर देती है। यह भी कि लिखने के लिए सीमोन ने पेरिस छोड़ना पसंद नहीं किया इसके साथ ही बोउवार की उत्तर अफ्रीका, अमेरिका की वे लंबी यात्राएँ जो उसने अकेले कीं। सीमोन को यह चिंता भी खाए जा रही थी कि इतने सारे व्यापक जीवनानुभव, जीवन यात्राएँ ये सब उसके साथ ही खत्म हो जाएँगी। 'आल सेड एंड डन' में अपने मित्र सिल्विए वान के साथ आत्मीय संपर्क की चर्चा करते हुए सीमोन का कहना है कि उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उम्र के साठवें वर्ष में उसे कोई सहयोगी और मित्र मिलेगा, लेकिन मिला। इन आत्मकथाओं में दो बातें मेरी समझ में आती हैं - एक तो आत्मनिर्भरता यानी अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाना, दूसरे अपने को हमेशा बेहतर ढंग से समझने का प्रयास। सीमोन ने सार्त्र के साथ सहजीवन जिया लेकिन विवाह नहीं किया क्योंकि स्वाधीनता के अर्थ दोनों के लिए अलग-अलग थे। सीमोन लिखती है - "अद्भुत थी स्वाधीनता! मैं अपने अतीत से मुक्त हो गई थी और स्वयं में परिपूर्ण और दृढ़ निश्चयी अनुभव करती थी। मैंने अपनी सत्ता एक बार में ही स्थापित कर ली थी, उससे अब कोई मुझे कोई वंचित नहीं कर सकता था, दूसरी ओर सार्त्र एक पुरुष होने के नाते बमुश्किल ही किसी ऐसी स्थिति में पहुँचा था, जिसके बारे में उसने बहुत दिन पहले कल्पना की हो ...वह वयस्कों के उस संसार में प्रविष्ट हो रहा था, जिससे उसे हमेशा से घृणा थी।"

वैसे मैं अब उस खोज में हूँ जिस ओर आंद्रियाना मेस्त्रोविच ने इशारा किया था। लिलियाना के निजी जीवन के बारे में विशेष जानकारी नहीं थी, वैसे भी किसी के निज की तफ्तीश असभ्यता ही मानी जाती है। प्रेमचंद ने भी कहा है कि ऐसा कोई भी प्रश्न जो सामने वाले को असुविधा में डाल दे, नहीं पूछा जाना चाहिए। सीमोन द बोउवार के लेखन के साथ सफर करते-करते युद्धोत्तर यूरोप और उसकी बदली परिस्थितियों के बारे में जानना चाहती हूँ और इसके लिए एक बंद दरवाजा है मेरे सामने लिलियाना का, वह वार-विक्टिम है ऐसी सूचना मरियाना ने भी दी थी। मुझे जो जानना है वह या तो लिली बता सकती है या दुष्का। दुष्का बहुत भावुक है। पता नहीं मेरी बात का क्या अर्थ निकाले। अपने घावों को खुद नखोरना-कुदेरना और बात है और दूसरों के सामने खोलकर रख देना ...लिलियाना को विदेशी पसंद हैं विशेषकर गंदुमी साँवली रंगत। मेरे पास हैदराबाद से लाए हुए कुछ मोती हैं। उन्हें 'गिफ्ट रैपर' में लपेट कर मैंने लिलियाना के घर जाना तय किया है। दुष्का साथ है। लिली खूब स्वस्थ, लंबी चौड़ी, लगभग पचास की उम्र छूती महिला है, जो सिर्फ सफेद टायलेट पेपर खरीदती है - रंगीन टायलेट पेपर के इस्तेमाल से कैंसर हो जाता है। ऐसा विश्वास है उसे। सन की तरह सुनहरे सफेद बाल, मैजेंटा रंग की गहरी लिपस्टिक, कड़कती ठंडी शाम में भी वह गर्दन और वक्ष का ऊपरी भाग खुला रखती है। लोगों को देख ढलके वक्ष को थोड़ा सहारा देकर, ऊपर उठा गर्दन अकड़ा कर चलना उसकी आदत में शुमार है। हाई हील और ऊँची स्कर्ट पहने वह संभ्रांत लोगों के बीच उठती-बैठती है उसके हाव-भाव मेरी अब तक की जानी चीन्ही स्त्रियों से अलग हैं। सन 1992-95 के दौरान क्रोएशिया, बोस्निया-हर्जेगोविना में जो स्त्रियाँ सर्ब सेनाओं के दमन का शिकार हुईं - लिली उनमें से एक हैं। युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हजारों मामले आए, कुछ मामले सरकारी फाईलों में दब गए, कुछ भुला दिए गए और कुछ शिकायतें वापस ले ली गईं। कुछ स्त्रियाँ मार दी गईं। कुछ अवसाद और अन्य रोगों का शिकार हो गईं। हालाँकि जेनेवा कन्वेशन में युद्ध के दौरान यौन हिंसा और सैनिकों द्वारा स्त्रियों के एकल या सामूहिक बलात्कार को मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध माना गया लेकिन पूरे विश्व में युद्ध नीति के तहत स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा एक अलिखित चर्या है। युद्ध काल के बलात्कार सामान्य बलात्कारों से अलग माने जाते रहे हैं। इनमें से बहुत से वाकयों की तहकीकात भी नहीं हो पाती। कई बार शोषिताएँ और घर्षिताएँ सामने भी नहीं आतीं। लिलियाना उन 68 बोल्ड औरतों में से एक है जिसने व्यापक सामूहिक बलात्कार की घटना की न सिर्फ रिपोर्ट दर्ज की, बल्कि वक्त और परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी, मृत्यु और जीवन, मूकता और बोलने में से जीवन का चुनाव किया, चुप नहीं रही। प्रथम और द्वितीय दोनों विश्व युद्धों में कई देशों में सैन्य और अर्ध सैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरण स्थली बने, वहीं दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रूस, जापान, इटली, कोरिया, चीन, फिलिपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों को घर्षित किया गया। आपसी छोटी-बड़ी मुठभेड़ों में अफगानिस्तान, अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, बोस्निया, कंबोडिया, कांगो, क्रोएशिया साइप्रस, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, हैती, भारत, इंडोनेशिया, कुवैत, कोलंबो, लाइबेरिया, मोजांबीक, निकारागुआ, पेरू, पाकिस्तान, रवांडा, सर्बिया, सोमालिया, टर्की, युगांडा, वियतनाम और जिंबांबे जैसे देशों की लंबी सूची है - जहाँ यौन हिंसा और स्त्री घर्षण की घटनाएँ हुईं और बड़े-बड़े भाषणों, राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दब गईं, दबा दी गईं।

अब मुझे लिलियाना का पैर हिलाते हुए कंसर्ट सुनना, अंधाधुंध सिगरेट पीना, एक आँख को हल्का दबाकर हँस देना अटपटा नहीं लगता। स्प्लित के चार सितारा होटल का मालिक आजकल लिली पर दिलोजान से फिदा है। लिली का कहना है इन गर्मियों में वह स्प्लित जाकर पूरे साल का खर्चा निकाल लेगी। वह 'एस्कोर्ट' है। जिसके साथ के लिए व्यापारी, पर्यटक अच्छी रकम खर्च करते हैं। लिली अपने बारे में गंभीरता से बात नहीं करती। उसने यौन हिंसा और सामूहिक बलात्कार झेला है। वह हँसती है जिंदगी पर। उसके साथ ही चवालीस स्त्रियाँ (जो अभी जीवित हैं) सर्ब सैनिकों से कई बार घर्षित हुईं। इनमें से 21 यौन दासियों के रूप में सैन्य शिविरों में रहीं और 18 ऐसी वृद्धाएँ थीं जो किसी न किसी बलात्कार की साक्षी रहीं। इनमें से 29 स्त्रियाँ बलात्कार के कारण गर्भवती हुईं जिनमे से 17 ने शर्म और अपमान से बचने के लिए गर्भपात करा लिया। कुछ ने संतान पैदा करके सरकारी अनाथालय में मुक्ति पाई। लिली का एक मात्र बेटा जो ड्रग के शिकंजे में सरकारी पुनर्वास योजना का मेहमान बना हुआ है, 1996 में ही जन्मा। लिलियाना को सब कुछ याद है ब्यौरेवार, लेकिन याद करना नहीं चाहती। मैं भी उसे ज्यादा परेशान नहीं करती और अपने फ्लैट पर वापस आ जाती हूँ।

नींद नहीं आ रही। क्या हुआ होगा लिलियाना जैसी सैकड़ों लड़कियों का? क्या गुजरी होगी उन पर। मैं घुप्प अँधेरे में हूँ ...कोई चेहरा नहीं, सिर्फ कराहें ...विक्टर फ्रैंकल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 'मैन्स सर्च फ़ॅार मीनिंग' शीर्षक पुस्तक लिखी थी, जिसमें आश्वित्ज़ के यातना शिविर की दैनंदिनी है। फ्रैंकल का कहना है कि जिस रूप में बंदी अपने भविष्य के बारे में सोचता था उसकी उम्र उसी पर निर्भर करती थी। उसने 'लोगो थेरेपी' का सिद्धांत दिया और बताया कि जिनके पास जीने का कोई कारण होता है, वे कैसे भी जी लेते हैं। इन यौन दासियों के पास जीने का क्या कारण होगा। पति, बच्चों, माँ, सास के सामने निर्वस्त्र और बलात्कृत की जाती, महीने दर महीने साल-भर उनके अपमान और यातना की कोई सीमा नहीं। उनके पास जीने का क्या कारण बच रहा होगा? अर्ध निद्रा में मुझे आश्वित्ज़ का यातना शिविर दीख रहा है। बेचैनी, पसीना और घबराहट ...गोद में बच्चा लिए लिलियाना दौड़ रही है। काँटेदार बाड़ के पास सैनिक ही सैनिक गोरे लाल मुँह वाले लंबे चौड़े सैनिक। लिलियाना को नोच रहे हैं। घसीट रहे हैं। उसके मुँह पर थूक रहे हैं। पैरों को फैला रहे हैं। बछड़ा पैदा करती गाय सी डकरा रही है। वह उसके ऊपर एक-एक करके लद गए हैं। लिली ...लिली ...लिलियाना.. अपनी चीख से नींद टूट गई है ...उठकर देखा है फोन पर कुछ संदेश आए हैं। ...पानी पिया है कभी की पढ़ी पंक्ति याद आती है -

तुमि गुछिए किछू कथा बोलते पारो ना
शुधू समय निजेर गल्पो बोले जाए

ठीक ही तो, कहाँ लिख पा रही हूँ खूब व्यवस्था से। लिलियाना जैसी अनेकानेक ने मेरा चैन छीन लिया है। दिन-रात उन्हीं के बारे में सोचती हूँ और ...और जानना चाहती हूँ। जिनकी कथा समय ही लिखेगा लेकिन कब ?

लिलियाना और ईगोर ने मुझे पार्टी में चलने को कहा है। मैं थोड़े पशोपेश में हूँ। शाकाहारी और मदिरा से परहेज करने वाला भारतीय संस्कार चोले में मुँह दबाए हँस रहा है। पिता को मालूम चला और पितातुल्य गुरु नित्यानंद तिवारी, वे तो अविश्वस्त नेत्रों से ताकेंगे भर मुझे। लिली बताती है कि वहाँ कुछ औरतें मिलेंगी मुझे, जो हो सकता है अपने बारे में कुछ बोलें। खैर हम शलाटा जाते हैं जहाँ से 'पॅाट पार्टी' में जाना है। इसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं। लेकिन पहुँचते ही लगा नशीले धुएँ से भरा माहौल दम घोंट देगा। कई लोग जिनमें लड़कियों की संख्या बहुत थी - हशीश, चरस, गांजा, आदि का सेवन कर रहे हैं। बिना पिए ही सिर चकराने लगा। लोग चुप लेटे हैं, कोई छत ताक रहा है कोई दम लगा रही है। हल्का संगीत बज रहा है। ध्यान से सुना श्री श्री रविशंकर की सभाओं में बजने वाला हरे कृष्णा ...राधे राधे यहाँ की हवाओं में झंकृत है। मैं बाहर जाना चाहती हूँ। इस दमघोंटू माहौल में आकर गलती की ...उफ नहीं आना चाहिए था। दीवार से सटकर एक जोड़ा खड़ा है। लड़के ने आगे बढ़कर मुझसे कुछ कहा है और हौले से मेरे बाल छुए हैं 'जेलिम दोटाक्नुटी स्वोजे क्रेन ड्लाके' (मैं तुम्हारे काले बाल छूना चाहता हूँ) सुनते ही मैं दौड़कर बाहर आ गई जैसे नरक कुंड से बचकर लौटी हूँ लिलियाना और ईगोर का कुछ पता नहीं। मैंने तीन ट्रामें बदली हैं और सुरक्षित लौट आने के सुकून ने मुझे गहरी नींद दे दी। अगले रविवार लिलियाना हँसकर कहती है 'नेमोज्ते से प्रेपाला' यानी डरो मत। यहाँ जबरदस्ती कोई कुछ नहीं करेगा, तुम्हारे बाल काले हैं, जो यहाँ वालों के लिए कुतूहल है।

तुर्केबाना येलाचीचा जाते हुए ट्राम लोहे की ईटों की सड़क के बीचोंबीच बने हुए ट्रैक पर मुड़ती है। गोल इमारत के ऊँचे-ऊँचे काँचदार दरवाजे जिनके भीतर भांति-भांति की दुकानें हैं। ऊनी, सूती वस्त्र,जो अधिकतर भारत और चीन के टैग से सुसज्जित हैं। जूते वियतनाम और थाईलैंड के बिक रहे हैं। दुकानदार की शक्ल दुमकटे लोमड़ जैसी है। सपाट चेहरे पर लाल नाक और गहरी कंजी आँखें, व्यवहार में विनम्र दीखता है लेकिन लाल भूरे बालों के भीतर रखे सिर में कुछ ऐसा खदबदा रहा है, जिसे मैं 'रंगभेद' समझती हूँ। साँवली रंगत का मनुष्य उसके बहुत सम्मान का पात्र नहीं। ऐसी गंध मेरी छठी इंद्रिय को मिल रही है। दुकान के बाहर कोने पर एक छह-सात वर्षीय गोरे, चित्तीदार चेहरे वाला लड़का शीशे से अपनी नाक सटाए है। बड़ा सा लबादा पहना हुआ है उसने पैरों में नाप से बड़े जूते। दुकानदार को बाहर आता देख वह खरगोश की तरह फुदक कर गायब हो जाता है। इसके बाद ही जाग्रेब की मशहूर केक की दुकान है। जहाँ क्रोएशियन और जर्मन केक की ढाई-सौ से अधिक किस्में अपने पूरे शबाब के साथ शीशे की पारदर्शी अल्मारियों में भारी जेब के दिलदार खवैयों का इंतजार कर रही हैं। तुर्की की विजिटिंग प्रोफेसर गुलदाने कालीन ने इस दुकान की पेस्ट्री की तारीफ कई बार की है। आज सोचा खा ही लूँ। इन केक्स की खूबी इनकी क्रीम है जो मनुष्य के मेदे और वजन को चुनौती देती है। मनचाहा सजीला सँवरा, क्रीम में लिपटा, बारीक डिजाइन दार केक का रसीला बड़ा-सा टुकड़ा प्लेट में सामने है। कीमत है पचास कूना यानी लगभग पाँच सौ रुपये। अपने यहाँ भी 'बरिस्ता' में लगभग यही दाम है। केक का पहला टुकड़ा काटती हूँ कि दुकान का मैनेजरनुमा आदमी बाहर खड़े बच्चे को दुरदुराता हुआ चिल्लाता है। हाथ में आलू चिप्स का फटा पैकेट लिए बच्चा दुकान के बीचोंबीच आ गया है। कर्मचारी लड़का उसका लबादा खींच कर घसीट रहा है, दुकान में सुरक्षा सायरन बजने लगा। बच्चा कुछ बोल नहीं पा रहा है, मेरे पहुँचते-पहुँचते बच्चा फुटबाल की तरह सड़क पर फेंका जा चुका है। पूछने पर वह दुकान के कूड़ेदान की ओर इशारा करता है। 'जा सम ग्लादना' (मैं भूखा हूँ) कहकर जार जार रो रहा है। अनुमान करती हूँ कि किसी के अधखाए चिप्स उठाकर बच्चा पेट भर रहा होगा और दुकान मालिक ने देख लिया होगा। मुझे अब केक नहीं खाना। शायद कभी नहीं। खून से बच्चे की नाक रंग गई है। केक खरीदती हूँ उसके लिए वह सुबकता हुआ जा रहा है। शायद शरणार्थी है। हाथ की मुट्ठी में दबे केक की सफेद क्रीम लाल हो रही है। उफ मेरे मौला ऐसे न जाने कितने बच्चे दर-ब-दर हो भटक रहे हैं - सम्मानहीन, भोजनहीन, आश्रयहीन, स्वयंसेवी संस्थाएँ हैं, सरकारें हैं, लेकिन हम अपना सुख भोग छोड़कर इनकी तरफ देखते हैं क्या? मन नम है और बाहर बरसात शुरू हो गई है -

पास रहो डर लग रहा है
लग रहा है कि शायद सच नहीं है यह पल
मुझे छुए रहो
जिस तरह श्मशान में देह को छुए रहते हैं
नितांत अपने लोग,
यह लो हाथ
इस हाथ को छुए रहो जब तक पास में हो
अनछुआ मत रखो इसे,
डर लगता है
लगता है कि शायद सच नहीं है यह पल
जैसे झूठ था पिछला लंबा समय जैसे झूठा होगा अगला अनंत
                                (नवनीता देवसेन)

जाग्रेब पुनर्वास केंद्र में औरतें जीवन यापन के लिए छोटे-मोटे काम सीखतीं हैं जिनमें सामान की पैकेजिंग, मुरब्बे, जैम, अचार, मसाले इत्यादि बनाना शामिल है। बोस्निया-हर्जेगोविना, क्रोएशिया के खिलाफ युद्ध में सर्बिया ने नागरिक और सैन्य कैदियों के कुल 480 कैंप बनाए थे। क्रोएशियन और बोस्निया नागरिकों को डराने के लिए उनकी स्त्रियों पर बलात्कार किए गए। आक्रमणकारी छोटे-छोटे समूहों में गाँवों पर हमला करते जिनका पहला निशाना होतीं लड़कियाँ और औरतें। सामूहिक बलात्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता ताकि दूसरे गाँवों को अपने हश्र का अंदाजा हो जाए। 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैंपों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किए। बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा। किसी उम्र की स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो। लिली और दुष्का को पर्यटन विभाग में नौकरी मिली और वह जाग्रेब चली आईं। सर्ब होते हुए भी वे दोनों क्रोएशियन नागरिक थीं और उससे भी पहले थी लड़कियाँ - ताजा, जिंदा, टटका स्त्री मांस। लिली उन अभागी लड़कियों में से एक थी, जिन्हें नोचा-खसोटा और पीटकर कैद में रखा गया। कई लड़कियों को अश्लीलता के सार्वजिनक प्रदर्शन के लिए बाध्य किया जाता रहा, यौनांगों को सिगरेट से दागा गया और एक दिन में कई बार बलात्कार किया जाता रहा। इस पुनर्वास केंद्र ने ऐसी स्त्रियों को स्वावलंबी बनने में मदद की थी और यह सिलसिला अब भी जारी है। युद्ध शुरू होते ही परिवार के परिवार गाँवों को छोड़कर भाग जाते, पीछे छूट जाते खेत, ढोर डंगर और पकड़ ली गई औरतें। जिनकी उम्र दस से लेकर साठ-सत्तर वर्ष की हुआ करतीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के अत्याचारों को युद्ध अपराध की संज्ञा दी गई, युद्ध थमने के बाद भी यौन-हिंसा की शिकार इन औरतों के लिए कोई ठोस सरकारी नीति नहीं बनी। विश्व के कई देशों, मसलन सोवियत यूनियन ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर आधिपत्य जमाने के लिए 'बलात्कार' का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इसी तरह बांग्लादेशी स्त्रियों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बड़े पैमाने पर घर्षण किया गया, युगांडा के सिविल वार और ईरान में स्त्रियों से जबरदस्ती यौन संबंध बनाकर अपमानित करने की घटनाओं से हम सब वाकिफ हैं। चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रियों का सामूहिक यौन-उत्पीड़न, दमन और श्रीलंकाई स्त्रियों के घर्षण के हजारों मामले 'नव साम्राज्यवाद' को फैलाने के लिए जोरदार और कारगर हथियार बने। कई स्त्रीवादियों ने वृत्त चित्रों, फिल्मों द्वारा इस तरह की घटनाओं के खिलाफ जनमत संग्रह के कारगर प्रयास भी किए, लेकिन बोस्निया और हर्जेगोविना की औरतों की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा का विषय कभी बनी ही नहीं। क्रोएशिया से सटे बोस्निया जाने का निर्णय मैंने किया है, जिसके लिए भारतीय दूतावास से अनुमति अनिवार्य है।

दूतावास में बोस्निया जाने की अनुमति आसानी से ही मिल गई लेकिन वहाँ के अधिकारी बड़े दबे स्वर में उपहास करते हैं - 'लोग तो पेरिस और इटली, जर्मनी घूमते हैं, मजे करते हैं और आप 'वार विक्टिम' के पीछे पड़ी हैं।' बोस्निया में लूट, भ्रष्टाचार, झूठ, राहजनी सभी कुछ है लेकिन हरियाले खेतों के बीच से जाती सड़क का रास्ता बुरा नहीं। बोजैक बोस्नियाई विद्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है साथ ही कुछ रोजगार भी उसकी उम्र पचास के ऊपर ही है। उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीया बेटी और पत्नी को बार-बार घर्षित किया गया। बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे। इस बीच कब उसने अंतिम साँस ली, पता नहीं। बोजैक वह जगह दिखाता है जहाँ उसकी पत्नी दिल की बीमारी और अवसाद से मर गई। 'लाइफ मस्ट गो ऑन' कहकर बोजैक फटी आँखों से हँसता है और अगला युद्ध कैंप दिखाने चल पड़ता है। बच्ची को खोकर, बाद के वर्षों में उसकी पत्नी प्रभु ईसू से अपने अनकिए पापों के लिए दिन भर क्षमा माँगा करती। उसका पाप क्या था? इसके उत्तर में बोजैक कहता है - 'औरत होना...'। शांति स्थापित होने के बाद भी जिन्होंने युद्ध को अपनी देहों पर रेंगता, चलता, बहता महसूस किया, एक बार नहीं अनेक बार जिनकी कोखों ने क्रूर सैनिकों के घृणित वीर्य को जबरन वहन किया, वे हमेशा के लिए हृदय और मानसिक रोगों का शिकार हो गईं। रवांडा में तो अकेले 1994 में लगभग 5000 बच्चे युद्ध हिंसा के परिणामस्वरूप जन्मे थे। क्रोएशिया में ऐसे बच्चों की सही संख्या का पता कोई एन.जी.ओ. नहीं लगा सका, क्योंकि अधिसंख्य मामलों मे लोग चुप लगा गए, पड़ोसी नातेदार सब जानकर भी घाव कुरेदने से बचते रहे। युद्ध सबके दिलो-दिमाग में पसर गया। बलात्कार की शिकार या गवाह रही अधिकांश स्त्रियाँ मृत्युबोध से ग्रस्त हैं। वे सामाजिक संबंध भी स्थापित नहीं करना चाहतीं। कई तो बस सालों तक टुकुर-टुकुर ताकती रहीं। कुछ बोल नहीं पातीं। कुछ ने अपना घर बार छोड़ दिया और फिर कभी यौन संबंध स्थापित नहीं कर पाईं। एक मोटे अनुमान के अनुसार बोस्निया में युद्ध के दौरान लगभग पचास हजार लड़कियाँ औरतें बलात्कार का शिकार हुईं और उधर 'इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फ़ॅार द फार्मर युगोस्लाविया' यौन दासता और बलात्कार को मानवता के प्रति अपराध के रूप में दर्ज कर कागज काले करता रहा।

संयुक्त युगोस्लाविया का विखंडन बोस्निया और हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसीडोनिया गणतंत्र, स्लोवेनिया जैसे पाँच स्वायत्त देशों में हुआ था, जो बाद में चलकर सर्बिया, मांटेग्रो और कोसोवो में बँटा क्रोएशियाई लोगों के बीच जो युद्ध और झड़पें हुईं उनमें से अधिकतर भूमि अधिग्रहण को लेकर थीं आज भी सात हजार से अधिक क्रोएशियन शरणार्थी बोस्निया और हर्जेगोविना में हैं और इस देश में लगभग 131,600 लोग विस्थापित हैं। क्रोएशिया और बोस्निया की 935 कि.मी. की सीमा साझा है। हमें यहाँ पर धोखाधड़ी से बार-बार क्रोएशियन दूतावास, जो सराजेवा में है - आगाह किया गया है। रास्ते में कई बार पासपोर्ट और वीजा 'चेक' किया गया। मुझे यहाँ के खस्ताहाल संचार साधनों और सड़कों को देखकर भारत के कई छोटे शहरों की याद आती है। पूरे इलाके में बारूदी सुरंगों का खतरा है, इसलिए पुलिस ट्रैफिक को रोककर घंटों पूछताछ करती है। पुराने लोग अंग्रेजी नहीं समझते जबकि नई पीढ़ी अंग्रेजी बोलती और समझती है। युद्ध के दौरान कई बोस्नियाई जर्मनी भाग गए थे, इसलिए इनकी भाषा में जर्मन शब्दों का आधिक्य है। हमें उना नदी में रिवर राफ्टिंग का आमंत्रण है लेकिन मेरा ध्यान कहीं और है।

कल लिली ने 1993 के लास एंजिल्स टाइम्स में प्रकाशित मिरसंडा की आपबीती दी थी। होटल लौट कर मैंने वही टुकड़ा उठाया है - "रोज रात को सफेद चीलें हमें उठाने आतीं और सुबह वापस छोड़ जातीं। कभी-कभी वे बीस की तादाद में आते। वे हमारे साथ सब कुछ करते, जिसे कहा या बताया नहीं जा सकता। मैं उसे याद भी नहीं करना चाहती। हमें उनके लिए खाना पकाना और परोसना पड़ता नंगे होकर। हमारे सामने ही उन्होंने कई लड़कियों का बलात्कार कर हत्या कर दी, जिन्होंने प्रतिरोध किया, उनके स्तन काट कर धर दिए गए।

ये औरतें अलग-अलग शहरों और गाँवों से पकड़ कर लाई गई थीं। हमारी संख्या लगभग 1000 थी। मैंने लगभग चार महीने कैंप में बिताए। एक रात हमारे सर्बियाई पड़ोसी के भाई ने हममें से 12 को भगाने में मदद की। उनमें से दो को सैनिकों ने पकड़ लिया। हमने कई दिन जंगल में छुप कर बिताए अगर पड़ोसी हमें न बचाता तो मैं बच नहीं पाती, शायद अपने को मार लेती, क्योंकि मैं जिस यातना से गुजरी, उतनी यातना तो मृत्यु में भी नहीं होती।

"कभी-कभी मुझे लगता है कि रात के ये दुःस्वप्न मेरा पीछा कभी न छोड़ेगें। हर रात मुझे कैंप के चौकीदार स्टोजान का चेहरा दीखता है। वह उन सबमें सबसे निर्मम था, उसने दस साला बच्ची को भी नहीं बख्शा था। ज्यादातर बच्चियाँ बलात्कार के बाद मर जाती थीं। उन्होंने बहुतों को मार डाला। मैं सब कुछ भूलना चाहती हूँ, नहीं तो मर जाऊँगी।"

पढ़कर मेरा मन घुटन से भर गया है, भूख नींद गायब हो गई है। स्काइप खोलकर देखा है। कोई मित्र-आत्मीय ऑनलाइन नहीं है। इस समय भारत में आधी रात होगी। दिल बहलता नहीं। बाल्कन प्रदेश के पार से आती गुम-सुम बोझिल हवाओं के घोड़ों पर सवार लंबे कद्दावर क्रूर सर्बियाई सैनिक दीखते हैं। हवा में तैरती चीखें और पुकारें हैं। 1992 में फोका की स्कूल जाने वाली लड़की बताती है कि कैसे जोरान वुकोविच नामक आदमी ने उससे जबरदस्ती संसर्ग किया और बाद में दूसरों के आगे परोस दिया। स्कूल में सैनिकों का जत्था घुसा और आठ लड़कियों को चुनकर उनसे निचले कपड़े उतारकर फर्श पर लेटने को कहा। पूरी क्लास के सामने इन आठों का जमकर बलात्कार किया गया। सैनिकों ने बोस्नियाई मुसलमान लड़कियाँ चुनीं, उनके मुँह में जबरन गुप्तांग ठूसे और कहा - "तुम मुसलमान औरतें (गाली देकर) हम तुम्हें दिखाते हैं।" उसके पास कोई शब्द ऐसा नहीं, जो उसकी यातना व्यक्त करने में सक्षम हो - बार-बार यही कहती है 'एक औरत के साथ इससे बदतर कुछ हो ही नहीं सकता'।

उसे बाद में पाट्रीजन स्पोर्ट्स हॅाल में, अलग-अलग उम्र की लगभग साठ अन्य स्त्रियों के साथ बंधक बनाकर रखा गया। वे बारी-बारी सर्ब सैनिकों द्वारा ले जाई जातीं और बलात्कार के बाद लुटी-पिटी घायल अवस्था में स्पोर्ट्स हाल में बंद कर दी जातीं। सर्ब सेनाओं ने घरों, दफ्तरों और कई स्कूलों की इमारतों को यातना-शिविरों में बदल डाला था। एक बोस्नियाई स्त्री ने बताया कि पहले दिन हमारे घर पर कब्जा करके परिवार के मर्दों को खूब पीटा गया। मेरी माँ कहीं भाग गई - बाद में भी उसका कुछ पता नहीं चल पाया। वे मुझे नोचने, खसोटने लगे। भय और दर्द से मेरी चेतना लुप्त हो गई ...जब जगी तो मै पूरी तरह नंगी और खून से सनी हुई फर्श पर पड़ी थी ...यही हाल मेरी भाभी का भी था ...मैं जान गई कि मेरा बलात्कार हुआ है ...कोने में मेरी सास बच्चे को गोद में लिए रो रही थी। ...उस दिन से हमें हमारे ही घर में कैद कर दिया गया। यह मेरी जिंदगी का सबसे बुरा वाकया था ...वे हमेशा हमें पंक्तिबद्ध कर सैनिकों के सामने ले जाते और हमें परोस देते। मकान में वापस लाकर भी अश्लील हरकतों के लिए मजबूर करते और हमें रौंदते ...हमारे बच्चों के सामने भी हमें खसोटते। ये सब एक साल तक चला, अधिकतर औरतें या तो मर गईं, पागल हो गईं या वेश्याएँ बन गईं।"

युद्ध के बाद 'डेटन एकार्ड्स' नाम से शांति समझौता हुआ था, जिसके अनुसार यौन-हिंसा पीड़िताओं को घर-वापसी पर मकान और संपत्ति दी जानी थी लेकिन ऐसी बहुत कम औरतें थीं, जो घर वापसी के लिए तैयार थीं अधिकांश ने अपने मकानों में लौटने से इनकार कर दिया क्योंकि वहाँ उनकी यातना और अतीत के नष्ट जीवन के स्मृति चिह्न थे।

अप्रैल 1992 का दिन इतने वर्षों बाद भी हासेसिस नामक मुस्लिम स्कूली छात्रा भूल नहीं पाई है, जब सर्ब सैनिक उसे विजेग्राद के पुलिस स्टेशन के तहखाने में ले गए -"उस कमरे में लकड़ी का बहुत-सा सामान था कुर्सियाँ वगैरह। वहाँ मैंने मिलान ल्युसिक और स्ट्रेजो लूसिक को देखा। मैं मिलान को अच्छी तरह जानती थी। उसने चाकू लहराते हुए कहा - 'अपने कपड़े उतारो - लगा वह मजाक कर रहा है ...लेकिन सच यही था कि इतना पुराना सर्बियाई पड़ोसी कई सैनिकों के साथ मुझे अपमानित करने पर तुला था...l"

स्पाहोटल 'विलिना व्लास', जो आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है - विश्वास नहीं होता पर मुझे बताया जाता है कि यहाँ दो सौ औरतों को बंद करके रखा गया था। बूढ़ी बाल्कन स्त्री को तारीख याद नहीं लेकिन वाकया बखूबी याद है - "मैं अपने बेटे को लेकर जंगल में छिप गई थी। मेरा 16 साल का बेटा मेरे साथ था लेकिन बेटी को मैंने घर के तहखाने में छिपा दिया था, क्योंकि सुनने में आया था कि वे लड़कियाँ उठा ले जाते हैं। उन्होंने मुझे पकड़कर धमकाया, बेटे के सामने मेरे कपड़े उतारे और चाकू से बेटे का गला रेत दिया। 'मम्मी' यही अंतिम शब्द था। जो मेरा बेटा बोल पाया। कभी-कभी वे मुझे दो दिन के लिए कैंप ले जाते, फिर होटल वापस छोड़ जाते। मैं गिनती ही भूल गई कि उन्होंने कितनी बार मुझसे बलात्कार किया। होटल के सारे कमरों में ताले लगे रहते, वे खिड़की के रास्ते हमें रोटी फेंकते, जिसे हमें दाँतों से पकड़ना पड़ता, क्योंकि हमारे हाथ तो पीछे बँधे रहते। सिर्फ बलात्कार के वक्त ही हमारे हाथ खोले जाते। हमें समय का ज्ञान भूल गया। हमारी देह को सिगरेट से जलाया जाता, जीभ पर चाकू चलाकर मांस का टुकड़ा काट लिया जाता। हममें से अधिकांश औरतें न बोलती थीं, न रोती थीं। कुछ ने अपनी जान भी ले ली और कई तो दर्द और भूख से मर गईं। कई औरतों का सात से नौ घंटे के बीच नौ बार बलात्कार हुआ। कुछ बलात्कारों की रिकार्डिंग भी की गई, जिनका इस्तेमाल पोर्नोग्राफी के बाजार के लिए किया गया।"

ये बलात्कार किसी सरकार द्वारा नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष द्वारा किए गए थे, इसलिए कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों का मानना था कि ये मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है क्योंकि उन्हें लगता था कि सिर्फ सरकारी संगठन ही मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं, लेकिन बाद में जब बोस्निया सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सर्ब सैनिक टुकड़ियों की हिंसा को 'जेनोसाइड' कहा और 1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पहली बार 'अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल' की घोषणा की, तब ऐसे कुछेक मामलों की सुनवाई आरंभ हुई। इन सुनवाइयों में कभी आरोपी की पहचान से इनकार किया गया तो कभी मुद्दई ने आरोप वापस ले लिए। दिलचस्प यह भी था कि ट्रिब्यूनल के पास सुनवाइयों की व्यवस्था के लिए धन का नितांत अभाव था, जिसकी पुष्टि 7 दिसंबर 1994 के न्यूयार्क टाइम्स की रपट करती है। दुखद आश्चर्य था कि ट्रिब्यूनल की 18 सदस्यीय जाँच समिति में मात्र तीन स्त्रियाँ थीं। लंबी प्रक्रिया के बाद बोस्निया में यातना शिविर चलाने और हिंसा के लिए 21 सर्ब सैनिक कमांडो को दोषी पाया गया। न्यायालय ने कहा कि 'ओम्सिका कैंप में स्त्रियों को बंधक बनाया गया, बलात्कृत कर जान से मारा गया। कइयों को बुरी तरह पीटा और अन्य बर्बर ढंग के बर्ताव किए गए।" न्यूयार्क में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की विशेषज्ञ रोंडा कोंप्लोन का मानना था कि स्त्रियों की अनुमति/सहमति के बिना ऐसे मामलों में उनकी पहचान को सार्वजनिक करना गलत है। बोस्निया की मुस्लिम बहुल आबादी में ऐसी स्त्रियाँ बहुत कम थीं, जो आरोपियों को पहचानने के लिए आगे आईं।

बोस्निया युद्ध हिंसा की शिकार अधिकांश स्त्रियों को न्याय नहीं मिला। कुछ मर-खप गईं और कुछ दूसरी जगहों पर बस गईं। युद्ध में शक्ति प्रदर्शन, लिंग विशेष के प्रति संचित घृणा ही बलात्कार जैसे कृत्यों में परिणत होती है। बलात्कार और यौन हिंसा एक तरह की 'युद्ध रणनीति' है, जिसके लिए कठिनतम और कठोर दंड का प्रावधान जब तक नहीं होता तब तक बलात्कार के शिकार बच्चों, स्त्रियों या अन्य किसी भी व्यक्ति को न्याय नहीं मिल सकता। युद्धकालीन यौन हिंसा की ओर से आँखें मूँदे रखना अधिकांश देशों की अघोषित राष्ट्रीय रणनीति है, लेकिन कागज पर विश्व के तीन चौथाई देशों ने युद्ध के दौरान यौन-हिंसा को खत्म करने के लिए 'डेक्लरेशन ऑफ कमिटमेंट टू सेक्सुअल वायलेंस इन कॅानफ्लिक्ट्स' पर दस्तखत कर रखे हैं।

लौटने के पहले बोस्निया के ल्युकोमीर गाँव की तरफ हम घूमने गए हैं, कहा जाता है कि यह यूरोप में सबसे ऊँचाई पर बसा हुआ गाँव है जहाँ आज भी आदिम सभ्यता सुरक्षित है। बिजली और आधुनिक उपकरणों के बिना जीवन-यापन आराम से हो रहा है। इसमें मेरे लिए आश्चर्य वाली कोई बात नहीं क्योंकि भारत में आज भी कई गाँव बिजली जैसी सुविधा से वंचित हैं। लिलियाना मुझे घुमाने में थक गई है, मेकअप की गहरी परत के भीतर छिपा विषाद उसके चेहरे पर दिख रहा है। पूरे रास्ते उसने मेरा कंधा पकड़ रखा है। शायद सब कुछ कह देने के बाद मनुष्य कमजोर हो जाता है। रवींद्रनाथ ने अंतिम यूरोप यात्रा से लौटकर शांतिनिकेतन में कहा था - 'आमि ओई खाने कंठ ता हारिए ऐशेछी' - आज समझ पाई हूँ कि रवि बाबू यूरोप जाकर अपना गान भूल क्यों गए होंगे। क्रोएशियन हाइकू कवि और पेशे से डॅाक्टर तोमिस्लाव मारेतिच जाग्रेब आए हैं। उन्हें मैंने बोस्निया यात्रा-वृतांत के कुछ टुकड़े सुनाए हैं। बड़ी देर चुप रहने के बाद इटली से मिहिनो का भेजा स्कॅार्फ मुझे देते हुए दोस्ताना पेशकश करते हैं - "नेमोज्ते पिसाती ओवो। ने ओब्जाविती ओवो" (कृपया मत लिखो इसे। प्रकाशित मत करो) मैंने मुस्कराकर क्रोएशियन ढंग से सिर हिला दिया है। छपाने न छपाने के द्वंद्व में तीन वर्ष गुजर गए हैं। सन 2010-2011 की प्रवास दैनंदिनी अब मुक्त हुई है। स्वच्छंद उड़ान के लिए। मित्र की बात न रख सकी, इसका अफसोस है। डायरी के पन्ने सुधारते-सुधारते हर सुबह गुरुदेव गुनगुना जाते हैं -

'अंध जने देहो आलो
मृत जने देहो प्राण
तुमि करुणामृत सिंधु
करो करुणादान
जे तोमाए डाके नहीं
तारे तुमि डाको, डाको...'

(दृष्टिहीन को प्रकाश दो, मृत देह को दो प्राण, तुम करुणा अमृत के सागर हो करो करुणा का दान। जिसने तुम्हें पुकारा नहीं उसे भी तुम पुकारो - 'गीतवितान')

टेलीविजन पर बीबीसी वर्ल्ड चल रहा है। युद्ध के दौरान यौन हिंसा के विवरण जुटाने और जाँच करने के बारे में विलियम हेग और एंजेलिना जॅाली द्वारा शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का प्रारूप प्रसारित हो रहा है -

"हम सभी देशों से अपील करेंगे कि वे बलात्कार और यौन-हिंसा संबंधी अपने कानूनों को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप बनाएँ। हम सभी सैनिकों और शांति रक्षकों के उचित प्रशिक्षण की माँग करेंगे ताकि वे युद्ध क्षेत्र में यौन-हिंसा को समझ और रोक सकें। शरणार्थी कैंपों में रोशनी के प्रबंध से लेकर जलावन एकत्र करने बाहर जाने वाली महिलाओं के साथ रक्षाकर्मी के जाने जैसे साधारण उपायों के जरिए हमले की संख्या में भारी कमी लाई जा सकती है और हम चाहते हैं कि ये आधारभूत सुरक्षा उपाय सार्वभौम हों।"

 

( * ' बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा ' - ओ कृष्ण तुम अगले जन्म में राधा बनना - बाउल गीत की पंक्ति)

( क्रोएशिया प्रवास के दौरान ( 2010-2011 : दो अकादमिक सत्र) तक जाग्रेब वि.वि. के दर्शन विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर प्रतिनियुक्ति के दौरान लिखा गया यात्रा वृत्तांत)


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