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वैचारिकी

इन्सान के विराट का जयघोष - उपन्यास
कृष्ण किशोर


एक नई सभ्यता की तरह उपन्यास का उदय हुआ। लेकिन कोई भी सभ्यता एकदम किसी घटना की तरह घटित नहीं होती, सदियों की सामूहिक और समुचित स्मृति हमारी चेतना में बहती रहती है। किसी ख़ास प्रक्रिया के तहत वक्त का चेहरा कुछ और लगने लगता है। इन्सानी कल्पना और अनुभव करने की किसी उद्देश्यहीन उत्कट आकांक्षा का सीधा प्रतिफलन उपन्यास बना। जिस मुक्ति भाव से सराबोर होकर उपन्यास की कलात्मक व्यापकता का स्वप्नबोध पैदा हुआ, वह मानवतावादी आंदोलन और पुनर्जागरण का अत्यन्त स्वाभाविक परिणाम था। उद्योग क्रांति, फ्रांस की क्रांति, विज्ञान की चमत्कारिक घोषणाएं इसी व्यक्ति स्वतन्त्रता और साहस का परिणाम थे जिन्हें घटित होने में इसके बाद लगभग एक सदी की प्रतीक्षा करनी पड़ी। यह प्रतीक्षा भी कोई रिक्त समयांश नहीं था। अगोचर अपनी प्रक्रिया में सतत्‌ था।

अभी सत्रहवीं सदी का आरम्भ ही था। कई तरह से महत्वपूर्ण समय का आभास होने लगा था। 1605 में Miguel de Cervantes (मिगेल सर्वेन्तीज़) के उपन्यास Don Quixote (डॉन किहोते) ने एक बृहत भूमिका ही नहीं निभायी, एक वास्तविक सरंचनात्मक आधार भी दिया। उपन्यास विधा ने तब से आज तक इन्सान की भीतरी और बाहरी दुनिया को इस तरह उजागर किया है जैसे हर सांस शब्दों में दर्ज हो गई हो। हर वासना अपने पूरे उत्सव और व्यापार के साथ उपन्यासों की रेखाओं में उतर गई। प्रेम, ईर्ष्या, जन्म, मृत्यु, उत्सर्ग, आदर्श, बन्धन, साहस, बलिदान, इतने अलग अलग तरह सब कुछ प्रकट हुआ कि आज किसी भी चीज़ को परिभाषित करना केवल औपन्यासिक प्रयत्न के इलावा कुछ नहीं रह गया लगता। जीने की इतनी दिशाएं खोली हैं उपन्यास विधा ने कि प्रश्न चिन्ह कोई नहीं।

इन्सानी खोज का रास्ता विचार से उपन्यास और उपन्यास से विचार की ओर खुलता रहा। बाहरी और भीतरी दुनिया को समझने और बेहतर बनाने के लिए जितने आयाम दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों और इतिहासकारों ने खोजे, उन सब की परीक्षण स्थली उपन्यास बना। हर नए विचार को जीवन की तरह जीने का माध्यम उपन्यास बना। फ्रायड की मान्यताओं को विस्तृत धरती मिली उपन्यासों में। कीर्कगार्द के अस्तित्ववादी दर्शन को आकाश मिला उपन्यासों में। मनोवैज्ञानिकों की अचेतन और अवचेतन की सैद्धांतिक वायविकताओं को एक वास्तविक ठोस सत्य की तरह जीवित किया उपन्यासों ने। सच तो ये है कि दर्शनों और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की कच्ची मिट्‌टी उपन्यासों ने ही तैयार की थी। डेस्कार्टीज़, काँट, हीगेल, फिर मार्केस सब हमारे उपन्यासों में अपनी मानवीय तरलता प्राप्त करते हैं। केवल नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विचारों की कार्यशाला ही नहीं हैं ये उपन्यास, बल्कि सब विचारों को परखने की एक यथार्थवादी कसौटी भी उपन्यासों में मिली।

पुनर्जागरण वास्तव में नवजागरण था जो ईसा पूर्व के समय को जादुई छड़ी से उकेर रहा था। इस प्रक्रिया में ज़िन्दगी और मौत के अर्थ बदले। आकाश से यह सम्बन्ध विच्छेद था और धरती से जुड़ना था। मौत अपने असली अर्थ में प्रकट हुई। इस धरती का जीवन पहली बार बाद के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण बना। ईश्वर के अस्तित्व में अविश्वास का पूर्वाभास पैदा हुआ। नीत्शे द्वारा ईश्वर की मृत्यु की घोषणा (सन्‌ 1883) के लिए उपन्यास को उन्नीसवीं सदी का इंतज़ार नहीं करना पड़ा। कथा साहित्य से बहुत अलग एक समयव्यापी आयाम था जो मानवीय आंदोलनों और आज़ादी से पैदा हुआ। शायद पहली बार अपने से बाहर किसी भी और शक्ति से नियंत्रित न होने के अहसास ने आसमान की तरफ़ देखने का अर्थ ही बदल दिया। व्यक्ति की जन्म से मिले अधिकारों से मुक्ति, सत्ता में अविश्वास आदि बाद के सघन दर्शन हैं जो पंद्रहवी-सोलहवीं सदी के मानवतावादी आंदोलन के वातावरण से प्रस्फुटित हुए, पनपे और तरह तरह के आकारों में प्रकट हुए। मानवतावादी आंदोलन से सम्पृक्त फ्रांस की क्रांति, मार्क्स का दर्शन और गोर्की का साहित्य सब बाद की घटनाएं हैं।

कविता और नाटक अपने पूरे कलात्मक सौंदर्य के बावजूद भी तब तक इन्सान की मूल स्वतन्त्रता का घोष नहीं थे। वे कहीं न कहीं ईसाईयत या नृप व्यवस्था से प्रभावित होते ही थे। पहली जयघोषणा शायद मिगेल सर्वेन्तीज़ का 'डॉन किहोते' ही थी। विस्तार महत्वपूर्ण नहीं है। साहसिक खोज महत्वपूर्ण है। ऊबड़ खाबड़ स्थलों, प्रदेशों और फैलावों में बिखरते सिमटते हुए अपनी अपूर्ण यात्रा में घटित होता है उपन्यास। दृष्टि कभी होती है, कभी नहीं। कभी दृष्टि की सिर्फ़ खोज होती है। इस यात्रा के दोनों सिरे जुड़े़ होते हैं अनुभव से। और यात्रा का बीजमन्त्र होता है - साहस, कल्पना और दृष्टि। इन्हीं तन्तुओं से कहीं बुना, कहीं उधड़ा रहा तथाकथित पहला उपन्यास 'डॉन किहोते'।

सर्वेन्तीज़ एक प्रस्थान बिन्दु की तरह जमे हुए हैं अपने से पहले की मध्ययुगीन संस्थाओं और उन से जुड़ी परम्पराओं से। 'डॉन किहोते' उस मध्ययुगीन आकाश से टूट कर धरती पर आ गिरने जैसी घटना थी। धार्मिक मानसिकता, मृत्यु, पाप-पुण्य जो ईसाईयत की रीढ़ की हड्‌डी थे, उन सब को अनदेखा करते हुए सर्वेन्तीज़ ने उस समय के भूमिपतियों, फ्यूडल लार्डज़ को जो समाज के अधिपति भी थे और राजनीति की लाठी भी - सब को ऐसी हास्यास्पद स्थिति में ला खड़ा कर दिया कि उस समय के पाठक को ऐसे हर्ष और आश्चर्य का अनुभव हुआ जो उस समय के लिए अप्रत्याशित भी था और उस स्वीकृति में सामाजिक साहस भी था। यह अनुभव संसार रचना या इसे स्वीकार करना दोनों ही उस समय की उपलब्धि थे। नाईट्‌स के साहसिक करतबों, दुर्गों, उनकी सेनाओं, यात्राओं, युद्धों, प्रेमिकाओं, मायाजालों, जादुओं के तिलिस्म को एक निहायत मसख़री दुनिया में तब्दील कर दिया सर्वेन्तीज़ ने। शहज़ादियों, किलों और उनके ईद-गिर्द बुने जादुओं को इस तरह हवा से उछाल कर नीचे गिरने दिया है कि इस तमाशे पर लोग तालियां बजा उठे। नाईट्‌स का गुणगान तो शेक्सपीयर के नाटकों में भी बहुत है। पर डॉन किहोते में बने उनके तमाशे के बाद उनके गुणगान की महत्ता समाप्त प्रायः हो गई। Le Morte d' Arthur जैसी रचनाओं का समय हमेशा के लिए समाप्त हो गया। जैसे एक पुराण काल की समाप्ति थी यह।

सर्वेन्तीज़ के समकालीन अपने लेखन को गौरव मण्डित करने के लिए तरह तरह के औजार इस्तेमाल करते थे। बड़े-बड़े और प्राचीन लेखकों, दार्शनिकों के हवाले देना, उन को उद्धृत करना, उद्धरणों को फुटनोट्‌स से स्पष्ट करना इत्यादि। दूसरे लेखकों या प्रभावशाली व्यक्तियों से अपनी प्रशंसा में सॉनेट्‌स लिखवा कर कृति के आगे प्रमाणसूत्र की तरह प्रकाशित करना आम बात थी। सर्वेन्तीज़ ने प्रीफ़ेस में इसका बड़ा गम्भीर उपहास किया है। प्रीफ़ेस भी एक कथा की तरह हो गया है। एक नाटकीय अन्दाज़ है। उपन्यास पूरा होने के बाद सर्वेन्तीज़ हतोत्साह होकर बैठ जाने का नाटक करता है, कोहनी मेज़ पर टिका कर हथेली पर मुंह गाड़े सोच में पड़ जाता है। अपनी हीनता का नाटक करते हुए सोचता है - ऐसी पुस्तक का क्या फ़ायदा जिसमें नए पुराने विद्वानों के नाम या उद्धरण न हों। जिसमें फुटनोट्‌स की भरमार न हो। आखिर एक मित्र को बुलाता है। मित्र उसे ढांढ़स बन्धाता है। इस भूमिका का एक अंश यहां देना अप्रासंगिक नहीं होगा। आखिर हम एक महत्वपूर्ण जन्म की बात कर रहे हैं। मित्र सर्वेन्तीज़ की हताशा दूर करते हुए कहता है, ''आओ, अब हम उन लेखकों और संदर्भों की बात करते हैं जिन्हें तुम अपने लिए चाहते हो। इसका इलाज बहुत सरल है। तुम कोई ऐसी किताब देखो जिसमें उन सब की कोटेशनज़ हों। उनमें से कुछ तुम अपने लिए चुन लो।... यह लम्बी सूची तुम्हारे ज्ञान की शक्ति तो दर्शाएगी ही चाहे उसकी ज़रूरत तुम्हारी किताब में नहीं है।... क्योंकि तुम्हारी किताब तो शुरू से आखिर तक इन नाईट्‌स सम्बन्धित कहानियों पर एक आक्रमण है। ऐरिस्टोरल ने तो उसका सपना भी नहीं लिया था। सेन्ट बेसिल और सिसरो ने तो एक शब्द भी उनके बारे में नहीं कहा था। फिर कोई तुम धार्मिक उपदेश नहीं दे रहे हो जहां मानव और दैवी तत्वों को घुला मिला दिया जाता है। किसी भी रचना को केवल प्रकृति या मानव स्वभाव के सत्यों का ही प्रयोग करना चाहिए। .... तुम्हें केवल अपनी शैली, अपने आख्यायन को संगीतमय और सुखद बनाना है। ऐसा बनाना है जिसमें सादगी, स्पष्टता और तथ्यपरकता हो। शब्दों का सही प्रयोग हो अपने स्थान पर। अपनी पूरी शक्ति से उद्देश्य की ओर बढ़ते हुए तुम्हें ऐसे अन्दाज़ में कहना है कि सब की समझ में आ जाए। जिस में कोई भी छद्म या जटिलता न हो। ये भी कोशिश करो कि तुम्हें पढ़ कर पाठक की निराशा और उदासी हंसी में बदल जाए.... साधारण लोग इसे पढ़ कर परेशान न हों, समझ बूझ वाले रचना की प्रशंसा करें और गंभीर लोग इससे घृणा न करें। अन्त में सब से महत्वपूर्ण बात यह कि इन सब Books of Chivalry के विशाल भवन को नष्ट करना ही तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य है। इसे कभी नज़र से ओझल मत करो। अगर तुम ऐसा करने में सफल हो गए तो यह कोई छोटी सफलता नहीं होगी।'' सर्वेन्तीज़ की इस नाटकीय भूमिका ने उन नाईट्‌स के ग्लैमर को ही ध्वस्त नहीं किया बल्कि लेखन के मूल शक्ति स्रोत को भी रेखांकित किया।

और डॉन किहोते शुरू होता है La Mancha गांव के एक बड़े ज़मींदार की कथा से जिसने नाईट्‌स से संबंधित साहस और प्रेम की कहानियां पढ़ पढ़ कर अपना दिमाग़ खराब कर रखा था। उसने एक साधारण किसान के साथ घर से निकलकर बहादुरी और प्रेम के वे कारनामे किए, जिन्हें एक दक्ष विदूषक ही कर सकता है। इस Knight बने हुए ज़मींदार की यात्राएं, खड़गयुद्ध, काल्पनिक शहज़ादियां, किले वगैरह के महामानवीय करतबों के बाद अपने घर लौटना, दूसरे भाग में घर पहुंच कर अपनी सारी किताबों का नष्ट हुआ पाना और फिर मृत्यु। यहां सारे औपन्यासिक औज़ार प्रयोग हुए मिलते हैं, इन सब स्थितियों का मज़ाक उड़ाने के लिए। फैंटेसी मुख्य रोल अदा करती है। गंभीर मसखरी माध्यम बनता है यह उद्देश्य प्राप्त करने का। पूरी तरह साधारण इन्सान ही उपन्यास में हीरो है। दूसरे साधारण लोग भी अपनी अतिशयता में भी अपनी वास्तविक स्थितियों तक पहुंचने को बाध्य हैं। इंसानी ऊर्जा, कल्पना, स्वप्नशीलता, आदर्श, ऊबड़ खाबड़ साहस की आज भी बेजोड़ मिसाल है मिगेल सर्वेन्तीज़ का 'डॉन किहोते'।

शेक्सपीयर सर्वेन्तीज़ के वरिष्ठ समकालीन थे। दोनों ने बिना एक दूसरे को जाने इन्सानी चरित्र को पहली बार स्वायत्तता प्रदान की। शेक्सपीयर में बाहरी परिस्थितियां चारित्रिक त्रुटियों का परिणाम मात्र हैं। नायक की चारित्रिक त्रुटियां या शक्तियां ही एक तर्कसंगत परिणाम लेकर सामने आती हैं। चरित्र और परिस्थितियों के टकराव का परिणाम कर्ता और दृष्टा दोनों भुगतते हैं। साफ़ दिखता है कि किंग लियर का हश्र यही होना था। उपन्यास विधा के जन्म के पहले इन्सान के भीतरी उपकरणों को इस्तेमाल करने वाला कृतिकार शेक्सपीयर ही है।

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कुछ भी नियमित-अनियमित कर सकने की स्वायत्तता, अपनी पूर्ण स्वछन्दता-अराजकता की हद तक भोगने, जीने मरने की आज़ादी, उपन्यास की पहली शर्त है। आज उपन्यास का अर्थ केवल एक विधा के माध्यम से अधिक अपनी औपन्यासिक प्रवृतियों में उजागर होता है। परिस्थितियां, परिवेश, पात्र, कथ्य, शिल्प, भाषा, दृष्टि, दर्शन, का विस्तार औपन्यासिक होता है अपने कलेवर की सीमाओं से मुक्त। हमारे अवचेतन में तो गद्य और पद्य दोनों अपनी तरलता में एक रूप हो जाते हैं। भाषा का आकार और अभिव्यक्ति की विधा केवल अपने प्रभाव में उजागर होती है। इसीलिए उन तमाम कथाओं को जो सैंकड़ों साल पहले पद्य में लिखी गईं थी, आज हम मुख्यतः गद्य में कहने सुनने और आत्मसात करने के आदी हो गए हैं। उनका कथानक हमारी अपनी भाषाओं की मानसिकता में ही अपना अर्थ ग्रहण करता है। एक मानसिक अनुवाद मात्र भाषा का ही नहीं है, विधा का भी है। इसीलिए प्राचीन रचनाएं हमारे बीच उसी तरह जीवित हैं। महाकाव्य अपनी औपन्यासिक उपस्थिति दर्ज करते हैं। हालांकि उनमें उपन्यास का अनिवार्य तत्व 'मनुष्य केन्द्रिता' अनुपस्थित है, फिर भी समयांकन, कथा तथा पात्रों की जीवन्तता हमारे लिए औपन्यासिक आर्कषण लिए हुए है। काव्य केवल उन की रचना का स्वरूप है। काव्य जनमानस तक पहुंचने का एकमात्र साधन था उन समयों में। गद्य या पद्य का माध्यम केवल आवरण का अन्तर है। असली बात वस्तु तत्व की रह जाती है।

उपन्यास थीम चाहे कुछ भी हो, लेकिन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक संस्थाओं के माध्यम से इन्सानों की उपस्थिति हर तरह वहां दर्ज होती है। वे मर्यादाओं और नियमों की कठपुतलियां मात्र नहीं होते। उनके आन्तरिक संसार भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने उनके बाहरी क्रिया कलाप। चेतन और अवचेतन के धरातल तरह तरह से सामने आते हैं। व्यवहारों और विचारों की गुत्थ्यां पाठक के सामने उलझती सुलझती हैं। अपनी मान्यता वे पाठक की स्वीकृति में ही पाते हैं। हमारे प्राचीन काव्य इस पाठक-स्वीकृति की सारी प्रक्रिया से वंचित हैं। वे श्रोता को मात्र एक ठोस पदार्थ परोसते हैं। सब कुछ बना बनाया। उसे एक मूल्य के रूप में श्रोता स्वीकार करता है। साहित्य एक ऐसी धार्मिक, सामाजिक विधा थी जिसमें समाज का कोई अवदान नहीं, आवाजाही नहीं। एकतरफ़ा रास्ता था। दूसरी बात है संघर्ष के मुद्दे। किन बातों और किन लोगों का संघर्ष। किस लिए संघर्ष। हमारे प्राचीन साहित्य में संघर्षों के कारण कोई बड़े मानवीय इन्सानी सरोकार कभी नहीं रहे। वही राज्य, धरती, स्त्री और उच्चवर्गीय मान मर्यादा ही संघर्षों का स्रोत रहे। कलात्मक ऊंचाईयां और दार्शनिक शिखर उन्हीं स्थितियों, परिस्थितियों और नियतियों को महामण्डित करती हैं। जनसाधारण की स्थितियां सिर्फ़ उनके समर्पण में हैं। जनसाधारण के संघर्ष, आपसी सम्बन्ध, प्रेम, घृणा, सपने, निराशाएं, प्रयत्न, दोस्ती, आकांक्षाएं - कहीं कुछ दिखता ही नहीं। बस यही उन महाकाव्यों और उपन्यास का अन्तर है। बहुत कुछ उपन्यास जैसा उनमें होते हुए भी वे उपन्यास नहीं हैं। पद्य और गद्य का अन्तर कुछ महत्व नहीं रखता। विषय वस्तु का अन्तर है।

उपन्यास के साथ एक विशेष सचेतन अर्थ जुड़ गया है और वह है - मनुष्य की स्वायत्ता। प्रत्येक मनुष्य की अलग अलग गरिमा, अस्तित्व, निश्चय-शक्ति, अपनी स्थितियां और नियति चुनने का एकल अधिकार, अपनी प्रेरणाओं और प्रवृतियों का आत्म प्रबन्धित विकास और प्रसारण, अपने ही भीतर निहित सर्वशक्तिमत्ता। मर्यादाओं से नपी तुली, परोमुखी जीवन नियमावलियां नहीं। अपनी कल्पनाओं को शारीरिक और भौतिक स्तर पर निरंकुश जीने मरने की आदिम तथा आधुनिक आत्म-संस्कृति और आचरण स्वतन्त्रता। उपन्यास ने इन्सान को ऐसी मुक्ति का सुख दिया है जो हमारे पहले के दर्शनों, काव्यों, श्रुतियों, स्मृतियों तथा अन्य भाष्यों ने नहीं दिया। संगीत, उपासना, नृत्य और आध्यात्मिक अनुभवों की विशिष्टता बिल्कुल अलग बात है।

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उन्नीसवीं सदी के साथ ही अलग तरह की इन्सानी समस्याओं का पूर्वाज्ञान शुरू हुआ। उपनिवेशीकरण, औद्योगिक प्रक्रिया और वैज्ञानिक अविष्कार मिल कर दुनिया को बांट रहे थे। सदियों पुरानी इन्सान की पहचान खत्म हो रही थी। सम्पन्नता जो वासनाएं और जिज्ञासाएं जगा रही थी, उनका सही स्वरूप समझने की आवश्यकता थी। गरीब और अमीर पहले भी थे, लेकिन इस तरह का आक्रामक अलगाव सामने आना पहली बार शुरू हुआ। शरीर को लेकर ऐसा भाव बोध जन्म ले रहा था जो नई नैतिक चुनौतियों के साथ सामने था। दैनिक स्तर पर स्पष्ट टकराहट शुरू हुई। व्यवस्थाओं की क्रूरता इस तरह पहले सर्वविदित नहीं हुई थी। ग़रीब अपनी ग़रीबी के कारण समझकर उन से घृणा करने लगा और अमीर उनको आडम्बरों से ढकने लगा। एक व्यक्तिगत निश्चय के रूप में परिवार का आधार और आकार बदलने लगा। यौन उत्सुकताएं अपना अर्थ और उद्‌गम ढूंढने लगीं। साथ ही व्यक्ति इतना आत्मविभोर पहले कभी नहीं हुआ था। आत्मछवि अब बाहर के क्रिया कलाप से निर्धारित न होकर अपनी सन्तुष्टियों असन्तुष्टियों और भीतरी पहचान से नियन्त्रित होने लगी। हर स्तर पर पिछली दुनिया के साथ एक जंग छिड़ गयी। यथास्थिति की असहायता का स्वरूप सामने आया।

हालांकि John Ruskin की प्रखर आर्थिक सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित महत्वपूर्ण कृति Unto the Last 1860 में प्रकाशित हो गई थी। मार्क्स का Das Kapital भी सन्‌ 1867 में आ चुका था। पर दर्शन को एक व्यवस्थित प्रभाव का आभास ग्रहण करते हुए निश्चित ही कुछ समय लग ही जाता है। जनमानस में उसकी भावभूमि तैयार करने का महत्वपूर्ण काम डिकेन्ज़ जैसे साहित्यकारों का ही रहता है। रस्किन और मार्क्स के इन ग्रन्थों के कुछ वर्ष पहले डिकेन्ज़ के महत्वपूर्ण उपन्यास छप चुके थे। लेकिन समाज की तस्वीर सामने रखना ही काफ़ी नहीं है। उनके कारणों में जाना भी ज़रूरी है जिन से मानवस्थितियां पैदा होती हैं और हर तरह के इन्सानों की ज़िन्दगी उनकी अभिव्यक्ति का कारण बनती है। सामाजिक चिन्तकों और उपन्यासकारों ने लगभग समानान्तर इस चुनौती को स्वीकार किया।

शहरों में कीड़े मकौड़ों की तरह रोज़ी रोटी की तलाश में आए लोगों का, सड़क के किनारे पड़ी इन्सानी ज़िन्दगी का, कल कारखानों में चूरा होते मज़दूरों का, चोरों, भिखारियों, वेश्याओं, अमीरों का यानी जीवन को जहां जहां उस शहरी समाज में ढूंढा, देखा जा सकता था, डिकेन्ज़ ने पहली बार उसका चित्रण किया था। अपने उपन्यासों डेविड कॉपरफील्ड, ब्लीक हाऊस, हार्ड टाईम्स, ग्रेट ऐक्सपेक्टेशनज़ और टेल ऑफ टू सिटीज़ में इतने पात्रों, कथाबिम्बों, स्थितियों का यथार्थपरक, व्यंग्यात्मक भी और भावुक भी - ऐसा चित्रण किया है कि शरणस्थली कोई नहीं। यतीम बच्चों को एक स्टॉक और शेयर बाज़ार कहना, लोगों को कुर्सी मेज़ कहना, इत्यादि उसी यातना की अभिव्यक्ति थी जो डिकेन्ज़ ने स्वयं जीवन में भोगी थी। अतिभावुकता का दोष उन्हें दिया जाता है। लेकिन स्थिति से बाहर खड़े हुए मात्र दृष्टा में और यातना की जद में आए हुए भोक्ता के स्वयं अपनी स्थिति को बयान करने में जो अन्तर होता है, उसे ही अक्सर ऐसे स्थलों की भावुकता कहा गया है। डिकेन्ज़ के अति व्यंग्यात्मक होने में भी भावुकता की आंच लोगों को महसूस हुई है। सपाट बयानी का दोष भी उन पर आया। डिकेन्ज़ में वर्णनों की भरमार है जो बाद के लोगों को कलात्मक नहीं लगी। पहली बार समाज का चित्रण डिकेन्ज़ कर रहे थे और उनका उद्देश्य भी स्पष्ट था। जिन लोगों तक बात पहुंचनी चाहिए और जिस अस्त्र का प्रयोग होना चाहिए, उसमें डिकेन्ज़ भरपूर सफल रहे। लोग अपनी दुर्गति को साफ़ देखें और जो पीड़ा के आदी होकर चुप हैं, उन्हें पीड़ा सिर्फ़ दिखे ही नहीं, महसूस भी हो - ऐसी अभिव्यक्ति कितने कलात्मक सौंदर्य की मांग करती है, यह वे लोग भूल जाते हैं। जो लोग इन स्थितियों के ज़िम्मेदार थे, वह उसी तरह सब को दिखें जैसे बे Bos (डिकेन्ज़ का मित-सम्बोधन) को दिखते थे। ऐसा व्यंग्य भी पीड़ा को पचाए बगैर संभव नहीं है। चरित्रों के नाम भी क्रूर स्थितियों जैसे हैं। डिकेन्ज़ को अपने जीवन में ही भरपूर लोकप्रियता मिल गई थी। सरकार को जिस तरह उन्होंने अकेले प्रभावित किया, उस समय की राजीनति ने भी नहीं किया।

डिकेन्ज़ में औद्योगीकरण से पैदा हुई पूंजीवादी व्यवस्था के साथ साथ विशिष्ट राजनीतिक दृष्टि भी है। फ्रांस की क्रांति के परिणामों और कारणों - दोनों को ही वे लंडन और पेरिस की स्थितियों में झलकता हुआ देखते हैं। Tale of Two Cities अंग्रेज़ी भाषा का सबसे अधिक प्रकाशित होने वाला उपन्यास है। अब तक इसकी 20 करोड़ प्रतियां प्रकाशित हुई हैं। फ्रांस की क्रांति (1789) के पहले और बाद का सफ़ेद और काला धुंआ, इन दोनों शहरों के किसानों, मज़दूरों की, रजवाड़ों और जमींदारों - (Aristocrats) के हाथों दुर्दशा और फिर क्रांतिकारियों द्वारा तमाम सहज मानवीय मूल्यों और सहानुभूतियों का अतिक्रमण - इन सब का चित्रण डिकेन्ज़ की उसी राजनीतिक दृष्टि का परिचायक है जो सामूहिक मानव आचरण को आरम्भ से अन्त तक निष्पक्ष होकर परखती है। यहां भी वही ऊर्जा है जो सृजन और विनाश के सम्बन्ध की अनिवार्यता को आचरण की अराजकता और बौद्धिक विसंगतियों से जोड़ कर देखती है। डिकेन्ज़ हालांकि बौद्धिक विश्लेषण में नहीं पड़ते। लेकिन इन्सानी व्यवहारों के उद्‌गम स्थलों की जांच पड़ताल वे अपने उस अनुभव के औज़ारों से ही करते हैं जिस से उन की अपनी ज़िन्दगी तराशी गई थी। उपन्यास का माहौल वातावरण को जिस तरह रुंधासता है, उसका चित्रण इतिहास दृष्टि की वक्रता भी है और जनोन्मुख प्रक्रिया भी।

''It was the best of times, It was the worst of times.''

जैसी पंक्तियां, जिन से उपन्यास शुरू होता है, कितनी बार और कितने समयों के लिए कही जा सकती हैं। शायद इतिहास में ऐसे समय इतने कम हैं कि उन्हें उनके व्यक्तिगत नामों से पुकारा जा सकता है।

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ऐसा ही एक वक्त भारत में भी आया था जब आज़ादी बहुत दूर नहीं थी। लेकिन कितनी दूर है, यह दिखता नहीं था। ऐसे समय में उसी दृष्टि और संवेदना से लैस होकर प्रेमचन्द उत्तर भारत में लिख रहे थे। डिकेन्ज़ शहर में आकर सबके सामने उघड़ी पड़ी ज़िन्दगी को और ज़्यादा उघाड़ रहे थे और प्रेमचन्द अपने उन गांवों की दुर्दशा का अंकन कर रहे थे जो देश की टूटी हुई रीढ़ की हड्‌डी की तरह थे। डिकेन्ज़ की तरह ही प्रेमचन्द का कोई सौन्दर्यभाव जनित कलात्मक उद्देश्य नहीं था। चरित्रों की मनस्थितियों के विश्लेषण में पड़ कर वे आग की सीधी लपक से दूर नहीं होना चाहते थे। वेदना उनके सामने थी, संवेदना उनके भीतर। दोनों के बीच कोई तीसरा जैसे आ ही नहीं सकता था। 'गोदान' के शुरू में ही होरी धनिया को जो कह गया, वह असहायता का अनायास वर्णन है। वह गांवों में सहज स्थिति थी। होरी के मालिक को मिलने जाने की जल्दी में उपन्यास शुरू होता है। होरी कहता है ''यह इसी मिलते जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है। नहीं, कहीं पता न चलता कि किधर गए। गांव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आई। किस पर कुड़की नहीं आई। जब दूसरे के पांवों तले अपनी गर्दन दबी हुई है तो उन पांवों को सहलाने में ही अपनी कुशल है।''

इसी तरह की समतल बयानियां इन पात्रों की बाहरी स्थितियों और भीतरी मनस्थितियों में कोई अन्तर नहीं रहने देतीं। अर्थों की कोई परतें यहां नहीं हैं जिन्हें कलात्मक जुगाड़ों से सुन्दर बनाने की कोशिश की जाए। किवाड़ खुलने पर भी वही दीखता है जिसकी कल्पना किवाड़ों के बाहर खड़े होकर की जाए। प्रेमचन्द ऐसे लिख रहे थे जैसे वे स्वयं गांवों में एक अप्रत्यक्ष चरित्र के रूप में हर जगह मौजूद हों। संवादों में हिस्सा लेते हुए, स्थितियों से गुजरते हुए, सफ़ाईयां देते हुए, जैसे कैसे अपना बचाव करते हुए, अपना अनिष्ट हर समय देखते हुए। यही स्थितियां उस समय हर गांव में थीं। कुछ पात्रों में विक्षोभ भी था, कसमसाई हुई आकुलता भी थी। स्थितियों का विरोध जहां नज़र आता है, उससे अधिक विद्रोह की संभावना का कोई विकल्प भी प्रेमचन्द नहीं रच रहे थे। उसके लिए बहुत कुछ बाहरी जोड़ना पड़ता जो उन गांवों की समस्यागत असहाय मानसिकता से मेल नहीं खाता। उसके लिए उन्हें और ही तरह की परिस्थितियों को शामिल करना पड़ता जो संभावनाओं के नाम पर कल्पित की जाती हैं। लोगों के सामने थे - ज़मींदार, रायबहादुर, पटवारी, तहसीलदार, कोर्ट कचहरी। अंग्रेज़ी कुटिल नीतियां कैसे इन सबको संचालित करती थीं, वह ग्रामीण जनता से बहुत दूर की चीज़ थी। उनके दुख अंग्रेज़ों की कुटिल नीतियों के परिणामस्वरूप थे, इसे देख पाना उन किसानों के लिए सहज और विश्वसनीय स्थिति नहीं थी। इसके अतिरिक्त अपने ही गांव गोठ की जात बिरादरी, संस्कार और परम्पराएं थीं जिनमें गरीब किसानों को डरा धमका कर रखने के लिए उतना ही विष था जितना सूदखोर ज़मीदारों, भ्रष्ट अहलकारों, हाकिमों और कचहरी के कारिन्दों में। इन्हीं बातों पर प्रेमचन्द का फ़ोकस था। ज़रा भी इस फ़ोकस से वे इधर उधर नहीं होना चाहते थे। राजनीतिक माहौल शायद इसीलिए उनके उपन्यासों में नहीं आया। वह भी अपने असली मुद्दे से उन्हें कुछ तो दूसरी तरफ़ ले ही जाता। वे इस गहनता को ज़रा भी ढीला नहीं पड़ने देना चाहते थे। पृष्ठभूमि में भी इस स्थिति के इलावा कुछ और नहीं। किसी क्लोज़ अप के लिए बैकग्राऊन्ड को ओझल करना पड़ना है। वे मटमैली धोती, बन्डी और गमछे पर सफ़ेद टोपी नहीं रखना चाहते थे। ज़्यादा कर्कश होकर कहा जाए तो वे जैसे वक्त के फैशन से बचकर अपने कैमरे से समय के सब से अन्धेरे कोनों को उजागर करते रहे।

अपने गांवों की छवि देने में प्रेमचन्द जितने सफ़ल हुए हैं, उतने उनके समकालीन या बाद के लेखक नहीं। केवल रेणु ही प्रेमचन्द के बाद एक आंचलिक परिवेश के माध्यम से इस कथा को बांच गए। उनका कलात्मक सौंदर्य और भाषा का जादू मिलकर कथा के अतल तक पहुंचता है। रेणु में परिवेश एक गन्ध की तरह व्याप्त है और स्मृतिकोष का हिस्सा बन जाता है। फिर भी उद्देश्य की सघनता प्रेमचन्द में ही ज़्यादा है। बाद के अधिकतर लेखक गांवों से दूर होते चले गए। विषयों के सीमित दायरों में सिमट गए। उनकी दृष्टि उद्देश्य की उस सघनता को नहीं पकड़ पाती जिस से पूरी तरह संपृक्त होकर लेखक अपने समय के दर्द को अक्षर अक्षर बांच रहा होता है। उस दर्द के पीछे किन शक्तियों का कितना हाथ है, वह बिना पूरी कथा बांचे भी दिख जाता है। ओंकारनाथ, दैनिक पत्र 'बिजली' के संपादक और रायसाहिब के बीच संवाद उस व्यवस्था की कीलपेंच तक पहुंचता है। रायसाहब का अपने सफ़ाई में लम्बा कथन दोनों तरफ़ का भंडाफोड़ है - ''आप को स्वदेशी-स्वदेशी चिल्लाकर विदेशी दवाओं और वस्तुओं के विज्ञापन छापने में शरम नहीं आती तो मैं अपने असामियों से डांड, तावान और जुर्माना लेते शरमाऊँ?...........हुक्काम को गालियां न दूं तो मैं बागी समझा जाऊं।'' सारा कथन उद्धृत करना संगत नहीं। यह लम्बी सफ़ाई बड़ी अर्थपूर्ण और बहुर्मुखी है। इसमें अतिरिक्ता कहीं नहीं। जहां पात्रों से हटकर लेखक स्वयं स्थितियां बयान करता है, वह ''नैरेशन'' के स्थल किसी भी विधा में कठिनाई पैदा कर सकते हैं। तालस्ताय और गैबरियल गर्सिया मार्केस इस कला के अद्वितीय सर्जक हैं। उनका 'नैरेशन' ही उनके प्रभाव की जान है। बड़े बड़े सत्य वहां उजागर होते हैं। प्रेमचन्द में भी ऐसे स्थल हैं, हालांकि कम हैं।

प्रेमचन्द के लगभग समकालीन उकलीद्‌स द कुन्या की एक अमर कृति OS Sertoes(1902) ''बैक लैण्ड्‌स में विद्रोह'' ब्राज़ील के अत्यन्त पिछड़े इलाके में किसानों द्वारा भ्रष्टाचार और नाजायज़ लगान के विरोध की कथा है। इस उपन्यास ने उस व्यापक स्तर पर अनचीन्ही घटना को सिर्फ़ ब्राज़ील के ही नहीं, सारे दक्षिण अमेरिका की स्मृति में अंकित कर दिया है। प्रेमचन्द के उपन्यासों में किसानों द्वारा अपनी दुर्दशा के विरुद्ध विद्रोह का यथार्थ और विकल्प 'प्रेमाश्रम', 'कायाकल्प' और 'कर्मभूमि' में आया तो है मगर उग्रता से नहीं। इनमें किसान अपने लगान की दर बढ़ाए जाने का विरोध करते हैं, लड़ते भी हैं, और हिंसा पर भी उतरते हैं। संभावनाएं बहुत थीं, लेकिन अंग्रेज़ सरकार के अतिरिक्त उस समय चल रहे राजनीतिक आंदोलन ने किसानों का साथ नहीं दिया। विद्रोह समझौतावादी प्रयासों का शिकार बन कर रह गया। राजनीतिक आंदोलन के उद्देश्य स्पष्टतः समझौतावादी थे। हालांकि सहजानन्द सरस्वती जैसे नेता भी थे, जिन्होंने 1929 में बिहार में प्रान्तीय किसान सभा स्थापित की और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा जिसमें राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, नम्बूदरीपाद, एन.जी.रंगा, राहुल सांकृत्यायन और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे दिग्गज नेता भी शामिल थे। 1934 में यानी 'गोदान' के प्रकाशित होने के दो वर्ष पहले बिहार के भूचाल पीड़ितों की सहायता के लिए सहजानन्द जी-तोड़ काम कर रहे थे। और ज़मींदार लोग लगान वसूली की सख्ती का ज़ुल्म कर रहे थे। सहजानन्द गांधी जी से मिले जो उन दिनों पटना आए हुए थे। गांधी जी ने उन्हें कहा, 'ज़मींदार लोग किसानों की मदद करेंगे, उनके कारिन्दे हमारे कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। इसलिए वे ज़रूर गरीबों की मदद करेंगे।' सहजानन्द सरस्वती ने उसके बाद गांधी जी से विच्छेद कर लिया। सहजानन्द का 'डण्डा मेरा ज़िन्दाबाद' और 'कैसे लोगे मालगुज़ारी, लठ हमारा ज़िन्दाबाद' (Walter Hauser, 1961) का नारा प्रेमचन्द के रचनात्मक उद्देश्यों की परिधि में नहीं आ पाया। मजबूरियों का चित्रण ही शायद प्रेमचन्द अधिक उद्वेलित करने वाली शक्ति मानते हों।

ऐतिहासिक दृष्टि से लैस होकर भविष्य को भी एक मूर्त यथार्थ की तरह साफ़ साफ़ देख पाने की सामर्थ्य का अभाव शायद प्रेमचन्द में नहीं था। वे स्वयं उन समकालीन गतिविधियों के जागरूक प्रहरी पत्रकार थे। लेकिन उनके साहित्यिक उद्देश्य को हम अपनी मान्यताओं के दर्पण में ही देखें तो निराशा होगी। उनका प्रभाव उन के उद्देश्य का आज सबसे बड़ा साक्षी है।

उक्‌लीद्‌स कुन्या के 'बैक लैण्ड्‌स में विद्रोह' का यह विधान अधिक सशक्त है। वहां एक साधु कांऊसलर अंतोनियो किसानों के विद्रोह को एक क्रांतिकारी आयाम देता है। उपन्यास में साधु अंतोनियो कहते हैं ''सचमुच, मैं तुम्हें कहता हूँ जब राष्ट्र के विरुद्ध राष्ट्र उठेगा, ब्राजी़ल के विरुद्ध ब्राज़ील, इंग्लैण्ड के विरुद्ध इंग्लैण्ड, पर्शिया के विरुद्ध पर्शिया, तभी समुद्र की गहराईयों से डॉन सिबैश्चियन अपनी सेना के साथ निकल कर बाहर तुम्हारी रक्षा को आएगा।''

यह साधु भी जैसे ऐतिहासिक और मिथकीय राजा सिबैश्चियन की तरह समुद्र की गहराईयों से निकल कर बाहर आया था। इस उपन्यास में भाषा एक चारित्रिक विशेषता के साथ स्थितियों का संवाहन करती है। एक विपक्ष की तरह स्थितियों के भीतर निहित कुतर्क को विज्ञप्त करती हुई जन संघर्ष को एक धार देती है। अपनी भाषिक भव्यता और क्षमता के लिए यह उपन्यास एक उपनिषदिक प्रभाव रचता है। यह कृति विश्व की साहित्यिक उपलब्धि मानी जाती है।

उन्नीसवीं सदी के अन्त में उकलीद्‌स के किसानों के ठीक समकालीन बिहार के घने जंगलों में रहने वाले मुंडा लोगों के विद्रोह की महागाथा अपने उपन्यास 'जंगल के दावेदार' में महाश्वेता देवी ने ऊष्ण आर्द्रता और उग्रता से उठाई है। यहां भी एक मुंडा युवक 'बीरसा' भगवान बन कर जंगल से उदय होता है। मुंडा लोगों को अपनी भूख प्यास बेरोज़गारी की शारीरिक मजबूरियों से मुक्त करके विद्रोह की मानसिक मजबूरी की स्थिति में ले आता है। दिव्यता एक कारक है उन लोगों का विश्वास अर्जित करने के लिए, ऐसा विश्वास जिसमें इन्सान अपनी भूख प्यास भूल जाए।

''रांची से रिपोर्ट गई, चालकाड़ और दूसरी दूर की बस्तियों में, गरीब मुंडा गांवों के लोगों के मन में भयानक रूप से असन्तोष भर गया है। मुण्डा लोग कुछ बात ही नहीं करते, जमींदारों और महाजनों की भी बात नहीं मान रहे हैं। खेत-मजूर मिल नहीं रहे हैं, बेगारी कोई देता नहीं। बिना खाए मरोगे, यह कहने पर मुण्डा जवाब देते हैं कि हम क्या दिकू हैं कि उपवास करने से, भोजन के न मिलने से डर जाएं? प्रदेश की सरकार ने जानना चाहा, ''दुर्भिक्ष तो प्रायः प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। मुण्डा लोग खाते क्या हैं?'' जवाब गया, ''घास के दानों का घाटो। जब मिल जाता है, खा लेते हैं! जब नहीं मिलता, नहीं खाते।''

बीरसा की गिरफ्तारी, उसकी यातना में भी दूसरों की रक्षा का ही अबूझ प्रयास और मरण पाठक की स्मृति में एक शिला की तरह स्थापित हो जाता है। मुंडा लोगों के भीतरी बाहरी जीवन की ऐसी झलक प्रस्तुत करता है यह सत्य आधारित उपन्यास कि इसे साहित्यिक दूरदर्शात्मकता की अनूठी कृति कहा जा सकता है।

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उपन्यास कला ने इतने दुख बीने हैं, इतने सुख बांटे हैं, इतने आश्चर्य हवाओं में उछाले हैं, इतनी नरम और कठोर धरती की रचना की है कि लगता है कि उपन्यास जीवन से बहुत बड़ा है या पूरा जीवन तो है ही। एक ही साथ, एक ही जगह न सही। अलग अलग हिस्सों में, समय कालों में, लगता है इन्सान ने अपना असली जीवन उपन्यासों में ही जिया है। जो हम खुद नहीं कर सकते, जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, जिसे जीवन में किसी भी तरह स्वयं भोग नहीं सकते, वही सब हमने उपन्यासों में भोगा है, किया है, कल्पित किया है। हमारे गोचर भी, अगोचर भी उपन्यासों में उद्धाटित होते हैं। और जीवन की तरह एक निरन्तरता है उपन्यास में। कोई भी उपन्यास खत्म नहीं होता। उपन्यास की समाप्ति चलते चलते एक स्थिति पर आकर रुक जाने से अधिक कुछ नहीं, हर उपन्यास समाप्त होने के बाद भी जारी रहता है। लेखक के मन में भी और पाठक के मन में भी। लेखक जब उपन्यास समाप्त करके उठता है तो यही सोचता है कि 'यह अभी समाप्त नहीं हुआ, बस मात्र आगे और लिखना बन्द हुआ है।' कहानी विधा की समाप्ति ऐसी नहीं होती। जहां कहानी समाप्त हो जानी चाहिए, वहीं कहानी समाप्त हो जाती है। लेखक भी महसूस करता है कि अब कहानी समाप्त हो गई है। पाठक को भी ऐसा लगता है, एक स्थिति थी जो समाप्त हो गई। कई कहानियां समाप्त होने का आभास नहीं रचतीं। उनका तर्क भी यही होता है कि कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। लेकिन एक स्थिति जिस तरह खत्म होती है, कहानी का समाप्त होना भी ज़रूरी होता है। कहानी चाहे कितनी भी लम्बी हो और उपन्यास चाहे कितना भी छोटा - यह और आधारों के अतिरिक्त इन विधाओं में एक महत्वपूर्ण अन्तर है। इस दृष्टि से काफ़्का की 'The Metamorphosis' एक लम्बी कहानी है और कृष्णा सोबती का 'मित्रो मरजानी' एक उपन्यास। काफ़्का के उपन्यास 'द ट्रायल' में स्थितियां प्रमुख हैं और K, के मरने के बाद वह स्थितियां जारी रहती हैं। लेकिन 'मेटामोरफोसिस' में ग्रेगर के मरने के बाद परिवार के लिए स्थिति पूर्णतः समाप्त हो जाती है। 'मित्रो मरजानी' के अन्त की स्थिति मित्रो के लिए पटाक्षेप नहीं है। दोनों अपने लघु कलेवर में ही अपना विधात्मक सत्य उजागर करते हैं।

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बीसवीं सदी के पहले दशक से ही एक संत्रास का वातावरण किसी न किसी रूप में लगभग हर जगह फैल रहा था और योरोप बाकी सारी दुनिया को जकड़े हुए था। बाल्ज़ाक, फ्लाबर्ट, एमिल ज़ोला और उन का Realism, Naturalism सब पीछे छूट गए थे। आज़ादी का स्वप्न भी उपनिवेशों की आंखों में उभर रहा था। जर्मनी में नाज़ियों की मदांधता आसपास के देशों को हड़पने की कोशिश में थी। यहूदियों के लिए इससे बुरा समय तब भी नहीं था जब रोमनों ने ईसापूर्व काल में उन पर जुल्म किए थे। केवल यहूदी ही नहीं, हर इन्सान दहशत में था। पहले विश्वयुद्ध का इतिहास सर्वविदित है। नाज़ियों की अपनी नस्ल और राज्यविस्तार की आकांक्षा सर्वविदित है। समाजवाद को साम्राज्यवाद बनने में भी अभी देर थी। उपन्यासों ने तब के समय को इस तरह रचा है जैसे उस समय की रचना उपन्यास की ही साज़िश हो। बाहर का अस्तित्व और संत्रास और उससे मुक्ति के प्रयासों की उपन्यास के भीतर और बाहर आवाजाही ऐसे बनी रही जैसे घर से निकलना और फिर घर लौटना। काफ़्का के The Trial (1925) से कामू के The Stranger (1942) तक की यात्रा एक कोहरे में दफ़्न घाटियों में यात्रा जैसी है। आंखों के सामने का कोहरा छंटता नहीं और चलना ज़रूरी है। यात्रा ज़रूरी है। ठीक ग़लत कुछ नहीं, बस ज़रूरी।

काफ़्का का 'द ट्रायल' इस सब कुछ के ज़रूरी होने का दस्तावेज़ है। जौसेफ़ के (K.) का अपराधी बनना समय की ज़रूरत है। कारण न के. को पता है न किसी अन्य को। उसके चाचा एक वकील करते हैं। वकील को अपराध की जानकारी नहीं है। लेकिन अपराध गंभीर है, बस यही मूल है। वकील की असिस्टेंट के प्रति के. का आकर्षण और आफ़िस के एक कोने का रोमांस - फिर एक पेंटर जो कचहरियों, मुकद्दमों की जानकारी रखता है, सिर्फ़ इतना जानता है कि सज़ा ज़रूर होगी, अपराध चाहे कुछ भी हो। फिर पादरी जो कैदियों का पादरी भी है, उस का रोल इतना ही है कि वह आने वाली अपरिहार्यता के लिए अपराधी को तैयार कर सके। आशा व्यर्थ की चीज़ है। सिर्फ़ तैयारी, अपनी समाप्ति के लिए। अपराध तो कुछ न कुछ है ही। सज़ा तो होगी ही। उससे बचने की कोशिश और उपाय भी ज़रूरी हैं। साथ ही शरीर की दूसरी वासनाएं भी इन्हीं स्थितियों के बीच के क्षणों में ही कहीं पूरी होंगी। वे भी ज़रूरी हैं। परिस्थितियों की क्रूरता हमारी अपनी वासना की तरह चारों तरफ फैली हुई है। वासना भी हर जगह है, क्रूरता भी हर जगह। दोनों एक साथ घटती हैं। मरने से पहले मरना हो नहीं सकता। लेकिन व्यवस्था का अपना समय और नियम है। सज़ा का वक्त आएगा जब, फैसला सुना दिया जाएगा। तुम्हारा यही अन्त ज़रूरी है। इसे कोई त्रासद भी कैसे कहे। यह बड़ी हास्यास्पद बात है। सब स्थितियों पर हंसी आती है। हर त्रासद स्थिति अपने भीतरी अतर्क और अकारण पर आधारित है और वही न समझ पाना ही हंसी का कारण है। कारण की अनुपस्थिति विदूषक की तरह है जो सब को हंसाती है। इसी का विस्मय बार बार हमें चौंकाता है, जकड़ता है, हाथ कुछ नहीं आता। हमारे समय के मार्केस और सलमान रश्दी भी इस विस्मय और अकारण का भरपूर प्रयोग करते हैं। खैर बात मृत्यु की थी और वहां ऐसी स्तब्धता है कि विदूषक को परदे के पीछे जाना ही पड़ता है। काफ़्का के 'ट्रायल' का अन्त या कहें अनन्त इस तरह है, ''Where was the judge he'd never seen? Where was the high court he'd never reached?... but the hands of one of the gentlemen were laid on K. 's throat, while the other pushed the knife deep into the heart and twisted it there, twice.... 'Like a dog! he said, it was as if the shame of it should outlive him.'' यह अनन्त K. की मृत्यु को एक मामूली ज़रूरत से अधिक कुछ नहीं रहने देता - उस के बाद भी अपमानजनक शर्मिंदगी।

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काफ़्का और कामू बड़े-बड़े प्रतीक, कथा बिंब और पेरेबल्ज़ रचते हैं अपने समय को पकड़ने के लिए। और इस प्रक्रिया में वे समयातीत भी हो जाते हैं। इन्सानी स्थिति के कुछ निर्णायक क्षणों को पकड़ कर इन्सान को मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं अपनी बात कहने के लिए और लगता है स्थितियां पीछे भी जाती हैं और आगे भी। वे एक दर्शन को माध्यम बनाते हैं और इन्सान को उन स्थितियों से गुजारते हैं जो उन्हें उनकी परिणितियों तक ले जाती हैं। जहां कर्ता और दृष्टा में अन्तर समाप्त होता दीखता है।

कामू में कर्ता ही दृष्टा भी है और वर्तमान ही निर्णायक क्षण है। कर्ता अपने स्वयं के कर्ता होने से आक्रान्त भी नहीं है क्योंकि वह दृष्टा भी है और इसीलिए उसके परिणाम भोगने की अनिवार्यता एक सहज स्थिति है। लेकिन काफ़्का अपने कर्ता होने का भी ज़िम्मेवार नहीं है। वह कुछ है ही नहीं। परिस्थितियां ही कर्ता हैं और निर्णायक भी। कर्ता और परिणाम के बीच कार्य-कारण का सम्बन्ध ग़ायब है। कामू हालांकि 1942 में 'अजनबी' लिख रहे हैं और काफ़्का 'द ट्रायल' 1925 से पहले। समय की प्रवृतियों में अन्तर केवल इतना था कि जो कुछ भी तरल था, ठोस बन गया था। पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के परिणाम युद्ध से भी अधिक भीष्ण थे। शायद इसी कारण सार्त्र और कामू दोनों अस्तित्ववादी दर्शन को एक सीमा तक ही स्वीकारते थे। वे भविष्य के प्रति आस्थावान होकर सामूहिक मानव प्रयत्नों में विश्वास करते थे। लेकिन कामू सार्त्र की तरह समाजवादी दर्शन को अर्जित नहीं कर पाए थे। उनका उपन्यास 'अजनबी' उनके अस्तित्ववादी चिन्तन का प्रतिनिधि उपन्यास है। अपनी मां की मृत्यु पर भावनाहीन उदासीनता, एक अरब व्यक्ति को गोली मारने के बाद की निस्पन्दता, अपने मुकदमे के दौरान प्रतिक्रियाहीन पाषाणता, कैद में पादरी को उसके ईश्वर के समेत नकारना और अन्त में मृत्यु का वरण। सब ऐसा है जो इस विश्व के अगोचर विधान की इन्सान के प्रति उदासीनता का प्रतिबिम्ब है। प्रकृति के विस्तार में इन्सान की उपस्थिति जैसे कोई विशेष ध्यान देने लायक चीज़ नहीं है। यहीं कामू और सार्त्र का अन्तर भी स्पष्ट हो जाता है। काफ़्का में स्थितियों की एबसर्डिटी आखिर एक विषाद तक पहुंचती है। कामू में यह विषाद अनुपस्थित है। कामू का essay 'The Rebel' सार्त्र और कामू का अन्तर भी है और दोनों के बीच की कड़ी भी, जिसे उन्होंने अपने समय में एक ज़िद की हद तक बनाए रखा - जोड़े भी रखा और तोड़े भी रखा।

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अज्ञेय का 'शेखर एक जीवनी' काफ़्का और कामू के बीच कहीं अटका हुआ है। काफ़्का में परिस्थितियां इतनी अधिक निर्णायक हैं कि अस्वीकार का कोई स्थान नहीं। परिस्थितियां 'शेखर' में भी उसके बचपन से ही निर्णायक रहती हैं। मां के अविश्वास का एक वाक्य एक अटल परिस्थिति की तरह शेखर में एक निर्णायक भूमि बनी। कैंप में पहरा देते हुए पकड़े जाना, जेल जाने की परिस्थिति - अकारण, अदोष। और फिर शशि की परिस्थिति - शेखर के पहले भाग का अन्त और दूसरे भाग का आरम्भ ही 'पुरुष और परिस्थिति' शीर्षक से है। अधिक परिस्थितियां शेखर के अपने कामों का परिणाम नहीं हैं। शशि-शेखर की कथा उन परिस्थितियों के परिणाम में ही स्थित हैं। अस्वीकार का कोई स्थान न होना, उस अस्तित्ववादी दर्शन को जन्म देता है जो बृहद रूप से कामू की रचनाओं में घटा। विशेष रूप से, 'स्ट्रेन्जर' में। यहीं 'ट्रायल' से 'स्ट्रेन्जर' की यात्रा का अन्त भी है जो उसी अस्वीकार से पैदा होता है - विद्रोह। शेखर में वह विद्रोह उसके स्वभाव में हमेशा ही हाथ की लकीरों की तरह बिछा रहा। हालांकि उस का कोई विधिवत text नहीं बनता जिसे पढ़ा जा सके और किसी दर्शन तक पहुंचा जा सके। हाथ पैर मारते रहना ही हाथ आता है। दलदल में धंसे व्यक्ति की तरह हाथ पैर मारते रहना। यही नियति शेखर के विद्रोह की रही। शशि को सम्बोधित शेखर कहता है, बिल्कुल अन्त के निकट, जब शायद सारा अर्जित ज्ञान बुझते हुए क्षणों में भक से उजागर हो जाता है -

''सर्वत्र कलुष है, ह्रास है, पतन है ... जीवन अमूल दूषित है। ईश्वर मानस, सब कुछ ... आमूल दूषित-दूषित और सड़ा हुआ। विरुद्ध लड़ने के लिए कुछ भी नहीं है या सब कुछ है ... मिट्‌टी को काटा जा सकता है, पर दलदल को नहीं - उसमें धंसना ही धंसना है।''

शेखर-शशि की कथा में 'घटित' और 'परिणाम' उन दोनों के भीतर एक बीज की तरह मौजूद है। केवल परिस्थिति चाहिए अंकुर फूटने के लिए। जिस रात शशि घर नहीं गई, उसी रात अंकुर फूटा भी और विष वृक्ष की तरह फैला भी। शशि क्या नहीं जानती थी इस का परिणाम। लेकिन परिणाम का स्वीकार पहले ही मौजूद है भीतर। इसी नियति की बात शेखर के पहले भाग के शुरू में ही एक विद्रोही को आंकते हुए कह दी गई है।

''विद्रोही पैदा होते हैं - बनते नहीं। बीज मौजूद है। केवल मिट्‌टी की ज़रूरत है।''

इसी नियति और परिस्थिति के संगम में शेखर की कथा घटित होती है। यहां नियति का अर्थ भाग्य नहीं एक अवश्यम्भावी परिणाम है। विद्रोह किस दिशा में ले जाएगा, इस की विधिवत कल्पना में ही क्रान्तिकारिता का दर्शन छिपा है जिसका अवसर शेखर को नहीं मिलता। उसे कल्पना के बजाय मिलती है यातना। और शशि की मौत से जो दृष्टि मिली, वह उसी विकल्पहीनता से पैदा होती है, जहां स्वयं को समाप्त कर लेने के इलावा कोई रास्ता नहीं बचता। शेखर शशि के अवशेष नदी में प्रवाहित करने के बाद, अन्तिम प्रणाम के बाद, अथाह वेदना की धार में अपने आप को समर्पित करता है - उस दल के काम में जहां प्रथम और अन्तिम का अन्तर समाप्त हो जाता है। जीवन जैसे जिया जा चुका है। ठीक ऐसे ही। समाप्ति के उस आभास में हर प्रयास अप्रयास की तरह भारहीन हो जाता है। कर्म जहां केवल मुक्त करता है। एक की मृत्यु दूसरे को मात्र छाया में परिर्वतित कर देती है।

''निरा अस्तित्व एक क्षण से दूसरे क्षण तक, एक अणु पुंज का बने रहना... मैं एक छाया हूं, एक स्वप्न, एक निराकार आक्रोश...।''

शशि के न रहने पर इस बोध की परिधि उस यथार्थ तक पहुंचती है जो अस्तित्ववादी दर्शन से आगे का यथार्थ रहा है, जहां हम सार्त्र, कामू और अज्ञेय को बगलगीर देखते हैं और इन तीनों के पीछे काफ़्का जैसे खड़ा हंस रहा हो कि तुम तीनों अभी मुक्त नहीं हो 'द ट्रायल' की परिस्थिति से। और सच ही इनके समकालीन समाजवादी दर्शन ने इन्हें ट्रायल की स्थिति से आगे नहीं जाने दिया।

बड़े लेखक केवल प्रभाव अर्जित कर रहे होते हैं। कहीं से भी। उसी से उनके भीतर का वातावरण निर्मित होता है और रचना प्रभावित होती है। बड़े लेखकों को एक तस्वीर में बगलगीर देखना ही अच्छा लगता है एक दूसरे को छूते हुए। यहां भी हम कम से कम चार बड़े लेखकों को बगलगीर हुआ देख सकते हैं। काफ़्का, सार्त्र, कामू और अज्ञेय। सार्त्र स्वयं कर्मशील विद्रोही रहे, जिनका दर्शन मात्र विद्रोह नहीं था। वे समाजवाद की क्रांतिकारिता के बहुत निकट थे। कामू अपने 'The Rebel' में विद्रोह और क्रांति को परिभाषित करते हैं, एक दार्शनिक आयाम रचते हैं। शेखर के भाग दो के प्रकाशन के सात साल बाद 1951 में Rebel प्रकाशित हुआ था। 'शेखर' का अपनी तरह का दर्शन है। शशि का अन्त, शेखर की वेदना और उससे जन्मी दृष्टि किसी भी दर्शन पर भारी पड़ती है। बल्कि कहें कि उसी दृष्टि से दर्शन जन्म लेता है। भले ही उसकी कोई text न हो। 'शेखर' उपन्यास की भाषा उसे एक अनुपम कलाकृति की तरह स्थापित करती है। हिन्दी में इस तरह भीतरी खोहों को प्रकाशित करती हुई भाषा पहली बार प्रयोग हुई। इस तरह की मनोवैज्ञानिक दार्शनिकता ऐसी भाषा में प्रस्फुटित हुई है कि विचारों की बर्फ़ शिलाएं भीतरी ऊष्ण समुद्र में तैरती रहती हैं।

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यूरोप की विश्वयुद्धीय विकटता से अलग तरह की परिस्थितियां और समस्याएं भारत में थीं। आज़ादी का संग्राम, किसानों की समस्या, सामाजिक कुरीतियां, इसी में हम उलझे हुए थे। लेकिन साहित्योन्मुख प्रतिभाओं की अपनी दिशा होती है। जैनेन्द्र भी समस्याओं की मुख्यधारा से कट कर नारी मुक्ति और नारी अस्मिता को प्राथमिकता देते रहे, बाकी सब उसके बाद। हालांकि जैनेन्द्र का 'त्यागपत्र' ज़्यादा यथार्थपरक और समस्यामूलक उपन्यास है जो समर्थ रूप में नारी मुक्ति की स्थिति का विकल्प रचता है। लेकिन मैं यहाँ 'सुनीता' का ज़िक्र करना चाहूंगा क्योंकि उसकी विषय वस्तु और मूल अवधारणा में एक चुनौती है जो एक बहस का कारण भी बनी। जैनेन्द्र की यह कृति कई वजह से हिन्दी जगत में महत्वपूर्ण रही। एक नारी की पुरुष के पौरुष को साहसिक चुनौती तो है ही, उसका श्रीकान्त के साथ सम्बन्ध भी विवाहित जीवन की नई व्याख्या प्रस्तुत करता है। इतना परस्पर विश्वास चौंका देने वाला है। ऐसा विश्वास जिससे जंगल में उसके निर्वसन होने का साहस भी जन्म लेता है। नारी मन की गुह्यता बेदखल होकर एक प्रगाढ़ता में बदल गई है। जैनेन्द्र की भाषा का दर्शन उसे अपनी व्याख्या में लगातार खोलता चलता है। विश्लेषणात्मक होने का कोई सम्मोहन नहीं है। केवल अर्थ का सम्मोहन है जो उस विश्लेषण से खुलता है।

जैनेन्द्र की सुनीता में नैतिकता का नहीं, विश्वास जनित साहसिकता का प्रश्न ही अधिक है। सुनीता का निर्वस्त्र होना किसी नैतिकता का उल्लंघन नहीं बनता, एक स्थिति और उद्देश्य के लिए उद्यत निस्संकोच साहसी नारी की अवसर-स्फूर्त क्रिया बन कर ही सामने आता है। भले ही वह पाठकों की सामाजिक नैतिकता को चौंका देने वाला लगे।

हरिप्रसन्न की क्रांतिकारिता एक छुटपुट, सौन्दर्यकामी, परजीवी और भावुकता से लबालब भरी हुई स्थितियों का पुञ्ज है। हरिप्रसन्न अत्यन्त रोमानी तर्क प्रस्तुत करते हैं सुनीता को अपने क्रांतिकारी युवक समूह के सामने प्रस्तुत होने के लिए। ''हमारे दल के युवक भी देखें कि उनकी देवी चौधरानी सौन्दर्य की भी देवी है। सौन्दर्य ईश्वर का एक रूप है। भाभी, सौन्दर्य शक्ति है। सौन्दर्य आदर्श है...बलि की प्रेरणा देता है। जो असुन्दर है, वह फिर सत्य भी कैसे है।'' यहां ईश्वर और सौन्दर्य दोनों गौर करने लायक शब्द हैं। वह दोनों में ही विश्वास नहीं करता। ऐसी ही बातें क्रांतिकारी-स्त्री और गृहस्थ पत्नी की स्थिति को लेकर पहले भी हरिप्रसन्न सुनीता से करता है। जंगल में लाल रोशनी देखकर उस तरफ़ अपना जाना स्थगित करते हुए, सुनीता को जोर से चिपटा कर उसने कहा, ''तुम जानती हो, अकेला होता तो मैं क्या करता। वहां संकट है, उस संकट के मुंह को ही जाकर मैं पकड़ता। लेकिन आज जो मैं उधर ताकता दूर खड़ा हूँ, मैं कुछ भी नहीं कर सकता।''

''क्यों?''

''क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ और प्रेम आदमी को निर्बल बना देता है।''

वह नारी प्रेम और वासना में अन्तर करता है जैसे सब भावुक रोमानी लोग करते हैं। इसे नैतिकता नहीं कहते। नैतिकता एक संस्कार बोध है और सामाजिक मूल्य भी। व्यक्ति पूरी वासना में भी नैतिक हो सकता है। प्रेमजनित वासना केवल नैतिक ही हो सकती है, अनैतिक नहीं। मित्र पत्नी होने की इन्सानी नैतिकता दूसरी बात है। अगर यह दूसरी बात ही हरिप्रसन्न के रास्ते में आती तो मित्र पत्नी को प्यार करना, उसके शरीर-सानिध्य के लिए आकंठ उत्सुकता उस नैतिकता का स्वरूप नहीं। अकस्मात अनावृत सुनीता को उस समय ले लेना कोई साहसिकता भी न होती, पौरुष भी नहीं, और अन्त में नैतिक भी नहीं। नहीं, केवल नैतिकता का प्रश्न यह नहीं रहा। परिस्थिति ऐसे अवसरों में बहुत निर्णायक होती है। जंगल में परिस्थिति ऐसी नहीं कि वह सुनीता को भोग लेता और जंगल में उसे अपने साथ लाने के उद्देश्य की मासूमियत भी बची रहती। परिस्थिति ऐसी नहीं थी जहां प्रेम मुक्त होकर भोगता है। उस समय उसका सुनीता को भाभी कह उठना बड़ा अनैतिक लगा।

सुनीता में नारी सुलभ निश्चयात्मकता और उत्सुकता है। स्त्री का किसी भी रहस्मयात्मक दिखने सुनने वाले पुरुष के लिए जितना आकर्षण हो सकता है, उतना ही आकर्षण उसमें हरिप्रसन्न के लिए है। प्रेम वह अपने पति श्रीकान्त से ही करती है। उसी का निर्देश आखिरी हद तक निभाने के लिए उद्यत सुनीता हरिप्रसन्न की सारी प्रेम जनित कामना-वासना को प्रश्रय देने के लिए तैयार होती है। जो शरीर सुनीता है, वही वह उसे अर्पित करती है। उसका मन हरिप्रसन्न को अर्पित होता कहीं नहीं दीखता।

श्रीकान्त की उदारता इन सब से बड़ी है। उसका निस्वार्थ भाव से दोस्त की खोज में लगे रहना, उसे आश्रय देना, अपनी गृहस्थ सोच के अनुसार उसे बदलने की चेष्टा करते रहना, उदार होकर हरिप्रसन्न की आर्थिक ज़रूरतें भी पूरी करते रहना और विशेषतौर पर सुनीता को लाहौर से उसका वह पत्र जिसमें वह हरिप्रसन्न को बचाने के लिए सुनीता को पूरी तरह आज़ाद कर देता है कुछ भी करने के लिए। उसी के बल पर सुनीता सब कुछ कर सकने को उद्यत हो सकी। यह नैतिक बल श्रीकान्त उसे देता है। इसी के बूते पर वह निर्वसन होकर भी अनैतिक नहीं होती।

श्रीकान्त और सुनीता हरिप्रसन्न को गृहस्थी में दीक्षित नहीं कर सके और हरिप्रसन्न सुनीता को अपने दल में दीक्षित नहीं कर सका। क्या इसी से समझा जाए कि दोनों अपनी जगह हार भी गए और जीत भी गए। हरिप्रसन्न सत्या को नहीं, सुनीता भाभी को प्रेम कर उठा, क्या इसी से उसकी क्रांतिकारिता खण्डित हो गई? बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि स्त्रियों को लेकर, घरबार को लेकर, उसके तर्क क्रांतिकारी दृष्टि उपस्थित नहीं करते। स्त्री, घर, गृहस्थ और क्रांतिकारी उद्देश्य अपनी अपनी जगह अनिवार्य और दुर्निवार चुनौतियां हैं। एक दूसरे को ललकारने के लिए उन्हें अस्त्र की तरह प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

दूसरे की स्थिति को छोटा करके देखने में क्रांतिकारिता का तर्क भोंडा लगता है। ऐसी कोई भी घटना नहीं घटती जो क्रांतिकारी आदर्श को परखती हो। एक जंगल वाली घटना से ही गृहस्थिन सुनीता विजयी होकर लौटती है। हरिप्रसन्न उसके बाद घर नहीं आएगा, यह निश्चित है। सुनीता का पांव छूकर हरिप्रसन्न को विदा करना इसी ओर संकेत करता है। अपने प्रेम की ऐसी अलंघ्य स्थिति के बाद हरिप्रसन्न अपने आपको चाहे जिस आग में झोंक दे। कोई विकल्प उसके पास नहीं है। अपने आपको 'नहीं मारूंगा' कह कर विदा लेने के बाद क्या हरिप्रसन्न सचमुच अपने आपको नहीं मारेगा? यह वही एक विकल्पहीन स्थिति है जो हर दुखान्त कथा का कारण बनती है। मरण का पथ ही प्रशस्त करती है।

सन्‌ 1774 में जर्मन लेखक Goethe (गेटे) का Sorrows of Young Werther भी एक मित्र पत्नी के प्रेम में मृत्यु पथ प्रशस्त्र करता हुआ अत्यन्त मार्मिक उपन्यास है। यह कृति इतनी लोकप्रिय हुई कि फ्रांस में नैपोलियन अपनी युद्ध स्थलियों में इसे अपने पास रखता था। यूरोप के युवकों के लिए Werther एक फैशन की चीज़ बन गई थी। वर्दर मित्र पत्नी Lotte(Charlotte) को पा नहीं सकता और उसके बिना जी नहीं सकता। कोई विकल्प नहीं। उसी प्रेमिका से रिवाल्वर उधार मांग कर अपना अन्त करना ही बच रहता है। वही वह करता है।

इसी तरह की विकल्पहीनता की त्रासद स्थिति तालस्ताय की अन्ना कैरेनिना में भी घटती है। नारी पुरुष के सम्बन्ध में प्रेम, वासना, नैतिकता, धर्मपरायणता आदि नारी मुक्ति से अलग समस्याएं हैं। प्रेम में भी मुक्ति की समस्या उसी तरह अखण्ड है जैसे समाज और परिवार में मुक्ति की समस्या। प्रेम में मुक्ति की अवधारणा नारी पुरुष की समानता से भिन्न है। जैनेन्द्र की सुनीता का संघर्ष उतना व्यापक, सर्वग्राही, ऐन्द्रिक, बौद्धिक तथा भावनात्मक कार्यकारण नियामकों और प्रेरक शक्तियों का संवाहक नहीं है जो निर्णायक स्थितियों और दृष्टि को जन्म देती हैं, जो विषाद और ट्रेजेडी का कारण बनते हैं। और न ही इन्सान की भीतरी कन्दराओं में छिपे अकारणों का विस्फोट करते हैं जिससे टालस्टाय की 'अन्ना कैरेनिना' जैसी रचनाएं जन्म लेती हैं। तुलना दोनों की किसी भी धरातल पर नहीं है लेकिन एक ख़ास तरह की नैतिकता और मुक्ति दोनों में सांझे विषय हैं।

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जिन दिनों मैंने तालस्ताय का 'अन्ना कैरेनिना' पढ़ा, कुछ ऐसा ही माहौल था मन का। भरपूर रोमांटिक और बेहद क्लासिक। जॉन कीट्‌स की 'Wilt thou Ever Love and she be Fair' और T.S.Eliot की 'Evening is spread out against the sky like a patient etherized on the table', दोनों बराबर अच्छी लगती थीं। मन की दुनिया एक 'Wasteland' बनी हुई थी। लेकिन प्रसाद की श्रद्धा (कामायनी) 'हृदय की अनुकृति बाह्य उदार, एक लम्बी काया उन्मुक्त' भी मन को आप्लावित करती थी। मजाज़ और फैज़ दोनों ही मन और कण्ठ में रचे हुए थे।

सब गड्डमड्ड होकर घनी उदासी भी पैदा करते थे। और क्रांति स्वप्न का रोमांस भी। मार्क्स, फ्रॉयड और सार्त्र समय सत्य की त्रयी की तरह ज़ेहन में अटके हुए थे। Saul Bellow का Herzog बहुत अच्छा लगा था, लेकिन शेखर की 'वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है' मन की कच्ची मिट्‌टी की तरह थी जिसे कोई भी आकार दिया जा सकता है। अन्तिम सत्य कुछ भी नहीं था। वह तो आज भी नहीं है। लेकिन ऐसा था कि कभी कुछ भी होगा तो घनी पीड़ा और उन्मुक्त आह्लाद के संगम से होगा। अकेले सुख और दुख कभी किसी मानव स्थिति के निर्णायक नहीं होंगे। निर्णय बोध की बात तब मन में थी ही नहीं। अनिर्णय ही मन मस्तिष्क का प्रेरक प्रवाह था। केवल दिशाएं थीं, अनुकूल और विपरीत से आज़ाद।

ऐसी युवा मनस्थिति में 'अन्ना कैरेनिना' पढ़ा था पहली बार। उसके अन्तिम होकर रह जाने की अनुभूति तो बहुत बाद में हुई। लेकिन बार बार उधर ही मुड़कर देखना लगातार होता रहा। तब इस तरह के फ़तवे जारी करने का चलन भी शायद नहीं था कि फलां शायर सबसे बड़ा शायर है, फलां सबसे बड़ा उपन्यासकार है। शायद यह रिवाज़ भी हो, पर हम इससे बेख़बर थे। जब एक मुद्दत से बार बार अलग अलग विचारों और मान्यताओं के आलोचकों, विद्वानों ने कहना जारी रखा कि 'अन्ना कैरेनिना' दुनिया का श्रेष्ठतम उपन्यास है तो हमें पीछे मुड़कर अपने मन में झांकने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यही लगा कि आखिर सबका सत्य सांझा है, यह केवल हमारी ही डफ़ली की आवाज़ नहीं थी।

शायद F.R.Leavis पहले आलोचक थे जिन्होंने कहा कि इस उपन्यास की सघनता, गहराई, दूरगामिता और अनुभव विस्तार को देखते हुए हम अगर कहें कि अन्ना कैरेनिना महानतम उपन्यास है तो इसकी सहमति प्राप्त करने की चुनौती भी स्वीकार करनी होगी। उन्हीं के शब्दों में - ''It is the range and variety of human experience going with the depth and vividness in the rendering that one would point to and start to comment on if, having ventured (as some might) that anna Karenina was the greatest of novels, one were challenged to give one's ground for accepting assent.''

और इस चुनौती को वे स्वीकार करते हैं 'अन्ना' का बृहत्‌ विश्लेषण देकर। उनके तर्कों को संक्षिप्त में देने का स्थान यह नहीं है। Leavis का essay, Anna Karenina : Thought and Significance in a great Creative Work कहीं भी पढ़ सकते हैं।

अभी 2007 में J. Peder Zane द्वारा Time मैगज़ीन के माध्यम से 125 लेखकों/आलोचकों की समिति ने विश्व के 100 बड़े उपन्यासों में 'अन्ना कैरेनिना' को पहले स्थान पर रखा। किसी भी कृति के बारे में ऐसा एकमत होना लगभग असम्भव है। हालांकि एक मत से सभी यह नहीं मानते कि कुल मिलाकर तालस्ताय अभी तक के श्रेष्ठतम उपन्यासकार हैं। लेकिन मैं ऐसा मानता हूं कि तालस्ताय ही अभी तक के महानतम उपन्यासकार हैं। F.R.Leavis के तर्कों के अलावा भी हम किन्हीं और बातों की वजह से अन्ना को महान कृति समझते हैं। उन्हीं कारणों को हम संक्षेप में यहां रखेंगे।

एक विकल्पहीनता और अप्रत्याशित की गाथा है अन्ना कैरेनिना। इसी विकल्पहीनता की त्रासदी के प्रवाह में जीवन की छोटी बड़ी घटनाएं अपने निर्णायक क्षणों तक पहुंचती हैं। इस त्रासदी में नैतिकता, चारित्रिक अहंकार, विचलन और अकारण के प्रवेश से नैतिक, चारित्रिक, निर्णय-अनिर्णय तथा व्यवस्था से जुड़े सभी प्रत्याशित भरभरा कर ढह जाते हैं। सांस्कृतिक विघटन व्यक्ति के भीतर भूमि स्खलन की तरह कहीं छिपा होता है। विस्फोट का समय निश्चित नहीं किया जा सकता। ऊपर की मान्यताएं इतनी बदशक्ल हो जाती हैं कि बर्बादी के मलबे से उन्हें बाहर निकालने पर पहचानना मुश्किल हो जाता है। यही प्रक्रिया तरह तरह से 'अन्ना' में घटती रहती है। कोई पात्र अपनी स्थापनाओं में सुरक्षित नहीं है। लेकिन मुक्ति का संग्राम अन्ना और व्रान्स्की का है। प्रेम केवल एक विस्थापन है। और असंतुलन भी इसी विस्थापन में है।

व्यापक परिस्थितियां जो एक समयांश निश्चित नहीं करता - उन्हें बदलना व्यक्तियों के बस का प्रायः नहीं होता। भीतरी प्रेरणाएं कार्यकारण की संहिता से स्वतंत्र इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं कि राह कोई रोक नहीं सकता। अन्ना ने आरम्भ में व्रान्स्की के आकर्षण से दूर रहने की कोशिश की, लेकिन सम्भव नहीं हुआ। अन्ना के पास व्रान्स्की के अतिरिक्त कोई जीवन नहीं था। लेकिन व्रान्स्की के पास अन्ना के अतिरिक्त उसका बृहद सामाजिक जीवन था। अन्ना के लिए लालसाएं एकरूप हो गई थीं। नौ वर्ष के बेटे की जुदाई एक शूल की तरह हृदय में भरकर वह व्रान्स्की के साथ भटकती फिरी। उसके लिए भटकन ही थी। व्रान्स्की उसे हर जगह साथ नहीं ले जा सकता था। लेकिन passion अपने शिखर पर ज़्यादा देर नहीं टिकता, प्रेम टिकता है और प्रेम की कमी व्रान्स्की में नहीं थी। मॉस्को में होटल में वे अलग अलग कमरों में रहे। व्रान्स्की ने अपने गांव की ज़मींदारी सम्भाली, वहां भी अन्ना से शारीरिक दूरी बढ़ती गई। अन्ना की मनस्थिति ऐसी हो गई जैसे 'जीवन को एक हाथ से पकड़ कर दूसरे हाथ से पीछे धकेल रही हो।' यह वाक्य उपन्यास में आता है अन्ना के पति कैरेनिन के लिए। लेकिन अन्ना के मन की व्रान्स्की के साथ भी वही स्थिति बनकर रह गई थी। व्रान्स्की का अन्ना के लिए प्यार कम नहीं हुआ था। लेकिन प्रेम और आवेग में अन्ना अन्तर नहीं जानती थी। संक्षिप्त रूप में किसी भी तरह कह सकना इस जीवनार्थ को कम करेगा। जीवन जैसे सिर्फ़ जीने की चीज़ है। उससे गुज़रना ही ज़रूरी है। योजनाबद्ध कुछ नहीं। वासनाओं की खोज केवल एक यात्रा है, जहां सिद्धान्त एक अप्रिय पाखण्ड बन कर रह जाते हैं। स्टीफ़ेन-डॉली, लेविन-किट्‌टी, अन्ना-कैरेनिन-व्रान्स्की, पादरी तथा छोटे छोटे कई नक्षत्रों से उपन्यास का आकाश भरा हुआ है। उनकी कथा के माध्यम से जीवन अपने आपको पूरी तरह खोलता चलता है। गर्व और घृणा स्थान बदलते नज़र आते हैं।

अन्ना पूरी तरह एक मोहभंग की स्थिति में पहुंचकर जीवन से दूर होती चली गई। पति से तलाक का मुद्‌दा बार बार उठा। तलाक के बाद क्या अन्ना को ज़िन्दगी मिलेगी? व्रान्स्की को छोड़कर पति के पास वापिस वह कभी भी जा सकती है, लेकिन कैरेनिन को वह प्यार नहीं कर सकती। उसके शरीर से एक किरण भी फूटकर कैरेनिन की ओर नहीं जाती। कैरेनिन एक अंधेरी धरती है उसके लिए। व्रान्स्की से विरक्त, एक रेलवे स्टेशन पर आती एक मालगाड़ी के दो डिब्बों के बीच की खाली जगह में कूद पड़ती है। उस खाली जगह के बीच गाड़ी का पहिया सिर तक आने का क्षणांश एक आसक्त क्षणांश है - जीवन की आसक्ति। सिर उठाने की कोशिश भी करती है, क्षणांश छोटा पड़ जाता है। अन्ना की इस तरह की मृत्यु या केवल उस का क्रमशः विघटन ही इस उपन्यास को इतनी बड़ी जगह नहीं देता। एक पूर्ण जीवन किताब की तरह खुलता है, वर्क वर्क पढ़ा जाता है। मृत्यु भी उस किताब के पन्ने फड़फड़ा कर रह जाती है, बन्द नहीं करती। व्रान्स्की उसे पढ़ना जारी रखता है। व्रान्स्की का सब कुछ छोड़कर लड़ाई के मोर्चे पर चले जाना, वही विकल्पहीनता की स्थिति है जिसने अन्ना को गाड़ी के पहियों में धकेल दिया। अन्ना का प्रेम यही एक रास्ता उसे सुझाता है। दया, धर्म, करुणा, घृणा, प्रेम, वासना, उदारता, संकीर्णता इत्यादि सब सिद्धांत पात्रों से टकरा कर ही अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। बना बनाया अर्थ जैसे अब तक कुछ है ही नहीं। शून्य में झूलती हुई सूलियां कोई नहीं। सूली बगल में दबा कर सभी कोई वजह और जगह ढूंढते फिर रहे हैं।

यथार्थवादी साहित्य का शिखर माना जाता है अन्ना को। ज़मींदारी पर फलने फूलने वाले अभिजात्य समाज का झूठ, पाखण्ड, बनावट, झूठी नैतिकता और क्रूरता सामने है और गरीब किसानों की दुर्दशा भी। बोलशेविक क्रांति के रास्ते की मुश्किलें भी लक्षित होती हैं और उस के संकेत भी मिलते हैं। लेविन, जो स्वयं तालस्ताय का प्रतिबिम्ब है, उसी के माध्यम से बाहर की दुनिया और किसानों के साथ ज़िन्दगी में झांकने का मौका मिलता है। वह किसानों के साथ मिलकर श्रम करता है। खेती को आधुनिक ढंग से करने की कोशिश करता है। लेकिन पारिवारिक सम्बन्ध यहां भी अपनी अर्थहीनता में ही उजागर होते हैं। वहां नैतिकता केवल दिखावे में है, जीवन को साधने में नहीं है। अन्ना के प्रति समाज का प्रतिशोध उसी समाज की नैतिकता (अनैतिकता) है जो अपने बेटों को किसी अमीर विवाहित स्त्री के साथ सम्बन्ध रखने को उनकी समाज में स्थापना का एक जरिया समझता है। व्रान्स्की अकेला नहीं पड़ता, अन्ना अकेली पड़ती है। प्रतिशोध उसके लिए ही अधिक है। 'You cannot build your happiness on somebody else's pain.' यही केन्द्र भी है और केन्द्र से छिटक कर मुक्त होने की युक्ति भी। किस के दर्द का घनत्व ज़्यादा है? इसका सामाजिक उत्तर भले ही हो, लेकिन समाधान की कोई संहिता नहीं है।

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उपन्यास की लगभग पांच सौ वर्ष पुरानी विधा एक लम्बे सफ़र से गुजरने के बाद विस्तार के उस छोर पर पहुंच गई है जहां सिर्फ़ आगे पीछे देखना ही काफ़ी नहीं रह जाता। अपनी पूर्णता में औपन्यासिकता को आंकने के लिए उन तमाम प्राचीन संस्कृतियों की तरफ भी देखना ज़रूरी हो जाता है जिन में औपन्यासिक मानसिकता और कल्पनाशीलता आज की घेरे बंदियों से हमें मुक्त करती है। धर्म के प्रति हमारे आग्रह आज वैसे नहीं रहे कि हम अपने प्राचीन काव्यों में वर्णित नायकों और कथानकों को केवल पूजा की वस्तु समझें। उनके चरित्र, परिस्थितियां और दर्शन अपने तमाम धार्मिक आग्रहों से मुक्त होकर हमारे लिए अपने सामाजिक और राजनैतिक संदर्भों में प्रकट होते हैं। उन कृतियों को बृहत या लघु उपन्यास, अथवा लम्बी-छोटी कहानी के रूप में उसी तरह पढ़ सकते हैं जैसे अपने समकालीनों को पढ़ते हैं। हमारे समकालीन भी केवल अपनी सामयिक उपस्थिति में ही समकालीन हैं। अपनी कल्पनाशील मानसिकता में वे महाभारतीय या होमरिक भी हो सकते हैं। वैश्विक संस्कृति हालांकि अभी विकसित नहीं हुई है, फिर भी एक सत्य यह है कि उसकी दूरगामिता हमें केवल भौगोलिक सीमाओं से ही नहीं, अपनी समकालीनता से भी मुक्त करती है। समकालीनता से मुक्ति हमारी मानसिकता की बड़ी उपलब्धि है।

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हमारी सभी प्राचीन कथाओं में वे औपन्यासिक तत्व नहीं हैं, जहां मनुष्य ही सर्वशक्तिमान बनकर सामने आता है और जहां उद्देश्य इतने सरल और सतही नहीं होते। जहां मंजिल से ज़्यादा सफ़र में रहना आकर्षित करता है। पूर्णता कोई अन्तिम बिन्दु नहीं रहता। निरन्तरता ही पूर्णता का मूर्तन अमूर्तन है। अनेकानेक रूपों में जीवन की कल्पना करना और उन सब कल्पित स्वरूपों को जीने की धरती तैयार करना वगैरह वही औपन्यासिक तत्व हैं जो हमें पौराणिक किस्से कहानियों में नहीं मिलते। जिन दर्पणों में हम स्वयं को नहीं देखते, उनकी चमक दमक थोड़ी देर बाद हमारी दृष्टि को धुंधला ही करती है।

लेकिन फिर भी महाभारत के दुखान्त की विराटता आज भी हमें घेर कर बौना बना सकती है। वह एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक महागाथा से कहीं अधिक हमारे अपने समय को भी छीलती नापती है। इतने महासामरिक संघर्ष से पैदा होने वाली विजय का उत्सव जिस रिक्तता को जन्म देता है, उसके सूत्र सारे उन औपन्यासिक परिस्थितियों में हैं जो हमेशा मौजूद रहती हैं। लेकिन परिणिति हर समय में भिन्न रहती है क्योंकि उनकी मूल प्रेरणाएं बदल जाती हैं। फिर भी एक उपन्यास की तरह अपनी गहन दुखान्तता में भी उत्थान का दर्शन रचती है महाभारत। प्राचीन संस्कृतियों की बाकी किसी भी अन्य कृति से महाभारत जनमानस के अधिक निकट है। ग्रीक महाकवि होमर के महाकाव्य इलियड और ओडिसी का महत्व ऐतिहासिक से अधिक कुछ नहीं। ऐकीलीज़, एगमैमनान, हैक्टर जैसे महायोद्धाओं का दुखान्त उनकी विजय के बाद की आत्मसम्पृक्त विरक्ति से उत्पन्न मोहभंग और त्याग की स्थिति नहीं है। उनकी ट्रेजेडी इसीलिए उस महाभारतीय गरिमा तक नहीं पहुंचती।

कुछ काल मानव इतिहास में ऐसे हैं जिनमें आदि सम्भावनाएं उपन्यास विधा की हो सकती थीं। लेकिन उन समयों में उपन्यास का जन्म क्यों नहीं हुआ, आज गौर से देखने पर हैरानी नहीं होती। चिन्तन की ऊँचाईयां सीमित वर्ग से सम्बन्धित रह कर अगर साहित्य में समाज की बुनियादी बनावट को उजागर नहीं करती तो उसका कारण एक महत्वाकांक्षी वर्ग की अपनी स्पर्धाओं में प्रकट होता है। प्राचीन ग्रीक काल इस बात की अप्रतिम मिसाल है। वहां साधारणजन का जीवन और ऊपरी एरिस्टोक्रेसी का जीवन दो धरातल ही नहीं थे, बल्कि नागरिक अधिकारों के बीच की दीवार की तरह थे।

लगभग 2700 वर्ष पहले रचे गए ओडिसी में महामानवों और देवताओं में कुछ खास अन्तर नहीं दिखता। मात्र हेलेन को पाने के लिए धरती और आकाशवासी स्त् पात और अकथ नरसंहार का कारण बनते हैं। उस युद्ध के बाद अपने राज्य इथाका में वापिस आने में ओडिसियस को दस वर्ष लगे, उस साहसिक अनुभव को एक उपन्यास की तरह देखा जा सकता है। सर्वेन्तीज़ के डॉन किहोते का पूर्वाभास यहां मौजूद है। अन्तर केवल इतना है कि 1605 में जब डॉन किहोते लिखा गया तो वह पूर्णतः मानवीय साहसिक और स्वायत्ता मानवीय अभियान था जो पहली बार किसी साधारण मानव द्वारा अपने लिए चुना गया था। फिर भी ओडिसी में वह पूर्वाभास मौजूद है जिसे प्रख्यात विश्व इतिहासकार J.M.Roberts ने पहला उपन्यास जैसा होने की बात कही थी। कहीं न कहीं ओडिसियस के संघर्षों, अप्रत्याशित अनुभवों, साहसिक निर्णयों में उन्हीं उत्सुकताओं और जिज्ञासाओं का परिचय मिलता है जो हमें डॉन किहोते के सामने आने तक स्थगित करना पड़ा।

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2500 वर्ष लम्बी छलांग लगा कर अपने समय में लौटते हैं तो देखते हैं कि ग्रीक डेमोक्रेसी और हमारी आज की राजनीति का जनाधार कितना भिन्न है। लेकिन एक जनाधार के राजनीतिक रूप को उपन्यासों में देखने के लिए हमें अक्सर लैटिन अमेरिका और थोडा़ बहुत अफ्रीका की तरफ़ ही देखना पड़ता है। बीसवीं सदी भारत में राजनीतिक उथल पुथल और आज़ादी के संघर्षों की स्थिति रही। हिन्दी उपन्यास में छुटपुट राजनीतिक स्थितियों की बात ही उठाई गई है। पूरे राजनीतिक परिवेश को उपन्यास ने नहीं पकड़ा। देश के बंटवारे पर लिखे उपन्यासों ने भी नहीं। एक भयावह स्थिति को पूरे विस्तार में अपनी घिनौनी राजनीतिक पृष्ठभूमि में एक इतिहास दृष्टि के साथ नहीं रचा गया।

लैटिन अमेरिका में हालांकि बीसवीं सदी डिक्टेटरों की रही है, फिर भी वहां राजनीतिक साहित्य की परचम हमेशा बुलन्द रही। मार्केस के बाद सबसे अधिक प्रसिद्ध जीवित उपन्यासकार लैटिन अमेरिका में मारियो वारॅगास योसा (LLosa) रहे हैं। पिछले दिनों Life and Literature पर बोलते हुए उन्होंने कहाYou know the inquisition forbade the novel for 300 years in Latin America. I think, they understood very well the seditious consequence that fiction can have on human spirit.''

महत्वपूर्ण शब्द है - Seditious Consequence - तोड़कर अलग कर देने वाला विद्रोही परिणाम। ऐसा ही वहां हुआ भी। बाद में अपने ही घर की राजनीतिक स्थितियों के विद्रोही जिसने पैदा किए। वहां का राजनीतिक साहित्य मुख्यतः उपन्यासों में झलकता है।

अभी 2000 में योसा का उपन्यास Feast of the Goat आया है। डॉमिनिकन रिपब्लिक में 31 वर्ष तक बेरहम डिक्टेटर General Rafael Trujillo (तरुहियो) का राज्य रहा। अन्त में उसकी हत्या कर दी गई थी। उसकी शासन क्रूरताओं पर आधारित है यह उपन्यास। 1960 से 1975 तक का इतिहास उपन्यास में है। योसा इसे लिखने के लिए लम्बे समय तक डोमिनिकन रिपब्लिक में रहे। डा. बालागेर जो तरुहियो के केबिनेट मे थे, उनसे लम्बी मुलाकातें भी योसा ने कीं। पर उपन्यास आख़िर उपन्यास है। कोई रोजनामचा नहीं। तथ्य इधर उधर होते हैं, सत्य नहीं। अन्ततः कल्पनात्मक सृजन ही उस तथ्यात्मकता तक भी ले जाता है जो विश्वसनीयता का आधार बनती है। योसा कहते हैं कि ''इस डिक्टेटर की व्यक्तिगत ऐय्याशियां एक तरफ़, वे किस काम कीं। लोगों को जिस तरह दबाया गया, वही मेरा विषय है।'' हालांकि उन ऐय्याशियों का भी भरपूर वर्णन उपन्यास में है। लेकिन यहां कहानी का महत्व सिर्फ़ विषय वस्तु को खोलते चले जाने में ही है। योसा का लेखन समय कथा को इतिहास बनने से रोकता है, स्मृति की तरह उदास करता है और राजनीतिक कुचक्रों से पाठक को ले जाता हुआ उस मोड़ तक ले आता है जहां ठोस आत्मसजगता राजनीतिक दृष्टि पैदा करती है। उनकी शैली की ऐन्द्रिकता एक झुरझुरी पैदा करती है, एक विद्युत लहर की तरह सचेत कर जाती है।

उपन्यास शुरू होता है मंत्री कबराल की बेटी उरानिया के विदेश से लौटकर आने से। कई साल बहिष्कृत होकर न्यूयार्क रहने के बाद उरानिया अपने बीमार पिता को देखने वापिस डॉमनिकन रिपब्लिक आई है। वहां के लोगों को देख कर सोचती है -

''यह बेढंगा सा उत्साह उन लोगों की एक बहुत बड़ी ज़रूरत है, अपनी ज्ञानेन्द्रियों को मुर्दा कर देने के लिए ताकि वे कुछ सोच न सकें, कुछ महसूस न कर सकें। जंगली, असभ्य ज़िन्दगी का एक विस्फ़ोट - नएपन के बहाव से अछूता। डॉमिनिकन लोगों में अब भी आदिमानव जैसा जादुई कुछ है जैसे कि शोर की भूख। शोर की, संगीत की नहीं।''

यह उस बेटी की सोच है जो तेरह साल देश से बहिष्कृत होकर बाहर रहने के बाद वापिस लौट कर अपने पिता से मिलती है, अपंग पिता - कबराल जो डिक्टेटर तरुहियो का दायां हाथ था।

''अपने खाने, सोने, कपड़े, पहनने, उतारने, नाखून काटने, मलमूत्र त्यागने के लिए नर्स पर निर्भर रहना एक प्यारा सा प्रतिशोध है। क्या तुम्हें लगता है, तुम्हारा बदला पूरा हुआ? वह पूछती है। नहीं?''

योसा इसी तरह यथार्थ को कठोर बनाते हैं। अपने समकालीन गार्सिया मार्केस की तरह जादुई नहीं। लेकिन मार्केस की अर्न्तदृष्टि और कलात्मकता, विचारों की तरलगामिता, हास्य-कठोरता, नैरेशन की सामर्थ्य का आज कोई सानी नहीं है। पिछले पचास वर्षों में मार्केस जैसा सार्थक, सम्पन्न और भाषा का जादूगर विश्व में दूसरा नहीं हुआ।

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कुछ मान्यताएं समय सिद्ध होती हुईं भी लोक स्वीकृत नहीं बन पातीं। यही बात कई साहित्यिक कृतियों के साथ होती है। वे अपने समय के तथ्यों को इस तरह उजागर करती हैं कि हां हां करते हुए भी पाठक उन्हें मन ही मन नकार रहा होता है। यह दोष रचना के झूठ सच का नहीं है बल्कि उस मानस का है जहां से वह प्रस्फुटित हो रहा है। यही दोष अरविन्द अडिगा के उपन्यास The White Tiger (2008) का है। पूरे उपन्यास में वर्णित एक बात पर भी उगंली नहीं रखी जा सकती जिसे झूठ कह कर नकार दिया जाए। लेकिन वह सब कुछ ऐसे आदमी के लेखन से आ रहा है जो लगता है इस समाज को बिल्कुल प्यार नहीं करता, इस समाज के प्रति घृणा से भरा हुआ है। जिस विनाश में पुनर्सृजन की सम्भावनाएं बिल्कुल न हों, उस विनाश को जनमानस कृतित्व कहकर स्वीकार नहीं कर सकता। रचनाकार के मन में कहीं कोई आशा, कोई विकल्प, कोई सुरंग के बाहर की रोशनी नहीं है। वह सिर्फ़ अन्धेरे में घूम रहा है। इसीलिए भारत के माहौल के लिए Darkness का शब्द बार बार प्रयोग हुआ है। जो रूप भारतीय समाज, राजनीति, भ्रष्टाचार, पुलिस की निरंकुशता, बेईमानी, देहव्यापार, आमजन के लिए अवसरहीनता और भ्रष्टाचारियों के लिए अवसर प्रचुरता, हत्या, चोरबाज़ारी, शिक्षा की काल कोठरी, बालशोषण इत्यादि जो कुछ बातें बलराम हलवाई, टैक्सी कम्पनी के मालिक के माध्यम से उठाई गई हैं, वे सब कुछ सच हैं, शब्दशः सच। लेकिन घृणा से भरी हुई हैं, सह-अनुभूति का एक अंश भी नहीं। इसीलिए घोर अस्वीकृत हैं। इतनी घोर घृणा की तरफ़ देखते देखते आंखें पथरा जाती हैं। गालियां सुनते सुनते मुट्ठियां तन जाती हैं। कर्कश अपयश गान केवल हमारी वर्तमान स्थितियों का ही नहीं, हमारे इतिहास का भी है। हमारी प्राचीन उपलब्धियां अरविन्द (बनकाब बलराम हलवाई) के लिए एक Rooster Coop से अधिक कुछ नहीं। ''Mr. Jibabo, Sir, when you get here, you'll be told we Indians invented everything from the internet to hard bolied eggs to space ships before the British stole it all from us. Nonsense, the greatest thing to come out of this country in ten thousand years of its history is the Rosster Coop.''

ऐसे आदमी के मुंह से एक बार भी Our Country नहीं निकलता, This Country ही निकलता है। कोई नुक्कड़ पर खड़ा छाबड़ी वाला भी, विश्वविद्यालय का विद्वान भी, सैक्रेटेरिएट में बैठा अफ़सर भी, मंत्री भी, हमारे एम.एल.ए., एम.पी. भी इन परिस्थितियों को जानते हैं क्योंकि वे ही इन स्थितियों के निर्माता और ज़िम्मेदार हैं। और उन की जितनी भर्त्सना की जाए, कम है। लेकिन देश से बाहर दुनिया के लिए इन स्थितियों के पोस्टर बना कर बेचने और वाहवाही लूटने की हवस उससे भी कहीं अधिक भर्त्सनायोग्य है। किसी समाज को पहले प्यार करना ज़रूरी है। फिर उसके दोष बताना सिर माथे पर। कोई भाषायी चमत्कार, कोई नंगई, कोई वर्णन वैभव आकर्षित नहीं करता जहां सहानुभूति, सृजनात्मक विकल्प और सदेच्छा उसका आधार न हों। अमेरिका से बार बार तुलना करना 'Not like America' कहना वहां के समाज के प्रति भी अज्ञान प्रदर्शित करता है। 'केवल पात्र बलराम बोल रहा है' कह कर अपनी उथली अंहकृत मानसिकता को छिपाया नहीं जा सकता। उपन्यास के अन्त में एक मानव उदय होता है और अपने कलुष को उजागर करता है। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। फिर भी बलराम का यह आत्म स्वीकार हमें भी आत्म स्वीकार की स्थिति की ओर ले आता है। एक तिनका है जो डूबते का सहारा बनता है : ''Why not? Am I not a part of all that is changing in the country? Haven't I succeeded in the struggle that every poor man in the country should be makin.... the struggle not to take the lashes your father took...''

अपने मालिक अशोक का मर्डर भी सामने आता है... ''It has darkened my soul. All the skin whitening creams sold in the markets of India won't clear my hands again. कहीं कहीं व्यंग्य बहुत धारदार है जैसा होना चाहिए। और कहीं स्थितियों के वर्णन की ऐसी उमस है जहां सृजन का वाष्प पैदा होता है। ''It was the time of the day teashop got cleaned. One of the human spiders dropped a wet rag on the floor and started to crawl with it, pushing a growing wavelet of stinking ink-black water ahead of him... As the black spider went past, a voice inside me said, 'But, your heart has become even darker than that, Munna.''

यह सब उपन्यास के अन्त तक आते हुए घटता है। यह उस दुर्भाव को ढीला करता है जो सारे उपन्यास में हमारा पीछा करता है। लेकिन फिर भी वह सद्‌भाव पैदा नहीं होता जो सृजन से पैदा होता है, जो हर ऊंची व्यंग्यात्मक कृति भी पैदा करती है।

इस अर्थ में श्रीलाल शुक्ल के 'राग दरबारी' का व्यंग्य उस कुंठा से नहीं जन्मा जो अपने समाज की हीनता तक ही सीमित रहता है। अनुभूतियां कठोरता की उन गहराईयों तक भी पहुंचती हैं जहां केवल तरल पदार्थ है - सहानुभूति और पुनर्सृजन का तरल पदार्थ।

सबसे टुच्ची बात अडिगा के उपन्यास की है, उसका चीनी प्रधानमंत्री को यह सारी स्थितियां चिटि्‌ठयों में बताने की कोशिश करना। उनके बैंगलोर आगमन से पहले उन्हें भारतीय सत्य से अवगत कराने का यह तरीका बेहद हास्यास्पद है। सात रातों में लिखी गई यह चिटि्‌ठयां एक भौंडा तरीका है, जो यथार्थ और सार्थकता से दूर ले जाता है। अडिगा के शक्तिस्त्रोत को इस तरह भावनाहीन रिक्तता में बिखरते देखकर अफ़सोस हुआ।

साहित्य में कम से कम तीन विश्वप्रसिद्ध उपन्यास हैं जो पत्र शैली में लिखे गए और जिन्होंने इस कला में नए सृजनात्मक आयाम स्थापित किए। 1740 में रिचर्डसन का Pamela पत्र शैली में लिखा पहला मनोवैज्ञानिक उपन्यास माना जाता है। गेटे का Sorrows of Young Werther (1774) एक ट्रैजिक रोमांटिक उपन्यास था जिसने अपने समय में योरोपियन ख्याति पाई और हमारी समकालीन एलिस वाकर का 'कलर पर्पल' Color Purple बेजोड़ अमरीकी उपन्यास है जो समाजशास्त्रीय मूल्यों की अकादमिक प्रस्तुति का माध्यम बना हुआ है।

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सन्‌ 2003 में एक और महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुआ। खालिद हुसैनी का Kite Runner. तीन भागों में विभाजित यह कथा अफ़गानिस्तान की दुर्दशा की आंखों देखी तस्वीर खींचती है। सोवियत आक्रमण से पहले का शान्तिपूर्ण समय पहले भाग में है। बाबा, पुत्र अमीर, नौकर अली और नौकर का बेटा हसन। अमीर और हसन दोस्त भी हैं। बचपन के खेलों के साथी। हसन एक हठी मासूमियत और ज़िद्दी वफ़ादारी की तस्वीर है। अमीर एक दब्बू और कायर अमीरज़ादा। हसन कटी पतंग को लूटने में महारत रखता है। अपने दोस्त के लिए वह बदमाश लड़के से पिटता है, अपना रेप भी करवाता है। अमीर चुपचाप खड़ा देखता है, अपराधबोझ से दबा रहता है। '' ...I waited for him to say something. But we stood there in fading light. I was grateful for the early evening shadows that fell on Hasan's face and concealed mine... ''

घटनाओं का वर्णन, दृश्यों का अंकन, सारे माहौल में अफ़गानी सुगन्ध उस समय की स्मृति को जीवित करती है। रूसी आक्रमण के बाद अफ़गानिस्तान की बरबादी और तालिबानी मज़हबी हकूमत की स्मृति को और गहराई में स्थापित कर जाती है।

दूसरे भाग में कहर बरपा होता है। पांच साल बाद सोवियत आक्रमण। बाबा अमीर को लेकर पेशावर और फिर यू.एस.ए. चले आते हैं। शरणार्थी जीवन की तरह अभावों में रहते हैं। यह भाग ज़िन्दगी के उस हिस्से को सजीव करता है जो अपनी अपूर्तियों के माध्यम से ही अपनी पूर्तियों तक पहुंचता है। छोटे छोटे दैनिक संघर्षों की धरती बडी़ उपजाऊ होती है, उसी से हमारा चरित्र उपजता है।

तीसरे भाग में अफगानिस्तान पर तालिबान काबिज़ है। वही आसिफ़ जिसने हसन का रेप किया था, अब तालिबान के एक समूह का नेता है। रहीम चाचा के बुलाने पर अमीर नौकर हसन के अनाथ बेटे को बचाने अफ़गानिस्तान पहुंचता है। रहीम चाचा बताते हैं कि हसन अमीर के पिता की ही सन्तान था। अमीर अफ़गानिस्तान पहुंचकर जो दुर्दशा देखता है, उसका बयान एक साहित्यिक उपलब्धि है और ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी। एक आदमी और औरत को नाजायज़ सम्बन्ध रखने के लिए जिन्दा गड्‌ढे में गाड़ कर पत्थरों से मार दिये जाने का वीभत्स दृश्य भी है। हत्या का दृश्य फुटबाल मैच के अन्तराल में घटता है। आधा मैच पहले, आधा मैच बाद में, बीच में नृशंस हत्या। मैच के लिए जमा हुई भीड़ का प्रयोग इस तरह किया गया है। ऐसा दृश्य भीड़ के बगैर अपनी धार्मिक ओजस्विता प्राप्त नहीं कर सकता था। काबुल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाला प्रोफ़ेसर अब एक अनाम भिखारी है। अमीर को वह हाफ़िज़ की ग़ज़ल सुनाता है तीन रुपये के लिए। यूनिवर्सिटी में वह रूमी, बेदिल, जामी, सादी और हाफ़िज़, जैसे शायरों का अदबी कोर्स पढ़ाता था। अब वह बदबूदार कपड़ों में, नंगे पैर भीख मांगता है। यह कहानी समाप्त होने पर भी कहां समाप्त होती है। राजनीतिक हथकंडों के परिणाम भुगतते हुए आम लोगों की दुर्दशा देखने की आदी हो चुकी दुनिया में इस तरह के विषय को लेकर भावुकता पैदा करना आसान बात नहीं। ऐसी कृतियां ही इतिहास को दूर की चीज़ नहीं बनने देती, एक परिचित सुगन्ध की तरह बीते हुए को कभी भी वापस ले आती हैं।

ख़ालिद हुसैनी की Kite Runner किसी दार्शनिक मुद्रा तक नहीं पहुंचती, जहां सुख दुख से गुज़र कर आदमी उन निर्णायक स्थलों तक पहुंचता है जो चुपचाप एक अर्थ थमा जाते हैं, एक दृष्टि जगा जाते हैं। लेकिन उपन्यासों की अनर्गल भीड़ में ख़ालिद हुसैनी की यह कृति अपने ख़ास नैन नक्श ज़रूर रखती है।

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आतंक! दो तरह का आतंक! राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से हर तरफ़ बेदख़ल कर दिए गए उग्रवादी अपनी सत्ता कायम रखने के लिए आतंक का सहारा लेते हैं और धर्म का भी। दूसरा आतंक पूंजीवाद का! पूंजीवाद का आधार है बड़ी बड़ी कारपोरेशन्ज़ का विश्वव्यापी फैलाव और उनकी अथाह राजनीतिक शक्ति। आज का मुख्य जीवन दर्शन यही कारपोरेट वर्ल्ड तय करता है। तथ्य अपने कारपोरेट अर्थानुवाद में ही अपनी सिद्धि प्राप्त करते हैं। इसी कारपोरेट दुनिया के तीन चार चरित्रों पर आधारित अलका सरावगी का नया उपन्यास 'एक ब्रेक के बाद' सन्‌ 2008 में आया है।

'एक ब्रेक के बाद' में कारपोरेट दुनिया की भीतरी तस्वीर नहीं है। वे दुनिया में जिस तरह कारोबार करते हैं, इसकी कोई झलक नहीं है। उनके व्यापारिक फैलाव के कील पेंच, काम करने का तरीका, प्रशासन तन्त्र, हायरिंग-फ़ायरिंग की रहस्यात्मक प्रक्रियाएं, आन्तरिक संचालन और भीतरी मशीनी स्वरूप का उद्घाटन नहीं है। न ही उपन्यास इस उद्देश्य से लिखा गया है। जो बातें इस वैश्विक व्यापारिक प्रसार को गौरान्वित करने के लिए हमारे शास्त्री लोग हवा में उछालते रहते हैं, उन बातों को उपन्यास के आरम्भ में कुछ अध्यायों में अच्छे सन्दर्भों के माध्यम से पकड़ा गया है।

वी.के., गुरुचरण और भट्‌ट ये तीन मुख्य पात्र हैं। वी. के. और भट्‌ट की पत्नियां भी हैं। गुरुचरण तन और मन दोनों से अकेला है। तीनों उच्च कोटि की कारपोरेट समझ रखते हैं। बहुत ऊंचे पदों पर आसीन हैं। ऐसे पदों पर सवार लोग घोड़ों पर सवार लोगों से बिल्कुल अलग होते हैं। उनके ओहदे वफ़ादार घोड़े नहीं होते। कभी भी सवार को कहीं भी पटक सकते है। यही इस व्यापारी दुनिया का सत्य है।

तीनों मुख्य चरित्र याद रह जाने वाले चरित्र हैं। उन की मनस्थितियां ही उपन्यास की घटनाएं बनती हैं। मनस्थितियों के लम्बे लम्बे ब्यौरे पन्नों पर बिखरे पडे़ हैं। इन्हीं ब्यौरों में उनकी व्यापारी सोच भी उजागर होती है।

''देखो, इस देश की रीस्ट्रक्चरिंग' या पुनर्गठन करना है, तो कुछ लोग हारेंगे, कुछ लोग जीतेंगे। हारनेवाले प्रायः वही होंगे जो पुराने जमाने से फ़ायदे उठाते रहे हैं। पुराने उद्योगपतियों को अब विदेशी कम्पनियों की क्वालिटी से होड़ लेनी पड़ेगी। किसानों को सस्ते दामों पर सरकार से जो पानी, बिजली, खाद मिलती आई थी, वह सब्सिडी बंद हो जाएगी। सरकारी दफ़्तरों और फैक्टरियों में जो लोग बिना कुछ काम धाम किए मक्खियाँ मारते बैठे थे और देश पर बोझ बने हुए थे, उनकी नौकरियों की कोई गारंटी नहीं रहेगी। तुम यह जान लो गुरुचरण कि गरीबों का सवाल उठाने वाले दरअसल आर्थिक सुधार के मुद्‌दे को भटकाना चाहते हैं। ''

आपसी संवाद और संवादों के बाद मनस्थितियों के ब्यौरों का अन्तराल - यही उपन्यास का मन है। मन ही एक घनिष्ठ परिचित की तरह साथ चलता रहता है। एक स्वतंत्र चरित्र की तरह मन हर जगह साथ है।

गुरुचरण इन दो मित्रों वी.के. और भट्‌ट के अलावा कई नारियों का अंतरंग मित्र है। अक्सर काम से 'ब्रेक' लेकर इधर उधर भटका करता है। इन औरतों को लेकर पहाड़ या कहीं भी घूमता है। भट्‌ट भी प्रायः उसके साथ होता है। फूल, जंगल, झरने, पहाड़, मित्र और नारियां सब उसी रहस्यमय मन के अनेक रूप हैं जिन्हें वह पकड़ कर न रख सकता है, न रखना चाहता है। प्रेम से अधिक प्रेम की तलाश उसकी पूंजी हैं। उतरांचल में फूलों वाली घाटी में अकेला सर्दी से बीमार पड़ कर मर जाता है। उसकी डायरी, उसका मन अन्त में भट्‌ट के सामने खुलता है। भट्‌ट की एक बौनी सी बेचैनी के बाद फिर उसी कारपोरेट दुनिया की तरफ वापसी में ही उपन्यास का अन्त होता है। उपन्यास के मूल मंत्र इन उक्तियों में ध्वनित है -

''यही तो मन है जो पल-पल बदलता है। कभी किसी चीज़ को महत्व देता है और कभी महत्व हटा लेता है। इसी को तो समझना है। और समझने को है क्या दुनिया में।''

पिछले दशक में कई उपन्यास, आज के मुद्दों को लेकर सामने आए हैं। उनमें से कुछ इस अंक में रेखांकित भी हैं। कुछ उपन्यासों की हम अगले अंक में चर्चा करेंगे।

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हिन्दी उपन्यास ने सभी पहलुओं और सामाजिक समस्याओं को छुआ है। पिछले कई दशकों से हिन्दी में अच्छे उपन्यास तो बहुत आए हैं, लेकिन बड़ा उपन्यास कोई नहीं आया। दिलो दिमाग पर और अहसास पर छा जाने वाला उपन्यास नहीं आया। कई पहलुओं को हमारे उपन्यासों ने मार्मिक ढंग से भी छुआ है। दलित चेतना, स्त्री मुक्ति, मानवीय सम्बंध, साम्प्रदायिकता, गरीबी, किसान, मजदूर, शहर-कस्बे-गांव, देह व्यापार, प्रेम, वासना, भ्रष्टाचार, राजनीति, गुण्डागिरी, देश-भक्ति, क्रांतिकारी, पूजा-पाठी यानी शायद ही कोई विषय हो जिसे हिन्दी उपन्यास ने बांधने की कोशिश न की हो। फिर भी हमारे उपन्यासों की ज़िन्दगी अधूरी है, सीमित है, एकांगी है। अनुभव गली के नुक्कड़ तक जाकर घर लौट आते हैं। पहले किसी उद्देश्य को तय करके घर से निकलने भर का साहस मात्र है। उन आश्चर्यों में प्रवेश करने का नहीं, जो सदा ही कारणहीनता से पैदा होते हैं। जहां से सब कुछ दांव पर लगा देने के बाद भी शायद खाली लौटना पड़ता है। जहां सिर्फ़ खो देने में ही दृष्टि मिलती है, जहां साहस ही अपने आप में एक मंज़िल है। उसी यात्रा में इन्सानों के दुख-दर्द, प्रेम, वासना, विचार, दृष्टि, मूल्य, राजनीति, नीति-अनीति - सब कुछ अपनी निरंकुशता में प्रकट होते हैं। उन्हें जीवन के अंतिम सत्य भले ही न कहो लेकिन एक महाकाव्यात्मक प्रयास के बाद की मुक्ति वहां अवश्य होती है। लेखक के लिए भी, पाठक के लिए भी। इस तरह का साहस जुटाना अभी बाकी है। अकारण में प्रवेश बाकी है। विस्तृत अनुभव और उन अनुभवों की अन्तर्सम्बन्धित निरन्तरता का फैलाव अभी बाकी है जहां पाठक को दृष्टि की अचूक निर्भयता मिलती है। औपन्यासिक तृप्ति बाकी है। Old Man and the Sea का एक दिन, एक रात बाकी है। One Hundred Years of Solitude का एक सदी पर छा जाने वाला महाप्रयास बाकी है। उसके आसपास का आभास भी अभी बाकी है।

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(फरवरी 2010)


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हिंदी समय में कृष्ण किशोर की रचनाएँ