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लेख

बंगाल में रंगमंच का इतिहास और वर्तमान
कृपाशंकर चौबे


बांग्ला रंगमंच का दो सौ साल से भी लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। बंगाल में रंगमंच की शुरुआत 1795 में हुई। अठाहरवीं शताब्दी के समाचार पत्रों में छपे विज्ञापन से पता चलता है कि रूसी रंगकर्मी गेरोमिस स्तेपोनोविच लिएबेदेफ 1795 में मद्रास से कलकत्ता आए और डोमतला में उसी साल नवंबर में एक मंच निर्मित कर 'काल्पनिक संवदल' नामक नाटक का मंचन कराया। उस अस्थायी सभागार का नाम बंगाली थियेटर रखा गया था और उस नाटक में बंगाली कलाकारों ने ही अभिनय किया था। नवंबर 1795 के चार माह बाद मार्च 1796 में उस नाटक का दूसरी बार मंचन हुआ। उस कालखंड में अंग्रेजों ने अपने मनोरंजन के लिए कलकत्ता में प्ले हाउस (1745-1756) और कैलकाटा थियेटर (1775) नामक सभागार बनाए किंतु वहाँ बांग्ला नाटकों के मंचन का उल्लेख नहीं मिलता। वहाँ किन अंग्रेजी नाटकों के मंचन हुए, इसका प्रामाणिक विवरण भी नहीं मिलता। उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में शेक्सपीयर तथा भवभूति के नाटकों के मंचन के बारे में उल्लेख मिलता है। 'समाचार चंद्रिका' में प्रकाशित एक समाचार से पता चलता है कि भवभूति के 'उत्तर रामचरित' का मंचन 1831 में प्रसन्न कुमार ठाकुर के बागानबाड़ी में हुआ था। इसी तरह 'हिंदू पायनियर' के 22 अक्टूबर 1835 के अंक में छपी एक नाट्य रंग समीक्षा से पता चलता है कि बंगाली बाबुओं के बागान या प्रासाद में बांग्ला नाटक 'विद्यासुंदर' का मंचन हुआ था। उसी के आस-पास 'विद्याविलास' तथा 'लोर चंद्राणी' नामक नाटकों के मंचन भी हुए। 1852 से 1872 के बीच बांग्ला में 157 मौलिक नाटक लिखे गए। 1857 में रामजय बसाक के चड़कडांगा नतूनबाजार स्थित घर के सामने मंच बनाकर 'कुलीनकुलसर्वस्व' नामक नाटक मंचित किया गया था। उसी साल आशुतोष देव और कालीप्रसाद सिंह के घरों के सामने 'शकुंतला', 'महाश्वेता', 'बेनीसंहार', 'विक्रमोवर्शी' नामक नाटकों के मंचनका उल्लेख मिलता है। उसी समय बांग्ला नाटकों के मंचन के लिए स्थायी रंगशाला बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस की गई और उसी क्रम में बेलगछिया थियेटर (1858), पाथुरियाघाट रंगालय (1859), जोड़ासांको थियेटर (1865) की स्थापना हुई। शोभाबाजार देवबाड़ी रंगालय भी उसी दौरान बना। इन रंगशालाओं में कई नाटकों के मंचन हुए। उसी दौर में माइकल मधुसूदन दत्त बांग्ला रंगमंच में आए। 1873 में उनके परामर्श से ही उनके नाटक 'शर्मिष्ठा' में स्त्री पात्र की भूमिका एक स्त्री ने निभाई। उसके पहले स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते थे।

गिरीश चंद्र घोष ने 1973 में बंकिम के उपन्यास 'कपालकुंडला' का मंचन किया। बंकिम के दूसरे उपन्यासों के भी मंचन हुए। इस कालखंड में रंगमंच को बंकिमचंद के उपन्यासों ने ही बचाया। गिरीशचंद्र ने नाट्य रूंपातर के साथ खुद भी कई नाटक लिखे जैसे 'कमले कामिनी', 'आगमनी', 'दोललीला', 'पारस्यप्रसून', 'हीरक जुबिली', 'मायाकानन', 'अबू हुसैन', 'मयावसान', 'कालापहाड़' आदि। उन्होंने कई नाटकों में अभिनय भी किया। गिरीश युग के बाद बांग्ला रंगमंच में शिशिर युग आता है। 'सीता', 'नवनारायण', 'दिग्विजयी' समेत कई नटकों का शिशिर कुमार ने मंचन किया। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में शिशिर युग का पर्याप्त प्रभाव रहा। इस दौरान शरतचंद्र के कई उपन्यासों का नाट्यरूपांतर हुआ और 'चरित्रहीन', 'आंधारे आलो', 'षोड्शी', 'विराज बऊ', 'अचला-गृहदाह' जैसी रचनाओं के मंचन हुए। तब तक कई सभागार बन गए थे जैसे - स्टार, मिनर्वा, बेंगाली थिटेट्रिकल कंपनी, आर्ट थियेटर, कार्नवालिस थियेटर, अल्फ्रेड मंच आदि।

1881 में रवींद्रनाथ के नाटक 'बाल्मीकि प्रतिभा' का मंचन हुआ। उसके एक साल बाद 1882 में 'कालमृगया', 1889 में 'राजा उ रानी', 1890 में 'विसर्जन' का मंचन हुआ। बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक कर रवींद्रनाथ ठाकुर के जिन नाटकों की बंगाल में धूम रही, वे हैं - 'चिरकुमार सभा', 'गृहप्रवेश', 'वशीकरण', 'विदाय अभिशाप', 'शोध बोध', 'चित्रांगदा', 'शेष रक्षा', 'तपती' और 'मुक्तिर उपाय'। बांग्ला रंगमंच को रवींद्रनाथ ने लगातार साठ वर्षों तक सींचा। उनके नाटकों के अनेकानेक मंचन हुए। खुद रवींद्रनाथ ने भी अपने नाटक खेले। उनमें अभिनय किया। 1941 में रवींद्रनाथ का निधन हो गया किंतु उसके बाद भी बांग्ला रंगमंच के लिए वे अपरिहार्य बने रहे और आज भी बने हुए हैं।

बीसवीं शताब्दी में चालीस के दशक में कुल 64 नाटकों के मंचन का प्रमाण मिलता है। तब बांग्ला रंगमंच इप्टा के प्रभाव में आ चुका था। विजन भट्टाचार्य, शंभु मित्र, ऋत्विक घटक और उत्पल दत्त बांग्ला रंगमंच के नए रहनुमा बनकर दर्शकों के सामने आए। विजन भट्टाचार्य के 'आगुन' (1943), 'जवाबबंदी' (1944) और 'नवान्न' (1944) ने बांग्ला दर्शकों को उद्वेलित करके रख दिया। 'नवान्न' में विजन भट्टाचार्य के अलावा ऋत्विक घटक और शंभु मित्र ने भी अभिनय किया था। 1951 में उत्पल दत्त ने रवींद्रनाथ के नाटक 'विसर्जन', 1952 में शेक्सपीयर के 'मैकबेथ', 1953 में रवींद्रनाथ के 'अचलायतन' और सुनील चट्टोपाध्याय के 'किरानी' का निर्देशन किया। इन नाटकों में उत्पल दत्त ने अभिनय भी किया। 1948 में शंभु मित्र ने बहुरूपी नामक रंग-संस्था बनाई। शंभु मित्र ने 'चार अध्याय', 'राजा' और 'रक्तकरबी' जैसे नाटकों के जरिए नए ढंग के रवींद्रनाथ का पुनराविष्कार किया। शंभु मित्र ने तुलसी लाहिड़ी कृत 'छेड़ा तार', हेनरिक इब्सन कृत 'पुतुल खेला' तथा 'दास चक्र', सोफोक्लीज कृत 'राजा ओडिपस' नाटकों का निर्देशन भी किया। शंभु मित्र के नाटकों की प्रकाश व्यवस्था तापस सेन और मंच व्यवस्था खालेद चौधरी सँभालते थे। बांग्ला रंगमंच में इन दो विभूतियों को आधी शती से ज्यादा समय तक समृद्ध बनाए रखने में योगदान किया।

आजादी के बाद के बांग्ला रंगमंच की जब भी चर्चा होगी तो 'रुद्धसंगीत' नामक नाटक का उल्लेख अनिवार्यतः आएगा। यह नाटक देवब्रत विश्वास के जीवन संघर्ष पर केंद्रित है किंतु उसी के बहाने दर्शक इप्टा के समूचे इतिहास को मंच पर जीवंत होते देख पाते हैं। ब्रात्य बसु निर्देशित यह नाटक बताता है कि पचास और साठ के दशक में इप्टा किस तरह देशव्यापी सांस्कृतिक वातावरण बनाने में जुटा था किंतु कम्युनिस्ट नेतृत्व बंगाल में उसे पचा नहीं पा रहा था। इप्टा से उभरे ऋत्विक घटक, सलिल चौधरी जैसे सांस्कृतिक नायकों तक को तब का कम्युनिस्ट नेतृत्व नहीं बर्दाश्त कर पाया था। सलिल के बाद ऋत्विक से पार्टी के जवाब-तलबवाले दृश्य को ब्रात्य ने मंच पर इस तरह रचा है कि वह पूरी बहस ही जीवंत हो उठती है। ज्योति बसु व प्रमोद दासगुप्त से ऋत्विक घटक कहते हैं - 'हमारी जनप्रियता ही तो आपके सिरदर्द का कारण है।' जवाब तलब के इस दृश्य को ब्रात्य ने समकालीन संदर्भों से भी जोड़ा है। 'आमरा-ओरा' का संदर्भ और संचार माध्यम (बांग्ला चैनल चौबीस घंटा) का संदर्भ नाटक को समसामयिक बनाता है। इस दृश्य में प्रमोद दासगुप्त का अभिनय पहले ब्रात्य करते थे। इस नाटक के सौ से ज्यादा शो हो चुके हैं। प्रमोद दासगुप्त की भूमिका अब देवाशीष विश्वास निभाते हैं।

नाटक बताता है कि कम्युनिस्ट नेतृत्व आज जितना रेजिमेंटेड है, उतना ही पचास-साठ के दशक में भी था। ऋत्विक घटक और सलिल चौधरी की तरह देवब्रत की भी अततः कोई पार्टी नहीं रह जाती। नाटक में देवब्रत का एक संवाद है - 'मेरा कोई धर्म नहीं है, यह संगीत ही मेरा धर्म है। मैं कलाकार हूँ जिसका जैसे कोई धर्म नहीं होता, जाति नहीं, उसी तरह कोई पार्टी भी नहीं।' देवब्रत विश्वास उर्फ जार्ज विश्वास उग्र वामपंथ के वे विरोधी हैं। वे कहते हैं - 'वायलेंस को मैं घृणा करता हूँ।' माओवाद उन्हें कमाओवाद की तरफ जाता दिखता है। देवब्रत जैसे विख्यात संगीतकार की शांतिनिकेतन ने उपेक्षा की तो आनंद बाजार पत्रिका जैसे अखबार ने उनकी नाहक आलोचना की। पर वे टूटे नहीं। नाटक में उनका एक संवाद है - 'मेरे समकाल ने मुझ पर सिर्फ थूक ही नहीं फेंका, मुझे प्यार भी दिया। हम अंधकार को जितना महत्व देते हैं, प्रकाश को नहीं। लोग हमें नहीं भूलते क्योंकि हम उनके हृदय में रहते हैं।'

देवव्रत विश्वास भारत के महानतम और सर्वाधिक जनप्रिय रवींद्र संगीत गायक थे। गणनाट्‌य संघ (इप्टा) के साथ उनकी संलग्नता और उससे संबंध-विच्छेद, कम्युनिस्ट पार्टी से उनका संन्यास, विश्वभारती के संगीत बोर्ड से उनके मतभेद की गहरी छानबीन यह नाटक करता है। देवव्रत विश्वास की भूमिका में देवशंकर हाल्दार ने असाधारण अभिनय किया है। देवशंकर हाल्दार के मुख से हरेक संवाद बांगाल (बांग्लादेश की बांग्ला) में सुनने के आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। सम्राट घटक ने हेमांग विश्वास, राजेश चट्टोपाध्याय ने सलिल चौधरी, सत्राजित सरकार ने ऋत्विक घटक, विल्वतोष चट्टोपाध्याय ने शंभु मित्र, रीना भट्टाचार्य ने तृप्ति मित्र, रक्तिम दत्त ने विजन भट्टाचार्य, प्रसेनजित चट्टोपाध्याय ने विनय राय, तन्मय सूर ने सुभाष मुखोपाध्याय, देवाशीष राय ने अरुण, पौलमी बसु ने शीला, सव्यसाची चट्टोपाध्याय ने ज्योति बसु, देवाशीष विश्वास ने प्रमोद दासगुप्त, सुभाष मित्र ने निर्मल घोष, चित्रांगदा चक्रवर्ती ने मंजुश्री चाकी सरकार, सुष्मिता गोस्वामी ने सुचित्रा मित्र, शुभायन भट्‌टाचार्य ने गोपेश सेन/ अंशु और ब्रात्य बसु ने संतोष कुमार घोष की भूमिकाएँ निभाई हैं।

यह संतोष की बात है कि पश्चिम बंगाल का मंत्री बनने के बाद भी ब्रात्य के भीतर का कलाकार और सर्जक शिथिल नहीं पड़ा है। 'व्योमकेश', 'अशालीन' तथा 'रुद्धसंगीत' के मंचन ब्रात्य की निरंतर रंग सक्रियता का प्रमाण हैं। इसी कड़ी में ब्रात्य बसु लिखित व देवेश चटर्जी निर्देशित नाटक 'विकेल-भोरेर सरसेर फूल' के मंचन का उल्लेख भी किया जा सकता है। रंगमंच के समानांतर सिनेमा में भी ब्रात्य ने अपनी अभिनय क्षमता तथा निर्देशन की छाप छोड़ी है। ब्रात्य ने 'रास्ता' और 'तीस्ता' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया तो 'कालबेला' समेत कई फिल्मों में अभिनय भी किया।

बांग्ला के जिस नाटककार के नाटक सबसे ज्यादा हिंदी में खेले गए, उसका नाम बादल सरकार है। बादल दा जितने बड़े नाटककार थे, उतने ही बड़े अभिनेता और निर्देशक भी। इससे भी बड़ी बात यह कि वे रंगमंच के सिद्धांतकार थे। उन्होंने तीसरा रंगमंच का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया और उसे बाकायदा मंच पर उतारा भी। भारतीय रंगमंच में तीसरे रंगमंच की मौलिक अवधारणा एकाएक नहीं जन्मी। उसके पहले बादल सरकार कई पड़ावों से गुजरे। वर्षों रंगकर्म करते हुए उन्होंने एक नई रंगभाषा की खोज की। उस खोज के भी कई चरण हैं जिन्हें पार करते हुए ही अंततः वे तीसरे रंगमंच का सिद्धांत रच सके थे। बादल दा के नाटक जब हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर खेले गए तो उनकी जनप्रियता बंगाल के बाहर, समूचे भारतवर्ष में फैली। यानी हिंदी में आने के बाद ही बादल दा पूरे भारत के नाटककार बने। परवर्ती काल में वे भारतीय रंगमंच के रहनुमा बने। बादल सरकार का बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने नाटक को प्रेक्षागृह से बाहर नि‍काला। आँगन मंच का यानी मुक्त मंच का सिद्धांत रचा। कम से कम खर्च में नाटक खेलना और सर्वसाधारण के लिए नाटक को निःशुल्‍क उपलब्‍ध कराना ही उनका मकसद रहा। मुक्त मंच का उनका अनुभव तीसरे रंगमंच की अवधारणा का मूलाधार बना। 15 जुलाई, 1925 को कोलकाता के एक ईसाई परिवार में जन्मे बादल उर्फ सुधींद्र सरकार ने शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी। नागपुर व कोलकाता में नौकरी की। रंगमंच में उनकी रुचि बचपन में ही हो गई थी। उन्होंने पहला नाटक साल्यूशव एक्स 1956 में लिखा। उसके बाद उन्होंने 'बोड़ो पीशी माँ', 'शनिवार' लिखा। उसके उपरांत 'सारा रात्तिर', 'बल्लभपुरेर रूपकथा', 'प्रलाप', 'पोरे कोनोदिन', राम श्याम जोदू, कवि कहानी जैसे महत्वपूर्ण नाटक उन्होंने लिखे। इन नाटकों का मंचन भी कराया। 1965 में उन्होंने 'एवं इंद्रजित' लिखा जिसके मंचन के बाद बादल दा की ख्याति चारों ओर फैल गई। उसी साल उन्होंने बाकी इतिहास नामक नाटक लिखा। उसके बाद बादल सरकार ने क्रमशः तीसवीं शताब्दी (1966), यदि फिर एक बार (1966), पगला घोड़ा (1967), सगीना मेहता (1970), अबू हसन, (1971) और मिछिल (1974) लिखा और मंचन भी किया।

अरसे तक उन्होंने 'आँगन मंच' में अपने नाटक प्रस्तुत किए। इस रंग शैली में शारीरिक अभिनय को विशेष महत्व दिया जाता है। इसके तहत बादल बाबू किसी हाल में अलग-अलग माप और ऊँचाई की कुछ बेंचें अलग-अलग सजा देते, उन पर दर्शक बैठ जाते और उनके आस-पास अभिनेता डोलते रहते। बाद में उन्होंने शहरी और ग्रामीण मंच से अलग एक 'तीसरा रंगमंच' प्रस्तुत किया। 1970 से 1993 तक बादल सरकार के सभी नाटक तीसरे या विकल्प के रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखे गए। बादल सरकार ने अपने साथियों के साथ 'परिक्रमा' कार्यक्रम के साथ बंगाल के अनेक जिलों में गाँव-गाँव जा कर नाटक किए और बंगाल के ग्रामीण जनों से सीधा रंगसंपर्क बनाया। बंगाल में गाँव-गाँव घूम कर बादल सरकार ने रंगकर्म का संदेश दे कर अभिजात्य नाट्य जगत को चुनौती दी। उनके नाटकों में कलाकारों और दर्शकों के बीच कोई फर्क नहीं होता। बादल सरकार ने आँगन, छत, नुक्कड़ और गाँवों में नाटकों को पहुँचा कर नाटक को व्यापक बनाया। पूरे देश में इन नाटकों को विभिन्न भाषाओं में, छोटे-बडे़ शहरों-कस्‍बों में विभिन्‍न नाट्य संस्‍थाओं द्वारा खेला गया। बादल सरकार के तीसरे रंगमंच ने भारत की भाषाई, प्रांतीय और सांस्कृतिक दूरियों को खत्म कर पहली बार एक सार्थक भारतीय रंगमंच विकसित करने की दिशा में एक सफल प्रयोग किया। मराठी, हिंदी, पंजाबी, गुजराती, मलयाली, कन्नड़, ओडिय़ा आदि भारतीय भाषाओं में उनके नाटक मंचित हुए और किसी न किसी रूप में देश के सभी प्रांतों के रंगकर्मियों को तीसरे रंगमंच ने अपनी ओर आकृष्ट किया।

बादल दा के रंगकर्म के तीन पड़ाव हैं। जैसा कि चिन्मय गुहा ने लिखा है - 'आज से सौ वर्ष बाद शायद इस बात पर बहस हो कि क्या बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधि काल में, एक ही साथ तीन-तीन बादल सरकार हुए थे जिनमें से एक ने सरस पर बौद्धक रूप से प्रखर संवादों से भरे, कॉमिक स्थितियों की बारीकियों पर अपनी पैनी नजर साधे, बेहद प्रभावशाली हास्य नाटक लिखे थे। दूसरे, जिन्होंने समाज में हिंसा के, विश्व की राजनीतिक खींचातानी के चलते युद्ध की काली परछाई के, परमाणु अस्त्रों के, आतंक के और समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता के खिलाफ अपनी आवाज को अपने नाटकों में दर्ज किया था और तीसरे, जिन्होंने प्रेक्षागृहों के अंदर कैद मनोरंजन प्रधान रंगमंच को एक मुक्ताकाश के नीचे आम जनता तक पहुँचाने का सपना देखा था।' इस सपने के कारण ही बादल दा अपने नाटकों में ऐसा स्पेस रच पाए जिनमें समाज के द्वंद्व, चिंताएँ, बुनियादी प्रश्न और मूल्यबोध हमारे सामने आते हैं। उन्होंने शास्त्रीय और लोक दोनों ही परंपराओं की सूक्ष्मताओं को लेकर अपने नाटकों में अनंत संभावनाएँ रचीं। उसकी शुरुआत 'राम श्याम जोदू' से हुई थी। 'राम श्याम जोदू' की सफलता ने उन्हें एक अलग किस्म के थिएटर का जनक बनाया, जिसे भारत में 'थर्ड थिएटर' और 'साइको फिजिकल थिएटर' (मनो-शारीरिक रंगमंच) के नामों से जाना गया। सन् 1965 में उन्होंने दो नाटकों का निर्देशन किया। ये नाटक थे - एवम् इंद्रजीत और वल्लभपुर की रूपकथा। इन नाटकों के साथ ही बादल सरकार का नाम हर रंगकर्मी की जुबान पर छा गया।

शुरू में बादल दा सिर्फ नाटक लिखते थे। बाद में उसका मंचन भी करने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनके नाटकों का दूसरे दल उतना मंचन नहीं कर रहे हैं, जितना करना चाहिए तो वे खुद मंचन भी करने लगे, तदनुसार अभिनय भी करने लगे। तथ्य है कि 'शौभनिक' और 'बहुरूपी' को छोड़कर दूसरे नाट्य दलों ने बादल सरकार के नाटकों का मंचन नहीं किया। शौभनिक ने बादल बाबू के सिर्फ एक नाटक 'एवं इंद्रजित' का मंचन किया जबकि 'बहुरूपी' ने 'बाकी इतिहास', 'तीसवीं शताब्दी', 'प्रलाप', 'पगला घोड़ा', और 'जदि आर एक बार' का मंचन किया। 'रूप कथा' का मंचन पहले हिंदी में हुआ, बाद में बांग्ला में। परवर्ती काल में मुक्त मंचन शुरू किया। 'जुलूस', 'भोमा', 'गंडी' इसी शैली के नाटक थे। इनके मंचन में बादल बाबू मुँह से तरह-तरह की ध्वनियाँ निकाल उपयुक्त वातावरण रचते। अंग संचालन और समूहन से तरह-तरह के दृश्य चित्र उपस्थित करते। इन नाटकों में कलाकार उछलते-कूदते, घिसटते हुए दर्शकों के आस-पास डोलते, दर्शकों के कान में फुसफुसाकर कुछ कह जाते और दर्शकों के मन को छू जाते। इस तरह उन्होंने सार्थक प्रस्तुति और श्रमश्राध्य अभिनय का एक मानदंड उपस्थित किया। उन्होंने सड़क-चौराहे पर, पार्कों में, गाँवों में जाकर नाटक खेले। कोलकाता और कोलकाता के बाहर कई रंग शिविरों का आयोजन किया। उन्होंने वर्षों अपनी रंग संस्था 'शताब्दी ग्रुप थियेटर' को रोपा-सींचा और पल्लवित-पुष्पित किया। नाटक को ही पूरा समय देने के लिए उन्होंने दो बार नौकरी छोड़ी। नाटक और रंगमंच में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान, पद्मश्री, रचना समग्र पुरस्कार आदि से सम्मानित किया गया। उन्हें नेहरू फेलोशिप भी मिली। वे संगीत नाटक अकादमी के भी फेलो रहे। 13 मई 2011 को उन्होंने आखिरी साँस ली और उसके साथ ही रंगमंच में एक युग का अवसान हो गया।

पिछले प्रायः पाँच दशकों से बांग्ला रंगमंच की बहुचर्चित शख्सियत बने हुए हैं -रुद्रप्रसाद सेनगुप्त। उन्होंने अपनी विलक्षण रंग दृष्टि का बार-बार परिचय दिया है। रुद्रप्रसाद सेनगुप्त निर्देशित नाटकों - 'फुटबाल', 'गोल्पो होलेई सोत्यी', 'हाटे-बाजारे', 'पदीपीशीर बर्मी बक्शा,' 'सिटी आफ ज्वाय', 'लिटिल बुद्धा' से लेकर 'आटोग्राफ' तक को आज भी लोग याद करते हैं। यही बात रवींद्रनाथ ठाकुर के नाटक 'अचलायतन' के लिए भी सही है। यह 'पंचम वैदिक' की रंग प्रस्तुति है जिसकी स्थापना शंभु मित्र के संरक्षण में प्रायः तीन दशक पूर्व उनकी पुत्री साँओली मित्र ने की थी। साँओली मित्र ने 'पंचम वैदिक' के बैनर तले एक से बढ़कर एक नाटक खेले। साँओली मित्र की रंग सक्रियता इधर मद्धिम पड़ गई है जिसकी भरपाई संप्रति अर्पिता घोष कर रही हैं। सांसद बनने के बाद भी उनकी रंग सक्रियता ध्यान देने योग्य है। 'अचलायतन' की निर्देशक अर्पिता घोष ही हैं। कोलकाता में 'अचलायन' के कई सफल शो हो चुके हैं। कहना न होगा कि रवींद्रनाथ बांग्लाभाषी रंगदर्शकों के लिए नित नए रूप में सामने आते हैं और उनके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। रवींद्रनाथ चिरनवीन हैं। 'अचलायतन' की रंग प्रस्तुति के साथ ही 'पंचम वैदिक' ने शंभु मित्र की परंपरा को भी अक्षुण्ण रखा है बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्धता भी दिखाई है। रवींद्रनाथ ने 'अचलायन' नाटक में परंपरा के नाम पर घिसी-पिटी रीतियों तथा अंधविश्वास पर प्रहार किया है। नाटक उस संगठन के इर्द-गिर्द घूमता है जो पुरानी रीतियों को लेकर अचल-अटल है। ऐसे धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक या राजनीतिक संगठन अभेद्य तथा दुर्गम नियमों से परिचालित होते हैं। जो भी उन नियमों को तोड़ते हैं, उन्हें कठोर दंड दिया जाता है। यहाँ तक कि संगठन के भवन की खिड़की तक खोलने के लिए एक बालक को कठोर दंड सुनाया जाता है। लेकिन संगठन में एक ऐसा समूह भी है जो इन परंपराओं का विरोध करता है। परंपरावादियों-कट्टरपंथियों के समूह में महापंचक है और उदारवादियों यानी स्वाधीनता का स्वाद चखने की आकांक्षा रखनेवालों के समूह में महापंचक का भाई पंचक है। यहाँ तक कि आचार्य भी परंपराओं के विरोधी हैं। परंपरा का विरोध करने की कीमत उन्हें निष्कासन के रूप में चुकानी पड़ती है। उपाचार्य भी आचार्य का साथ देते हैं और संगठन से बाहर कर दिए जाते हैं। पंचक भी बाहर कर दिया जाता है। अंततः गुरु आते हैं और परंपरावादियों-कट्टरपंथियों को लताड़ते हैं। गुरु को दादाठाकुर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। दादा ठाकुर या ठाकुरदा रवींद्रनाथ का प्रिय चरित्र रहा है। रवींद्रनाथ की रचना 'राजा' में भी ठाकुरदा (राजा) हैं तो 'डाकघर' में भी ठाकुरदा (फकीर) हैं। इस चरित्र के मार्फत ही रवींद्रनाथ अपनी बात कहते हैं। उनकी बात में जीवन दर्शन का सार होता है। 'अचलायतन' के दादा ठाकुर भी अंततः सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ते हैं और संगठन को पुरानी प्रथाओं से मुक्त करते हैं। वह स्वाधीन होकर साँस लेने, सोचने-विचारने के लिए नया संगठन बनाने के लिए मार्गदर्शन भी करते हैं। नाटक के मूल को, उसके मर्म को और सार को अर्पिता घोष ने अपनी इस रंग प्रस्तुति में पूरी तरह अक्षुण्ण रखा है। निर्देशक ने नाटक में यह प्रश्न शिद्दत से उठाया है कि जिन आदर्शों को लेकर धार्मिक या राजनीतिक संगठन बनाए जाते हैं, क्रमशः उनका क्षय क्यों होता जाता है और कैसे रह जाते हैं वे नियम, जिन्हें ये संगठन बनाते हैं और आदर्श क्यों खो जाते हैं? अनौचित्यपूर्ण नियमों को भी क्यों टोकना तक मना होता है? प्रश्न करना भी क्यों निंदनीय और पापपूर्ण माना जाता है? है। नाटक का यह संवाद देर तक दर्शकों के मन-मस्तिष्क में गूँजता रहता है - "जो मूर्ख हैं, वे ही प्रश्न पूछते हैं। जो कम जानते हैं, वे ही जवाब देते हैं और जो ज्यादा जानते हैं, वे जानते हैं कि जवाब नहीं दिया जाता।"

दृश्यानुकूल गीत-नृत्य तथा संगीत इस नाटक के आशय को पुष्ट करते हैं। अर्पिता घोष के रूहानी कंठ स्वर, तड़ित भट्टाचार्य के संगीत, सुदर्शन चक्रवर्ती की नृत्य संरचना और पारमिता मंडल की म्यूजिक प्लेयिंग को दाद दी जानी चाहिए। 'अचलायन' में नाटक के कलाकार जब रेजीमेंटेड फौजियों की तरह वेश-भूषा या कभी गेरुआ वस्त्र पहनकर मंच पर आते हैं तो एक भिन्न समय और भिन्न लोक के वातावरण की सृष्टि होती है। वेश-भूषा के लिए समृद्ध चटर्जी और मेक अप के लिए मोहम्मद अली प्रशंसा के पात्र हैं। चंदनदास की प्रकाश व्यवस्था और हिरण मित्र की मंच सज्जा भी उम्दा थी। कोई नाट्य निर्देशक विलक्षण निर्देशक तभी बनता है जो अपनी टीम की सारी प्रतिभा को उपयोग में लाता है। इस लिहाज से अर्पिता घोष विलक्षण नाट्य निर्देशक हैं। 'अचलायन' में अर्पिता ने बैक स्टेज के अपने सहयोगियों की प्रातिभ उर्वरता का पूरा उपयोग किया है। मंच पार्श्व की व्यवस्था पारमिता, शीला, मातून, शिवांजना, पलाश, पार्थ, राहुल, सुदीप, मलि और सोमा ने सँभाली। खुद अर्पिता इस नाटक में तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थीं - निर्देशन, संपादन और अभिनय।

पंचक के रूप में अर्पिता के असाधारण अभिनय को कभी नहीं विस्मृत किया जा सकेगा। 'अचलायतन' में अर्पिता के अभिनय की एक खासियत यह भी है कि पंचक की काया में वे पूरी तरह प्रवेश कर जाती हैं। यही बात आचार्य के रूप में बाबू दत्त राय, उपाचार्य के रूप में स्वपन अढ्य, उपाध्याय के रूप में देवकमल मंडल, अध्येता के रूप में देबू चौधरी, महापंचक के रूप में सिद्धार्थ चक्रवर्ती, दादा ठाकुर के रूप में अनिर्वाण राय चौधरी, विश्वंभर के रूप में अनीक घोष, संजीव के रूप में अमिताभ दास, त्रिनंजन के रूप में शंकर दास, जयोत्तम के रूप में सौरभ साहा, मंथर गुप्त के रूप में अमितेश भट्टाचार्य और सुभद्रा के रूप में बुगी के अभिनय के लिए भी सही है। शिशु छात्रों के रूप में तिस्ता, ऋजु, टिनटिन और पटु ने, शोनपांशुर के दल में तमाल, जबा, पलाश, सम्राज्ञी, सुनयन, अमृता, सौम्य और पापिया ने तथा दर्भक के दल में देवब्रत, कार्तिक, सुब्रत, देवाशीष, धीमान, जयिता, केका और स्वाति ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ भरसक न्याय किया। एक कुशल निर्देशक वह है जिसकी रंग प्रस्तुति में सभी कलाकार अपने-अपने पात्रों को डूबकर जीते नजर आएँ। इस कसौटी पर अर्पिता घोष पूरी तरह खरा उतरती हैं। अर्पिता ने यह गुण कदाचित अपने नाट्य गुरु साँओली मित्र से पाया है। अर्पिता घोष सुसंबद्ध कथानक, दृश्यबंध, शिल्प संयोजन यानी पूरी रंगभाषा पर आद्योपांत पकड़ बनाए रखती हैं। यह पकड़ रंगमंच को सांस्कृतिक और कलात्मक अनिवार्यता बनाए रखने में बहुत सहायक सिद्ध होती है।

'अचलायतन' की तरह 'राजनैतिक हत्या' भी 'पंचम वैदिक' का रनिंग नाटक है। ज्याँ पाल सार्त्र की रचना 'क्राइन पैसेनल' का 'राजनैतिक हत्या' शीर्षक से बांग्ला में अनुवाद अर्पिता घोष ने ही किया है। अर्पिता ने सार्त्र की रचना 'नो एक्जिट' का 'नारकीय' शीर्षक से, जार्ज आर्वेल के उपन्यास 'एनिमल फार्म' का 'पशुखामार' शीर्षक से और रौनाल्ड सेगल के उपन्यास का बांग्ला में 'टोकोलस' शीर्षक से अनुवाद किया। अनुवाद के अलावा अर्पिता ने नाट्य रूपांतर भी किए और मंच पर उन्हें खेला भी। साँओली मित्र कहती हैं, "अर्पिता घोष ही आज हमारी संस्था 'पंचम वेदिक' की कर्णधार हैं। ग्यारह-बारह साल पहले वे हमारी संस्था से जुड़ी थीं। रंगमंच की बारीकियाँ खास तौर पर प्रकाश, मंच सज्जा, शब्द, स्क्रिप्ट लिखना, बहुत-कुछ अर्पिता ने खुद से सीखा। रंगमंच में खुद वह सीढ़ी बनी और उस पर ऊपर चढ़ी। ठीक दस साल पहले जब पंचम वैदिक की गतिविधि बंद होने के कगार पर आ गई तो उसे बचाने के लिए अर्पिता ही आगे आईं। अर्पिता के निर्देशन में 2004 में बच्चों को लेकर सुकुमार राय की रचना 'हयबदल' का मंचन हुआ। उसके बाद फिर कभी अर्पिता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2004 में जब मेरे निर्देशन में 'राजनैनिक हत्या' का मंचन हुआ तो उसमें मुख्य किरदार जेसिका का प्रभावी अभिनय अर्पिता ने ही निभाया। 'चंडाली' में अर्पिता ने 'प्रकृति' की भूमिका निभाई। अभिनय के समानांतर अर्पिता ने निर्देशन का दायित्व निभाना भी जारी रखा।"

अर्पिता घोष ने 'पंचम वैदिक' की रंग प्रस्तुतियों - 'घरे-बाइरे' और 'एवं देवयानी' का भी निर्देशन किया। अर्पिता घोष निर्देशित नाटक 'पशुखामान' भी इधर बांग्ला जगत में खासा चर्चा में रहा है। इस नाटक के फोल्डर पर निर्देशक का यह वक्तव्य छपा हुआ है - "आज पूरे संसार में लोकतंत्र संकट में है। यह नाटक साधारण जनता के पक्ष में और राजनीतिक सत्ता के आतंक के विपक्ष में खड़ा है। आज हर जगह सत्ता का दुरुपयोग हो रहा है। व्यक्ति स्वातंत्र्य से राजनीतिक नेतृत्व का मानो चिरकाल से ही विरोध है। हमें अपने पड़ोसी देश में आंग सू की की बात क्या याद नहीं आती? या फिर युद्ध विध्वस्त अफगानिस्तान, इराक, इजराइल और लेबनान की बात? और इसी के साथ और भी अनेक लोगों की बात? सभी साधारण लोगों की तरफ से हम उस पृथ्वी का स्वप्न देखना चाहते हैं जहाँ सभी सभी से प्रेम करते हुए ही जीएँगे।" कहने की जरूरत नहीं कि इस वक्तव्य को अर्पिता ने अपनी रंग प्रस्तुतियों में और निश्चित ही अपने जीवन में भी बरता है और जटिल होते इस समय से मुठभेड़ किया है। अर्पिता की सारी प्रतिबद्धता साधारण जन के प्रति ही है। यह प्रतिबद्धता उन्हें एक बड़ा कलाकार बनाती है और निश्चित ही बड़ा मनुष्य भी।

पिछले दशकों में अनीक थियेटर ग्रुप, बहुरूपी, गननाट्य, ग्रुप थियेटर आफ कोलकाता, इप्टा, नांदीकर, पंचम बैदिक, संगलप कोलकाता, सयक, सुंदरम, सृजन सेना, स्वप्नफेरी, स्वप्न संधानी जैसे रंग समूह बंगाल में सक्रिय रहे हैं। वर्तमान में जो रंगकर्मी बांग्ला रंगमंच को जीवन दे रहे हैं, उनमें प्रमुख हैं - सौमित्र चटर्जी, मनोज मित्र, विभास चक्रवर्ती, सुमन मुखोपाध्याय, देवशंकर हाल्दार, कौशिक सेन, रमाप्रसाद बनिक और सोहिनी सेनगुप्त। अच्छी रंग प्रस्तुतियाँ उस भाषा तक सीमित नहीं रह जातीं जिसमें वे खेली जाती हैं। उन प्रस्तुतियों को हर भाषा के दर्शक देखते और सराहते हैं।

बंगाल में रंगमंच की बात हो रही है तो कम से कम तीन हिंदीभाषी रंगकर्मियों का जिक्र लाजिमी है। ये हैं - श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली। इन तीनों रंग स्तंभों ने स्वातंत्र्योत्तर काल में बांग्ला तथा हिंदी रंगमंच के बीच महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण किया। श्यामानंद जालान (13 जनवरी 1934-24 मई 2010) ने बांग्ला की कई महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। जालान ने रवींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यास 'घरे-बाइरे' का हिंदी में नाट्य रूपांतरण किया तो बादल सरकार के दो नाटकों 'एवम इंद्रजीत' और 'पगला घोड़ा' का भी हिंदी में नाट्य रूपांतरण कर मंचन किया। जालान ने ही समूची हिंदी पट्टी से बादल सरकार का परिचय कराया था। श्यामानंद जालान ने महाश्वेता देवी के उपन्यास 'हजार चौरासी की माँ' का हिंदी में नाट्य रूपांतरण कर मंचन किया तो दिव्येंदु पालित की कहानी 'मुखाभिनय' की हिंदी में पटकथा तैयार की और 'ईश्वर माइम कंपनी' नाम से फिल्म बनाई। जालान द्वारा निर्देशित यह एक मात्र फिल्म थी। श्यामानंद जालान ने 1972 में पश्चिम बंग नाट्य उन्नयन समिति के नाटक 'तुगलक' में बांग्ला के किवदंती रंगपुरुष शंभु मित्र के साथ मंच पर अभिनय किया था। इस बांग्ला नाटक में देवब्रत दत्त और रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता ने भी अभिनय किया था। जालान ने बांग्ला नाटकों के अलावा बांग्ला फिल्मों में भी अभिनय किया। उत्पलेंदु चक्रवर्ती की बांग्ला फिल्म 'चोख' में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें बी एफ जे ए का श्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार मिला था।

जालान ने रंगमंच, साहित्य व फिल्म में ही अपने छह दशक से ज्यादा का जीवन लगाया। छात्र जीवन में ही रंगमंच उनकी सजातीय विधा बन गई थी। पंद्रह साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1949 में 'नया समाज' नामक एक नाटक में अभिनय किया था। तरुण संघ की तरफ से यह नाटक खेला गया था। उसके ठीक बाद 'समस्या' और 'अलग-अलग रास्ते' नामक एकांकियों में उन्होंने अभिनय किया। इन एकांकियों में श्यामानंद जालान ने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया और फिर उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अभिनय शुरू करने के दो साल बाद ही श्यामानंद जालान ने नाटकों का निर्देशन शुरू किया। महज 17 साल की उम्र में 1951 में जालान ने पहली बार तरुण राय लिखित 'एक थी राजकुमारी' नामक एक बाल नाटक का निर्देशन किया था। जालान ने 1954 में जगदीश चंद्र माथुर लिखित 'कोणार्क' और 1955 में सेठ गोविंद दास लिखित 'चंद्रगुप्त' का मंचन किया। 1955 में ही जालान ने अपनी नई रंग संस्था 'अनामिका' की स्थापना की। तब तक अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में वे अपनी प्रातिभ क्षमता का लोहा रंगजगत में मनवा चुके थे। 'अनामिका' से उसके स्थापना काल से जुड़ी रहीं प्रतिभा अग्रवाल के मुताबिक, 'किसी भी नाटक को मंचित करने का निर्णय करने पर उसके उपयुक्त साधनों को जुटाना, कलाकारों, तकनीकी सहायकों को साथ लेना श्यामानंद का पहला काम होता। प्रस्तुतियों के आगे-पीछे, आजू-बाजू लड़ाई-झगड़ा, मत-विरोध, वैमनस्य, तर्क-वितर्क जो भी चलता रहा हो, रिहर्सल आम तौर पर सुखद स्थल होता था। श्यामानंद हमेशा बड़े रूप में चीजों की परिकल्पना करते, अनेक बार इतने बड़े रूप में कर बैठते कि बाद में नाना तरह की उलझनें उठ खड़ी होतीं पर वे उसकी परवाह नहीं करते। वे मानते थे कि बड़े रूप में सोचे बिना बड़ा काम किया ही नहीं जा सकता। कदाचित इसी कारण अनामिका ने यादगार प्रस्तुतियाँ दीं।'

'अनामिका' और श्यामानंद जालान जल्द ही एक-दूसरे के पर्याय बन गए। 1959 में 'नया हाथ' नाटक के लिए जालान को संगीत नाटक अकादमी का श्रेष्ठ नायक पुरस्कार मिला। बाद में अकादमी का श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी उन्हें मिला। 'अनामिका' के नाटकों के कारण ही जालान के रंग जीवन में नया मोड़ आया। 'अनामिका' की चार प्रस्तुतियों - 'छपते-छपते', 'लहरों के राजहंस', 'शुतुरमुर्ग' और 'एवम् इंद्रजीत' के निर्देशन श्यामानंद थे। ये चारों नाटक अपने कथ्य, लेखन शैली और प्रस्तुतियों के कारण देश भर में खासा लोकप्रिय हुए। मंच के लिए वह जो भी कथा उठाते, उसके मूल को, मर्म व महत्व को और सार को अक्षुण्ण रखने की पूरी कोशिश करते। मंचन के पाठ से कहानी के पाठ को करीब रखने के लिए हमेशा सतर्कता बरतते। इस संदर्भ में वे लेखकों के साथ लगातार संपर्क रखते।

श्यामानंद जालान ने 'लहरों का राजहंस' का मंचन करने के पहले मोहन राकेश से लंबा पत्र-व्यवहार किया। बात तब भी नहीं बनी तो उन्हे कलकत्ता बुलाया। वह आए और महीना भर रहे। घंटो-घंटों दोनों में बातचीत होती और नाटक के आलेख में आवश्यक परिवर्तन होता। 'लहरों का राजहंस' का तीसरा अंक तो लगभग नया ही लिखा गया। स्त्री-पुरुष संबंध, उनके द्वंद्व और अहं को गहराई के साथ एक नए धरातल पर नाटक ने प्रस्तुत किया। साहित्यप्रेमियों ने इस प्रभावपूर्ण प्रस्तुति को हाथों-हाथ लिया। मोहन राकेश के दो अन्य नाटकों 'आषाढ़ का एक दिन' और 'आधे-अधूरे' के मंचन के दौरान भी जालान ने लेखक से लगातार संपर्क रखा।

ज्ञानदेव अग्निहोत्री लिखित 'शुतुरमुर्ग' की कहानी को हूबहू उन्होंने मंच पर उतारा तो 'एवं इंद्रजित' नाटक के आलेख को हिंदी में तैयार कर पहले बादल सरकार को सुनाया और जब उन्होंने अपनी संतुष्टि जताई तभी उसका रिहर्सल शुरु हुआ। नाटक जब मंचित हुआ तो कहा गया कि बांग्ला में मंचित 'एवम् इंद्रजित' नाटक से भी यह बेहतर है। 1973 में श्यामानंद को जब संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला तो इस नाटक का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया और पुरस्कार वितरण के समय इसे मंचित करने का श्यामानंद से आग्रह किया गया। इस नाटक की कई जगहों पर प्रस्तुतियाँ हुई। इलाहाबाद में तो इसे देखने वाले दर्शकों में सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा समेत कई बड़े साहित्यकार भी थे।

'एवम् इंद्रजित' के बाद बादल सरकार के 'पगला घोड़ा' और विजय तेंदुलकर के 'पंछी ऐसे आते है' का निर्देशन करते समय भी जालान ने नाटक के आलेख पर लेखकों से उन्होंने अनवरत चर्चा की और उन्हे संतुष्ट करने के बाद ही काम शुरू किया। 1972 में श्यामानंद 'अनामिका' से अलग हो गए और उसी साल अपनी रंग संस्था 'पदातिक' बनाई। 'पदातिक' ने श्यामानंद जालान के निर्देशन में 'गिधाड़े', 'सखाराम बाइंडर', 'हजार चौरासी की मां' और 'शकुंतला' जैसे नाटकों के सफल मंचन किए। जालान ने श्याम बेनेगल निर्देशित 'आरोहण', एमएस सत्थु निर्देशित 'कहाँ कहाँ से गुजर गया' और रोनाल्ड जाफी निर्देर्शित 'सिटी ऑफ ज्वाय' में भी काम किया। जालान ने सत्यजित राय और मृणाल सेन की कतिपय टेली फिल्मों व धारावाहिकों में भी अभिनय किया। जालान की तरह ही प्रतिभा अग्रवाल एक प्रतिबद्ध रंगकर्मी रही हैं। रंगमंच के प्रति प्रतिभा जी की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण : सन् 1959 में पिता मृत्युशय्या पर थे। दिल्ली में 'नए हाथ' का मंचन था। 12 अगस्त को पिता की इहलीला समाप्त हुई। प्रतिभा 18 को दिल्ली गर्इं, 19 अगस्त को नाटक किया और 21 की सुबह लौटकर दशकर्म विधान में भाग लिया। रंगमंच से उनकी इस प्रतिबद्धता और समर्पण के पीछे अभिनय, संगीत और साहित्य के वे गहरे संस्कार रहे जो उन्हें विरासत में मिले। पिता बालकृष्ण दास बनारस में रंगमंच की मशहूर शक्खियत थे और दादा रायकृष्ण दास प्रसिद्ध लेखक थे। वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के सगे फुफेरे भाई थे। भारतेंदु के निवास स्थान भारतेंदु भवन में ही 10 अगस्त, 1930 को प्रतिभा अग्रवाल का जन्म हुआ था। प्रतिभा का दाखिला वाराणसी के अग्रवाल कन्या पाठशाला में कराया गया। दर्जा तीन में सुशीलता का इनाम मिला। स्कूल के वार्षिकोत्सव में नृत्य और गायन का बराबर मौका मिला और रंगमंच से जुड़ने की शुरुआत भी उसी उम्र में हो गई। जब वह पाँचवीं कक्षा में थीं तो अंतर्विद्यालय अंत्याक्षरी प्रतियोगिता में अव्वल आई थीं। उस प्रतियोगिता का मतलब होता था - श्रेष्ठ कविताओं का पाठ। उतनी छोटी उम्र में प्रतिभा को डेढ़ सौ कविताएँ कंठस्थ थीं। पिता रोज कहीं न कहीं नाटक खेलने जाते। कभी-कभी बेटी को भी साथ ले जाते नाटक दिखाने। नाटक देख उनके भीतर भी रंगकर्म की प्रेरणा जागृत हुई और वह स्कूल के वार्षिकोत्सव में नाटकों में भाग लेने लगीं। इसके अलावा काशी के महिला मंडल के वार्षिकोत्सव में राधाकृष्ण दास के 'महाराणा प्रताप' में प्रतिभा ने पहली बार मंच पर अभिनय किया। तब उनकी उम्र तेरह वर्ष थी।

उसी दौरान प्रतिभा को मदन मोहन अग्रवाल ने हनुमान भैया के यहाँ देखा। मदन बाबू को प्रतिभा और उनका रूप-रंग भा गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। बगैर दहेज के 15 फरवरी, 1945 को विवाह हुआ। तब प्रतिभा की उम्र 15 वर्ष और मदन बाबू की 25 वर्ष थी। शादी के पंद्रह दिन बाद ही प्रतिभा पति के साथ कोलकाता आ गर्इं। उनका गाना और सितार बजाना जारी रहा। शादी के साल भर बाद ही इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए प्रतिभा को शांतिनिकेतन भेजा गया। वहाँ प्रेमचंद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' का आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाट्य रूपांतर किया जिसमें नवाब वाजिद अली शाह की भूमिका प्रतिभा ने निभाई। शांतिनिकेतन से वह तीन वर्ष बाद कोलकाता लौटीं। उन्होंने कोलकाता में पहली बार 'दो अतिथि' और 'कला और जीवन' में अभिनय किया। फिर तो अभिनय उनके जीवन का अभिन्न अंग ही बन गया। पढ़ाई भी जारी रही। एम ए के बाद डीफिल, डीलिट् किया। 'समस्या', 'अलग-अलग रास्ते', 'चंद्रगुप्त' और 'शाहजहाँ' में अभिनय करने के बाद 1955 में प्रतिभा 'अनामिका' नाट्य संस्था में जुड़ गर्इं। 'अनामिका' की रंग प्रस्तुतियों - 'नए हाथ', 'जनता का शत्रु', 'आषाढ़ का एक दिन', 'घर-बाहर', 'छलावा', 'सुहाग के नूपुर' और 'आधे-अधूरे' में उनके अभिनय की धूम मच गई। 1970 में उन्होंने नाट्य निर्देशन शुरू किया और अभिनय भी समानांतर चलता रहा। 'गोदान' में धनिया के रूप में उनके अभिनय को आज भी लोग याद करते हैं। 'सापउतारा', 'मेरे बच्चे,''साँझ ढले', 'कहत कबीरा' में उनके अभिनय की तारीफ हुई तो 'सुहाग के नूपुर', 'मनवाने की बात' और 'सूरदास' में निर्देशन को भी सराहना मिली।

सन् 1981 में प्रतिभा अग्रवाल ने कोलकाता में नाट्य शोध संस्थान की स्थापना की। इस संस्थान ने भारत की हर भाषा के थियेटर से जुड़े तथ्यों और रंगकर्मियों तथा रंग संस्थाओं से जुड़े तथ्यों का ऐतिहासिक संग्रह किया है। यह संस्थान भारत में थियेटर की परंपरा और उसके इतिहास की मुकम्मल जानकारी उपलब्ध कराता है। संस्थान ने दुर्लभ नाट्य पांडुलिपियों, पोस्टरों, नाट्य समीक्षाओं, पत्र-पत्रिकाओं की कतरनों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, ऑडियों-वीडियो कैसेट, फिल्म स्टेड मॉडल, स्लाइडों, ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग, तस्वीरों, नाटक के लिए उपयोग में लाई गई पोशाकों, आभूषणों और ब्रोशर्स का अनुपम संग्रह किया है। संस्थान के पुस्तकालय और संग्रहालय में थियेटर पर सैकड़ों पुस्तकें, दुर्लभ पांडुलिपियाँ और चार सौ व्यक्तियों के इंटरव्यू उपलब्ध हैं। शोधार्थियों की सुविधा के लिए नाट्य शोध संस्थान का कैटलाग तीन खंडों में प्रकाशित किया गया है। इसका संपादन प्रतिभा अग्रवाल ने ही किया है। संस्थान प्रकाशन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहा है। शुरुआत हुई 1986 में मास्टर फिदा हुसैन पर प्रतिभा अग्रवाल की किताब से। उसके बाद उनकी किताब किंवदंती रंग पुरुष हबीब तनवीर पर आई - 'हबीब तनवीर : एक रंग व्यक्तित्व'। प्रकाशन का काम आज भी समान गति से चल रहा है। नाट्य संस्थान की स्थापना के बाद प्रतिभा जी का अभिनय-निर्देशन छूट गया पर संस्थान के जरिए रंग-संरक्षण का महत्वपूर्ण काम उन्होंने किया।

प्रतिभा अग्रवाल बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। अभिनय और रंग निर्देशन के अलावा वे लेखिका और अनुवादिका भी हैं। प्रतिभा अग्रवाल की मौलिक कृतियाँ - 'सृजन का सुख-दुख', 'दस्तक जिंदगी की', 'मोड़ जिंदगी का' हिंदी में पर्याप्त समादृत हुर्इं। इन तीनों किताबों में प्रतिभा जी ने अपने बारे में लिखा है लेकिन केवल अपने बारे में नहीं लिखा है। इन किताबों में उन्होंने कलकत्ता के हिंदी रंगमंच का इतिहास भी प्रस्तुत किया है। इसी कड़ी में उनकी किताब 'कहानी मदन बाबू की' का उल्लेख भी किया जा सकता है। प्रतिभा जी ने कविताएँ भी लिखी हैं। उनका कविता संग्रह 'खेल खेल में' बच्चों के लिए संग्रहणीय किताब है। प्रतिभा जी उपन्यासकार भी हैं। 'प्यारे हरिचंद जू' शीर्षक से उन्होंने जीवनी उपन्यास लिखा है। भारतेंदु के जीवन के अनेक मार्मिक प्रसंग इस कृति को आरंभ से आखिर तक पठनीय बनाए रखते हैं। उनका शोध प्रबंध 'हिंदी मुहावरे : विश्लेषणात्मक विवेचन' भी एक मूल्यवान कृति के रूप में समादृत हुई।

मौलिक लेखन के अलावा प्रतिभा जी ने छह उपन्यासों के नाट्य रूपांतर किए। ये हैं - घरेर-बाइरे (रवींद्रनाथ ठाकुर), देना-पावना (शरतचंद्र), सुहाग के नूपुर (अमृतलाल नागर), गोदान (प्रेमचंद), मैला आंचल (रेणु) और वंशवृक्ष (एस एल भैरप्पा)। प्रतिभा अग्रवाल ने चालीस से अधिक नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है। मुख्यतः बांग्ला और गुजराती के नाटकों का। बांग्ला से धनंजय वैरागी, बादल सरकार, शेखर चटर्जी, उत्पल दत्त, मनोज मित्र के नाटकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया तो गुजराती से शिव कुमार जोशी, मधु राय, लाभशंकर ठाकर तथा अंग्रेजी से इब्सन, आर्थर मिलर, पिरैंडेलो और सार्त्र के नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया। प्रतिभा अग्रवाल ने नंदलाल बसु रचनावली का भी हिंदी में अनुवाद किया तो सुकुमारी भट्टाचार्य तथा सुनील गंगोपाध्याय की किताबों का भी। प्रतिभा जी के लिए अनुवाद हमेशा पुनर्प्रस्तुति रहा है। प्रतिभा अग्रवाल ने कई पुस्तकों का संपादन भी किया जिसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है - 'हिंदी रंग कोश' जिसे नाट्य शोध संस्थान और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया है। प्रतिभा अग्रवाल ने कई वर्षों तक कलकत्ता साहित्य संकलन भी निकाला। उसका महत्व इस लिहाज से बहुत है कि कोलकाता के हिंदी लेखकों का वह प्रतिनिधि साहित्य संकलन होता था।

उषा गांगुली ने कोलकाता में हिंदी नाटक खेले तो बांग्ला नाटक भी। रंगमंच के जरिए बांग्ला-हिंदी सेतुबंधन में अहम भूमिका अदा करनेवाली उषा गांगुली को जानने का अवसर उन्हीं की रंग प्रस्तुति 'अंतर्यात्रा' देती है। यह नाटक उनका आत्मकथांश है। उनके निजी और रंगजीवन में जो स्त्रियाँ आर्इं, सभी इसमें हैं। दूर खड़ी है पुरुष के प्रेम के द्वंद्व में फँसी 'बीना'। आत्म सम्मान से जीने के लिए घर से बाहर आई 'मुनिया'। राजनीतिक विप्लव की साकार छवि बन गई गोर्की की 'माँ'। गाड़ी के बोझ को अकेले खींच रही - 'हिम्मतमाई'। साहसी सावित्री। 'रुदाली' की सनीचरी, जिसका पेशा है - अमीरों के मुर्दों पर रोकर पैसा कमाना। उषा गांगुली निर्देशित-अभिनीत 'अंतर्यात्रा' सिर्फ नाटक नहीं, बाहर-भीतर के जंग से निरंतर जूझती स्त्री की संघर्ष गाथा है। इस नाटक में तीन ज्यामितीय आकृतियाँ मंच सज्जा का जरूरी हिस्सा हैं। मंच सज्जा खालेद चौधरी की है और प्रकाश व्यवस्था तापस सेन (अब दिवंगत) की। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के धुरंधर। मंच-सज्जा और प्रकाश व्यवस्था 'अंतर्यात्रा' में कथा की संप्रेषणीयता कई गुना बढ़ा देती है। ढाक बजता है और उसी के साथ उषा मंच पर प्रकट होती हैं। ढाक की आवाज उषा को बचपन की याद दिलाती है और जब वे स्मृतियों में उतरती हैं तो उनके निजी जीवन और रंग जीवन में आई अनेकानेक स्त्रियों की वेदना, उनका संघर्ष उनकी आँखों के सामने तैर जाता है। इस तरह उषा गांगुली की 'अंतर्यात्रा' में कई-कई स्त्रियों की अंतर्यात्राएँ जुड़ती जाती हैं और सभी मिलकर नाटक को स्त्री संघर्ष की महागाथा के रूप में परिणत कर देती हैं। यह महागाथा उषा गांगुली कभी स्वयं से, कभी दर्शकों से, तो कभी अपने पात्रों से ज्यादातर हिंदी में व बीच-बीच में बांग्ला में बात करते हुए सुनाती हैं। उनके स्त्री पात्र मंच पर नहीं दिखते पर उनकी उपस्थिति का एहसास उषा कराती चलती हैं। उषा का संपूर्ण जीवनानुभव व रंग अनुभव इस नाटक में तनाव और कसावट को बनाए रखता है। दृश्य-श्रव्य के सहारे पूरे एक घंटे दर्शकों को वे खींचे रखती हैं। उनकी संवाद अदायगी व भंगिमाएँ इतनी असरदार हैं कि दर्शक पूरी 'अंतर्यात्रा' में शरीक होता चलता है और उनकी चिंताओं में भी। पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री की हैसियत का बोध उषा को बचपन में ही हो जाता है - 'छोटे भाई की तरह मेरा जन्मदिन नहीं मनाया जाता था...' स्त्री-पुरुष समानता की पूरी कलई यह छोटा सा संवाद खोल देता है। फिर शुरू होती है एक-एक पात्र की दुखभरी कहानी - 'आज बीना की याद आ रही है। 'रंगकर्मी' के पहले बड़े नाटक 'परिचय' की बीना... बस ड्राइवर की बेटी बीना। नौकरी करने दिल्ली जाती है। बुद्धिजीवी सुदीप के प्रेम में डूब जाती है... बीना समूचे परिवार के साथ सुदीप का इंतजार करती है पर सुदीप नहीं आता। आता है एक खत, जिसमें लिखा है, इतने दिनों उसने जो-जो कहा सब झूठ है। पूरा घर बीना पर बरस पड़ता है...।'

बीना प्रेम के द्वंद्व में है तो केया दी को कठिन आर्थिक संघर्ष से जूझना पड़ता है। वही केया दी यानी केया चक्रवर्ती जिन्होंने 'नांदीकार' नाट्य ग्रुप को गढ़ने के लिए कॉलेज की नौकरी छोड़ दी, बस में कंडक्टर को देने के लिए उषा से कहती है - 'ऐ जे पाँच पोयसा होबे?' उन्हीं केया दी ने उषा को तृप्ति मित्र से मिलाया था और जब तृप्ति मित्र रंगकर्मी के नाटक 'गुड़ियाघर' के निर्देशन के लिए आईं तो शंभू मित्र जो कुछ कर चुके थे, उस पर इस तरह राय जताई थी - 'ऊनी (शंभू मित्र) जा कोरेछन, आमी तार बेशी किछू कोरबो ना।' इसे कहते हैं ईमानदारी! इस नाटक में उषा 'मुनिया' बनीं। मुनिया अपने पति को बहुत चाहती थी, उसे बचाने के लिए उसने जाली दस्तखत किए और जब इसके पति को पता चला तो उसने मुनिया का बंद कमरे में जबरदस्त अपमान किया। यही अपमान वह नहीं बर्दाश्त कर पाती, अपमान की उस रात वह अपने सारे सामान, शादी का जोड़ा, गहने, जेवर सब कुछ त्यागकर एक नया रूप धारण करती है और जैसे ही रूमाल से अपनी माँग का सिंदूर पोंछती है - पूरे हॉल में सनसनी फैल जाती है। मुनिया के अपमान दंश का प्रसंग सुनाकर उषा दर्शकों में सहानुभूति या दावा का भाव नहीं जगातीं, बल्कि प्रतिवाद का, चेतना का बीच बो जाती हैं। 'अंतर्यात्रा' नाटक मुनिया के सिंदूर प्रसंग को अनिमा दी के प्रसंग से जोड़ता है। हम सबके घर में अनिमाएँ रहती हैं जो उपनगरों से आकर हमारे घरों को सँभालती हैं। अनिमा दी अपने घर से निर्वासित होकर कोलकाता आई थीं। उषा पूछती हैं - 'सीता से जो निर्वासन शुरू हुआ, उसका अंत कब होगा?' अनिमा दी माँग में सिंदूर लगाती थीं। वे अपना गाँव मथुरापुर इसलिए छोड़ आई थीं क्योंकि वहाँ उनकी सौत आ गई थी। ...अनिमा दी के बाद उषा गोर्की व ब्रेख्त की माँ का स्मरण करती हैं। 1992 में 'माँ' का मंचन हुआ। माँ अशिक्षित थीं किंतु वही एक दिन एक संपूर्ण राजनीतिक आंदोलन की प्रतिमूर्ति हो उठती हैं। ...सिमिलगिन को गोली लग जाती है, तब भी धीरे-धीरे जमीन पर झुकती है, झंडा उठाती है - 'झंडा मुझे दो सिमिलगिन, मैं उठाऊँगी। इन सबको बदलना होगा।' पार्श्व से आवाज आती है - प्लाजिया ब्लासोवा, तुम्हारे बेटे को गोली मार दी गई है। यह सुनकर माँ बेटे के शोक में कमजोर नहीं होती बल्कि और मजबूत होकर सामने आती है।

सुरक्षा के सवाल से रोज ही स्त्री को रूबरू होना पड़ता है। स्वयं उषा गांगुली को भी जूझना पड़ा है। 'अंतर्यात्रा' में उषा का स्वयं का एक अनुभव है - 'नंदन में फिल्म पर एक सेमिनार में बोलकर वापस आ रही थी, सड़क पार कर टैक्सी के इंतजार में गोखले रोड में किनारे खड़ी हुई कि अचानक एक अनजान, अपरिचित सामने आकर एक अश्लील प्रस्ताव रखता है - कॉफी पीने जाएँगी? जैसे किसी ने हजार-हजार बाल्टी ठंडा पानी मेरे ऊपर डाल दिया हो। ...लगा मेरी शिक्षा, मेरा सम्मान, मेरा अध्यापन, मेरा सुंदर सृजनशील थियेटर सब खाक में। उस पुरुष की निगाह में थी सिर्फ एक आदिम नारी।' माधुरी 'रंगकर्मी' की संस्थापक सदस्य थी। देखने-पढ़ने में सुंदर। एम.ए. प्रथम श्रेणी में प्रथम आई थी। स्वर्ण पदक मिला था। वही माधुरी एक दिन दोपहर के वक्त दौड़ती-हाँफती आई। उसके पूरे शरीर में किरोसीन की गंध। बोली वो लोग मुझे मार डालेंगे। मेरे हाथ में माचिस की तिल्ली देकर चिल्लाने लगे - आग लगाओ।' 14 दिन कमांड अस्पताल में रहकर चल बसी। लास्ट स्टेटमेंट दिया। - 'मेरी मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं।' जीवन में मिली स्त्रियों की कथा-व्यथा सुनाते हुए उषा बराबर स्त्री की अवस्था को व्यापक सामाजिक संदर्भों के बीच रखकर जाँचने-परखने की कोशिश करती हैं। नाटक का एक संवाद है - मीराबाई की जंजीर भी कम भारी नहीं थी। उन्हें जीने के लिए मरना नहीं पड़ा था। मीरा ने अपने गीत में कहा था - छोड़े पिता, छोड़े माँ / छोड़े जिस-जिसको छोड़ना हो। मीरा प्रभु चरणों में लगी ही रही / इसमें जो होना हो, सो हो। उषा गांगुली आखिर में कहती हैं - मैं भी बचूँगी। मैं बच गई। इस संवाद के साथ ही परदा गिरता है। कहना न होगा परदे के भीतर भी स्त्री का संघर्ष और उसका आत्मसंघर्ष चलता रहता है। अब भी चल रहा है। संघर्ष में ही राह की निर्मित होती है और स्त्री विमर्श के नए गवाक्ष खुलते हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. बांग्ला नाट्य कोष, लेखिका - संध्या दे, प्रतिभास, कोलकाता
2. देश, 15 नवंबर 1997
3. पुत्री का कथन, साँओली मित्र, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली
4. हिंदी रंग कोश, प्रतिभा अग्रवाल, प्रकाशक - नाट्य शोध संस्थान और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
5. सृजन का सुख-दुःख, प्रतिभा अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
6. तीनटी राजनीतिक नाटक, अर्पिता घोष, सप्तर्षि प्रकाशन, कोलकाता
7. पशुखामार (जार्ज आर्वेल), अनुवाद तथा नाट्य रूपांतर - अर्पिता घोष, प्रकाशक एवं मुशायरा, कोलकाता
8. विनोदन विचित्रा, मई, 1998


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