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लेख

गीत-रचना और 'नवगीत'
राजेंद्र प्रसाद सिंह


गीत काव्य-रचना का एक ऐसा प्रकार है, जिसके माध्यम से, रचयिता और रस-ग्राहक, दोनों के आंतरिक भाव-संगीत का विनिमय हो सकता है और जिसकी वस्तु तथा शैली में हृदय की अनुभूति-लीन प्रक्रिया मौलिक रूप से गतिशील रहती है, तथा परिवेश की उत्तरोत्तर व्यापक परिधियों के प्रभाव अनुभूति की विशेषताओं का परिपाक करते रहते हैं।

व्यक्तिगत स्वभाव, परिवेशगत प्रभाव और परंपरागत मान्यताओं के अंतर्द्वंद्व से, अनुभूति की प्रक्रिया में बहता हुआ हृदय जिस मार्मिक समग्रता को संजोता रहता है उसका आत्मीयतापूर्ण स्वीकार ही गीत का उद्गम है। इसीलिए अनुभूति समानांतर प्रक्रियाओं से गुजरने वाले रचयिता और रस-ग्राहक में गीत के माध्यम से आंतरिक भाव-संगीत का विनिमय हो सकता है। हाँ, माध्यम में अन्विति का होना अनिवार्य है, एक प्रकार की संगति और हार्दिक सर्वनिष्ठता आवश्यक है।

अनुभूति की प्रक्रिया में संचयित उस मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार तो एक प्रकार की हार्दिक सर्वनिष्ठता पा ही जाता है और वह संवेदना की सामर्थ्य से ही व्यक्त होता है। इसीलिए संवेदना की सामर्थ्य का अंतर ही रचयिताओं की कला-प्रौढ़ि का अंतर भी हो जाता है।

एक अन्य वास्तविकता भी ध्यातव्य है कि अनुभूति-प्रक्रिया में संचयित उस मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार ही गीत का क्षेत्र है; उसके परे प्रगीत का क्षेत्र है। ऐसा इसलिए कि अनुभूति की मार्मिक समग्रता, उस आत्मीयतापूर्ण स्वीकार तक तो अन्वित और संगत रह पाती है, एक प्रकार के आंतरिक भाव-संगीत या 'रस' से संश्लिष्ट, अतः सर्वनिष्ठ रह पाती है; किंतु उससे आगे बढ़ने के साथ ही वह, 'मनीषा' की सीमा में प्रवेश कर, अवांतर भेद, विश्लेषण, समस्यात्मक चिंतन, प्रतिक्रिया, अनेकांत प्रभाव, मूल्यांकन, अतिक्रांति और विकास की प्रेरणाएँ जगा देती हैं। ये प्रेरणाएँ प्रगीत रचना का उद्रेक कर सकती हैं, ये गीत-रचना में समाहित नहीं होतीं। हाँ, इन प्रेरणाओं की निर्वैयक्तिक प्रखरता जब यह आत्मीयता की छाया में मंद पड़ जाती है और विश्लिष्ट मनःस्थिति में फिर एक प्रकार की अन्विति, संगति और सर्वनिष्ठता आ जाती है, तब पुनः पूर्वाधार पर गीत-रचना हो सकती है।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि निर्वैयक्तिकता गीत-रचना के प्रतिकूल है, या वैयक्तिकता उसके अनुकूल, प्रत्युत दोनों की संधि-भावना - 'आत्मीयता' ही अनुभूति प्रवण गीत-रचना के लिए अनिवार्य है। यह आत्मीयता, अनुभूति की मार्मिक समग्रता के प्रति रचयिता के स्वीकार में होनी चाहिए।

गीत-रचना का यह क्षेत्र वैदिक अथवा प्राग्वैदिक काल से इस अंतरिक्ष-युग की संभावनाओं तक अक्षुण्ण प्रतीत होता है, क्योंकि मानव-व्यक्तित्व की सूक्ष्म इन्द्रियों ने अनुभूति का सातत्य नहीं छोड़ा है। व्यक्तित्व के विकास की सीढ़ियाँ जब तक मनोवैज्ञानिक अनिवार्यता और विशिष्टताओं से प्रछन्न रहेंगी, तबतक गीत-रचना की प्रेरणा अपनी सार्थकता पाती रहेगी। मनुष्य की व्यक्तित्व-मूलक अभिव्यक्ति का कोई भी निकाय कभी विनष्ट या मृत नहीं होता, उसका रूपांतर, दिशांतर और विकास ही होता है। गीत मानव व्यक्तित्व की वैसी ही व्यंजनाओं का माध्यम है। फिर भी, कुछ समय से, विशेषतः हिंदी कविता के क्षेत्र में गीत-रचना का विरोध या समर्थन एक तनाव पैदा कर रहा है, जिसके फलस्वरूप पक्षधरता बढ़ती जा रही है। इत तनाव से तटस्थ होकर ही औचित्य की खोज हो सकती है।

छायावाद-काल के गीतों में प्रायः वे सभी गुण पाए जाते हैं, जो छायावादी प्रगीतों में हैं, यहाँ तक, कि उन्हें सामान्यतः अभिन्न भी समझा जाता है। हाँ 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक, धीरे-धीरे' की संदर्भगत सार्थकता न समझकर उसे पलायन की प्रवृत्ति कहने वाले और 'लाई हूँ फूलों का हास, लोगी मोल, लोगी मोल' की अनुभूतिगत प्रतनुता न समझकर मानवीकरण की दुहाई देनेवाले रसज्ञों (?) को सहज ही अंतर्विरोध जान पड़ेगा। निश्चय ही छायावाद के प्रगीत प्रकृति-बोध के आवरण में, मानवीय सौंदर्य-बोध की व्याप्ति से उन्नीत हैं और छायावाद के गीत जीवन के हार्दिक क्षणों की प्रतनु अनुभूति से अनुकंपित। रहस्यवाद के प्रगीतों की संख्या कम है, गीतों की अधिक, अतः सामान्यतः वे गीत दर्शन की धार्मिक अनुभूति और काव्यात्मक अभिव्यक्ति के संदर्भ में, आरोपित संवेदनाओं की प्रतिष्ठित सहजता से असाधारण हैं। इसीलिए 'कौन तम के पार (रे कह !)' 'या 'बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ' की अनुभूति का धरातल, रसज्ञों से, आरोपित और प्रासंगिक संवेदना की असाधारण सहजता का संघटन माँगता है। फिर भी रहस्यवाद के कुछ गीत इसलिए लोकप्रिय हुए कि आरोप और असाधारण अनुभव के अंतराल में, मूलभूत सहज मानव-भावनाएं प्रदर्शित होती रहीं। रहस्यवाद और प्रगतिवाद के बीच सहज मानव-भावना के स्वछंदतावादी गीतों ने मध्यांतर उपस्थित किया। छाया, रहस्य और सहजता का स्वच्छंद उपयोग गीतों की बहुमुखता बढ़ाता रहा, तभी दर्शन के साथ जीवन-दर्शन, छायावादिता के साथ अंतर्मुखता, रहस्य के साथ मनोरहस्य और सहज प्रवृत्तियों की अवांतर अभिव्यक्ति के साथ मार्मिकता, हालावादी मस्ती या सस्ती प्रेमानुभूतियाँ व्यक्त की जाने लगीं। प्रगतिवाद के समानांतर ही स्वच्छंदतावादी गीत-धारा बहती रही है और वर्ग-संघर्ष, क्रांति-कोलाहल तथा यथार्थवादी अतिवादिता की चुनौती पर परिस्थिति से क्षोभ, वैयक्तिक पीड़ा, सामाजिक करुणा, जन-संस्कृति; लोकरुचि और ग्राम-सौंदर्य को स्वर देती रही है।

हिंदी कविता में 'प्रयोगवाद' के उत्थान के साथ ही साहित्य की पूर्वागत मान्यताओं पर चोट पड़ने लगी और मौलिकता, नवीनता, आधुनिकता, प्रयोग, जटिल संश्लेषण, अनुबिंबन, छंद विरोध, मनोवैज्ञानिकता और राहों का अन्वेषण, आंदोलन की तीव्रता से चल पड़ा। व्यक्तित्व का बहुमुखी अंतःसंगीत गीतों में व्यक्त होने को अकुलाता रहा, पर वातावरण होड़ के तनाव से ऐसा भर गया कि पूर्वागत निकायों के रचनाकार पूर्वाग्रही और नए निकायों के अन्वेषक उपेक्षक हो चले। यह अतिवादिता बहुत बढ़ गई और नई कविता के वर्तमान दशक में तो गीत फरोश, 'जब गीतकार मर गया', 'चाँद रोने आया', 'गीत का स्मारक' आदि अनेक जुमले दिए हैं; साथ ही 'गीतों का हमला', श्रीनीरज की ओर से श्री दिनकर को उत्तर और गीतकारों के नाम पातियाँ भी मिली हैं। इस सरगर्मी के बीच एक अजीव ऊहापोह है। वस्तुस्थिति यह कि अधिक गीतकार रचना की दिशा में वैषयिक और शैलीगत नवीनता के साथ उचित प्रगति नहीं पा रहे हैं और अपनी पूर्वागत सीमाओं से, उन रुचियों और त्रुटियों से भी इस तरह लापरवाह और अनुत्तरदायी होकर आग्रह-बद्ध हो गये हैं कि प्रगीत के क्षेत्र का पिछला गत्यवरोध गीत के क्षेत्र में आ गया है। इसीलिए गीतकारों को अधिक उदार, उदात्त, जागरूक, प्रगतिवान और आधुनिक होने की आवश्यकता है। नई कविता के अनेक कवि भी गीत रचना करते हैं और उनके गीतों में 'टेकनीक' की आधुनिकता तो रहती है, वैषयिक नवीनता का प्रायः अभाव ही रहता है, फिर भी वे पूर्वागत निकायों के गीतों में प्रायः बराबर है। फिर भी नई कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे ध्यातव्य कवियों का अभाव नहीं है, जो मानव जीवन के ऊँचे और गहरे, किंतु सहज-नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छिति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज-सँवार कर नई 'टेकनीक' से, हार्दिक परिवेश की नई विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं। प्रगति और दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नई कविता के प्रगीत का पूरक बनकर 'नवगीत' का निकाय जन्म ले रहा है। नई कविता के सात मौलिक तत्व हैं - ऐतिहासिकता, सामाजिकता, व्यक्तित्व, समाहार, समग्रता, शोभा और विराम, तो पूरक के रूप में 'नवगीत' के पाँच विकासशील तत्व हैं - जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व, और परिसंचय।

समकालीन हिंदी कविता की महत्वपूर्ण और महत्वहीन रचनाओं के विस्तृत आंदोलन में गीत-परंपरा 'नवगीत' के निकाय में परिणति पाने को सचेष्ट है। नवगीत - नई अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा। इस स्थापना का आभास उन पाँच तत्वों के समकालीन नए साक्षात्कार से हो सकता है, जो नवगीत का स्वरूप रचने में सचेष्ट हैं।

जीवन दर्शन के आयामों का संघटन परिणति की ओर प्रयास कर रहा है। समस्त मानव-संस्कृति के वर्तमान मर्म का अनुभव करनेवाला व्यक्ति-मन, जिस प्रतिनिधित्वपूर्ण करुणा, संश्लिष्ट अंतर्विरोध और प्रछन्न जीवन शक्ति की प्रक्रिया का अनुभव कर सकता है, उसकी सूक्ष्म व्यापकता 'निराला', पंत, जानकीवल्ल्भ शास्त्री, जयकिशोरनारायण सिंह, देवराज, और 'नीरज' के गीतों में हो रही है। दृष्टिकोण के अंतर से जीवन-दर्शन भिन्न हो सकते हैं, पर वैषयिक एकता भी स्पष्ट है।

आत्मनिष्ठा के धरातल पर पूर्वागत निकायों के गीतकार भी नई विशिष्टताओं का समावेश कर रहे हैं। व्यक्ति एक प्रतीक के रूप में, अपनी अंतर्वाह्य व्यापकता का संकल्प कर, आधुनिक विश्वासों के आवर्त्त में जिस आस्था से धैर्य और धैर्य से आत्म-निर्माण की शक्ति पाता है, उस आस्था में नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों के साथ आत्मदान की प्रेरणा भी होती है, जिसकी अभिव्यक्ति महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, विद्यावती 'कोकिल' रामकुमार वर्मा, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', गंगा प्रसाद पांडेय, जगदीश अतृप्त, वीरेंद्र मिश्र, कुमारी रमा सिंह आदि के गीतों में हो रही है।

व्यक्तित्व-बोध के परिवेश में व्यक्ति, परिस्थिति और स्वभाव के परमाणुओं का सामंजस्य करने के लिए ही अंतर्विरोध, अन्यमनस्कता, निराशा और अन्य मनोवस्थाओं से गुजरकर जिस जिजीविषा की रक्षा करता है और अपने व्यक्तित्व की जिन संवेदनाओं में निमज्जन करता है, उस जिजीविषा और उन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हरिवंशराय बच्चन, गोपाल सिंह नेपाली, धर्मवीर भारती, रमानाथ अवस्थी, रवींद्र भ्रमर, कृष्णनंदन पियूष, कुमारी मधु, रंगनाथ राकेश आदि के गीतों में हो रही है।

प्रीति-तत्व की दिशा में, व्यक्ति क्रमशः आकर्षण, कामना, पूरकता, अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मूल्यांकन और व्याप्ति - सात सोपानों से गुजरता चलता है और अपनी अवांतर अनुभूतियों के सातत्य और व्यक्तित्व की उपलब्धि करता है। गीत-रचना का यह तत्व सर्वाधिक गीतकारों के अनुकूल है और लोकप्रिय भी। अतः अधिक विकसित प्रयासों की आवश्यकता भी इसी तत्व के संबंध में है। रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', आरसी प्रसाद सिंह, नरेंद्र शर्मा, गोपालदास 'नीरज'; हंसकुमार तिवारी, शंभुनाथ 'शेष', परमेश्वर 'द्विरेफ', जगदीश सलिल, शांतिस्वरूप कुसुम, राजेंद्र किशोर, चंद्रदेव सिंह, श्यामनंदन 'किशोर', रामचंद्र चंद्रभूषण आदि के गीतों में यह तत्व नई विधाएँ और विकास पा रहा है।

परिसंचय के पथ पर वे गीतकार अपने कदम आजमा रहे हैं, जिनके गीतों में किसी एक तत्व की प्रधानता नहीं, अपितु काव्यात्मक, गीतात्मक, आदि कई प्रकार की सामग्रियों का संचयन हो रहा है।

तो कहना नहीं होगा कि 'गीतांगिनी' वर्तमान दशक के हिंदी गीत-काव्य का प्रतिनिधि संकलन हो सके - ऐसी चेष्टा की गई है। चेष्टा पर मुझे संतोष है, क्योंकि कुछ गीत 'दोष-प्रकरण' की रचनाओं का भी प्रतिनिधित्व कर लेते हैं। अनेक गीतकारों ने 'गीतांगिनी' के प्रकाशन में आत्मिक, नैतिक, आर्थिक या चुनौती-भरा योग भी दिया है; उन पर मुझे और हिंदी गीत-काव्य को गर्व है। अस्तु।

५ फरवरी,१९५८                                                       राजेंद्र प्रसाद सिंह

 

* हिंदी गीतकाव्य के इतिहास में नवगीत के प्रवर्तक राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा संपादित-प्रकाशित नवगीत का नाम-लक्षण-निरूपक प्रथम ऐतिहासिक संकलन ' गीतंगिनी '(1958) की भूमिका


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