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कविता

अपूर्णता
राजेंद्र प्रसाद सिंह


अनादि भाव-मेघ से भरा गगन,
अनंत कर्म-धार से भरी मही !
मगर उभय दिशा-प्रसार में कहीं,
सुगंध आदि-अंत की न मिट रही !
सुगंध यह अमंद, रूप-राशि की,
मधुर, परंतु तिक्त भी, मदिर सदा !
अजेय मोह, दुर्निवार भोग की -
व्यथा-पुलक बनी अमूल्य संपदा !
अरूप से बँधा समस्त रूप है,
सुगंध आदि-अंत की बँधी हुई -
अखंड वृत्त-बीच द्रव्य-मंडली
विकास के प्रवाह में सधी हुई !
अटूट यह अदृश्य रज्जु-बंध रे !
अपूर्ण है समस्त दृश्य की कला,
कुमुद कभी मुँदा, कभी मुँदा कमल,
दिनेश ढल गया कि चाँद भी ढला !
अपार भाव-कर्म के वितान में,
छिपी सजीव रत्न-सी अपूर्णता !
अशेष देश पर अशेष काल के
अशेष पाद-चिह्न-सी अपूर्णता !

 


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