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कहानी

क्लीन चिट
योगिता यादव


बंगला साहिब गुरुद्वारे में मत्था टेककर सरोवर किनारे बैठना सिमरन कौर को इतनी शांति देता था कि घर-गृहस्थी और ऑफिस की महीने भर की थकान उतर जाया करती। इसलिए हर महीने के आखिरी इतवार को वह इस गुरुद्वारे में मत्था टेकने जरूर आया करती। मम्मी और छोटी बहन के साथ इतवार की कई पिकनिक उसने इसी सरोवर के किनारे मनाईं थीं। फिर स्कूल और कॉलेज बंक करके सहेलियों के साथ घूमने के लिए भी यही जगह उसे पसंद आती थी। लंगर का प्रसाद, सरोवर का पानी और ढेर सारी मस्ती।

सिमरत सिंह जब बैंगलोर से पहली बार दिल्ली आया, तो पहली-पहली डेट भी इसी सरोवर के किनारे पर थी।

मत्था टेककर कड़ाह प्रसाद खाया और बचा हुआ घी दोनों हथेलियों पर मलते हुए सिमरन कौर सरोवर किनारे चल पड़ी। बरामदे में छाँव देखकर वह वहीं चौकड़ी मारकर बैठ गई। चिनॉन के महीन दुपट्टे से सिर और माथे को ढाँपते हुए दोनों कानों के पीछे से घुमाकर कंधे के चारों और लपेट लिया। सिर का पिछला हिस्सा दीवार से सटाकर मुँह ऊपर किए वह कुछ देर निश्चिंत भाव से आँखें मूँदे बैठी रही। लाउडस्पीकर पर हल्की सुरीली आवाज आ रही थी... 'मेरे गोबिंद अपना नाम दियो...'

वह तीन साल की ही तो थी जब ताई जी की चिकचिक से तंग आकर डैडी जी ने दिल्ली आने का मन बनाया था। खेत, ट्रेक्टर, कूलर सब था पर माँ के लिए चैन नहीं था। डैडी जी भी चाहते थे कि पटियाले की पढ़ी-लिखी लड़की होशियारपुर की भैंसों और खेतों को पानी पिलाने में ही न खप जाए इसलिए उन्होंने अपना तबादला दिल्ली करवा लिया। दिल्ली आते ही ऑफिस और मकान देखने के बाद सबसे पहले मम्मी और डैडी जी इसी गुरुद्वारे में आए थे शुक्राना अदा करने। मम्मी-डैडी नन्हीं सिमरन को समझाने लगे थे, 'सुख वेले शुक्राना, दुख वेले अरदास, हर वेले सिमरन।' इस बात का पूरा मतलब समझे बिना ही वह खुश हो गई थी कि उसके मम्मी जी डैडी जी हर वेले उसका नाम लेने की बात कर रहे हैं। मम्मी डैडी दिल्ली आकर सचमुच खुश थे और मैं भी। तभी भगवान ने एक साल में ही हमारे घर में एक नया मेहमान भेज दिया। इस नए मेहमान के आने पर भी हम यहीं आए थे मत्था टेकने। फिर गुरुद्वारे में ही उसका नाम रखा गया मनु, मनजोत कौर।

मनजोत कौर के आते ही घर की खुशियों में चार चाँद लग गए। डैडी जी हर रोज शाम को कुछ न कुछ लेकर घर लौटते और फिर रात को खाना खाने के बाद मनजोत कौर को बाबा गाड़ी में लिटाकर हम सब सैर को निकल पड़ते...

मेरे चौथे जन्मदिन पर मम्मी ने मेरे लिया नया फ्रॉक सिआ और डैडी जी नीले रंग का बस्ता लेकर आए थे। अगले दिन पास के स्कूल में जाकर मेरा नाम लिखवाया गया और नीले रंग के बस्ते में ढेर सारी रंग-बिरंगी किताबें आ गईं थीं। मनु और नीले बस्ते ने कितने रंग भर दिए थे मेरी दुनिया में। उस बार गर्मियों की छुट्टियों में हम सब होशियारपुर गए। हमारे ठाठ-बाट देखकर सब हैरान थे। जिन ताई जी से तंग आकर हम दिल्ली आए थे उन्होंने भी मम्मी को गले लगाकर कितना अपनापन दिखाया था। मनजोत कौर को देखकर भी सब खुश थे, ताई जी ने इतना जरूर कहा था 'कौर बड़ी हो गईं अगली बारी सिंह लेकर आना।' सारा माहौल देखकर लगता था कि हमारे दिल्ली जाने से हम ही नहीं वे सब भी बहुत खुश हैं।

होशियारपुर से विदा लेकर हम फिर से दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी में लौट आए थे। नीले बस्ते के रंग दिनों दिन बढ़ते जा रहे थे। नई कविता सुनाने पर मम्मी खूब शाबाशी देती। फिर घर में आने वाले हर नए व्यक्ति के सामने वही कविता दोहराने को कहतीं। उनकी खुशियाँ और मेरी शाबाशियाँ बढ़ती जा रहीं थीं... पर लोग कर रहे थे कि ऐसा कुछ हुआ है जिस पर ऊपर वाला दोषियों को कभी माफ नहीं करेगा। इसी माहौल में मोहल्ले की सारी आंटियों ने गुरद्वारे जाकर अरदास की। गुरद्वारे में ललकार भरी आवाज में सिंह सूरमाओं का आह्वान किया गया। डैडी जी को हालाँकि इन सब बातों से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं था फिर भी मम्मी के कहने पर उन्होंने भी केसरिया पगड़ी पहनी।

...फिर न जाने रात में या दिन में ऐसा क्या हो गया कि केसरिया पगड़ी वाले अपनी जान बचाकर भागने लगे। पर आफत सिर्फ केसरिया पर ही नहीं तमाम पगड़ियों पर आ चुकी थी। डैडी जी जब अगले दिन ऑफिस जाने के लिए निकले तो मम्मी ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की। दिन भर मम्मी हम दोनों बहनों को सीने से सटाकर रोती रहीं...

और फिर शाम को... डैडी जी नहीं लौटे।

हम पर कोई और आफत न आ जाए इसके लिए मकान मालिक अंकल जी ने दहशत भरी हिदायत दी थी, 'भाभी जी कुछ भी हो जाए आप दरवाजे की चटखनी मत खोलना। सारी बत्तियाँ बुझा दो और छोटी को खाँसी की दवा पिलाकर सुला दो। ये रोएगी तो लोगों को पता चल जाएगा कि अंदर कोई है।'

सारी रात चीख-पुकार मची रही।

सुबह को टेलीविजन पर लाशों के ढेर दिखाए जा रहे थे। तस्वीरों के बाद शिनाख्ती के लिए फोन नंबर दिए जा रहे थे। पगड़ी खुला, केश बिखरा, झुलसाया हुआ हर चेहरा मुझे डैडी जी जैसा लग रहा था। लाशों के पास ही उनके हाथ का सामान बिखरा पड़ा था। माँ की सिसकियाँ नहीं टूट रहीं थीं। मकान मालिक आंटी उन्हें पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी और अंकल जी शिनाख्ती के लिए पुलिस स्टेशन गए थे। इस बार शाम को डैडी जी लौटे! खाली हाथ! सरकारी गाड़ी में!, सफेद कपड़े में लिपटे हुए!

मेरा मन कर रहा था कि मैं कहूँ, 'गुड़िया चाहें न लाना पर पापा जल्दी घर आना...' सुनते ही डैडी जी उठकर मुझे गले से लगा लेंगे। पर वे नहीं उठे और मम्मी बिलखकर उनसे लिपट गई। नन्हीं सी मनु को मैंने अपनी गोदी में छुपा लिया।

डैडी जी जा चुके थे, उनके साथ हमारे घर का मुखिया, कमाने वाला इकलौता शख्स, नीले बस्ते और माँ की चुन्नियों के गहरे सारे रंग चले गए। हालात ऐसे नहीं थे कि हम होशियारपुर जा सकते और वहाँ से कोई यहाँ आने वाला भी नहीं था। दुख के उस माहौल में अचानक मकान मालिक अंकल और आंटी बहुत अच्छे हो गए थे। खराब हालात में भी वह कहीं न कहीं से मनु के लिए दूध ले आते। टाफियाँ देकर मुझे भी खुश करने की कोशिश करते रहते और माँ को हिम्मत न हारने का दिलासा देते।

दिल्ली के हालात सुधरने लगे थे पर हमारे घर के अभी भी वैसे ही थे। मम्मी छोटी को गोद में लिए रोज दफ्तरों के चक्कर काटती। चूड़ियों और गहनों से सुंदर सी दिखने वाली मम्मी जी अब वैसी सुंदर नहीं रह गई थी, एक दिन उन्हें डैडी जी की जगह नौकरी जरूर मिल जाएगी, इसके इंतजार में एक-एक कर उनके सब गहने बिकने लगे थे।

नौकरी मिलती इससे पहले ही अंकल जी ने बताया कि दिल्ली सरकार विधवाओं के लिए कॉलोनी बना रही है। हमें भी डैडी जी के कागज-पत्तर दिखा कर मकान मिल सकता है।

मम्मी जी की भागदौड़ रंग लाई और उन्हें सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई। स्कूल सुबह का था, मनजोत अभी छोटी थी, मम्मी मुझे भी पढ़ाना चाहती थी, सब कुछ एक साथ होना मुश्किल हो रहा था। इस बार आंटी जी ने मम्मी की हिम्मत बढ़ाई और कहा 'भैनजी आप जाओ स्कूल, मैं सँभाल लूँगी छोटी को'। पर मम्मी और ज्यादा दिन उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी।

'मास्टरों के बीच में अकेली मास्टरनी', सबने मना किया पर मम्मी ने अर्जी दे ही दी और दोपहर बाद के लड़कों के स्कूल में अपनी ड्यूटी लगवा ली। स्कूल के स्टाफ में मम्मी का आना जवान विधवा के प्रति सहानुभूति से शुरू हुआ फिर धीरे-धीरे वहाँ से विधवा खत्म होकर सिर्फ जवान रह गया। न चाहते हुए भी मम्मी ने अपने आप को इस माहौल में ढाल ही लिया था।

एक महीने बाद मम्मी को तनख्वाह मिली और उन्होंने डेढ़ साल बाद एक बार फिर से अंकल जी के मकान का किराया दिया। इस एक साल में मम्मी कभी आंटी जी के सूट, कभी परदे, कभी तकियों के कवर सिल कर उनका बोझ कम करने की कोशिश किया करती। मम्मी के अपने सारे सूट पुराने और ढीले हो चुके थे पर पटियाले की पढ़ी-लिखी लड़की को अब सूटों की नहीं हम दोनों बहनों के भविष्य की चिंता थी।

विधवाओं की कॉलोनी में भी मकान मुफ्त मिलने वाले नहीं थे। यह सोचकर मम्मी ने एक-एक पैसा जोड़ना शुर कर दिया। शाम को मिलने वाले तोहफे, संडे की पिकनिक, रात की सैर डैडी जी के साथ ही चले गए थे। अब मैं उतनी नादान भी नहीं थी कि कुछ न समझ सकूँ। मैं और बड़ी होना चाहती थी ताकि मम्मी की परेशानियों को बाँट सकूँ। पर मम्मी मुझे और मनजोत को खूब पढ़ाना चाहतीं थीं।

मैं पाँचवी में हो गई थी और मनजोत ने भी स्कूल जाना शुरू कर दिया था। हमारे अधूरे परिवार में खुशियाँ सचमुच लौट आईं जब विधवाओं की उस कॉलोनी में हमें सस्ता सा मकान मिल गया। मम्मी की पाँच साल की तपस्या रंग लाई। हमने अपने मकान में कदम रखा। कितने सालों बाद हमारे घर की कड़ाही ने पँजीरी की मिठास चखी। घर में सामान के नाम पर सब कुछ पुराना हो चुका था, कुछ नया लेकर दिखाना भी किसे था, इस नई कॉलोनी में सब हमारी ही बिरादरी के परिवार थे। सफेद चुन्नियों वाली मम्मी और बिना डैडी जी वाले परिवार।

हर साल एक दिन ऐसा भी आता जब सारी सफेद चुन्नियों वाली मम्मियाँ कॉलोनी के बीचों बीच बने स्मारक पर मोमबत्तियाँ जलातीं और ऊपर वाले से गुनाहगारों को कभी न बख्शने की अपील करतीं। जिंदगी धीरे-धीरे ढर्रे पर लौटने लगी थी। मनजोत पढ़ने में मुझसे भी ज्यादा होशियार हो गई थी। दोनों बहनों के पास होने पर मम्मी हम दोनों बहनों को यहीं बंगला साहिब गुरुद्वारे में मत्था टिकवाने लाती। लंगर के बाद सरोवर किनारे बैठकर छोटी-छोटी मछलियाँ देखना हमारे बचपन में रोमांच भर देता। फिर मम्मी खुश होकर हम दोनों बहनों को लोहे के नए कड़े दिलवाती।

हमारी खुशियों में अब पटियाले और होशियारपुर के रिश्तेदार भी कभी-कभी शामिल हो जाया करते। फिर मम्मी को याद दिलाते कि अच्छा होता अगर मनजोत की जगह मेरा छोटा बीर आया होता, कम से कम घर में एक मर्द तो होता। आगे बच्चियों की शादियाँ भी करनी हैं। और फिर आखरी वक्त में ...मम्मी आस भरी नजरों से हम दोनों बहनों की तरफ देखती और हमें सीने से लगा लेती। उस वक्त मम्मी की साँसों में सरोवर की शांति महसूस होती।

12वीं के बाद नजदीक के कॉलेज में ही मैंने दाखिला ले लिया। मम्मी की मेहनत ने दिन फेर लिए थे। घर का एक-एक सामान मम्मी ने अलग-अलग बाजारों से खूब मोल भाव के बाद खरीदा था। घर के कोने-कोने में मम्मी की हर महीने की कोई न कोई बचत दिखाई देती। यही हाल हम दोनों बहनों की अलमारी का था। सिर की पिन से लेकर पाँव की चप्पल तक सब पर मम्मी की मुहर। कोई हमें विधवा की बेटियाँ कहकर सहानुभूति दिखाए ये मम्मी को बिल्कुल पसंद नहीं था। इसलिए हमारा स्टैंडर्ड अब अकसर दूसरों से अच्छा ही हुआ करता था।

उस साल होशियारपुर गए थे ताई जी की बेटी की शादी में। तब बारातियों में से एक था सिमरत सिंह। शादी में खूब मजा आया। पहले पहल खुशी इस बात की हुई कि हम दोनों का नाम लगभग एक जैसा था। बैंगलोर में इंजीनियरिंग कर रहा था सिमरत। टेलीफोन नंबर माँगा तो मुझसे इनकार न हुआ। और दिल्ली लौटते ही घर पर उसके फोन आने शुरू हो गए। मुझे लगने लगा कि अब मैं सचमुच बड़ी हो गई हूँ। कॉलेज की सहेलियों के साथ मिलकर सिमरत के लिए आए दिन कोई न कोई कार्ड खरीदने का बहाना ढूँढ़ती।

मैंने मम्मी को इतनी मेहनत और हम दोनों बहनों से इतना प्यार करते देखा था कि उनकी जगह कोई और ले ही नहीं सकता था। मम्मी का विश्वास तोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए मैंने हिम्मत करके सिमरत के बारे में मम्मी को बताया। इस बार जब उसका फोन आया तो मम्मी ने भी सिमरत से बात की और दोनों को पहले अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी फिर आशीर्वाद दिया कि हम दोनों हमेशा खुश रहें।

अंकल जी के समझाने के बाद से आज तक हम रात को दरवाजे की चटखनी अच्छी तरह बंद करके ही सोते थे पर मुसीबतें न जाने किस खिड़की से हमारे घर का रास्ता ढूँढ़ ही लेती।

आधी रात को अचानक मम्मी की तबियत बहुत खराब हो गई। रात को ही अंकल जी को फोन किया और एंबुलेंस में डालकर मम्मी को हॉस्पिटल लेकर गए। डॉक्टर ने बताया मम्मी का बीपी बहुत बढ़ गया है उन्हें आराम की सख्त जरूरत है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि मम्मी को कैंसर हो गया था।

मेरे पाँव तले से जमीन खिसक गई। अभी-अभी तो हमने खुश होना शुरू किया था। कैंसर की आखिरी स्टेज थी मम्मी हमारे पास छह महीने से ज्यादा की मेहमान नहीं थी। डॉक्टर उन्हें हॉस्पिटल में रखकर कुछ और टेस्ट करवाना चाहते थे पर मम्मी घर लौटना चाहती थी। वे इन छह महीनों में भी स्कूल जाकर हम दोनों बहनों के लिए कुछ और पैसा छोड़ जाना चाहती थीं। अब मम्मी एक दिन में कई दिनों का काम निपटाने की जल्दी में रहती। बैंक की पास बुक, मकान के कागज, घर में रखी नकदी सबके बारे में मम्मी मुझे कई-कई बार समझाने लगी थी। और मनजोत के बारे में भी। मनजोत और इस घर को लेकर मैं मम्मी की पहली और आखरी आस थी। मम्मी ने खास हिदायत दी कि हम मम्मी की बीमारी के बारे में किसी को कुछ न बताएँ, होशियारपुर वालों को तो बिल्कुल भी नहीं।

सब कुछ जानते हुए भी मैं मम्मी को दोनों वक्त टाइम पर दवा खिलाती और सोचती एक-एक गोली अगर एक-एक दिन भी बढ़ा दे तो बहुत है। मम्मी मेरा अठारहवाँ जन्मदिन धूमधाम से मनाना चाहती थी। मम्मी ने मेरे लिए सोने की दो चूड़ियाँ बनवाईं और मनजोत के लिए बालियाँ। शायद मनजोत के जन्म दिन तक मम्मी ठहर नहीं सकती थी। मेरी और मनजोत की सब सहेलियों और दोस्तों को मम्मी ने घर पर बुलाया। केक कटवाया और अपने हाथ से खाना बनाकर सबको खिलाया। यह मेरी जिंदगी का सबसे यादगार जन्म दिन था। सिमरत का फोन आया और मम्मी ने हम दोनों को एक बार फिर से आशीर्वाद दिया। मम्मी को सिमरत पसंद है इसकी घोषणा मम्मी ने मेरी सारी सहेलियों के सामने की। अगले दिन जब कॉलेज लौटी तो सभी ने कहा, भगवान ऐसी मम्मी सभी को दे। इस बार मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अपनी सहेलियों को मम्मी की बीमारी के बारे में बता दिया। पहली बार मैंने मम्मी का विश्वास तोड़कर घर की कोई बात बाहर वालों को बताई थी।

शायद इसी की सजा मुझे मिली और मम्मी पाँचवें महीने में ही जबरदस्त बीमार हो गई। अब मम्मी ने खुद ही अंकल जी, आंटी जी, होशियारपुर और पटियाले फोन करने को कहा। अगले ही दिन हमारे छोटे से घर में दोस्तों और रिश्तेदारों का हुजूम उमड़ पड़ा। और इसी हुजूम के बीच मम्मी मनजोत का हाथ मेरे हाथ में थमा कर चुप हो गई। इस घर के कोने-कोने से जिसने डैडी जी का खालीपन दूर किया था आज वो भी इस घर से हमेशा के लिए दूर चली गई।

इतनी भीड़ के बीच हम दोनों बहनें बिल्कुल अकेली हो गईं। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने हमारे जिस्म से कपड़े उतार कर हमें नंगा कर दिया हो। हमारे पाँव की जमीन, सिर के ऊपर का आसमान सब एक ही झटके में उजड़ गया।

संस्कार से लौटते ही लोगों ने पूछा, 'अब आगे क्या करना है?' आगे क्या करना है, मुझे लगा जैसे किसी ने एनेस्थीसिया दे दिया हो और मैं बेहोश हो गई।

होश आया तो मैं बिस्तर पर थी और मनजोत मेरे सिराहने बैठी मेरे होश में आने का इंतजार कर रही थी। तब तक ये फैसला हो चुका था कि मामी जी का कोई रिश्तेदार है इंग्लैंड में। उम्र थोड़ी ज्यादा है पर खाता-कमाता अच्छा है। इतना बड़ा घर है फिर भी मामी जी उसे राजी कर ही लेंगी मुझसे शादी करने के लिए। वे लोग कुछ नहीं माँगेंगे पर शादी के लिए खर्चा तो चाहिए ही न, इसके लिए अंकल जी को कहा गया कोई अच्छा सा ग्राहक बुलाकर मकान का सौदा करवाने के लिए। और मनजोज... मनजोत को अमृतसर हॉस्टल में डाल देंगे। अच्छा हॉस्टल है, पढ़ाई भी करेगी और रहेगी भी। जब मैं इंग्लैंड में सेटल हो जाऊँगी तो मैं भी उसे वहीं बुला लूँगी नहीं तो होशियारपुर तो है ही। कभी-कभी छुट्टियों में वहाँ चली जाया करेगी।

मेरी नन्हीं सी मनजोत, मनु जिसका हाथ मम्मी मेरे हाथ में सौंप कर गई है वो ऐसे दर-दर की ठोकरें खाएगी और हमारी मम्मी की आखरी निशानी ये घर, इसके भी सौदे की तैयारी... मैंने साफ इनकार कर दिया... कुछ भी हो जाए मेरी बहन सिर्फ मेरे पास रहेगी और अपने जीते जी हम दोनों बहनें अपनी मम्मी जी की आखिरी निशानी को बिकने नहीं देंगे।

सभी को अपने-अपने घर में जरूरी काम थे, सो हमें सोचने के लिए कहकर वे सभी अपने-अपने घर चले गए। जाते-जाते कह गए बड़ी निर्भाग हैं दोनों। पहले डैडी, फिर मम्मी और ऊपर वाले ने एक बीर दिया होता तो सँभाल लेता दोनों को।

ऊपर वाले शायद अंकल जी और आंटी जी को हमारे लिए ही बनाया था। हमारे सिर पर उन्हीं दोनों हाथ था पर कितनी देर तक। अंकल जी और मम्मी के स्कूल से आए कुछ लोगों ने समझाया कि मैं मम्मी की जगह नौकरी के लिए कोशिश करूँ। पर अभी तो मेरा ग्रेजुएशन का दूसरा ही साल था। पर घर में जो तूफान आया था उसके देखे मेरा पढ़ाई का मसला बहुत छोटा था।

मनजोत ने फोन करके सिमरत को सब कुछ बता दिया। वो बिचारा भी क्या करता, पढ़ाई कर रहा था, जब तक घर से पैसे नहीं मिल जाते तब तक ट्रेन की टिकट भी नहीं करवा सकता था और फिर बैंगलोर से दिल्ली पहुँचने में भी तो वक्त लगता।

सिमरत से पहले ही मामी जी अपने उस रिश्तेदार की तस्वीर और उसकी माँ को लेकर हमारे घर पहुँच गई। मामी जी फूली नहीं समा रहीं थीं यह बताते हुए कि वो मुझे चुन्नी चढ़ाने आईं हैं। मेरा दिमाग घूमने लगा मामी जी के साथ आई उस औरत ने मिठाई के डिब्बे के ऊपर कुछ पैसे रखकर मेरे हाथ में पकड़ा दिए। मेरा वश चलता तो यही डिब्बा उठाकर उसके सिर में दे मारती और दोनों घर से बाहर निकाल देती। पर अनाथ बच्चियाँ किसके सहारे नाराजगी दिखाएँ। मकान का सौदा अभी पटा नहीं था इसलिए दोनों अगले महीने आने की बात कहकर चली गईं। अब मुझसे रहा नहीं गया। मैंने सिमरत को फोन करके जल्द से जल्द कोई फैसला लेने को कहा।

सिमरत ने सिर्फ इतना कहा कि कुछ भी हो जाए तुम दोनों बहनें एक साथ रहना और अपना घर छोड़कर कहीं नहीं जाना। मैं अपने हाथ मजबूत करना चाहती थी। इसलिए नौकरी के लिए कोशिश करना शुरू कर दिया।

एक हफ्ते बाद सिमरत सिंह हमारे घर पर था। उसके पहली बार गले लगकर मैं खूब रोई। एक महीने के बचाए हुए आँसू सब उसी पर उड़ेल दिए। मैं और मनजोत दोनों के लिए सिमरत आखिरी सहारा था। तब तक मामी जी का फोन आ गया। इंग्लैंड वाला लड़का परसों आ रहा है रिंग सेरेमनी के लिए। सिमरत ने फैसला किया हम कल ही शादी कर लेंगे। मैंने अपनी सहेलियों को साथ लिया और सब हिम्मत करके अगले दिन सुबह-सुबह आर्य समाज मंदिर पहुँच गए। न चूड़ा, न चुन्नी शादी क्या की, ऐसा लगा कोई जंग लड़ी है, बॉन्ड साईन किया, तस्वीर खिंचवाई और अपने घर लौट आए।

सिमरत ने आज की रात गुरुद्वारे में ही बिताई। ज्यादा पैसे न उसके पास थे न मेरे। पढ़ाई भी अभी हम दोनों की अधूरी थी। अगली सुबह मामी जी के आने से पहले ही मैं कॉलेज के लिए निकल आई। एजुकेशन के दफ्तर जाकर नौकरी की अर्जी कहाँ तक पहुँची इसका भी पता करना था। सिमरत भी इस शहर में नया-नया था उसका भी ख्याल मुझे ही रखना था। सहेलियों ने इस दौरान बहुत साथ दिया। शादी के बाद पहले दिन, पहली बार हम दोनों ने एक साथ इसी गुरुद्वारे में मत्था टेका। सरोवर किनारे बैठकर एक-दूसरे का हालचाल पूछा। सिमरत ने शादी के तोहफे के तौर पर मेरे लिए ग्रीटिंग कार्ड खरीदा था। सिमरत ने फैसला किया कि अब वह बैंगलोर वापस नहीं जाएगा और यही रहकर कोई नौकरी करेगा।

देर शाम घर लौटी तो मामी जी का चेहरा तमतमाया हुआ था। इंग्लैंड वाला लड़का तीन चार घंटे इंतजार करने के बाद अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ चला गया था। मामी जी और वो लड़का शादी के लिए कमर कसकर आए थे। अब बचना मुश्किल लग रहा था। मैंने बैंक की पासबुक, घर के कागजात इकट्ठे किए और अगली सुबह फिर कॉलेज के लिए निकल गई। मनजोत ने घर पर रहना ठीक समझा। जब तक हम दोनों को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल जाती। मामी जी के रहते घर में क्या-क्या हो रहा है यह बताने वाला भी तो कोई होना चाहिए था। यह सोचकर मैं भी मान गई।

उस रात से मेरा ठिकाना भी गुरद्वारा ही था। मेरे घर न लौटने पर सबसे पहले शक सहेलियों पर ही जाएगा यह सोचकर किसी के घर ठहरने की बजाए मैंने भी गुरद्वारे में ही रहना ठीक समझा और सिमरत तो वहाँ था ही। शादी के बाद भी बस एक दूरी थी, तीन रातें उसने मर्दाना हॉल में और मैंने जनाना हॉल में बिताईं। तब तक मैंने किराए का एक कमरा ढूँढ़ लिया था।

घर पर फोन किया तो पता चला कि मामी जी ने ताई जी को भी होशियारपुर से यहाँ बुला लिया है और छातियाँ पीटी जा रही हैं कि माँ की आग ठंडी भी नहीं हुई थी और लड़की घर से भाग गई। दोनों ने मिलकर पूरे घर की तलाशी ली, जब कुछ नहीं मिला तो बैंक का खाता सील करवाने की भी कोशिश की। मैं तो चली पर मेरी नन्हीं मनू उन के ताने सुनने के लिए अकेली रह गई थी। अब वे एक पल के लिए भी मनजोत को चैन से नहीं बैठने देती थीं।

किसी तरह उन्होंने हमारे ठिकाने का पता लगा ही लिया। ताई जी क्योंकि सिमरत के घर वालों को जानती थीं इसलिए उन्होंने उन्हें भी फोन करके दिल्ली बुलवा लिया। सबने मिलकर हमारे नए घरौंदे पर डेरा डाल दिया। चारों तरफ से गालियाँ पड़ रहीं थीं। सभी हम दोनों को अलग करना चाहते थे पर हम तो शादी कर चुके थे। इस पर मामी जी ने कहा भी, 'दो चार दिन ही तो साथ रहे हो, फिर क्या हो गया हम किसी को नहीं बताएँगे चलो बड़ों के आगे माफी माँग लो।' अपने मम्मी जी-डैडी जी को देखकर सिमरत पिघल गया। घंटो रोता रहा पर हिम्मत नहीं हारी। मैंने जब पुलिस को बुलाने की धमकी दी तब जाकर सब वहाँ से उठे। जाते-जाते सिमरत की मम्मी जी कह ही गए, 'जादूगरनी है, मेरे भोले-भाले बेटे पर जादू कर दिया है।'

इस बार मामी जी और ताई जी घर से निकले तो मनजोत भी घर को ताला मारकर वहाँ से भाग खड़ी हुई। बड़ा ढूँढ़ा तब पता चला कि वो अपनी एक सहेली के घर पर है। अब हर रोज कोई न कोई हमें समझाने हमारे घर आ धमकता। यह सब देखकर पड़ोसियों ने भी हमें शक की निगाह से देखना शुरू कर दिया है। मैंने नए मकान की तलाश शुरू कर दी। मनजोत को बुलाया और सिमरत के साथ जो भी थोड़ा सा सामान था चुपके से नए मकान में चले गए। मकान मालिक को जो तीन महीने का एडवांस दिया था उस पर भी बात नहीं की।

मनजोत के घर को ताला मारने के बाद से ही मामी जी ने पटियाले की और ताई जी ने होशियारपुर की गाड़ी पकड़ ली। सिमरत के मम्मी जी-डैडी जी भी थक हारकर अपने घर लौट गए।

खुशियाँ कितनी देर हमसे रूठी रहतीं। सिमरत को गाड़ियों पर बार कोडिंग करने वाली एक कंपनी में नौकरी मिल गई थी और अच्छा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद मेरी भी नौकरी का लेटर आ गया। अब हमें किसी का डर नहीं था, हम अपने घर लौटे, अपने असली घर, मम्मी जी की आखरी निशानी के पास। आज रविवार था मनजोत ने मेरे हाथों में लाल चूड़ा चढ़ाया और हम चल पड़े बंगला साहिब गुरुरद्वारे शुक्राना अदा करने। हमारी जिंदगी में लाली लौट आई थी। शादी के कई महीनों बाद मैं और सिमरत पहली बार एक बिस्तर पर आए।

जिंदगी ने सब कुछ दिया, सुख भी और दुख भी। मनजोत डॉक्टर बन गई। सिमरत ने बड़ी सादगी से अपने एक इंजीनियर दोस्त से उसकी शादी करवाई। मेरी और सिमरत की नन्हीं कंवल कौर भी अब स्कूल जाने लगी है। सबसे ज्यादा खुशी की बात यह कि माँ की निशानी अब भी सलामत है...

वक्त काफी बीत चुका था। सिमरन ने पर्स उठाया, सरोवर की परिक्रमा की और मत्था टेककर घर के लिए निकल पड़ी। घर पहुँची तो देखा कॉलोनी के स्मारक पर लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ है। इसी मोहल्ले की मम्मी की कुछ पुरानी सहेलियाँ आज फिर से छाती पीट-पीटकर हाय-हाय के नारे लगा रहीं हैं और कह रहीं हैं कि ऊपर वाले गुनाहगारों को कभी बख्शेगा नहीं है। एक अखबार जो सब पढ़ रहे हैं उस पर छपा है '84 के दंगों में दो और को क्लीन चिट।'


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