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कविता

गुलबिया क चिट्ठी
कैलाश गौतम


कहीं निरदयी कि बेदरदी कहीं हम
भुलक्‍कड़ कहीं कि अलहदी कहीं हम
कि झुट्ठा कि लंपट कि बुद्धू अनाड़ी
कि अकड़ू कि अँइठू कि पक्‍का खेलाड़ी
गयल हउवा जब से न मुँह फिर देखउला
न देहला सनेसा न चिट्ठी पठउला
न कहले कहाला न सहले सहाला
हमैं दाल में कुछ हौ काला बुझाला
झरत हउवै पतई बहत हौ झकोरा
खलत हउवै ऐना खलत हौ सिन्‍होरा
अ बान्‍है के हौ बार मीसल परल हौ
बिहाने से तोहरे पर गुस्‍सा बरल हौ
बजत हौ झमाझम रहरिया क छेमी
सबै भइया बाबू सिवाने क प्रेमी
चढ़ल हउवै फागुन उपद्दर मचल हौ
सबै रंग में डूबल न केहू बचल हौ
हौ होठे पर फागुन कपारे पर फागुन
बजावत हौ चिमटा दुआरे पर फागुन
लवर दिन में लहकै परासे के ओरी
कियरिया लगै लइसे रंग क कटोरी
फरल हउवै सहिजन दुआरे क जब से
उहै हउवै ठीहा दुलारे क तब से
बड़े मन से फगुआ जियत हउवैं बुढ़ऊ
अ भ‍गतिन के मंठा पियत हउवैं बुढ़ऊ
जहाँ देखैं बुढ़ऊ टकाटक निहारैं
एको दाँत नाहीं हौ मसगुर चियारैं
भगत कंठी वाले चुहल पर उतारू
उहैं ढेर बइठैं जहाँ मेहरारू
का का बताईं आ कइसे बताईं
बिपत पर बिपत हौ कहाँ तक गिनाईं
एहर कवनो करवट न आवै ओंधाईं
अ देखीं चनरमा त फूटै रोवाईं
भुला गइला फगुआ भुला गइला होरी
भुला गइला चुटकी थपोरी टिकोरी
गहागह फुलाइल कियारी भुलइला
तू कइसे भला महुआबारी भुलइला
सिवाने क सरसों देखाले कि नाहीं
अ कोइल क बोली सुनाले कि नाहीं
टिकोरा करेजा छुवैला कि नाहीं
अ सिरहाने महुआ चुवैला कि नाहीं
भुला गइला किरिया भुला गइला वादा
अबौ ले बतावा असों का इरादा
गइल खेती-बारी अ मूँड़े उधारी
अ कइसे दियाई असों मलगुजारी
पकत हउवै गोहूँ लगत हउवै कटनी
उहै बासी रोटी अ लहसुन क चटनी
हँसी मुसकुराहट हेराइल हौ जइसे
अ एही में जिनिगी घेराइल हौ जइसे
अ चुड़िहारिन सगरों पुकारैले धँस के
हमैं देख आगे निकल जाले हँस के
बड़ा बेकहल हौ कबुत्तर क जोड़ा
करै मूँहाठोंठी न मानै निगोड़ा
गुटरगूँ-गुटरगूँ सुनावल करैला
ई आल्‍हर करेजा जरावल करैला
अ गौरइया खोंता लगावत हौ फिर से
अ चुन-चुन के तिनका लियावत हौ फिर से
बँहसटी पुरनकी जरावे के लायक
अ बड़की पलँगरी बिनावे के लायक
सूतींला भुँइला मगर जिउ डेराला
अ रोजे इहाँ साँप गोजर मराला
घरे होता अब ले त दीया बुताइत
अ बहरी दुआरी में बेंवड़ा लगाइत
तू आपन सुनवता हम आपन सुनाइत
अ बेना डोलाइत थकहरी मेटाइत
निहारींला पैड़ा आ जोहींला गाड़ी
भरल आँख हउए खुलल हौ केंवाड़ी
उहाँ नाहीं आइब हम दूसर न होबै
तोरे दाल भाती में मूसर न हौबै

 


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