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बाल साहित्य

जलेबी के पेड़
मनोहर चमोली ‘मनु’


बहुत पुरानी बात है। उस समय धरती पर एक भी पेड़ नहीं उगा था। धरती अकेली थी। सुनसान। सपाट और खाली-खाली। धरती पर हवा ही रहती थी। हवा के पास ढेर सारे बीज थे। हवा ने दो बीज बो दिए। बारिश हुई। धरती पर दो पेड़ उग आए। पहला पेड़ जलेबी का था। उस पेड़ पर जलेबियां लगती। दूसरा पेड़ गुलाब जामुन का था। उस पेड़ पर गुलाब जामुन लगते।

एक दिन जलेबी का पेड़ बोला-''उफ! ये हवा मेरी जलेबियां गिरा देती है। उतनी ही फिर से उग आती हंै। मुझसे मेरी रसीली जलेबियों का बोझ ही सहन नहीं होता। क्या करूं? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।''

गुलाब जामुन का पेड़ बोला-''ठीक कहते हो। मैं खुद परेशान हूं। हवा मेरे गुलाब जामुन गिरा देती है। मेरे फल तो बहुत ही नाजुक हैं। हल्का झोंका भी सहन नहीं कर पाते। टप्प से टपक पड़ते हैं।''

उन दोनों की बातें हवा भी सुन रही थी। अपने बारे में ऐसा सुनकर वह नाराज हो गई। हवा जलेबी के पेड़ पर जा पहुंची। कहने लगी-''अब तुझ पर जलेबियां नहीं आएंगी। तेरे फल गोल और घुमावदार नहीं रहेंगे। तेरे फल लम्बे होंगे। तेरे फल अब देर से पकेंगे।''

जलेबी का पेड़ बोला-''हां-हां। मेरे लिए यह ठीक रहेगा।''

अब हवा गुलाब जामुन के पेड़ पर जा पहुंची। पेड़ से कहने लगी-''तेरे गुलाब जामुन नाजुक हैं न? अच्छा अब से तेरे फल बहुत कठोर हो जाएंगे। इतने कठोर कि उन्हें खाने से पहले फोड़ना होगा।''

यह कहकर हवा चली गई। हवा ने सारे बीज धरती पर बिखेर दिये। धरती में सैकड़ों पेड़ उग आए। जलेबी के पेड़ पर अब केले उगने लगे और गुलाब जामुन के पेड़ पर अखरोट लगने लगे।


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