डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

बाल साहित्य

शतकों का शतक
मनोहर चमोली ‘मनु’


मेघा पिछले साल स्कूल की टाॅपर थी। उसे उम्मीद थी कि इस साल भी वो ही नंबर वन पर रहेगी। लेकिन मंच से उसे नहीं अनु को बुलाया गया। स्कूल टाॅपर के रूप में अनु के लिए तालियां बज रही थीं। बहुत समय बाद मेघा का नाम पुकारा गया तो वह वह फफक-फफक रोने लगी। प्रिंसीपल मैडम ने उसे इशारे से बुलाया। नजदीक पहुंचते ही मेघा की आँखों से आंसू झरने लगे। प्रिंसीपल मैडम ने पूछा-''मेघा। जानना चाहती हो कि तुम इस बार बेहतर प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाई?''

मेघा हां में अपना सिर ही हिला पाई। प्रिंसीपल ने कहा-''तुमने पिछले साल सर्वश्रेष्ठ अंक हासिल किये थे। वहीं तुम्हारी सबसे अच्छी सहेली राधिका इस बार भी टाॅप इलेवन में नहीं आ पाई। सबसे बड़ी बात अनु की मेहनत रंग लाई। अनु मेरिट में कहीं भी नहीं थी। लेकिन आज वो इस स्कूल की सर्वश्रेष्ठ छात्रा बनकर उभरी है।''

मेघा ने सिसकते हुए कहा-''लेकिन मैम मैंने तो बहुत मेहनत की थी। फिर भी मैं...'' मेघा का गला भर आया। वह आगे कुछ भी न बोल पाई।

प्रिंसीपल ने मुस्कराते हुए उसे लाईन में खड़े होने को कहा। प्रिंसीपल ने अब सभी छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा-''प्यारे बच्चों। सबसे पहले आप सभी को बधाई। यह खुशी की बात है कि आप सभी अच्छे नंबरों से पास हुए हैं। परीक्षा कोई हौवा नहीं है। परीक्षा न ही अखाड़ा है और न ही हार-जीत का मैदान। मैं मानती हूं कि आप सभी बच्चों में एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं हैं। हुनर है। हौसला है। बिना रूक,े बिना थके लगातार काम करने की ताकत आप में है। वैसे कोई भी परीक्षा किसी भी बच्चे का सही मूल्यांकन नहीं कर सकती। मूल्यांकन तो लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन फिर भी साल भर का आकलन एक लिखित परीक्षा से ही होता है। अव्वल तो हर कोई नहीं आ सकता। कोई एक ही रहेगा। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमने हर दिन नया क्या सीखा। हम हर रोज अपना आकलन करें कि हम आज बीते कल से बेहतर हुए कि नहीं। परीक्षा हमें यही अवसर देती है। केवल पढ़ाई और लिखाई से आपका रिपोर्ट कार्ड पूरा नहीं होता। साल भर आपकी दैनिक गतिविधियां क्या थीं। उसका आकलन करने के बाद ही आपकी मेरिट बनी है।'' यह कहकर प्रिंसीपल ने प्रिया मैडम को इशारा किया।

प्रिया मैडम फाईल लेकर मंच पर आ गई। मैडम ने कहना शुरू किया-''प्यारे बच्चों। आज ही से अब आप नई कक्षा के छात्र बन गए हैं। अब बात करते हैं इस बार की सर्वश्रेष्ठ टाॅपर अनु की। अनु ने बेहतर प्रदर्शन किया है। अनु साल के पहले ही दिन से अपने लक्ष्य का पीछा करती रही। इस छात्रा ने एक भी दिन अपने इस संकल्प को दिल और दिमाग से बाहर नहीं निकलने दिया। लगन, हौसला और आत्मविश्वास के चलते अनु ने यह स्थान प्राप्त किया है।'' सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अनु चहकते हुए मंच पर अपना पुरस्कार लेने आई।

प्रिया मैडम ने फाईल पर नजर दौड़ाते हुए कहा-''अब बात करते हैं उन बच्चों की जो चाहते तो हैं कि वे अव्वल रहे लेकिन परिणाम उनके मुताबिक नहीं आता। ऐसा क्यों होता है? इस पर हर छात्र को सोचना चाहिए। केवल नियमित स्कूल आना और कक्षा में बैठ जाना ही काफी नहीं होता। सबसे पहले हमें मायूसी को अपने मन से निकालना होगा। पिछले साल के प्रदर्शन को भूल कर नए सिरे से नई उपलब्धियां हासिल करने के लिए जुट जाना होगा। मायूसी ही हमें निराश करती है। हम अच्छा करने से पहले ही निराश हो जाते हैं। बहुत अच्छा कर सकने की क्षमता के बाद भी हम अच्छा नहीं कर पाते। हम उम्मीद करते हैं कि आप सभी आज ही से अपने आत्मविश्वास को बढ़ाएंगे और मायूस नहीं होंगे।'' सबने तालियां बजाकर मैडम की बात का समर्थन किया।

मैडम प्रिया ने कहा-''अब मैं मंच पर मेघा को बुलाना चाहूंगी। मेघा पिछले साल टाॅपर रही है।'' मेघा सुबकते हुए मंच पर आ गई। प्रिंसीपल मैडम ने मंच पर आकर कहा-''मेघा मेहनती है। यही कारण है कि इसने पिछले साल टाॅप किया था। लेकिन मेघा कामयाबी को बरकरार नहीं रख पाई। शायद मेघा को लगा कि अब उससे बेहतर कोई नहीं हो सकता। बच्चो याद रखो। सफलता की सबसे ऊँची सीढ़ी पर तुम आसानी से पहुंच सकते हो। लेकिन उस सीढ़ी पर बने रहना और टिके रहना इतना आसान नहीं है। मेघा ने पिछले साल जमकर मेहनत की थी। लेकिन इस बार उसे और अधिक मेहनत करनी थी। सचिन तेंदुलकर विश्व के महानतम बल्लेबाज एक शतक से नहीं बने। उन्हें हर बार एक और शतक लगाना पड़ा। हर बार एक-एक बाल को ध्यान से खेलना पड़ा होगा। हर बार शतक बनाने के लिए मेहनत की होगी। तभी तो वे शतकों का शतक लगा सके। क्यों?''

बच्चों ने फिर से तालियां बजाईं। राधिका और मेघा जैसे कई बच्चे थे, जो इस साल के लिए फिर से और अधिक मेहनत करने का संकल्प मन ही मन मे दोहरा रहे थे।


End Text   End Text    End Text