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कविता

अब मैं
आभा बोधिसत्व


धरा हूँ
पेड़ हूँ
हरा हूँ
जिसे चाहूँ दूँ फल-
फूल हूँ जिसे चाहूँ दूँ खूशबू,
अन्न हूँ जिसे चाहूँ दूँ तृप्ति
रोना त्याग कर
पानी अपनी आँखों में बाँध कर।
यह वह पानी नहीं जिसकी परिभाषा
तुम्हारे पास है कुलबोरनी नदी
यह नदी है गंगा जो रोई मेरे साथ
यमुना भी
यह वह पानी है जिसमें मैं जीती हूँ
अपने अस्तित्व में
अब मैं... थक कर विचार

 


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