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कविता

एप्रन
आल्दा मेरीनी

अनुवाद - सरिता शर्मा


हालाँकि, मेरी माँ के पास, छुट्टियों और काम करने के लिए
एक ही पुराना एप्रन था
और उन्होंने जिंदा रहकर, इससे खुद को सांत्वना दी।
हमें उस एप्रन में तसल्ली मिली
जिसे उनकी मृत्यु के बाद
कबाड़ी को दे दिया गया, मगर एक भिखमंगे ने,
उसके मातृभाव को जानकर,
अपने जिंदा अंतिम संस्कार के लिए
उससे एक गीला तकिया बनाया


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