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बाल साहित्य

ठीक हो जाएगा मिट्ठू ?
मनोहर चमोली ‘मनु’


जसवंत ने शिकायत की - 'मैम। इयारा ने मेरी कॉपी खराब कर दी।'

'इयारा। स्टैंड अप। क्या किया तुमने?' अनीता मैडम ने पूछा। तभी इयारा खड़ी हो गई। वह हाथ मटकाते हुए बोली - 'मैम ये इयारा और दीया रोज च्विंगम खाते हैं और फिर चुपके से हमारी बुक्स और कॉपीज में चिपका देते हैं।'

'मैम, दीया ने कल मेरे एक जुराब में च्विंगम चिपका दिया। मेरा एक जुराब खराब हो गया। ममा ने धोया भी, बट च्विंगम चिपककर काला हो गया है। यह देखो। मेरा एक जुराब कितना भद्दा लग रहा है।' सनजीत भी खड़ा हो गया।

वह बोला - 'मैम, इयारा अपने मुँह का च्विंगम खींच-खींच कर धागा बनाती है और उसे स्टूल-डैस्क में चिपका देती है। मैम, मेरा बैन्च और जॉन का बैंच देखिए, इसने कितना खराब कर दिया है।'

मैम ने इशारा किया तो इयारा और दीया सीट छोड़कर मैम की कुर्सी के पास आ गए। मैम ने कहा - 'तुम दोनों को कुछ और काम नहीं है! ये अच्छी बात नहीं है। चलो अभी के अभी मेरी चेयर, टेबिल और इस क्लास के सभी बैंच-स्टूल साफ करो। अच्छे से। बाकी बच्चों तुम सब बुक्स निकालो।' यह कहकर अनीता मैडम पढ़ाने में व्यस्त हो गई।

इयारा और दीया को अक्सर च्विंगम के कारण क्लासरूम में डाँट पड़ती। कल तो हद ही हो गई। नई मैडम नीता चावला का पहला दिन था। मौसम बेहद खराब था। बिजली चले जाने से क्लासरूम में सामान्य से कम रोशनी थी। इयारा और दीया ने क्लास टीचर नीता चावला की कुर्सी में चबाया हुआ च्विंगम रख दिया। नीता चावला की नजरें कमजोर थीं। वह आईं और चुपचाप कुर्सी में बैठकर हाजिरी लेने लगी। चावला मैडम ने जैसे ही इयारा का नाम पुकारा वह खड़ी होकर हँसने लगी।

नीता चावला ने पूछा - 'क्या हुआ? अटेंडेंस देने की बजाए तुम हँस रही हो?' अब दीया भी हँसने लगी। मैडम नीता को कुछ समझ नहीं आया। कुलबिंदर कौर उठी। वह बोली - 'मैम। इन दोनों ने जरूर कोई गड़बड़ की है। ये दोनों आज क्लास में पहले से बैठी हुई थीं। ये प्रेयर में भी नहीं थीं।'

नीता चावला ने पूछा - 'गड़बड़!' ग़जाला ने बीच में बोल पड़ी - 'हाँ मैम। कल तो प्रिंसिपल मैम ने इन दोनों को अपने ऑफिस में काफी देर तक खड़ा रखा। इन दोनों ने प्रिंसिपल मैंम की चेयर पर च्विंगम रख दिया था। वह च्विंगम मैम की साड़ी में चिपक गया था।'

इतना सुनते ही नीता चावला खड़ी हो गई। वह स्टूडेंट्स की ओर घूमी तो कुलबिंदर चिल्लाई - 'हा मैम। आपकी साड़ी में एक नहीं दो जगह च्विंगम चिपका हुआ है। ये इन दोनों ही रखा होगा।'

मैडम ने हाजिरी रजिस्टर बंद किया और सीधे प्रिंसिपल ऑफिस की ओर चली गई। दीया और इयारा के पेरेंट्स स्कूल में बुलाए गए। इयारा की अम्मी और दीया के पिता प्रिंसिपल मैडम से मिले।

इयारा की अम्मी बोली - 'हमने तो इयारा का पॉकेटमनी तक बंद कर दिया है। इसे दीया ही च्विंगम खरीद कर देती है। इयारा ने घर में कई चादरें और रजाई खराब कर दी हैं। इयारा च्विंगम चबाते-चबाते सो जाती है। वही च्विंगम यहाँ-वहाँ गिर जाता है। दीया की संगत में रहकर ही हमारी इयारा ने च्विंगम खाना सीखा है। यदि दीया च्विंगम नहीं खाएगी तो मैं भी नहीं खाऊँगी। इयारा ऐसा कहती है। अब आप ही बताइए, ये भी कोई बात हुई?' दीया के पिता सिर झुकाए हुए चुपचाप सुन रहे थे। वह धीरे से बोले -'च्विंगम खा-खाकर दीया को मीठा खाने की आदत पड़ गई है। च्विंगम की लगातार आ रही शिकायतों के चलते मैं दीया के दो स्कूल बदल चुका हूँ।' प्रिंसिपल मुस्कराई - 'स्कूल बदलने से यह समस्या हल नहीं होगी। हम च्विंगम चबाने के खिलाफ नहीं है। बल्कि उसे चबा लेने के बाद ये बच्चियाँ उसका जो दुरुपयोग करती हैं, उससे परेशान हैं। खैर कोई बात नहीं। बच्चों को मारने-पीटने से उनकी यह आदत नहीं छूटेगी। बस उन दोनों का मन बदलना है। फिर भी आप ध्यान रखिए।'

स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ गई थीं। दीया के घर उसकी नानी आई हुई थी। दीया नानी के साथ ननिहाल चली आई। दीया किसी को बिना बताए अपने बैग में ढेर सारे च्विंगम साथ ले आई थी। दीया को नानी का गाँव बहुत अच्छा लगा। इतना अच्छा कि खेत, खलिहान, तालाब और गाँव की मस्ती और खेलकूद में वह च्विंगम खाना ही भूल गई। गाँव में उसके कई दोस्त बन गए थे। जुबैदा, शाईन, हरमिंदर, आनंदा के साथ खेलना उसे अच्छा लगने लगा था। एक सुबह की बात है। जुबैदा ने दीया की नानी से कहा - 'मेरी अम्मी और अब्बू शहर गए हैं। मैं घर पर अकेली हूँ। दीया को मेरे साथ भेज दीजिए।'

दीया की नानी ने कहा - 'ठीक है। लेकिन दिन में तुम दोनों खाना खाने आ जाना।'

दोनों हँसी-खुशी जुबैदा के घर की ओर चल पड़े। 'आओ जुबैदा। वेलकम।' जुबैदा ने जैसे ही घर में कदम रखा, भीतर से आवाज आई तो दीया ने चौंकते हुए पूछा - 'घर में कौन है?' जुबैदा ने जवाब दिया - 'कोई नहीं।'

'कोई कैसे नहीं है! अभी तो कोई बोला था!' फिर से आवाज आई - 'आओ जुबैदा। वेलकम।'

'फिर कोई बोला। कौन है अंदर?' दीया ने पूछा।

'ओह! ये तो हमारा मिट्ठू है। ऊपर देखो।'

दीया ने छत की ओर देखा तो उसे वहाँ एक पिंजरा नजर आया। पिंजरे में तोता था। 'ये तोता तो बोलता है! मैं तो पहली बार तोता देख रही हूँ। ये कितना प्यारा है। इसकी चोंच कितनी प्यारी है! ये क्या-क्या खाता है?' दीया ने चौंकते हुए पूछा। जुबैदा ने बताया - 'हम जो भी खाते हैं, इसे भी देते हैं। ये ए टू जेड सुनाता है। मिट्ठू वन से लेकर हंड्रेड तक काउंट भी कर लेता है।' दीया ने कहा - 'मैं अभी एक मिनट में आती हूँ।' यह कहकर दीया चली गई। दीया दौड़ती हुई वापिस आई। वह हाँफते हुए बोली - 'मैं मिट्ठू को ऐसी चीज खिलाना चाहती हूँ, जो इसने नहीं खाई होगी।' यह कहकर उसने तीन-चार च्विंगम की गोलियाँ पिंजरे में डाल दी। एक च्विंगम उसने खुद खाया और कुछ च्विंगम उसने जुबैदा को देते हुए कहा - 'इसे च्विंगम कहते हैं। ये सब तुम्हारे लिए हैं। च्विंगम खुशबूदार होता है। बहुत मीठा भी। च्विंगम से दाँतों की कसरत भी हो जाती है। और हाँ, इसे टॉफी या चॉकलेट की तरह चबाकर खाते नहीं है। बस चबाते रहते हैं, चबाते रहते हैं।' दोनों हँसने लगे।

जुबैदा को च्विंगम बहुत पसंद आया। अभी वे दोनों च्विंगम के बारे में बात कर ही रहे थे कि तोता जोर-जोर से टींटींटींटीं करने लगा। पिंजरे के अंदर तोता पंखों को बेहद तीव्रता के साथ फड़फड़ाने लगा। दीया ने पूछा - 'इसे अचानक क्या हुआ? ये क्यों चिल्लाया?'

जुबैदा बोली - 'पता नहीं। मिट्ठू ने पहले तो ऐसा कभी नहीं किया। शायद पानी पीना चाहता हो। मैं इसे थोड़ा पानी देती हूँ।' जुबैदा पानी ले आई। पिंजरे के अंदर जड़ी नन्ही सी कटोरी में जुबैदा ने पानी डाल दिया। लेकिन तोते न कटोरी में चोंच तक नहीं डाली।

तोता अब भी लगातार अपने पंख फड़फड़ा रहा था। बस अब उसने चिल्लाना बंद कर दिया था। शाम हो आई थी। जुबैदा के अम्मी-अब्बू शहर से लौट आए तो दीया अपनी नानी के पास चली गई।

सुबह हुई तो दीया फिर जुबैदा के घर चली आई। वह सीधे पिंजरे के पास गई तो

उसने देखा तोता निढाल पड़ा है। पिंजरे के पास ही जुबैदा के अम्मी-अब्बू चुपचाप खड़े हैं।

दीया ने पूछा - 'आंटी, मिट्ठू को क्या हुआ? ये तो हिल-डुल भी नहीं रहा है। अंकल, जुबैदा कहाँ है?'

जुबैदा के अब्बू बोले - 'जुबैदा घर के पीछे वाली कोठरी में बैठी है। उसने कल शाम से कुछ भी नहीं खाया है। यहाँ तक की पानी भी नहीं पिया है।'

'कुछ नहीं खाया है! पानी नहीं पिया है! मगर क्यों?'

'क्योंकि उसके मिट्ठू ने भी कल शाम से न कुछ खाया है और न ही पिया है।'

'क्यों? मिट्ठू को क्या हुआ?'

जुबैदा की अम्मी ने धीरे से कहा - 'दीया, तुम्हारे च्विंगम की वजह से ऐसा हुआ है।'

'च्विंगम की वजह से?'

जुबैदा के अब्बू बोले - 'मेघा। च्विंगम चिपचिपा होता है। वह मिट्ठू की चोंच और जीभ में गोंद की तरह चिपक गया है। शायद गले में भी। अब वह न कुछ खा पा रहा है और न ही पानी पी पा रहा है। यहाँ तक कि कल शाम से हमने इसकी आवाज भी नहीं सुनी है। अब यदि यह कुछ खाएगा-पीएगा नहीं तो मर ही जाएगा।'

यह सब सुनकर दीया सन्न रह गई। वह दौड़कर जुबैदा के पास जा पहुँची। जुबैदा

को रोते देख दीया भी रोने लगी। वह जुबैदा से बोली - 'सॉरी जुबैदा। मुझे नहीं पता था कि च्विंगम से मिट्ठू की यह हालत हो जाएगी। पता नहीं अब क्या होगा?'

जुबैदा बोली - 'अब मिट्ठू का बचना मुश्किल है।' यह कहकर वह रोने लगी।

दीया सुबकते हुए बोली - 'जुबैदा। मिट्ठू की जो हालत हुई है वह मेरी वजह से हुई है। इस च्विंगम की वजह से मुझे और मेरी सहेली इयारा को स्कूल में कई बार पनिशमेंट भी मिला है। मम्मी-पापा को भी कई बार स्कूल में बुलाया गया है। हम च्विंगम खाकर उसे यहाँ-वहाँ फेंकते रहे हैं। न जाने कितने पक्षी फेंके हुए च्विंगम को खाकर तुम्हारे मिट्ठू की तरह परेशान हुए होंगे। मुझे पता नहीं था कि यह च्विंगम इतना हार्मफुल है।' इतना कहकर दीया जुबैदा से चिपक गई।

क्या मिट्ठू ठीक हो जाएगा? दीया और जुबैदा शायद यही सोच रहे थे।


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