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कविता

अपेक्षा
महेन्द्र भटनागर


कोई तो हमें चाहे
गाहे-ब-गाहे!


निपट सूनी
अकेली जिंदगी में,
गहरे कूप में बरबस
ढकेली जिंदगी में,
निष्ठुर घात-वार-प्रहार
झेली जिंदगी में,


कोई तो हमें चाहे,
       सराहे!


किसी की तो मिले
         शुभकामना
         सद्भावना!


अभिशाप झुलसे लोक में
सर्वत्र छाये शोक में
हमदर्द हो
           कोई
           कभी तो!
तीव्र विद्युन्मय
दमित वातावरण में
बेतहाशा गूँजती जब
          मर्मवेधी
चीख-आह-कराह,
अतिदाह में जलती
          विध्वंसित जिंदगी
          आबद्ध कारागाह!
ऐसे तबाही के क्षणों में
चाह जगती है कि
          कोई तो हमें चाहे
          भले,
          गाहे-ब-गाहे!


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