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कविता

अनुभूति
महेन्द्र भटनागर


जीवन-भर
अजीबोगरीब मूर्खताएँ
            करने के सिवा,
समाज का
थोपा हुआ कर्ज
            भरने के सिवा,
क्या किया?


गलतियाँ कीं
खूब गलतियाँ कीं,
चूके
बार-बार चूके!
यों कहें -
जिए;
लेकिन जीने का ढंग
            कहाँ आया?
           (ढोंग कहाँ आया!)
और अब सब-कुछ
भंग-रंग
हो जाने के बाद -
              दंग हूँ,
              बेहद दंग हूँ!
              विवेक अपंग हूँ!


विश्वास किया
लोगों पर,
अंध-विश्वास किया
अपनों पर!


और धूर्त
साफ कर गए सब
           घर-बार,
बरबाद कर गए
जीवन का
           रूप-रंग सिंगार!


छद्म थे, मुखौटे थे,
सत्य के लिबास में
          झूठे थे,
अजब गजब के थे!


जिंदगी गुजर जाने के बाद,
नाटक की
फल-प्राप्ति / समाप्ति के करीब,
सलीब पर लटके हुए|
सचाई से रू-ब-रू हुए जब -
अनुभूत हुए
असंख्य विद्युत-झटके
              तीव्र अग्नि-कण!
ऐंठते
दर्द से आहत
तन-मन!


हैरतअंगेज है, सब!
सब, अद्भुत है!
अस्तित्व कहाँ हैं मेरा,
           मेरा बुत है!
अब,
पछतावे का कड़वा रस
पीने के सिवा
बचा क्या?


जमाने को
न थी, न है
रत्ती-भर
शर्म-हया!


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