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नाटक

दर्ज लम्हे : खुदकुशी के
दिनकर बेडेकर

अनुवाद - माधुरी बेडेकर


व्यक्ति रेखा : जनक, राजा, मोहिनी

( किसी नाटक की रिहर्सल का कमरा। थोड़ा फर्नीचर जमा कर रखा है। एक दरवाजा। प्रकाश योजना केवल आवश्यक उतनी ही। एक कुर्सी पर जनक बैठा है। जींस-शर्ट ऐसी पोशाक। हाथ में एक फाइल है। पढ़ रहा है। उम्र लगभग चालीस। व्यग्र चेहरा। वर्तन में आत्मविश्वास। मितभाषी। क्षणभर में राजा आता है। जनक का असिस्टेंट। सीधा-सादा मेहनती लड़का। राजा के हाथ में चाय का मग है। जनक को देता है।)

जनक : तुम्हारी?

राजा : है न -

( जाता है। जनक पुनः पढ़ने लगता है। कुछ ही क्षणों में मोहिनी आती है। उम्र लगभग पैंतीस। जींस-शर्ट पहने हुए। बोल-चाल में अभिनेत्री होने के लक्षण। कंधे पर बड़ीपर्स।)

मोहिनी : (दरवाजे से ही) हा SSय!

( जनक का उसकी ओर केवल एक कटाक्ष। ध्यान पुनः फाइल में। मोहिनी आती है। एक कुर्सी पर बैठती है।)

मोहिनी : व्हॉट अ नास्टी वेदर, है ना? किचकिच किचकिच हो रही है -

( जनक कोई प्रतिक्रिया नहीं देता।)

मोहिनी : राजा - ए राजा

( राजा आता है।)

मोहिनी : ए - कुछ ठंडा लेके आओ ना मेरे लिए -

( राजा हाँ कहकर जाता है।)

मोहिनी : हं... स्क्रिप्ट पूरी बन गई लगती है - या अब भी कुछ पन्ने होने ही हैं... लेखक भी क्या पकड़ा है - दो-दो तीन-तीन पन्ने लिखकर देता है।

( जनक कुछ नहीं कहता।)

मोहिनी : बाकी सब अभी आने के ही हैं? जनक - तुम ना अपने एक्टर्स को बहोत लड़िया के रखते हो।

( इस वाक्य पर जनक फाइल बंद करता है। परे रखता है। उठता है।)

जनक : कहाँ थीं आप हफ्ता भर? न कोई मेसेज, न फोन ‌-

मोहिनी : आय वॉज आउट ऑफ टाउन।

जनक : अच्छा?

मोहिनी : हाँ। अ‍ॅन्ड डोंट यू मेक मी फील गिल्टी अबाउट इट। पिछले संडे तक तो स्क्रिप्ट भी पूरी नहीं हुई थी।

जनक : वो हो चुकी थी, दो दिनों में। और फिर पागलों जैसे शहर भर तुम्हें ढूँढ़ते फिर रहे थे।

मोहिनी : सॉरी -

जनक : मोहिनी, मैं जानता हूँ, तुम्हारे लिए ये सारा सेटअप नया है। पर तुमने खुद इस प्रोजेक्ट में इंट्रेस्ट दिखाया, इसलिए मैने तुम्हें यह रोल दिया। यहाँ काम करने वाले लड़के भले ही प्रोफेशनल ना हों, उनके पास स्पौंटॅनिटी भरपूर है। सिंसियर हैं वो लोग। हमारे ऐसे बर्ताव से वो हताश हो जाते हैं, ऐसा मुझे लगता है।

मोहिनी : अरे! इतना कुछ सुना डालने की जरूरत नहीं है, हाँ। अचानक ही ट्रिप तय कर दी नंदिता ने। नंदिता - यू नो न? उसकी एक सहेली आई थी, स्टेट्स से। फिर मनोज को भी जैसे-तैसे छुट्टी मिल गई - और नंदिता के अलीबाग के घर जाने का फैसला हो गया। मैंने उससे बहोत कहा। पर वो मानी ही नहीं। कहने लगी - ना, तुम्हें चलना ही पड़ेगा। जिद पकड़कर बैठ गई। फिर मैं क्या करती? मैंने तुम्हें कितने फोन ट्राय किए। बिल्कुल बाहर निकलते तक। (झूठ हजम होने का अंदाजा लेते हुए) हाँ, अब तुम्हारे घर आकर तुम्हें बता नहीं पाई। उतना वक्त ही नहीं था। सॉरी -

( कान पकड़कर बड़े नाटकीय ढंग से उससे माफी माँगती है। जनक कोई रिसपॉन्स दे, इससे पहले ही राजा कोल्डड्रिंक लेकर आता है। उसे देखते ही मोहिनी अपना पैंतरा बदलती है।)

मोहिनी : ये क्या ले आए तुम?

राजा : (कनफ्यूज्ड) आप ही ने तो कहा था कि कुछ ठंडा -

मोहिनी : इसलिए ये उठा लाए तुम? अरे क्यूँ मुझे ऐसी तकलीफ देते हो तुम लोग? तुम जानते हो ना कि कोक पीने से मुझे थ्रोट इंफेक्शन हो जाता है -

( राजा के लिए ये जानकारी नई है, पर वो कुछ कहता नहीं।)

मोहिनी : कुछ और नहीं मिला तुम्हें?

राजा : है, पर ठंडा नहीं है - ये बिल्कुल चिल्ड था तो -

मोहिनी : गॉड! (जनक ने इस सबसे कब का ध्यान हटा लिया है।) जनक -

जनक : (रूखेपन से) राजा, कुछ और ले आओ।

राजा : (मोहिनी से) क्या लाऊँ?

मोहिनी : रहने दो - (राजा झेंपकर जनक की ओर देखता है।) हिल रहा है क्या देखो - ऐसा करो - दो बियर ले आओ - एक मेरे लिए और एक तुम्हारे लिए -

( राजा और झेंप जाता है।)

जनक : राजा - जाओ तुम -

मोहिनी : अब वो बियर ले आएगा! चिल्ड! क्या जनक, तुम्हारे ये लोग -

जनक : क्यों उस बेचारे की फिरकी ले रही थी?

मोहिनी : फिरकी? अरे सच, आजकल गला एकदम नाजुक हो गया है। जरा बहाना मिला नहीं कि हो गया इनफेक्शन! डॉक्टर को दिखाऊँ तो कहते हैं - नथिंग टु वरी! पर अपसेट तो हो ही जाता है ना सब -

जनक : (विषय बदलते हुए) कैसी रही ट्रिप?

मोहिनी : मस्त! तुम गए हो कभी अलीबाग?

जनक : एक-दो बार। पर काम से ही।

मोहिनी : कितना सुंदर है ना वो इलाका? और नंदिता के घर से तो समंदर इतना पास है। हम तीनों तो पूरा टाईम बीच पर ही रहती थीं। मनोज बिचारा झुँझला जाता - पर इट वॉज सो रिफ्रेशिंग !

जनक : थियेटर की डेट्स ले रखी हैं -

मोहिनी : जनक, तुम भी ना - (जनक अपना समान बँटोर रहा है। उसका आविर्भाव देख मोहिनी अपना लडियाना समेटती है।) एनी वे - क्या प्लान है अब? ( जनक उसकी ओर देखता मात्र है। उसका चेहरा सब-कुछ बोल जाता है।) जैसा तुम कहो - शॅल वी स्टार्ट? मेरे पीसेस करें?

जनक : हं (दरवाजे की ओर जाने लगता है।)

मोहिनी : ये क्या? तुम कहाँ चल दिए?

जनक : सॉरी मुझे जरा जाना होगा। अपॉइंट्मेंट है।

मोहिनी : जान-बूझ कर जा रहे हो? मुझे सबक सिखाने?

जनक : (उसके रिमार्क को अनदेखा कर) तुम रिहर्सल शुरू करो। बाकी लोग आते ही होंगे। मैं वापस आ रहा हूँ। घंटे भर में।

मोहिनी : अरे लेकिन मैं अकेली क्या करूँ?

( जनक शांति से अपने हाथ में रखी फाइल उसे थमाता है। मोहिनी संतप्त है पर कुछ कह नहीं पाती। जनक चला जाता है। मोहिनी क्षणभर उस ओर देखती है। फिर फाइल टेबल पर फेंकती है। कुर्सी में बैठती है, अस्वस्थ। कुछ न सूझने पर आदतन मोबाइल निकालती है। एक नंबर लगाती है। रिस्पान्स न मिलने पर दूसरा। क्षणभर अधीर अस्वस्थता। फिर चिढ़कर तीसरा नंबर लगाती है। इतने में राजा आता है। कोल्डड्रिंक लेकर। मोहिनी का उसकी ओर ध्यान नहीं है।)

मोहिनी : सब के सब बहरे हैं। फोन बज रहा है पर सुनाई नहीं देता किसी को !

राजा : दीदी -

मोहिनी : क्या है ?

( राजा कोल्डड्रिंक उसके आगे करता है। मोहिनी चिढ़कर फोन बंद करती है। पर्स से एक शीशी निकालती है। उसमें से एक गोली अपने हाथ पर रखती है। मोबाइल राजा को थमाती है।)

मोहिनी : पकड़ो जरा -

( राजा बिदक कर बड़ी जिम्मेदारी के साथ उसके हाथ से मोबाइल लेता है। मोहिनी कोल्डड्रिंक के एक बड़े घूँट के साथ गोली निगलती है। राजा की नजर का एहसास होते ही जल्दी जल्दी कोल्डड्रिंक खतम करती है। बोतल वापस देकर मोबाइल लेती है। राजा बोतल ले जाता है। मोहिनी पुनः एक नंबर लगाने की चेष्टा करती है। इस बार नंबर लग जाता है।)

मोहिनी : हलो... मंजिरी - मंजिरी ही बोल रही हो न? तो फिर तुम्हारी आवाज क्यों ऐसी? बिजी? किस में? - खास कुछ नहीं यार - कल से बीसियों फोन लगाए तुम्हें - थे कहाँ तुम लोग? काम कुछ नहीं यार - बस ऐसे ही। सोचा कई दिनों में मिले नहीं - हलो - मंजिरी, सुन रही हो ना? - मैं? मेरा क्या है? बस चल रहा है वही रुटीन - तुम दोनों आओ ना एक बार घर पे - कल आते हो? खाने पर ही आओ। क्यूँ? ओह! ठीक है... पर फोन जरूर करना हँ। मैं राह देखूँगी तुम्हारे फोन की - और मंजिरी - हलो-हलो - (वहाँ से फोन कट जाता है। राजा, इस संभाषण के दौरान पुनः कमरे में आ खड़ा है। फोन बंद करते हुए मोहिनी का उसकी ओर ध्यान जाता है।)

मोहिनी : तुम? तुम क्या कर रहे हो यहाँ?

राजा : सर बोल कर गए कि दीदी की मदद करना।

मोहिनी : मदत? मेरी?

राजा : डायलॉग पढ़ने को बोले।

मोहिनी : तुम? तुम डायलॉग पढ़ोगे?

राजा : बहोत बार पढ़ता हूँ ना।

मोहिनी : हँ! लगता है घर से भाग आए थे बचपन में - हीरो बनने?

( राजा बस झेंप जाता है। मोहिनी पर्स से कॉम्पॅक्ट निकालती है। चेहरे का बारीकी से निरीक्षण करती है। साथ ही साथ राजा से बात कर रही है। राजा सकुचा जाता है।)

मोहिनी : कितने नाटक देखे हैं?

राजा : सर के सब।

मोहिनी : और मेरे?

राजा : आपके फोटो देखे हैं। पेपर में, मॅगजीन में।

मोहिनी : राजा, तुम्हारे ये सर, घर पर भी ऐसे ही खड़ूस जैसे रहते हैं? (राजा सिर्फ मुस्कुराता है। उत्तर देना टाल जाता है।) सच-सच बताओ।

राजा : सर बोलते नहीं ज्यादा।

मोहिनी : हँ! बड़ा आदमी है बाबा वो! अंग्रेजी पेपरों में लिखा जाता है उसके नाटकों पर -

( मोहिनी कॉम्पॅक्ट बंद करती है। पर्स में रखती है।) हाँ, तो अब? (राजा पास पड़ी स्क्रिप्ट उठाकर पन्ने पलटने लगता है। मोहिनी उसे घूर रही है ये उसके ध्यान में आता है।) लगते हो! सौ फीसदी जनक के असिस्टेंट लगते हो! (उठकर उसके बिल्कुल पास जाती है। वह संकोचवश बौखला जाता है। मोहिनी उसके हाथ से स्क्रिप्ट लेकर कुछ पन्ने पलटती है।)

मोहिनी : हँ - यहाँ से पढ़ो।

राजा : (स्क्रिप्ट में से पढ़ता है) पार्क में रखा बेंच -

( स्वयं तीन कुर्सियाँ जोड़कर बेंच तैयार करता है।)

राजा : एक स्त्री। अधेड़ उम्र की, सीधी-सादी गृहिणी। बेंच पर बैठी है। अनमनी सी - (मोहिनी वैसे बैठती है।) क्षणभर के पश्चात एक वृद्ध आता है। उसे बैठी देख ठिठकता है। स्त्री उसे देखते ही उठ खडी होती है, पर वृद्ध उसे बैठने को कहता है। स्वयं भी बैठता है।

मोहिनी : बैठो यहाँ।

राजा : यहाँ?

मोहिनी : तो फिर?

( राजा संकोचवश बिल्कुल दूसरे सिरे पर बैठता है।)

मोहिनी : थोड़ा और परे हो जाओ, यानी नीचे गिरना आसान होगा!

राजा : अँ? (जल्दी-जल्दी स्क्रिप्ट में ढूँढ़ने लगता है।)

मोहिनी : स्क्रिप्ट में नहीं है ये लाइन! बेवकूफ!! थोड़े पास खिसको न - गिरोगे ना नीचे -

( राजा थोड़ा पास सरकता है। मोहिनी पुनः बेअरिंग लेती है। राजा को एक लुक देती है। एक पल में उसका पूरा व्यक्तित्व बदल गया है। राजा अवाक्।)

मोहिनी : मेरा मुँह क्या ताक रहे हो? पढ़ो अगली लाइन।

राजा : (स्क्रिप्ट से) इस पार्क में शोरगुल बहोत बढ़ गया है इन दिनों। शाम के समय दो घड़ी एकांत में बैठना संभव नहीं रहा।

( स्त्री की ओर देखता है। वह नजर मोड़ लेती है।)

राजा : लीजिए - प्रसाद है - काशी विश्वेश्वर का ‌- हमारे एक स्नेही हो आए हैं। (स्त्री प्रसाद लेती है।) आपको इससे पहले कभी देखा याद नहीं -

मोहिनी : यहाँ नहीं रहते हम लोग -

राजा : हम लोग?

मोहिनी : हम - हमारे वो -

राजा : अच्छा!

मोहिनी : सुबह से देख रहे हम - वो लड़के वो बच्ची को बार-बार सता रहे -

राजा : कहाँ?

मोहिनी : वो क्या वो झाड़ी के पीछे - रोने की आवाज आती न - पहले वो के हाथ से डबलरोटी छीन लिए - नलके पर पानी पीती रही तो एक ने पीछे से धकेल दिया - अभी भी रो रही बिचारी -

राजा : अब भिखारी बच्चे ठहरे! उनका तो ये सब चलता ही रहता है।

मोहिनी : देखा नही न जाता -

राजा : किस गाँव से हैं आप?

मोहिनी : नगर -

राजा : यहाँ कितने दिन?

मोहिनी : बहुत दिन हो गए। आज तो लौटना है। सच पूछिए तो हमें यहीं अच्छा लग रहा है। ऐसे शांत अकेले बैठने को मिलता नहीं कभी।

राजा : आपके घर में कौन-कौन है?

मोहिनी : हम दोनों और -

राजा : यहाँ कैसे?

मोहिनी : डाक्टर के पास।

राजा : डॉक्टर?

मोहिनी : हमारे वो - जबरदस्ती ले आए हमको। अब आप ही बताइए, आपको हम बीमार लगते हैं क्या? कैसी असहाय रो रही वो बच्ची - सुना नहीं जाता। माँ-बाप भी कैसे -

राजा : कहाँ?

मोहिनी : वो क्या उधर - वो झूले के पास - वो बच्चे वो को बैठने ही नहीं दे रहे। सुनिए न - आप तनिक -

राजा : आपको तकलीफ क्या है?

मोहिनी : तकलीफ तो वैसे कोई नहीं जी। और रही भी तो शिकायत किससे करें? आखिरकार वो तो मालिक हैं। जैसे उनकी मरजी वैसे ही ना वो रखेंगे। हमें तो बस एक दिन को दूजा दिन जोड़ते हुए जीना है। आखिर में सुख क्या और दुख क्या, सब तो मानने ही पर है ना?

( राजा की ओर देखती है। वह अनजाने ही इन्व्हॉल्व हो गया है।)

मोहिनी : पंद्रह बरस हो गए। ना नजर को नजर, ना शब्द को शब्द। बहुत दिक्कत हुई शुरुआत में। लगता रहा शायद अपनी ही कोई गलती हो रही। बचपन में सब बातूनी कहकर चिल्लाते रहे हमपर। और यहाँ, किसी से दो बात कहने को मिले इस करके तरसते रहते हम। बहुत तड़पते। समय-बेसमय क्या सब याद आता और आँखें झरने लगतीं। एक बार ये हमको रोते हुए देख लिए। अब उनको क्या बताएँ? मायके की याद आती करके बोले - तो कहे कि जाओ, पर वापस इधर लौटना नहीं। उस दिन से आँख जो सूखी न, सो आज तक। कितने बरस बीत गए - इस बीच क्या कुछ हो गया - पर (बीच में ही रुकती है) राजा - (राजा अपने ही रोल के बेअरिंग में) राsजाs

राजा : अँ?

मोहिनी : ध्यान कहाँ है तुम्हारा?

राजा : (घबरा कर) क्या हो गया? कोई गलती हो गई?

मोहिनी : (हँसने लगती है) इस कदर डरने लायक क्या हो गया तुम्हें?

राजा : नहीं - आपने एकदम से टोक दिया -

मोहिनी : राजा, कुछ देर पहले मैंने जो कहा, तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?

राजा : नहीं।

मोहिनी : सच?

राजा : जनक सर ने बता रख्खा है सबको, आप नाराज हुईं तो कोई बुरा ना माने।

मोहिनी : अच्छा? और क्या कुछ बता रख्खा है तुम्हारे जनक सर ने?

राजा : (भोलेपन से) दीदी, इस नाटक में आप ही को लेंगे इस बात पर अमर साहब से कितना झगड़ा हुआ - अमर साहब तो मना करा रहे थे - कह रहे थे कि आपका कोई भरोसा नहीं -

मोहिनी : ऐसा बोला अमर? रुको, अभी देखती हूँ उसे - वो मोबाईल देना इधर -

राजा : लेकिन दीदी -

मोहिनी : फोन इधर दो - (राजा फोन देता है। मोहिनी नंबर लगाती है।) अमर - बहुत बड़े प्रोड्यूसर समझने लगे हो खुद को? जनक के कान भर रहे थे मेरे खिलाफ? गले तक कर्ज में डूबे हुए थे तुम - तब मैंने साथ दिया था तुम्हारा - लगातार पाँच हिट नाटक दिए थे - तुम तो भूलोगे ही - तुम कितने कृतघ्न हो जानती हूँ मैं - मेरे खिलाफ तुम्हारी क्या कुछ साजिशें चल रही हैं, सब जानती हूँ मैं - तुम ही सम्हालो खुद को - (चिढ़कर फोन बंद करती है।) मुझे धमकी देता है कमीना - (राजा इस सबसे घबरा गया है।) तुम वहाँ क्यों खडे हो? चलो बैठो यहाँ -

राजा : अं? हाँ - हाँ... (पुनः अपने स्थान पर बैठता है। जल्दी-जल्दी स्क्रिप्ट के पन्ने पलटाने लगता है।)

मोहिनी : लाओ इधर - (उससे स्क्रिप्ट लेती है। सही पृष्ठ निकालकर उसे देती है।) बेवकूफ !

राजा : आपके हाथ को क्या हो गया?

मोहिनी : मेरे? (हकबकाकर अपने हाथ देखने लगती है।)

राजा : यहाँ ऐसा ही तो लिखा है -

मोहिनी : तुम ना सिर्फ पढ़ो - फालतू ऐक्टिंग वगैरह मत करो - पढ़ो -

राजा : आपके हाथ को क्या हो गया है? जलने की निशानी लगती है -

मोहिनी : सो तो चलता ही रहता है। घरगिरस्ती बोलें तो औरत के भाग में ये जलना-भुनना तो लिखा ही रहा (धीरे से जले के निशान पर से हाथ फेरती है।) घर में हम दो ही। उसमें भी ये चुप्पी साधे हुए। इतना सारा बोलना जमा होता गया मन में। बात करें तो किससे? फिर हमें ही सूझा - हमारे मायके से आईं कुछ चीजें थीं - सोचे, हाड़-मांस के आदमी तो हमसे बात नही करेंगे - चलो इन्हीं से बतिया लें - लेकिन वो भी देख लिए एक दिन ये - बोले कुछ नहीं - चूल्हे पर कलछी थी - वो उठाए और (विराम) देखिए तो - वो लड़के फिर से - आप उन्हें -

राजा : उन बच्चों से उलझना बेकार है। एक घड़ी झगड़ते हैं; दूसरी में फिर एक हो जाते हैं। (विराम) आपके कोई बाल-बच्चा?

मोहिनी : है ना। लड़का। उनकी पहली पत्नी से। वो को माँ चाहिए इस करके तो हमसे ब्याह रचाए। (मुड़कर राजा की नजर से नजर मिलाते हुए) एक बारह बरस के, बिन माँ के बच्चे का हम दुःस्वास करेंगे ऐसा लगता है आपको?

राजा : नहीं

मोहिनी : लेकिन उनके मन से वो बात गई नहीं। दूर रखे वो को हमसे। सोने जैसा बच्चा - बौखला गया - और तिसपर ये बीमारी आने से तो आठ-आठ दिनों में हमारा मिलना ही नहीं होता था। कभी कभार उसकी आवाज सुनाई पड़ती, बस। लगता, कमरे का दरवाजा खोलें, तनिक विलगा कर उसे देख ही लें, लेकिन बाहर से बंद किया हुआ दरवाजा कोई अंदर से कैसे खोले? बस आकुल हो कर छटपटाते रहते - लगता दरवाजे पर सिर मार मार कर जान ही दे दें - फिर कोई जा कर डाक्टर बुला लाता - वो मुझे धरपकड़ कर इंजेक्शन देता - और ये सब वो नन्हा, डरी हुई आँखों से ताकता -

राजा : ये सब कबसे?

मोहिनी : क्या ?

राजा : यही - ये तकलीफ?

मोहिनी : वही तो ढूँढ़ते रहते हैं हम। पर सही से कुछ समझ नहीं पाते। हाँ, कभी कभी जरा सा कुछ बूझता है। छोटे थे तो हमारे घर के पिछ्वाड़े एक बड़ा पीपल का पेड़ हुआ करता था। तनिक कुछ मर्जी के खिलाफ होता तो वहीं जा कर बैठते हम। एक दिन ऐसे ही वहाँ बैठे थे। ऐसी ही शाम की बेला रही होगी। वहाँ एक आदमी आया। आपके जैसा - बोला - बिटिया, अकेली क्यों बैठी हो? हम बोलीं - हम नाराज हैं सबसे - तो फीकी हँसी से हमको देखा - बोला - यूँ जरा-जरा सी बात पर ऐसे गुस्सा पकड़कर नहीं रखते बिटिया - जाओ - अपने लोगों में लौट जाओ - देर मत करो। और हमारा चेहरा अपने हाथ से सहलाकर चला गया । हम अपनी ही अकड़ मे थे - नहीं गए (विराम)। अब लगता है - ये जो आपके सामने हैं वो असली हम नहीं हैं, असली हम तो वहीं बैठे हैं अब भी। और बीच में से कित्ते सारे बरस गुजर गए हैं। समझाने-बुझाने आएँगे ऐसे लोग भी नहीं रहे। ( राजा से रेसपॉन्स न पाकर मोहिनी उसकी ओर देखती है।)

मोहिनी: ए... बुद्दू... रो क्यों रहे हो?

राजा : (जल्दी से अपने आँसू छिपाते हुए) नहीं - कहाँ?

मोहिनी : अरे बाबा, ये नाटक है।

राजा : मैं चाय ले आता हूँ। लाऊँ न?

मोहिनी : ठीक है। ले आओ। (राजा जाने लगता है।) और उन मैले कुचैले मग्ज में मत लाना -

( राजा जाता है। मोहिनी अकेली। हाथों से चेहरा ढँककर बैठ जाती है। फिर खुद को सम्हालती है। फोन उठाती है। क्षणभर सोचकर एक नंबर लगाती है। कुछ क्षण राह देखकर बंद कर देती है। फोन परे रख देती है। अस्वस्थ। विचार बदलकर फिर फोन उठाकर लगाती है।)

मोहिनी : हलो - हाँ - मैं मोहिनी - तुझे तो मेरी याद आने से रही। अंत में मुझे श्मशान पहुँचाने का समय आएगा तब तो आएगी न? मुझे बहलाने की कोशिश मत कर। आज तक दस बार सुन चुकी हूँ तेरा ये प्रॉमिस - साफ साफ क्यों नहीं कह देती कि - मैं सेंटी हो रही हूँ? खूब जानती हूँ तेरे काम - पर हफ्ते भर में एकाध फोन, महीने भर में एक बार मिलना, इतना भी एक्स्पेक्ट ना करूँ मैं? नहीं ना - सच। बात करनी है तुझसे - ऊब चुकी हूँ अब - इतने बड़े घर में भूतनी की तरह घूमती रहती हूँ मैं। रात को प्यास लगे तो बेड पर से उठने की हिम्मत नहीं होती। एक कमरे से दूसरे में जाते हुए ऐसा लगता है जैसे पीछे से कोई चल रहा है। (दीर्घ विराम) हाँ ट्रीटमेंट तो चल रही है। पर उससे बस, टाइमबीइंग के लिए थोड़ी राहत मिलती है। उन दवाइयों से भी उकता गई हूँ। आय नीड योर हेल्प - मैं इस व्हिशिअस सर्कल से बाहर निकलना चाहती हूँ।(क्षण भर सोचकर) ए मैं... मैं रहने आऊँ तुम्हारे यहाँ? (विराम, निराशा से) ठीक है - नहीं, उसमें माइंड क्या करना है?(उधर से फोन काट दिया गया है। आखिरी कुछ वाक्यों के दौरान राजा आ खड़ा है। मोहिनी फोन को देख रही है। कुछ बिगड़ गया है, इतना वह समझ जाता है।)

राजा : दीदी, आपको ठीक नहीं लग रहा? चाय लिजिए, थोड़ा अच्छा फील करेंगी।

(मोहिनी चाय पीने लगती है। राजा बीच-बीच में उसकी ओर देखते हुए अपनी चाय खतम करता है।)

मोहिनी : और कितना बाकी है ये सीन?

राजा : (फटाफट स्क्रिप्ट देखकर) और तीन पन्ने हैं। लेकिन आप को ठीक नहीं लग रहा हो तो...

मोहिनी : नहीं... ठीक हूँ मैं - चलो -

( राजा पुनः अपनी पोजीशन लेते हुए)

राजा : अँधेरा होने वाला है। आपके पति आए नहीं अब तक?

मोहिनी : वो वहाँ बड़ा होटल दिख रहा है न? हमारा ब्याह हुआ तब वहाँ खाना खाने गए थे हम -

राजा : और क्या-क्या देखा यहाँ?

मोहिनी : एक ही दिन में क्या कुछ देख पाते? तीन महीने तो हम अस्पताल में ही थे। वहाँ की खिड़कियों में मोटे मोटे सींखचे होते हैं, इत्ते बड़े बड़े ताले होते हैं। आज ये आए तो छूट तो भी पाए हम उस जेल से।

राजा : कोई आ रहा है, - शायद आप के पति हों -

( स्त्री उस दिशा में देखती ही नहीं। दीर्घ विराम।)

राजा : शाम को चहल-पहल थी तो तकलीफ हो रही थी, अब शांत है तो डरावना लग रहा है। (उठता है। बेवजह चहलकदमी करने लगता है।)

मोहिनी : आपको देर हो रही होगी - आप निकलिए -

राजा : लेकिन आपके पति -

मोहिनी : उन्होंने हमें अस्पताल से छुट्टी दिलाई यही बहुत है। और कित्ती तकलीफ देंगे उन्हें?

राजा : मतलब?

मोहिनी : बस स्टाप पर खड़े थे हम - बस आई तो एकदम से भीड़ हो गई - और उस भीड़ में -

राजा : अरे, फिर वो वहीं ढूँढ़ रहे होंगे आपको -

मोहिनी : नहीं। वो बस में बैठ गए। हमने देखा भीड में से। हम चिल्लाए - सुनिए -

राजा : उस शोरगुल में सुनाई नहीं दिया होगा -

मोहिनी : पल भर के लिए उनकी नजर हमारे से मिल गई। दूसरे ही पल उन्होंने नजर हटा दी और बस निकल गई... (विराम)

राजा : इसका मतलब उन्होंने आपको -

मोहिनी : जाने भी दीजिए। जो हुआ ठीक ही हुआ।

( दीर्घ विराम। वृद्ध अस्वस्थ है।)

राजा : मुझे चलना चाहिए अब। काफी देर हो चुकी है।

मोहिनी : जा रहे हैं? ठीक है।

राजा : अब आगे क्या सोचा है आपने?

मोहिनी : अब तो सब समेटने का बखत आ गया। अब क्यों कुछ सोचना? (विराम) आखिर में ही सही, आप मिले, आपसे दो बातें बोल पाए। अच्छा लगा। (विराम) इतना कुछ तो आप सुन लिए - अब खाली दो बातें पूछनी है आपसे (विराम) हमें बताइए - उस दिन, वो आदमी मिला उस एक शाम को छोड़ के, हम कभी किसी से नहीं रूठे, गुस्सा नहीं किए, मन में कुछ नहीं रखे, तब भी हमारे भाग में ये सब क्यों आया? (वृद्ध निरुत्तर। क्षण भर स्तब्धता।) अच्छा वो भी छोड़िए, हमारा एक काम करेंगे आप?

( यह सवाल सुनकर वृद्ध जाने लगता है। स्त्री उसे रोकने का प्रयास करती है। लेकिन वह चला ही जाता है। सारे प्रयास विफल होने के बोध से स्त्री निराश हो, विमनस्क बैठी रहती है। क्षणभर स्तब्धता। राजा अंदर आता है।)

राजा : दीदी -

मोहिनी : हँ -

राजा : दीदी - आप ठीक तो है न?

मोहिनी : (थकी हुई आवाज में) यस... आय एम फाइन... (विराम) राजा, मेरी एक बात मानोगे? नाराज मत होना - मुझे कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दोगे? सिर्फ दस मिनट - प्लीज?

राजा : जी। कुछ चाहिए होगा तो आवाज दीजिएगा। मैं हूँ बाहर।

( राजा जाता है। मोहिनी कुछ देर वैसी ही बैठी रहती है। फिर आवेग में फोन उठाती है। महत्प्रयास से लगाती है।)

मोहिनी : (आवाज में एक्साइट्मेंट , कंपन छिपाने की भरसक कोशिश करती हुई) हाँ। मैं ही बोल रही हूँ। क्या समझ बैठे तुम लोग मुझे? छ-सात साल की बच्ची? जिसे फुसलाकर, चकमा दे कर भाग सकते हो? मैं बेवकूफों की तरह राह देखती रही तुम्हारी। दोपहर हो गई तो दौड़-धूप करती, बैग ले कर पहुँची तुम्हारे घर। दरवाजे पर पडा ताला देखा तब सारा खेल समझ में आया मेरी। हाऊ कुड यू डू दिस टू मी नंदिता? व्हाट इज देअर टु एक्सप्लेन? अपने सगों से ज्यादा प्यार दिया मैने तुम्हें। मेरे सुख, मेरे दुख, मेरे फ्रस्ट्रेशंस, सब शेअर किए तुम्हारे साथ - पूरे विश्वास के साथ, और तुमने ऐसा क्रुएल खेल खेला मेरे साथ? क्यों नंदिता? व्हाय? मेरा होना इतना बड़ा संकट लगता है तुम्हें? पता है? पिछले हफ्ते भर अपने ही घर में बंद कर रखा था मैने खुद को। बिस्तर से उठने तक की हिम्मत नहीं थी मुझमें। नो - मत आओ तुम। अब मुझे किसी से मिलने की इच्छा नही है। फोन भी मत करना। लेकिन याद रखो नंदिता, यू हैव रिडिक्यूल्ड मी - अब तुम्हें गिल्टी लगता रहेगा। जनम भर।

( फोन बंद करती है। तिरस्कार के साथ उसे फेंक देती है। उसकी नजर गोलियों की शीशी पर पड़ती है। वह शीशी उठाकर हाथ पर उँड़ेलती है और सारी गोलियाँ एक साथ निगलने का प्रयास करती है। बेहद तकलीफ के बाद वह यह कर पाती है। और इतनी देर की उसकी तड़पन धीरे-धीरे शांत होती है। वह निश्चल पड़ी है। राजा आता है। पहले दूर से ही आवाज देता है। फिर धीरे-धीरे उसके पास आता है।)

राजा : दीदी...

( उसके बिल्कुल समीप जाकर दुबारा आवाज देता है। फिर भी वह कोई प्रतिसाद नहीं देती। इतने में पास पड़ी गोलियों की बोतल से राजा का पाँव छू जाता है। उस पर नजर पड़ते ही वह ठिठक जाता है। वहीं जम जाता है। दीर्घ स्तब्धता। फिर मोहिनी का मोबाइल बजने लगता है - बजता रहता है...)


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हिंदी समय में दिनकर बेडेकर की रचनाएँ