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बाल साहित्य

नन्हें जासूस
शादाब आलम


जाँच-परख करने में माहिर
हम नन्हें जासूस।

आँखें-कान खुले रखते हैं
रहते चौकन्ने-तैयार
पता लगा लेते अम्मा ने
कहाँ छुपाकर रखें अचार।
दिनभर मस्त रहें अपने में
होते ना मायूस।

जहाँ मिलेंगे अपने मन के
सभी खिलौने व सामान
हमे पता किस गली-मुहल्ले
में पड़ती है वह दुकान।
हँसते-गाते हुए निकलता
अपना रोज जुलूस।

चोर-सिपाही, लुका-छुपी का
अक्सर खेला करते खेल
सूझ-बूझ से पकड़ चोर को
सीधे पहुँचाते हैं जेल।
अपने थाने में न चलती
है बिल्कुल भी घूस।


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हिंदी समय में शादाब आलम की रचनाएँ