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नाटक

सती प्रताप
भारतेंदु हरिश्चंद्र


 

संवत् 1941

(एक गीतिरूपक)



प्रथम दृश्य

 

हिमालय का अधोभाग।
तृण लता वेष्टित एक टीले पर बैठी हुई तीन अप्सरा गाती हैं।।
1. अप्सरा- (राग झिझौंटी)
1. जय जय श्री रुकमिन महारानी।
2. निज पति त्रिभुअन पति हरि पद में छाया सी लपटानी।
3. सती सिरोमणि रूपरासि करुनामय सब गुनखानी।
4. आदिशक्ति जग कारिनि पालिनि निज भक्तन सुखदानी।।
2. अप्सरा- (राग जंगला या पीलू)
जग में पतिब्रत सम नहिं आन।
नारि हेतु कोउ धर्म न दूजो जग में यासु समान ।।
अनुसूया सीता सावित्री इन के चरित प्रमान।
पति देवता तीय जग धन धन गावत वेद पुरान ।।
धन्य देस कुल जहँ निबसत हैं नारी सती सुजान।
धन्य समय जब जन्म लेत ये धन्य व्याह असथान ।।
सब समर्थ पतिबरता नारी इन सम और न आन।
याही ते स्वर्गहु में इन को करत सबैन गुन गान ।।
3. अप्सरा- (रागिनी बहार)
नवल बन फूलीं द्रुम बेली।
लहलह लहकहिं महमह महकहिं मधुर सुगंधहिं रेली ।।
प्रकृति नवोढ़ा सजे खरी मनु भूषन बसन बनाई।
आंचर उड़त बात बस फहरत प्रेम धुजा लहराई ।।
गूंजहिं भंवर बिहंगम डोलहिं प्रकृति बधाई।
पुतली सी जित तित तितली गन फिरहिं सुगन्ध लुभाई ।।
लहरहिं जल लहकहिं सरोज मन हिलहिं पात तरु डारी।
लखि रितुपति आगम सगरे जग मनहुं कुलाहल भारी ।।
(पटाक्षेप)



दूसरा दृश्य


तपोवन-लतामंडप में सत्यवान बैठा हुआ है।
(रंग गीति-पीलू-धमार)
”क्यों फकीर बन आया वे मेरे वारे जोगी।
नई बैस कोमल अंगन पर काहे भभूत रमाया वे ।।
किन वे मात पिता तेरे जोगी जिन तोहि नाहि मनाया वे ।।
काचें जिय कहु काके कारन प्यार जोग कमावा वे ।।“
(चैती गौरी तिताला)
बिदेसिया वे प्रीति की रीति न जानी।
प्रीति की रीति कठिन अति प्यारे कोई विरले पहिचानी ।।
सत्यवान : यह कोमल स्वर कहाँ से कान में आया? प्रतिध्वनि के साथ यह स्वर ऐसा गूँज रहा है कि मेरी सारी कदम्बखंडी शब्द ब्रह्ममय हो गई। बीच बीच में मोर कुहुक कुहुक कर और भी गूँज दूनी कर देते हैं। (कुछ सोचकर) हाय! मेरा मन इस समय भी स्थिर नहीं। हाय! प्रासादों में स्फटिक की छत पर चलने मं जिनके चरण को कष्ट होता था आज वह कंटकमय पथ में नंगे पाओं फिर रहे हैं और दुग्धफेन सी सेज के बदले आज मृगचर्म पर सोते हैं। हाय हमारे माता पिता बुढ़ापे से सामथ्र्यहीन तो थे ही ऊपर से दैव ने उन्हें अंधा भी बनाया। हाय अभागे सत्यवान से भी कभी माता पिता की सेवा न बन पड़ी। कभी उनके वात्सल्यपूर्ण प्रेमामृत वचन ने मेरे कान न शीतल किए और न ऐसा होना है। जनमते ही तो तपस्या करनी पड़ी। धन्य विधाता! दरिद्र को धनवान और धनवान को दरिद्र करना तो तुम्हें एक खेल है। किन्तु दरिद्र बना के फिर क्यों कष्ट देते हौ। दारिद्र ही सही पर मन को तो शान्ति दो। भला दो घड़ी भी वृद्ध माता पिता की सेवा करने पावैं। ख्चिन्ता,
(सावित्री को घेरे हुए गाते गाते मधुकरी, सुरबाला और लवंगी का आना और फूल बीनना)
सखीजन : (गौरी)
भौरा रे बौरानो लखि बौर
लुबध्यौ उतहि फिरत मडरान्यौ जात कहुं नहिं और-
भौंरा रे बौरायो।
(चैती गौरी)
फूलन लगे राम बन नवल गुलबवा।
फूूलन लागे राम महुआ फले आम बौराने डारहिडार भंवरवा झूलन लगे राम।
(गौरी)
पवन लगि डोलत बन की पतियां।
मानहु पथिकन निकट बुलावहि, कहन प्रेम की बतियां ।।
अलक हिलत फहरत तन सारी होत है सीतल छतियां।
यह छबि लखि ऐसी जिय आवत इतहि बितैए रतियां ।।
सुरबाला : सखी; कैसा सुंदर वन है।
लवंगी : और यह बारी भी कैसी मनोहर है।
मधुकरी : आहा! तपोबन रिषि मुनि लोगों को कैसा सुखदायक होता है।
सावित्री : सखी रिषि मुनि क्या तपोवन सभी को सुख देता है।
सुरबाला : क्योंकि यहाँ सदा बसन्त ऋतु रहती है न।
सावित्री : बसन्त ही से नहीं तपोवन ऐसा नहीं है।
मधुकरी : अहा! यह कुंज कैसा सुंदर है। सखी देखो माधवीलाल इस कुंज पर कैसा घनघोर छाई हुई है।
सावित्री : सहज वस्तु सभी मनोहर होती हैं। देखो इस पर फूल कैसे सुन्दर फूले हैं जैसे किसी ने देवता की फूल मण्डली बनाई हो।
सुरबाला : और उधर से हवा कैसी ठंढी आती है।
लवंगी : और हवा में सुगंध कैसी है।
मधुकरी : सखी! एकटक उधर ही क्यों देख रही हो!
सुरबाला : सच तो सखी। वहाँ क्या है जो उधर ही ऐसी दृष्टि गड़ा रही हौ?
लवंगी : तू क्या जानै। तपोवन में सैंकड़ों वस्तु ऐसी होती हैं।
सावित्री : (रागसोरठ)
लखो सखि भूतल चन्द खस्यो।
राहु केतु भय छोड़ि रोहिनिहि या बन आई बस्यौ ।।
कै सिव जय हित करत तपस्या मनसिज इत निबस्यौ।
कै कोऊ बनदेव कुंज में वनविहार बिलस्यौ ।।
मधुकरी : सच तो तपसियों में ऐसा रूप!
सुरबाला : जाने दे। वनवासी तपस्वी में ऐसा रूप कहां?
सावित्री : यह मत कहो। बिधना की कारीगरी जैसी नगर, में वैसी ही बन में।
(सत्यवान की ओर सतृष्ण दृष्टिपात)
सुरबाला : देखती हौ? एक मन एक प्रान होकर कैसी सोच रही है?
लवंगी : (परिहास से) आज जो यह तासकुमार के बदले राजकुमार होते तो घर बैठे गंगा बही थी।
मधुकरी : सखी, इसका कुछ नेम नहीं है कि राजकुमारी का ब्याह राजकुमार ही से हो।
सावित्री : विधाता ने जिस भाव में राजपुत्र को सिरजा है उसी भाव में मुनिपुत्र को। और फिर राजधन से तपोधन कुछ कम नहीं होता।
सत्यवान : (आप ही आप) यह क्या बनदेवी आई हैं।
मधुकरी : हम उनके पास जाकर प्रणाम तो कर आवै।
(मधुकरी का कुंज की ओर बढ़ना और सत्यवान का लतामंडप से निकलकर बाहर बैठना)
मधुकरी : (सत्यवान के पास जाकर) प्रनाम (हाथ जोड़कर सिर झुकाना)
सत्यवान : आयुष्मती भव। आप लोग कौन हैं?
मधुकरी : हम लोग अपनी सखी मद्रदेश के जयन्ती नगर के राजा अश्वपति की कुमारी सावित्री के साथ फूल बीनने आई हैं।
सत्यवान : (स्वगत) राजकुमारी! बामन को चंद्रस्पर्श।
मधुकरी : कृपानिधान। आप सदा यहीं निवास करते हैं।
सत्यवान : जब तक दैव अनुकूल न हो यही निवास है।
मधुकरी : इससे तो बोध होता है कि किसी राजभवन को सूना करके आप यहाँ आए हैं।
सत्यवान : सखी! उन बातों को जाने दो।
मधुकरी : हमारे अनुरोध से कहना ही होगा। दयाल सज्जनगण अतिथि की याञचा व्यर्थ नहीं करते। विशेष कर के पहले ही पहल।
सत्यवान : हम शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र हैं। हमारा नाम चित्राश्व वा सत्यवान है। इस भेध्यारण्य नामक वन में पिता की सेवा करते हैं।
मधुकरी : (आप ही आप) तभी। गंगा समुद्र छोड़ कर और जलाशय की ओर नहीं झुकती। (प्रकट) तो आज्ञा हो तो अब प्रणाम करूं।
सत्यवान : (कुछ उदास हो कर) यह क्यों? बिना आतिथ्य स्वीकार किए हुए?
मधुकरी : इसका तो मैं सखी से पूछ लूं तो उत्तर दूं। (सावित्री के पास आकर) सखी कुमार तापस कहते हैं कि आतिथ्य स्वीकार करना होगा।
सावित्री : (सखियों का मुंह देखती है)।
लवंगी : (परिहास से) अवश्य अवश्य! इसमें क्या हानि है।
सावित्री : (कुछ लज्जा कर के) सखी! उनसे निवेदन कर दे कि हम लोग माता पिता की आज्ञा लेकर तब किसी दिन आतिथ्य स्वीकार करैंगे, आज विलम्ब भी हुआ है।
मधुकरी : (सत्यवान के पास जाकर) कुमारी कहती हैं कि किसी दिन माता पिता की आज्ञा लेकर हम आवैंगे तब आतिथ्य स्वीकार करैंगे। आप तो जानते ही हैं कि आर्यकुल की ललनागण किसी अवस्था में भी स्वतंत्रा नहीं है। इससे आज क्षमा कीजिए।
सत्यवान : (कुछ उदास होकर) अच्छा। (सखियों के साथ सावित्री का प्रस्थान) (उधर ही देखता है) यह क्या? चित्त में ऐसा विकार क्यों? क्या स्वर्ण और रत्न में भी मलिनता? क्या अग्नि में भी कीट की उत्पत्ति? उह? फिर वही ध्यान? यह क्या? अब तो जी नहीं मानता। चलैं आगे बढ़कर बदली में छिपते हुए चंद्रमा की शोभा देखकर जी को शान्ति दें।
(जाता है)
(पटाक्षेप)



तीसरा दृश्य


जयन्ती नगर गृहोद्यान
(जोगिन बनी हुई सावित्री ध्यान करती है)
(नेपथ्य में बैतालिक गान)
प्र. वै. : नैन लाल कुसुम पलास से रहे हैं फूलि
फूल माल गरे बन झालरि सी लाई है।
भंवर गुंजार हरि नाम की उचार तिमि
कोकिला सी कुहूकि वियोग राग गाई है ।।
हरीचन्द तजि पतझार घर बार सवै
बौरी बनि दौरी चारू पौद ऐसी धाई है।
तेरे बिछुरे तें प्रान कंत कै हिमन्त अन्त
तेरी प्रेम जोगिनी वसन्त बनि आई है ।। 1 ।।
द्वि. वै. : पीरो तन परîौ फूली सरसों सरस सोई
मन मुरझान्यौ पतझार मनो लाई है।
सीरी स्वास त्रिविध समीरसी बहति सदा
अँखियाँ बरसि मधुझरि सी लगाई है ।।
हरीचन्द फूले मन मैन के मसूसन सौं
ताहीं सों रसाल बाल बदि के बौराई है ।।
तेरे बिछुरे तें प्रान कंत कै हिम्मत अन्त
तेरी प्रेम जोगिनी बसन्त बनि आई है ।। 2 ।।
प्र. वै. : ”बरुनी बघंबर मैं गूदरी पलक दोऊ,
कोए राते बसन भगौहें भेख रखियाँ।
बूड़ी जलही मैं दिन जामिनीहूं जागैं भौंह,
धूम सिर छायो विरहानल बिलखियां ।।
आंसू ज्यौं फटिक माल काजर की सेली पैन्ही,
भई हैं अकेली तजि चेलि संग सखियाँ ।।
दीजिये दरस देव कीजिये संजोगन ये,
जोगिन ह्नै बैठी हैं बियोगिन की अंखियाँ“ ।। 3 ।।
द्वि. वै. : एक ध्यान एकै ज्ञान एकै मन एकै प्रान,
दसों दिसि अविचल एकै तान तानो है।
जग मैं बसत हूँ मनहुँ जग बाहिर सी,
हियौ तन दोऊ निसि दिवस तपानो है ।।
‘हरिचंद जोग की जुगति रिद्धि सिद्धि सब,
तजि तिनका सी एक नेह को निभानो है।
बिना फल आस सीस सहनी सहस्र त्रास,
जोगिन सों कठिन बियोगिन को बानो है ।।
(सावित्री ध्यान से आँख खोलती है)
सावित्री : अहा! एक पहर का दिन आ गया। सखीगण अब तक नहीं आई इसी से ध्यान भी निर्विघ्न हुआ। हमारी वासना सत्य है तो अंतर्गति जानने वाली सतीकुल-सरोजिनी भगवती भवानी हमारी भावना अवश्य पूर्ण करेंगी। मन बच कर्म से जो हमारी भक्ति पति के चरणारविंद में है तो वे हमको अवश्य ही मिलेंगे। अथवा न भी मिले तो इस जन्म में तो दूसरा पति हो नहीं सकता। स्त्रीधर्म बड़ा कठिन है। जिसको एक बेर मन से पति कहकर वरण किया उसको छोड़कर स्त्री शरीर की अब इस जगत् में कौन गति है। पिता माता बड़े धार्मिक हैं। सखियों के मुख से यह संवाद सुनकर वह अवश्य उचित ही करेंगे। वा न करेंगे तो भी इस जन्म में अन्य पुरुष अब मेरे हेतु कोई है नहीं। (अपना वेष देखकर) अहा! यह वेष मुझको कैसा प्रिय बोध होता है। जो वेष हमारे जीवितेश्वर धारण करें वह क्यों न प्रिय हो। इसके आगे बहुमूल्य हीरों के हार और चमत्कार दर्शक वस्त्रा सब तुच्छ हैं। वही वस्तु प्यारी है जो प्यारे को प्यारी हो। नहीं तो सर्वसंपत्ति की मूल कारण स्वरूपा देवी पार्वती भगवान् भूतनाथ की परिचर्या इस वेष से क्यों करतीं? सतीकुलतिलका देवी जनकनंदिनी को अयोध्या के बड़े बडे़ स्वर्ग विनिंदक प्रासाद और शचीदुर्लभ गृह-सामग्री से भी वन की पर्णकुटी और पर्वतशिला अति प्रिय थीं, क्योंकि सुख तो केवल प्राणनाथ की चरणपरिचर्या में है। जब तक अपना स्वतंत्रा सुख है तब तक प्रेम नहीं। पत्नी का सुख एकमात्रा पति की सेवा है। जिस बात में प्रियतम की रुचि उसी में सहधर्मिणी की रुचि। अहा! वह भी कोई धन्य दिन आवेगा जब हम भी अपने प्राणाराध्य देवता प्रियतम पति की चरणसेवा में नियुक्त होंगी। वृद्ध श्वसुर और सास के हेतु पाक आदि निर्माण करके उनका परितोष करेंगी। कुसुम, दूर्वा, तुलसी, समिधा इत्यादि बीनने को पति के साथ वन में घूमेंगी। परिश्रम से थकित प्राणनायक के स्वेद-सीकर अपने अंचल से पोंछकर मंद मंद वनपत्रा के व्यजनवायु से उनका श्रीअंग शीतल और चरणसंवाहनादि से श्रमगत करेंगी। (नेत्रा से आँसू गिरते हैं)
(गान करते हुए सखीगण का आगमन)
(ठुमरी)
सखीत्राय : 
देखो मेरी नई जोगिनियाँ आई हो-जोगी पिय मन भाई हो।
खुले केस गोरे मुख सोहत जोहत दृग सुखदाई हो ।।
नव छाती गाती कसि बाँधी कर जप माल सुहाई हो।
तन कंचन दुति बसन गेरुआ दूनी छवि उपजाई हो ।।
देखो मेरी नई जोगिनियाँ आई हो।
(सावित्री के पास जाकर)
(लावनी)
लवंगी : 
सखि! बाले जोबन महा कठिन व्रत कीनो।
यह जोग भेख कोमल अंगन पर लीनो ।।
अबहीं दिन तुमसे खेल कूद के प्यारी।
पितु मातु चाव सां भवन बसो सुकुमारी ।।
ओढ़ौ पहिरौ लखि सुख पावै महतारी।
बिलसौ गृह संपति सखी गईं बलिहारी ।।
तजि देहु स्वांग जो सबही बिधि सों हीनो।
यह जोग भेष जो कोमल अंग पर लीनो ।।

मधु. : सखि! यही जगत की चाल जिती हैं क्वारी।
उनके सबही विधि मात पिता अधिकारी ।।
जेहि चाहैं ताकहँ दान करै निज बारी।
यामैं कछु कहनो तजनो लाज दुलारी ।।
बिनती मानहु हठ माँहि वृथा चित दीनो।
यह जोगभेष जो कोमल अँग पर लीनो ।।
सुर. : सखि औरहु राजकुमार बहुत जग माँहीं।
विद्या-बुधि-गन-बल-रूप-समूह लखाहीं ।।
चिरजीवी प्रेमी धनी अनेक सुनाहीं।
का उन सम कोऊ और जगत में नाहीं ।।
जाके हित तुम तजि राजभेष सुख-भीनो।
यह जोग-भेष निज कोमल अँग पर लीनो ।।
सावित्री : (ईषत क्रोध से)
बस-बस! रसना रोको ऐसी मति भाखो।
कछु धरमहु को भय अपने जिय मैं राखो ।।
कुलकामिनी ह्नैव गनिका धरमहि अभिलाखो।
तजि अमृतफल क्यों विषमय विषयहि चाखो ।।
सब समुझि बूझि क्यों निंदहु मूरख तीनो।
यह जोग भेष जो कोमल अँग पर लीनो ।।
लवंगी : सखी को कैसा जल्दी क्रोध आया है?
सावित्री : अनुचित बात सुनकर किसको क्रोध न आवेगा?
सुर. : सखी! हम लोगों ने जो वचन दिया था वह पूरा किया।
सावित्री : वचन कैसा?
सुर. : सखी, तुम्हारे माता पिता ने हम लोगों से वचन लिया था कि जहाँ तक हो सकेगा हम लोग तुमको इस मनोरथ से निवृत्त करेंगे।
सावित्री : निवृत्त करोगी? धर्मपथ से? सत्य प्रेम से? और इसी शरीर में?
सुर. : सखी, शांत भाव धारण करो। हम लोग तुम्हारी सखी हैं, कोई अन्य नहीं है। जिसमें तुमको सुख मिले वही हम लोगों को करना है। यह सब जो कुछ कहासुना गया, केवल ऊपरी जी से।
सावित्री : तब कुछ चिंता नहीं। चलो, अब हम लोग माता के पास चलें। किंतु वहाँ मेरे सामने इन बातों को मत छेड़ना।
सखीगण : अच्छा, चलो।
(जवनिका गिरती है)


चौथा दृश्य


स्थान-तपोवन। द्युमत्सेन का आश्रम
(द्युमत्सेन, उनकी स्त्री और ऋषि बैठे हैं)
द्युमत्सेन : ऐसे ही अनेक प्रकार के कष्ट उठाए हैं, कहाँ तक वर्णन किया जाय।
पहला ऋषि : यह आपकी सज्जनता का फल है।
(छप्पय)
क्यौं उपज्यौ नरलोक? ग्राम के निकट भयो क्यौं?
सघन पात सों सीतल छाया दान दयो क्यौं?
मीठे फल क्यौं फल्यो? फल्यौ तो नम्र भयो कित?
नम्र भयो तो सहु सिर पै बहु बिपति लोक कृत।
तोहि तोरि मरोरि उपारिहैं पाथर हनिहैं सबहि नित।
जे सज्जन ह्नै नै कै चलहिं तिनकी वह दुरगति उचित ।।
दूसरा ऋषि : ऐसा मत कहिए! वरंच यों कहिए-
चातक को दुख दूर कियो पुनि दीनो सब जग जीवन भारी।
पूरे नदी नद ताल तलैया किये सब भाँति किसान सुखारी ।।
सूखेहू रूखन कीने हरे जग पूरîौ महामुद दै निज बारी।
हे घन आसिन लौं इतनो करि रीते भए हूँ बड़ाई तिहारी ।।
द्युमत्सेन : मोहि न धन को सोच भाग्य बस होत जात धन।
पुनि निरधन सो दोस न होत यहौ गुन गुनि मन ।।
मोकहँ इक दुख यहै जु प्रेमिन हू मोहिं त्याग्यौ।
बिना द्र्रव्य के स्वानहु नहिं मोसों अनुराग्यौ ।।
सब मित्रन छोड़ी मित्रता बंधुन हू नातो तज्यौ।
जो दास रह्यौ मम गेह को मिलनहुँ मैं अब सो तज्यौ ।।
पं. ऋषि. : तो इसमें आपकी क्या हानि है? ऐसे लोगों से न मिलना ही अच्छा है।
द्युमत्सेन : नहीं, उनके न मिलने का मुझको अणुमात्रा सोच नहीं है। मुझको तो ऐसे तुच्छमना लोगों के ऊपर उलटी दया उत्पन्न होती है। मुझको अपनी निर्धनता केवल उस समय अति गढ़ाती है जब किसी सत्पुरुष कुलीन को द्रव्य के अभाव से दुःखी देखता हूँ। उस समय मुझको निस्संदेह यह हाय होती है कि आज द्रव्य होता तो मैं उसकी सहायता करता।
दू. ऋषि : आपके मन में इसका खेद होता है तो मानसिक पुण्य आपको हो चुका। और आपकी मनोवृत्ति ऐसी है तो वह अवश्य एक न एक दिन फलवती होगी।
प. ऋषि : सज्जनगण स्वयं दुर्दशाग्रस्त रहते हैं, तब भी उनसे जगत् में नाना प्रकार के कल्याण ही होते हैं।
द्युमत्सेन : अब मुझसे किसी का क्या कल्याण होगा! बुढ़ापे से शरीर में पौरुष हुई नहीं। एक आँख थी सो भी गई। तीर्थ भ्रमण और देवदर्शन से भी रहित हुए।
प. ऋषि : आपके नेत्रों के इतने निर्बल हो जाने का क्या कारण है? अभी कुछ आपकी अवस्था अति बुद्ध नहीं हुई है।
द्युमत्सेन : वही कारण जो हमने कहा था। (उदास होकर) पुत्रशोक से बढ़कर जगत् में कोई शोक नहीं है। गणक लोगों ने यह कहकर कि तुम्हारा पुत्र अल्पायु है, मेरा चित्त और भी तोड़ रखा है। इसी से न मैं ऐसा घर, ऐसी लक्ष्मी सी बहू पाकर भी अभी विवाह संबंध नहीं स्थिर करता।
दू. ऋषि : अहा! तभी महाराज, अश्वपति और उनकी रानी इस संबंध से इतने उदास हैं। केवल कन्या के अनुरोध से संबंध करने के लिए कहते हैं।
(हरिनाम गान करते हुए नारद जी का आगमन)
नारद : (नाचते और वीणा बजाते हुए)
(चाल नामकीर्तन महाराष्ट्रीय कटाव) 
जय केशव करुणाकंदा। 
जय नारायण गोविंदा ।। 
माधव सुरपति रावण-हंता।
बुद्ध नृसिंह परशुधर बावन।
कल्कि बराह मुकुन्दा।
जय जय विष्णु भक्त भयहारी।
जसुदा-सुअन देवकीनंदन।
शंख-चक्र-कौमोदकि - धारी।
जय वृंदावन चंदा।
जय नरायण गोविंदा।
(सब लोग प्रणाम करके बैठाते हैं)
द्युमत्सेन : हमारे धन्य भाग कि इस दीनावस्था में आपके दर्शन हुए।
नारद : राजन्! तुम्हारे पास सत्यधन, तपोधन, धैर्यधन अनेक धन हैं, तुम क्यों दीन हौ। और आज हम तुमको एक अति शुभ संदेश देने को आए हैं। तुम्हारे पुत्र का विवाह संबंध हम अभी स्थिर किए आते हैं। सावित्री के पिता को भी समझा आए हैं कि उनकी कन्या सावित्री अपने उज्ज्वल पातिव्रत्य धर्म के प्रभाव से सब आपत्तियों को उल्लंघन करके सुखपूर्वक कालयापन करेगी और अपने पवित्र चरित्रा से दोनों कुल का मान बढ़ायेगी। तुमसे भी यही कहने आए हैं कि सब संदेह छोड़कर विवाह का संबंध पक्का करो।
द्युमत्सेन : मुझको आपकी आज्ञा कभी उल्लंघनीय नहीं है। किंतु-
नारद : किंतु किंतु कुछ नहीं। विशेष हम इस समय नहीं कह सकते। इतना मात्रा निश्चय जानो कि अन्त में सब कल्याण है।
द्युमत्सेन : जो आज्ञा।
नारद : अब हम जाते हैं।
(गान चाल भैरव, ताल इकताला वा बाउल भजन की चाल पर ताल आड़ा)
बोलो कृष्ण कृष्ण राम राम परम मधुर नाम।
गोविंद गोविंद केशव केशव गोपाल गोपाल माधव माधव।
हरि हरि हरि वंशीधर श्याम।
नारायण वासुदेव नंदनन्दन जगबंदन।
वृंदावन चारु चंद्र गरे गुंजदाम।
‘हरीचंद’ जन रंजन सरन सुखद मधुर मूर्ति।
राधापति पूर्ण करन सतत भक्त काम।।
(नृत्य और गीत)

(जवनिका गिरती है।)

 


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हिंदी समय में भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएँ