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लेख

मीडिया में दलित, वंचित और आदिवासी
राकेशरेणु


मीडिया में दलितों, वंचितों और आदिवासियों की स्थिति पर चर्चा से पूर्व, आइए इसी वर्ष सितंबर-अक्तूबर में घटी कुछ घटनाओं पर नजर डालें। आठ अक्तूबर को बिहार में भोजपुर जिले के सिकरहटा थाना क्षेत्र में कबाड़ बीनने वाली पाँच महादलित बच्चियों/किशोरियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटी। पुलिस ने काफी ना-नुकुर के बाद गुस्साई भीड़ के दवाब में घटना के चौबीस घंटो बाद एफआईआर दर्ज की। अँग्रेजी दैनिक 'द हिंदू' ने इसकी छोटी-सी खबर 11 अक्तूबर जबकि हिंदी के सबसे संजीदा माने जाने वाले अखबार 'जनसत्ता' ने 16 अक्तूबर को प्रकाशित की। राष्ट्रीय कहे जाने वाले दिल्ली से प्रकाशित किसी भी अन्य समाचार पत्र ने इस कुत्सित घटना को प्रकाशन योग्य समझा हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। 'हिंदू' और 'जनसत्ता' दोनों ने खबर के बासीपन को छुपाने के लिए इसके आरंभ में डेटलाइन नहीं दी। इसके प्रायः दस दिन पहले सितंबर के अंतिम सप्ताह के दौरान एक अन्य घटना ओडिशा के गंजम जिले की है। यहाँ सनखीमुंडी ब्लॉक के सुमंतापुर गाँव में उच्च जाति के लोगों ने दलितों के नलके से पानी भरने पर रोक लगा दी। बेरहामपुर शहर से यह गाँव लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। लेकिन इस खबर को मीडिया, खासकर हिंदी मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी। इसे विस्तार से प्रकाशित किया अँग्रेजी अखबार 'द हिंदू' ने जिसका ओडिशा में कोई संस्करण नहीं है।

आजादी के 67 सालों बाद जब सरकारें देश को विश्व की आर्थिक शक्ति बनाने के सपने देख और दिखा रही हैं, न केवल गाँवों और भीतरी इलाकों में, बल्कि शहरों और राजधानियों में भी अमानवीय जातिवादी हिंसा और आछूत विद्यमान है और एक बड़ी जनसंख्या के साथ दोयम दर्जे के नागरिक सरीखा व्यवहार जारी है। यह भेदभाव उनके रंग, नाक-नक्श, कपड़े-लत्ते, जीवनशैली, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार भी है लेकिन उनके मूल में जातिवादी सोच और अपने को बौद्धिक और सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति ही है। जब तक कोई हो-हल्ला न हो, व्यवस्था इसे चुपचाप देखती रहती है और घटनाएँ मीडिया की निगाह से ओझल होती रहती हैं। सुमंतापुर की घटना वाले दिन ही बिहार के मधुबनी जिले में घटी एक अन्य घटना को मीडिया ने पर्याप्त कवरेज दी। यह घटना राज्य के दलित-आदिवासी मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से जुड़ी थी। श्री मांझी के अनुसार जिले के तरही गाँव में एक मंदिर में उनके दर्शन कर लौटने के बाद मंदिर के फर्श और प्रतिमाओं को धोया गया। इस दूसरी घटना को अखबारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में क्यों जगह मिली? इसलिए नहीं कि यह किसी दलित/आदिवासी के अधिकारों के हनन का मामला था, बल्कि इसलिए कि घटना राज्य के मुख्यमंत्री के साथ घटित हुई थी। अन्यथा इसकी भी वैसी ही अनदेखी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस तरह की अनेकानेक घटनाओं की जानकारी दलित-आदिवासियों द्वारा निकाले जाने वाली भंगुर पत्र-पत्रिकाओं में मिल सकती है।

मीडिया प्रबंधकों द्वारा प्रायः इन घटनाओं के दूरदराज के क्षेत्र में घटित होने के कारण छूट जाने की संभावना की ओट ली जाती है। लेकिन अखबारों और चैनलों से उम्मीद की जाती है कि वे केवल प्रमुख और शासकों की ही नहीं 'गौण' और 'शासितों' की खबर भी दें जिसके लिए जरूरी है कि गाँव-देहात में नहीं तो कम-से-कम हर जिले में उनके संवाददाता अथवा अंशकालिक संवाददाता हों। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं है। समाचारों के लिए अखबार समाचार एजेंसियों पर निर्भर होते हैं जबकि निजी इलेक्ट्रोनिक मीडिया टेलीविजन का चरित्र मुख्यतया शहरी है। बहरहाल, यह चर्चा का अलग विषय है।

'दूरदराज की खबर छूटने की संभावना' के खोखलेपन का आकलन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में घटी एक अन्य घटना के उदाहरण से किया जा सकता है। यहाँ पढ़ाई और रोजगार के साथ-साथ अन्य वजहों से आने वाले पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राओं, युवक-युवतियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घटनाएँ आए दिन पढ़ने-सुनने को मिलती हैं। राजधानी और आसपास घटित होने के कारण मीडिया उन्हें कवरेज तो देता है तो उनको 'फॉलो' करने के मामले में वह प्रायः शिथिल हो जाता है। ऐसे एक मामले का बयान लेखक-चिंतक और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक अपूर्वानंद करते हैं। कुछ समय पूर्व उनकी एक छात्रा और उसके भाई की मुखर्जी नगर में उनके मकान मालिक ने बुरी तरह पिटाई की। क्योंकि बगैर यह बताए कि वे दलित (चमार) हैं, उनके मकान में सवा साल से रह रहे थे। जातीयता के लिए भले बिहार-उत्तर प्रदेश बदनाम हों, ऊपरी प्रगतिशीलता का रंग चढ़ाए दिल्ली जैसे इलाके कहीं दो कदम आगे ही ठहरते हैं। पिटाई के बाद दोनों को मुखर्जी नगर थाने ले जाया गया जहाँ महिला किंतु 'शर्मा' थानाधिकारी ने उन्हें रात भर बिठाए रखा। दलित होने की वजह से उन्हें प्रताड़ित किया गया। पीने के लिए पानी माँगने पर उन्हें गिलास में मुँह न लगाने और 'ऊपर' से पीने को कहा गया। लेकिन अखबारों और मीडिया ने इस घटना पर क्या किया? अपूर्वानंद बताते हैं कि पहले दिन अखबारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने दिलचस्पी दिखाई, पर आगे किसी में इसे लेकर उत्सुकता न रही कि न्याय की संरचना ने कनक (दलित छात्रा) की शिकायत का क्या किया। मीडिया 'जरूरी' और 'ताजा' घटनाओं की कवरेज में मशरूफ हो गई और जनतांत्रिक समाज की चेतना पर लोटपोट होते करैत की मौजूदगी एक बार फिर उसकी निगाह से ओझल हो गई। ऐसा क्यों है कि आदिवासियों, दलितों और अन्य वंचित तबकों की खबरें या तो मीडिया की निगाह से ओझल रहती हैं या सूचना देने मात्र के बाद आगे की खबर (फोलोअप) उसकी पहुँच से बार-बार फिसलती जाती है जबकि, राजनीति, आर्थिक भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार आदि की खबरों की वह महीनों परत दर परत उघारता रहता है? क्या इनमें निहित चटखारापन और सनसनी उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करते हैं, जिनका आदिवासियों और दलितों की खबरों मे अभाव होता है अथवा इसके कुछ अन्य कारण भी हैं?

मीडिया को हासिल स्वतंत्रता अगर समाज की स्वतंत्रता को मापने का पैमाना हो, तो निस्संदेह भारतीय समाज बहुत ही स्वतंत्र है किंतु क्या वाकई यह सभी वर्गो-समाजों के लिए एक-सा ही है? यह सही है कि आज की पत्रकारिता में कैरियर और कमाई की प्रवृत्ति हावी है। अन्य कारणों के साथ-साथ इनकी वजह से भी पत्रकारिता का स्वरूप बदला है। उसकी पूँजी और बाजार पर निर्भरता बढ़ी है, इन दोनों का आज की मीडिया पर, पत्रकारिता पर प्रायः वर्चस्व है। इसके बावजूद, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि स्वातंत्र्योत्तर काल में जनतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में, समाज में आए सकारात्मक बदलावों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन ये बदलाव हमेशा सकारात्मक ही रहे, ऐसा दावा भी नहीं किया जा सकता। इसने अनेक मर्तबा यथास्थितिवाद और नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी शह दी है। भारतीय समाज में कमजोर, उपेक्षित और प्रताड़ित तबकों की कमी नहीं है। लेकिन स्वतंत्र, जनतांत्रिक और आधुनिक भारत में भी उनकी स्थिति में वर्चस्व वाले वर्गों की दृष्टि में कोई बड़ा, परिवर्तन नजर नहीं आता। उदाहरणस्वरूप आरंभिक चार वाकयों को लिया जा सकता है। हम सब जानते हैं कि ये अपवादस्वरूप घटी घटनाएँ नहीं है। देश के विभिन्न अंचलों में इस तरह की अथवा इनसे कहीं ज्यादा तकलीफदेह घटनाएँ रोज घट रही हैं, पर वे मीडिया-विमर्श का हिस्सा नहीं बनती। महाराष्ट्र के चर्चित खैरलांजी बलात्कार हत्याकांड पर मीडिया की नजर घटना के दो हफ्ते बाद गई। अखबारों-पत्रकारों और समग्र मीडिया की नजर से या तो ओझल रहती हैं अथवा उन्हें खबर के बतौर छुआ भर जाता है। मुख्यधारा की तत्कालीन मीडिया के इस एकांगी स्वरूप और आदिवासियों व दलितों के प्रति उसके उपेक्षाभाव को स्वय दलित विचारक शिद्दत से महसूस करते रहे। स्वयं डॉ. बी.आर. आंबेडकर इस कमी को महसूस किया जिसकी भरपाई के लिए उन्होंने अलग-अलग समय में चार अलग-अलग अखबार, क्रमशः - 'मूकनाथ' (1920), 'बहिष्कृत भारत' (1927), 'जनता' (1930) और 'प्रबुद्ध भारत' (1956) का संपादन-प्रकाशन किया। ये सभी मराठी भाषा में प्रकाशित होते थे। आंबेडकर से भी पहले स्वामी अछूतानंद ने 1917 में 'अछूत' नामक पत्रिका का हिंदी में प्रकाशन किया। 'हिंदी की दलित पत्रकारिता पर पत्रकार आंबेडकर का प्रभाव' शीर्षक अपने शोधप्रबंध में श्योराज सिंह बेचैन स्वामी अछूतानंद से लेकर अब तक के दलित पत्रकार-संपादकों और उनके पत्र-पत्रिकाओं विस्तृत सूची प्रस्तुत करते हैं। ये सभी विचारक और अखबार-पत्रिकाएँ दलितों की पीड़ा को सार्वजनिक करना चाहते थे, उनके मनुष्यगत अधिकारों को स्वीकृति दिलाना चाहते थे उस समाज से जिसने शताब्दियों से उनके सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन का उनका हक छीन लिया था और निरंतर उनके शोषण में सहभागी थी। लेकिन इनमें से कोई भी प्रयास मुख्यधारा की पत्रकारिता का अंग न बन पाया। ये सब स्वैच्छिक प्रयास थे, मूक दलित-वंचितों को आवाज देने और उनकी पीड़ा को बृहत्तर समाज व व्यवस्था तक पहुँचाने के मिशनरी एकलव्य प्रयास। मुख्यधारा की पत्रकारिता की व्यावसायिकता वहाँ न थी, न ही वह प्रबंधन तंत्र उनके पास था जिसकी बदौलत वे अपने उत्पाद (अखबार) की मार्केटिंग कर पाते और उसे अधिक से अधिक लोगों को बेच-पढ़ा पाते। इसी लिए अछूतानंद और आंबेडकर से लेकर अबतक दलितों और आदिवासी संगठनों/व्यक्तियों द्वारा निकाले गए अखबारों-पत्रिकाओं का जीवन निजी प्रयासों से निकलने वाले अन्य पत्र-पत्रिकाओं की भांति बड़ा भंगुर और अल्पजीवी रहा है। प्रसार के लिहाज से अपने लघु आकार के कारण इस मिशनरी पत्रकारिता की एक बड़ी सीमा यह रही कि उनकी पीड़ा और इच्छाएँ भले दलितों के एक सीमित वर्ग तक (जहाँ तक वे प्रसारित हो पाती हैं) पहुँच जाएँ, समाज के अन्य वर्गों के दलितों और आदिवासियों की समता और अधिकारों के समर्थक प्रबुद्ध और प्रगतिशील चेतना संपन्न लोगों तक नहीं पहुँच पाती।

तकनीक ने मीडिया का अनजाने और नए क्षेत्रों में भारी प्रसार किया है। इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों को विगत दो दशकों में भारी प्रसार हुआ है और आज देश के दूरदराज के अंचलों में भी इनकी मजबूत उपस्थिति महसूस की जा सकती है। लेकिन टेलीविजन चैनल शुरू करने के लिए जिस परिमाण में पूँजी की जरूरत पड़ती है, उसने इसे बड़े व्यापारियों और कॉरपोरेटों की झोली में ला पटका है जिनके लिए किसी भी अन्य व्यापारिक उद्यम की तरह टेलीविजन चैनल भी एक व्यापारिक उद्यम है जिसका अंतिम लक्ष्य मुनाफा कमाना और पूँजी बाजार में शेयरों पर प्रीमियम को निरंतर बढ़ता देखना है। इसने मुख्यधारा के सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाओं के सम्मुख चुनौती पेश करने का खम भरने वाले लघुपत्रिका आंदोलन जैसी संभावना की गुंजाइश भी खत्म कर दी है। इसके परिणामस्वरूप देखा जा सकता है कि टेलीविजन प्रसारण के क्षेत्र में एक चैनल भी वैकल्पिक माध्यम की चुनौती पेश करने की स्थिति में नहीं है न तो विचारधारात्मक अंतर्वस्तु के स्तर पर, न सामाजिक बादलाव के स्तर पर। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में आकाशवाणी, दूरदर्शन और लोकसभा, राज्यसभा जैसे लोकप्रसारणकर्ता चैनलों को छोड़कर निःस्वार्थ भाव से आदिवासियों-दलितों की आवाज बनने वाला कोई चैनल नहीं है।

हाल के वर्षों में सूचना के जनतांत्रीकरण के एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में सोशल मीडिया सामने आया है। यहाँ कंप्यूटर साक्षर और इंटरनेट का उपयोग करने की सामर्थ्य रखने वाला कोई भी व्यक्ति पत्रकार हो सकता है और अपनी बात इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले बृहत्तर जनसमुदाय तक पहुँचा सकता है। लेकिन जिस देश में कंप्यूटर साक्षरता अभी भी कुल जनसंख्या के दो प्रतिशत के इर्द-गिर्द सिमटी हो, जहाँ बीस या बाइस रुपये प्रतिव्यक्ति दैनिक आय को गरीबी रेखा माना जाता है और जहाँ इस पैमाने पर भी देश की एक तिहाई से अधिक आबादी (जो प्रायः शतशः आदिवासियों और दलितों की आबादी है) गरीबी रेखा से नीचे ठहरती हो, कल्पना कर सकते हैं कि वहाँ कितने दलित, आदिवासी और वंचितों को कंप्यूटर का ज्ञान होगा और उनमें से कितने कंप्यूटर या सुगमतापूर्वक इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने वाले उन्नत मोबाइल हैंडसेट रखते होंगे। इसलिए 'दलित वायस' जैसे एकाध वेबसाइट की उपस्थिति के बावजूद अभी तक सोशल मीडिया की पैठ आदिवासी-दलित समुदाय में नहीं हो पाई है। दलितों-आदिवासियों का सामाजिक जीवन, उनमें शिक्षा का अभाव अथवा अल्पशिक्षा, गाँव से शहर तक उनकी यात्रा, विस्थापन, उनका रहन-सहन, खाते-पीते शहरी का उनके प्रति बर्ताव उन्हें फेसबुक, ट्वीटर या दूसरे सोशल साइट्स पर खुलने और दोस्त बनाने से रोकता है। पारंपरिक मीडिया के उलट यहाँ उन्हें अपने विचार, अपनी बातें रखने की पूरी आजादी है, लेकिन उनका समुचित प्रसार नहीं हो पाता। अगर उनके दोस्त ही नहीं होंगे तो उनके पोस्ट्स को पढ़ेगा-सुनेगा कौन।

दूसरी ओर, आजादी के 67 वर्षों बाद भी न तो भारतीय समाज, न ही उसे चलाने वाला शासन-प्रशासन तंत्र और न ही इन सबकी निगहबानी करने का दम भरने वाला मुख्यधारा का परंपरागत मीडिया - प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक दोनों पूरी तरह समावेशी बन पाया है। आदर्श जनतंत्र तो वह है जहाँ समाज का कोई भी तबका उपेक्षित नहीं रहता, सबकी राय को एकसमान जगह और महत्व दिया जाता है और समाज की इंद्रधनुषी विविधता का बराबर सम्मान होता है। अनेक विविधताओं से भरे भारतीय समाज के लिए तो यह और भी जरूरी है। लेकिन भारत की मीडिया में अब तक ऐसा हो नहीं पाया है। समानता के सांवैधानिक प्रावधान के कारण राजनीति और प्रशासकीय निकायों में जहाँ आदिवासियों-जनजातियों और दलितों को प्रतिनिधित्व मिला है, वहीं मीडिया में उनकी उपस्थिति शून्य अथवा नगण्य है। यही वजह है कि जनजातियों-आदिवासियों और दलितों में मीडिया के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। उन्हें शासन-प्रशासन, कानून व्यवस्था से जितनी शिकायतें हैं उससे कहीं अधिक शिकायत मीडिया से है।

दो सौ साल से अधिक के भारतीय पत्रकारिता (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों) के इतिहास में पहली बार मीडिया में दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों की स्थिति पर सबसे पहले द्वितीय प्रेस आयोग में विचार किया गया। न्यायमूर्ति के.के. मैथ्यू की अध्यक्षता में भारतीय प्रेस की प्रगति और स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए गठित इस आयोग ने 3 अप्रैल 1982 को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके 'ए नोट ऑन कास्ट सिस्टम एमांग जर्नलिस्टस' शीर्षक अध्याय में भारत में संभवतः पहली बार मुख्यधारा की पेशेवर पत्रकारिता में पत्रकारों और उनके जाति संबंधों पर सिलसिलेवार अध्ययन किया गया था। लेकिन इस अध्ययन का भी कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा। जैसा कि आमतौर पर सरकार प्रायोजित रिपोर्टों के साथ मीडिया, खासकर भाषायी मीडिया करती है, सीमित और सतही चर्चा के बाद उसे किनारे रख भुला दिया गया। लेकिन आयोग की रिपोर्ट में शामिल इस अध्ययन से आंबेडकरवादी और दलित अधिकारों के लिए सचेत कुछ संजीदा पत्रकारों को एक रास्ता सूझा। मीडिया स्टडीज ग्रुप से जुड़े पत्रकार अनिल चमड़िया ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पत्रकारों की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारधारात्मक पृष्ठभूमि की जानकारी लेने के लिए बिहार के पत्रकारों के बीच एक सर्वेक्षण किया जिसमें उन्हें अनुसूचित जाति का केवल एक पत्रकार मिला जो राज्य से बाहर का था और जिसकी जातिगत स्थिति नियोक्ताओं और स्थानीय पत्रकार बिरादरी के बीच स्पष्ट नहीं थी। चमड़िया के इस शुरुआती सर्वेक्षण की खबर एक स्थानीय अखबार में छपी लेकिन उसका कोई नोटिस नहीं लिया गया। स्वयं अनिल चमड़िया के अनुसार इस सर्वेक्षण का अभिप्रेत पत्रकारिता में दलितों और जनजातियों के सवाल पर विमर्श करना नहीं बल्कि पत्रकारों की वर्गीय और विचारधारात्मक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना था। 

1996 में अँग्रेजी पत्रकार बी.एन. उनियाल का ध्यान इस ओर गया कि जिस पेशे में उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा गुजार दिया उसमें एक भी दलित पत्रकार नहीं है और कभी उनका ध्यान इस स्याह खालीपन की ओर गया भी नहीं। उनियाल से जब अमरीकी समाचारपत्र 'वाशिंगटन पोस्ट' के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख कैनेथ कपूर ने अपने एक शोध के सिलसिले में इस बारे में जानकारी चाही थी तब उनका ध्यान इस ओर गया। उनियाल ने अनेक संपादकों से बातचीत और पत्र सूचना कार्यालय-पीआईबी के मान्यताप्राप्त पत्रकारों संवाददाताओं की सूची सहित सभी उपलब्ध सूचियाँ खंगाल डाली लेकिन किसी भी सूची में उन्हें एक भी दलित पत्रकार नजर न आया। लेकिन उनियाल के इस लेख के बाद यह मीडिया के इस एकांगी स्वरूप ने सबका ध्यान खींचा और निष्ठापूर्वक जाति-निरपेक्ष प्रगतिशीलता का अनुपालन करने वाले इन पंक्तियों के लेखक सहित अनेक पत्रकारों, मीडिया पर अध्ययन-अनुशीलन करने वाले लोगों का ध्यान इस खालीपन की ओर गया। उनियाल अँग्रेजी दैनिक - पायोनियर में प्रकाशित अपने उक्त लेख में कहते है कि 'अचानक मुझे लगा कि मैं तीस वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ और मुझे एक भी दलित पत्रकार नहीं मिला, एक भी नहीं' सबसे तकलीफ की बात तो यह है कि कभी मुझे इसका अहसास तक नहीं हुआ कि हमारे पेशे में इतना बड़ा अभाव है।’

उनियाल की स्वीकारोक्ति के लिए उनके प्रति सम्मान की भावना के साथ-साथ सवाल यह पैदा होता है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता में अपना प्रायः समस्त कार्यशील जीवन व्यतीत कर देने के बाद भी आखिर किसी पत्रकार को (जो यदि आदिवासी या दलित नहीं तो सवर्ण ही है) को यह अहसास नहीं होता कि जिस समाज में और जिस समाज की बेहतरी के लिए वह काम कर रहा है, वह भौतिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर सिरे से परिदृश्य से नदारद क्यों है?

एक दशक बाद का हाल

सन् 2000 में पश्चिमी दुनिया की नकल में जब भारतीय मीडिया नई सहस्राब्दि के आगमन की खुशियाँ मना रहा था और इसके स्‍वागत के समूहगान गा रहा था, अफसोसनाक रूप से तब भी इस मीडिया समूह में एक भी दलित-आदिवासी चेहरा न था। देश की कुल आबादी के प्रायः एक तिहाई हिस्‍से का प्रतिनिधित्‍व वहाँ सर्वथा नहारद था। निजी क्षेत्र में इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया-टेलीविजन और एफएम रेडियो को तेजी से विस्‍तार हो रहा था लेकिन वहाँ न केवल समाचारों, बल्कि मनोरंजन सहित किसी भी कार्यक्रम की एंकरिंग करने वाला दलित-आदिवासी चेहरा न था। लगभग दस साल तक भारत के विभिन्‍न नगरों में स्थित समाचारपत्र समूहों के अध्‍ययन के बाद शिक्षाविद् रॉबिन जेफ्री की 'इंडियाज न्‍यूजपेपर रिवोल्‍यूशन' नामक पुस्‍तक प्रकाशित हुई। इस किताब में जेफ्री रेखांकित करते हैं कि विकास गाथाएँ लिखने के बावजूद किसी भी समाचारपत्र समूह में उन्‍हें एक भी दलित प‍त्रकार नहीं मिला, दलित आदिवासी संपादक या मालिक तो दूर की बात है।

कूपर-उनियाल अध्‍ययन के एक दशक बाद 2006 में दिल्‍ली स्थित मीडिया स्‍टडीज ग्रुप के अनिल चमड़िया और सीएसडीएस के योगेंद्र यादव ने 37 मीडिया संस्‍थानों के 315 प्रमुख पदों का सर्वेक्षण कर पता लगाया कि फैसले लेने वाले शीर्ष पदों पर एक प्रतिशत अन्‍य पिछड़ा वर्ग के लोग हैं, लेकिन मीडिया के प्रमुख पदों पर उनकी हिस्‍सेदारी केवल चार प्रतिशत पाई गई जबकि आठ प्रतिशत जनसंख्‍या वाले सवर्णों का मीडिया के फैसले लेने वाले 71 प्रतिशत पदों पर वर्चस्‍व था। आरंभ में इस सर्वेक्षण का मुखर विरोध हुआ और मीडिया में जाति अथवा सामाजिक संरचना के अनुरूप वर्गीय प्रतिनिधित्‍व के बजाय ज्ञान और दक्षता की जरूरत बताई गई। एचटी मीडिया लिमिटेड की उपाध्‍यक्ष शोभना भरतिया ने सीएनबीसी 18 टेलीविजन चैनल के एक टॉक शो में और इसी समूह द्वारा प्रकाशित हिंदी दैनिक 'हिंदुस्‍तान' की तत्‍कालीन मुख्‍य संपादक मृणाल पांडे ने अपने अखबार में संपादकीय लेख लिखकर विरोध की अगुवाई की। अँग्रेजी दैनिक 'द पायोनियर' के मालिक और संपादक चंदन मित्रा ने इसे 'विभाजनकारी' बताया। सीएनबीसी 18 के इसी कार्यक्रम में 'द हिंदू' के तत्‍कालीन मुख्‍य संपादक एन. राम ने सर्वेक्षण की प्रशंसा करते हुए इसे इसकी सीमाओं के बावजूद समाज की बेहतरी के लिए जरूरी बताया। एन. राम ने अमरीकन सोयायटी ऑफ न्‍यूजपेपर एडिटर्स के प्रयासों का उल्‍लेख करते हुए कहा कि इस सोयायटी के कार्यक्रम से अमरीकी मीडिया में अश्‍वेत, अफ्रीकी-अमरीकी सहित अल्‍पसंख्‍यकों की स्थिति मजबूत हुई है। उन्‍होंने सर्वेक्षण के आलोक में अमरीकी मीडिया संगठनों की तरह काम करने की जरूरत बताई।

2006 के इस सर्वेक्षण में लोकसभा टीवी, आकाशवाणी और दूरदर्शन सरीखे लोक प्रसारकों की बाबत जानकारी शामिल नहीं थी। राज्‍यसभा टीवी का त‍ब तक उदय नहीं हुआ था। लेकिन ये सभी चैनल सरकार की आरक्षण नीति का अनुपालन करते हैं, इसलिए यहाँ दलित-आदिवासी पत्रकारों और कर्मियों की उपस्थिति उत्‍साहवर्धक है। हालाँकि अनिल चमड़िया दलितों और आदिवासियों के संदर्भ में सरकारी (लोक प्रसारणकर्ता) और निजी क्षेत्र की मीडिया में कोई फर्क नहीं पाते लेकिन वह स्‍वयं उल्‍लेख करते हैं कि दूरदर्शन के जिन 17,019 पदों पर नियुक्तियाँ की गई हैं उनमें से 4,714 यानी 27.7 प्रतिशत दलित और आदिवासी हैं। आकाशवाणी में भी कमोबेश यही स्थिति है। इन दोनों संगठनों में निचले पायदान से लेकर फैसले लेने वाले शीर्ष पदों तक दलित-आदिवासियों का प्रतिनिधित्‍व देखा जा सकता है, कार्यक्रमों का संचालन करते हुए, समाचार पढ़ते हुए, साक्षात्‍कार और रिपोर्टिंग करते हुए उन्‍हें देखा-सुना जा सकता है।

इंटरनेट पत्रिका 'द हूट' के लिए एजाज अशरफ ने पिछले वर्ष, 2013 में भारतीय जनसंचार संस्‍थान से पत्रकारिता की पढ़ाई कर निकले दलित छात्रों के सर्वेक्षण के क्रम में पाया कि उनमें से प्रायः सभी प्रसार भारती (यह आकाशवाणी और दूरर्शन का नियंत्रण और संचालन करती है) द्वारा आयोजित परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। अशरफ कहते हैं कि इस जानकारी ने उन्‍हें चकित कर दिया। उनकी मान्‍यता थी कि 'विगत वर्षों के दौरान मूल्‍यों में क्षरण के बावजूद वास्‍तविक, स्‍वतंत्र, अनियंत्रित पत्रकारिता सरकारी क्षेत्र से बाहर ही की जाती है।' अशरफ की यह मान्‍यता धराशायी हो रही थी। क्‍या वजह थी कि लगभग सभी युवा दलित पत्रकार आकाशवाणी और दूरर्शन में नौकरी के लिए बेताब थे। अशरफ की खोजबीन ने निजी क्षेत्र की मीडिया को लेकर बनी उन्‍हीं स्‍थापनाओं-मान्‍यताओं को पुष्‍ट किया जिनकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। इन युवा पत्रकारों से बातचीत में उन्‍होंने पाया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में वे इस भरोसे के साथ आए थे कि इससे उनके समुदाय को ताकत मिलेगी। लेकिन हिंदी और भाषायी मीडिया में जहाँ उन्‍होंने नगण्‍य-सी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू किया है, उन्‍हें भेदभाव, अपमान और विरोध का सामना करना पड़ता हे। अँग्रेजी मीडिया में उनकी उपस्थिति प्रायः नहीं है। नियमों से बँधी सरकारी मीडिया में भेदभाव भीतर-भीतर भले एक कुढ़न के रूप में हो, प्रकट रूप में नहीं है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की संवैधानिक व्‍यवस्‍था के चलते नई नियुक्तियों में अधिक नहीं तो कम से कम एक निश्चित प्रतिशत तक दलित-आदिवासियों का स्‍थान सुनिश्चित है। कामकाज की बेहतर स्थितियों के साथ-साथ नियुक्ति की भांति पदोन्‍नति में यहाँ भेदभाव की गुंजाइश कम ही है। बीच में नौकरी छूटने से उत्‍पन्‍न अनिश्चितता यहाँ प्रायः नहीं होती जो कमजोर आर्थिक पृष्‍ठभूमि वाले दलित-आदिवासी पत्रकारों को सुरक्षा का बोध देती है।

इसके विपरीत, निजी क्षेत्र के अन्‍य सभी उद्यमों की तरह मीडिया में किसी किस्‍म के जाति-आधारित आरक्षण के प्रति नकार का भाव है। 'ज्ञान' और 'दक्षता' आधारित पेशे के दावे के बावजूद निजी क्षेत्र की मीडिया में नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं बरती जाती। प्रायः नियुक्तियों जान-पहचान, पारिवारिक रसूख, व्‍यक्तिगत सिफारिश आदि के आधार पर कर ली जाती हैं। भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष जब इन स्थितियों के आलोक में पत्रकारों के लिए न्‍यूनतम योग्‍यता की वकालत करते हैं तो ज्ञान और दक्षता की अर्हता देने वाले वही लोग तिलमिला उठते हैं और उनका अपने-अपने मंचों पर विरोध करते हैं।

इसके बावजूद, अशरफ दावा करते हैं कि उनियाल के अध्‍ययन के बाद के बीते 17 वर्षों में निजी क्षेत्र की मीडिया में दलितों की तादाद बढ़ी है। उनियाल को जहाँ 1996 में एक भी दलित पत्रकार नहीं मिला, अशरफ को अकेले दिल्‍ली में इस तबके के दर्जन भर से ऊपर पत्रकार मिले। लेकिन उनकी मौजूदगी का कोई प्रभाव या अर्थपूर्ण परिवर्तन रॉबिन जेफ्री अथवा तमिल पत्रकार जे. बालासुब्रह्ण्‍यम को नहीं दिखाई देता। 2012 में नई दिल्‍ली में राजेंद्र माथुर स्‍मृति व्‍याख्‍यान में जेफ्री कहते हैं कि 'भारतीय समाचार संगठनों के समाचार कक्षों में 1992 में दलित (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) का एक भी पत्रकार नहीं था, कमोबेश आज भी वही स्थिति है। जब तक (दलितों के खिलाफ, हिंसा या नफरत की घटनाओं को छोड़ दे तो) लगभग एक चौथाई भारतवासियों की खबरों को उनके जीवन में क्‍या कुछ घटित हो रहा है, जाना नहीं हा सकता।' बालासुब्रह्ण्‍यम भी 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वकिली' में दलित-आदिवासियों के संदर्भ में समाचार संगठनों में आए किसी उल्‍लेखनीय बदलाव से इनकार करते हैं।

बाजार का असर

बाजार अपने उत्‍पाद बेचना चाहता है, उसे जीवन के लिए अति अनिवार्य साबित कर मुनाफा कमाना उसका अभिप्रेत है, इसलिए 'कॉपरोरेट सोशल रेस्‍पॉन्सिबिलिटी' के लुभावन जुमले के बावजूद किसी वंचित दलित वर्ग का वास्‍तविक हित उसका लक्ष्‍य नहीं।

जेफ्री से कुछ वर्ष पहले, 2007 में वही राजेंद्र प्रसाद स्‍मृति व्‍याख्‍यान देते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने बताया कि 'जिन दिनों मुंबई में लैक्‍मे फैशन वीक में सूती कपड़ों की नुमाइश चल रही थी, लगभग उन्‍हीं दिनों कपास की फसल खराब होने की वजह से विदर्भ में बड़ी संख्‍या में किसान आत्‍महत्‍या कर रहे थे। लेकिन विडंबना यह है कि मुंबई में 600 से ऊपर पत्रकार फैशन वीक को कवर कर रहे थे जबकि विदर्भ में किसानों की आत्‍महत्‍या की कवरेज के लिए देशभर से बमुश्किल छह पत्रकार पहुँच पाए।' मीडिया की इस उपेक्षा के पीछे कृषि और कृषिकर्म में लगी दो तिहाई आबादी के प्रति मीडिया की संवेदनहीनता ही मुद्दा नहीं है, बल्कि बाजार और उसे संचालित करने वाली बड़ी पूँजी की मुनाफाखोर प्रवृत्ति कहीं बड़ा मुद्दा है। इसी प्रवृत्ति की वजह से निजी क्षेत्र के उद्योग आरक्षण के खिलाफ खड़े होते हैं और यही प्रवृत्ति मीडिया में दलित-आदिवासियों के प्रवेश के खिलाफ खड़ी होती है। कुछ भी हो, यह स्थिति विध्‍वंसकारी है - भारतीय गणतंत्र के लिए, पहले से ही विखंडित समाज के लिए और सामाजिक विकास की मल अवधारणा के लिए। यह विध्‍वंसकारी है क्‍योंकि यह संविधान की प्रस्‍तावना में शामिल समता और बंधुत्‍व के वायदे के खिलाफ है। यह मीडिया के जनतांत्रिक और समावेशी स्‍वरूप के खिलाफ है और यह जनतांत्रिक व्‍यवस्‍था में मीडिया के 'चौथा स्‍तंभ' होने के दावे को खोखला बनाता है। इसलिए यह स्थिति बदलनी चाहिए - जितनी जल्‍दी बदले उतना बेहतर। लेकिन स्थिति बदलेगी कैसे?

बदलाव के लिए पहल

इस दिशा में पहल कोई भी कर सकता है। शुरुआत भारतीय प्रेस परिषद और दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) कर सकते हैं। भारतीय प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 परिषद को इसके लिए पर्याप्‍त अधिकार देता है। इस अधिनियम के तीसरे अध्‍याय की धारा 14 और 15 में समाचार संगठनों को 'जिम्‍मेदार और जनतांत्रिक' बनाने के लिए पर्याप्‍त अधिकार दिए गए हैं। क्‍या दलितों, आदिवासियों और वंचितों को मीडिया घरानों में शामिल कराना उन्‍हें जिम्‍मेदार और जनतांत्रिक बनाना नहीं है?

एन. राम ने जिस अमेरिकन सोसाइटी ऑफ न्‍यूज एडीटर्स के प्रयासों से अमरीकी मीडिया में आए बदलावों की चर्चा की थी, उस सोसाइटी की तर्ज पर भारत में एक पहल एडीटर्स गिल्‍ड ऑफ इंडिया कर सकता है। गिल्‍ड समाचार संगठनों की जातीय, क्षेत्र और वर्ग आधारित विविधता की एक निश्चित अंतराल पर सर्वेक्षण कर उसे प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। वह मीडिया संगठनों के लिए विविधता को बढ़ावा देने के लक्ष्‍य निर्धारित कर सकता है और समय-समय उनकी जानकारी जुटा प्रगति का मूल्‍यांकन कर सकता है। इस पूर्वनिर्धारित लक्ष्‍य से मीडिया संगठनों पर विविधता बढ़ाने का एक नैतिक दबाव बनेगा। इस दबाव के हिंदी और भाषायी मींडिया में ज्‍यादा कारगर होने की संभावना है। क्‍योंकि इनके प्रमुख पाठक-श्रोता-दर्शक उपभोक्‍ता मुख्‍यतः नवसाक्षर और अपने हकों को लेकर अब जागरूक हो रहे दलित-आदिवासी तबके ही हैं।

पहल राष्‍ट्रीय मानव अधिकार आयोग, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति आयोग और अल्‍पसंख्‍यक आयोग जैसे संगठन भी कर सकते हैं। वे विविधिता, बहुलता और समता बढ़ाने के लिए सम्‍मान-पुरस्‍कार, सहायता और अन्‍य प्रोत्‍साहन कार्यक्रम की घोषणा कर सकते हैं।

एक जरूरी पहल पत्रकारिता का प्रशिक्षण देने वाले संस्‍थानों के स्‍तर पर अपेक्षित है। सरकार द्वारा चलाए जाने वाले संस्‍थानों में जहाँ नामांकन में आरक्षण व्‍यवस्‍था लागू है, इस पर निजी क्षेत्र के प्रशिक्षण केंद्रों में अमल करने और उन्‍हें जरूरी छात्रवृत्तियां देने की जरूरत है, ताकि अधिकाधिक दलि-आदिवासी युवा पत्रकार प्रशिक्षित होकर निकलें और मीडिया संस्‍थानों के अंदरूनी जनतंत्र को मजबूत करें।

वस्‍तुतः आवश्‍यकता इन सभी प्रयासों पर एकसाथ अमल करने की है। तभी चौथे खंभे की कालिमा साफ की जा सकती है, तभी समाज के एक बड़े हिस्‍से का असंतोष कम हो पाएगा और उनकी अकथ कथाओं को वाणी मिल पाएगी और तभी मीडिया खुद को समताधर्मी, समावेशी और जनतांत्रिक मूल्‍यों का पोषक कह पाएगा।


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