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लेख

जिंदा इतिहास लिखने वाली स्वेतलाना
शिवप्रसाद जोशी


बेलारूस की 67 वर्षीया स्वेतलाना अलेक्सियाविच कथाकार से पहले एक पत्रकार हैं। उन्होंने अपनी पत्रकारिता को साहित्य से कुछ ऐसा जोड़ा, जैसा लातिन अमेरिकी कथाकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस और लातिन अमेरिका के ही एक और बड़े लेखक पत्रकार एदुआर्दो गेलियानो ने। इस लिहाज से स्वेतलाना पारंपरिक यूरोपीय लेखन शैली से अलग नजर आती हैं। उन्होंने एक खुरदुरी भाषा बनाई है और कहने का ऐसा ढंग विकसित किया है जिसके कुछ नजारे हम गेलियानो के लेखन में देख सकते हैं। उनका गद्य बेहद तीक्ष्ण, गतिशील लेकिन ठंडे, निर्विकार अंदाज में चीजों और घटनाओं की पड़ताल करता है और उनके निष्कर्ष किसी लेखकीय चमत्कार से नहीं आते। वे उन वृत्तांतों, संस्मरणों और टिप्पणियों से सीधे आते हैं जिनके जरिए स्वेतलाना दर्द, यातना और शोषण का कथानक बुनती हैं।

स्वेतलाना ने पत्रकारिता और साहित्य में अपनी एक अलग विधा विकसित की है। मनुष्य की तकलीफों के ब्यौरे उन्हीं की जुबानी। 'चेर्नोबिल की आवाजें' इस विधा की एक अद्भुत मिसाल है। वहाँ नाटकीयता और संदर्भ नहीं हैं। आवाजें ही संदर्भ हैं। अप्रैल 1986 का चेर्नोबिल कांड याद आते ही हमारे सामने 1984 के भोपाल गैस कांड की स्मृति आ जाती है। 80 के दशक की ये दोनों बड़ी दुर्घटनाएँ दो साल के अंतराल में घटित हुई थीं। स्थानीय लोग और पूरा विश्व स्तब्ध रह गया था और लगने लगा था कि बीसवीं शताब्दी मुनाफों, बदइंतजामियों और सामाजिक भावना से विरत कॉरपोरेटी मंशाओं से निकली इन्हीं असामयिक, अचानक दुर्घटनाओं के हवाले होगी और इक्कीसवीं सदी नए किस्म की और बड़ी दुर्घटनाओं का सामना करेगी। आज यही हो रहा है। पर्यावरण से लेकर समाज तक पूरा विश्व अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग भूगोलों में एक भीषण उत्पात से घिरा है। कौमें पहले से ज्यादा वलनरेबल और असहाय हुई हैं, जबकि चेर्नोबिल जैसी घटनाओं से कोई सबक लिया गया होगा, ऐसा लगता नहीं है। निवेशों और साझेदारियों में होड़, लालच और मुनाफा इतना केंद्रीय हो गया है कि कोई नहीं बता सकता कि हम पर अगले पल कौन सी आफत टूट पड़ेगी।

दुर्घटनाएँ अलग-अलग रूपों में अलग-अलग दबोच रही हैं। इराक की बर्बादी से लेकर, सीरिया की तबाही तक, अफ्रीका में जारी खूँरेजी, आर्थिक हलचलें, यूनान की बदहाली, बड़े देशों का शोर और कुछ कम बड़े देशों की इलाकाई दबंगई। जैसे सब लोग एक साथ सर्वोच्च स्थिति में पहुँच जाना चाहते हैं - अपने समाज, अपने मुल्क, अपनी संस्कृति और अपने पर्यावरण से बेपरवाह। भारत को ही लें तो विश्व शक्ति बनने की उसकी लालसा जोर मारती है लेकिन ऊपर की ओर इसका धक्का कितना बनावटी और सुनियोजित है, यह कभी पता नहीं चल पाता है। स्वेतलाना इसी खुराफात, उधेड़बुन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव को रेखांकित करती हुई लिखती रही हैं।

सोवियत दौर में गोर्बाच्योव काल की राजनीतिक और सामाजिक बदहालियों के बारे में हम नहीं जान पाते, अगर चेर्नोबिल जैसे जघन्य कांड पर स्वेतलाना का लिखा दस्तावेज हमें न मिलता। ऐसी महागाथा लिखने के लिए अनथक श्रम ही नहीं एक गहरी मानवीय और नैतिक दृष्टि भी चाहिए। स्वेतलाना में दोनों हैं। हैरानी होती है कि चेर्नोबिल को किसी तरह दबाने-छिपाने की जुगत करती गोर्बाच्योव के नेतृत्व वाली सोवियत सत्ता कैसे अगले चार साल में सब कुछ ढहाकर, गिराकर ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका की आड़ लेकर विश्व पूँजीवाद की शरण में पहुँची और मिट गई।

सत्ताएँ अपनी गलतियाँ कभी कबूल नहीं करतीं, उन्हें सुधारने की तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जाती। फिर उनकी क्षुद्रताओं पर कौन बोलेगा, कौन उँगली रखेगा? यह काम बुद्धिजीवियों, लेखकों और आंदोलनकारियों का है। स्वेतलाना का लेखन हमें इस बात की ताकीद करता है। शायद यही भरोसा है जो अमेरिका में नोम चॉम्स्की से लेकर भारत में अरुंधति रॉय तक कायम है और इसी संघर्ष के प्रकाश में लोग लिख रहे हैं, बोल रहे हैं और जान तक गँवा रहे हैं। स्वेतलाना को मिला नोबेल इस भावना का सम्मान है।

पहली नजर में लग सकता है कि रूस को आँख दिखाने या उसे चिढ़ाने के लिए ऐन उसकी नाक के नीचे, कल तक उसका ही एक हिस्सा रहे बेलारूस के एक लेखक, और वो भी महिला को नोबेल दिया जा रहा है। लेकिन ऐसा सोचना सतही होगा। इसे हमें नोबेल चयन समिति की सदाशयता की तरह लेना चाहिए कि देर से ही सही, पर उसने एक्टिविस्ट के तौर पर लेखक की भूमिका को सलाम किया क्योंकि ये दोनों अलग-अलग चीजें नहीं हैं।

एक सच्चा लेखक अपने समाज का एक्टिविस्ट ही होता है। वह सिर्फ अपने एकांत में कहानियाँ या कविताएँ ही नहीं रचता। वह अपने समाज में जाता है, तंग कर देने वाले तथ्यों को सहेजता है और वृत्तांत के जरिए ऐसी बड़ी गाथा का सृजन कर देता है जो न सिर्फ उस समय में बल्कि आने वाले वक्तों में भी एक साहित्यिक उपलब्धि की तरह नजर आने लगती है। स्वेतलाना ने दूसरे विश्व युद्ध की तबाहियों को स्त्रियों के हवाले से अपनी रचनाओं में पेश किया। अपने देश बेलारूस के शहर चेर्नोबिल की कभी न भुलाई जा सकने वाली घटना का किस्सा कुछ यूँ दर्ज किया कि बिना इस तफसील को पढ़े चेर्नोबिल के मर्म को हम और आने वाली पीढ़ियाँ समझ ही नहीं सकेंगी।


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हिंदी समय में शिवप्रसाद जोशी की रचनाएँ



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