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लघुकथाएँ

आँकड़ा-गैंग
दीपक मशाल


कपिल को हमेशा ऐसा लगता कि उसके टीचर अँग्रेजी कविताओं का जो भावार्थ बता रहे हैं वह वैसा नहीं जैसा होना चाहिए। फिर भी उसकी कुछ कहने की हिम्मत न पड़ती। लेकिन जब से वह अपने टीचर से ट्यूशन भी पढने लगा, तब से थोड़ा उनके मुँह लगने लगा था। एक दिन ट्यूशन में टीचर जब अर्थ लिखा रहे थे तो उसने टोक दिया -

- सर क्या आप श्योर हैं कि पोएट ने भी यही सोचकर कविता लिखी होगी जो भावार्थ आप बता रहे हैं?

- क्यों, तुम बड़के कवि हो का? जब ये लिखी गई थी तब न हम पैदा हुए थे न तुम्हारे पिता जी। जो हम लिखा रहे हैं, सब वही लिखाते हैं।

- लेकिन सर, इसके दूसरे अर्थ भी तो निकलते हैं

- चुपचाप यही उतार लो कॉपी में और इम्तिहान में यही लिखना वरना फेल होने से कोई नहीं बचा पाएगा।

कपिल ने मन में ही कुछ गणना की, फेल शब्द का डर उसके दिमाग पर तारी हो गया था। उससे बचने के लिए वह कल्पना के घोड़े से उतरा और खुद को रोबोट के ढाँचे में बंद कर लिया।


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हिंदी समय में दीपक मशाल की रचनाएँ