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लघुकथाएँ

पहचान
दीपक मशाल


तय शिड्यूल के हिसाब से आज उसका पीठ और पैरों की एक्सरसाइज करने का दिन था। समय बचाने की मंशा से जिम पहुँचकर उसने ट्रेडमिल पर दौड़ पूरी होते ही पीठ की एक्सरसाइज वाली मशीन की तरफ नजर दौड़ाना शुरू किया, किस्मत कि मशीन खाली थी। इससे पहले की कोई और उसपर कब्जा जमाता उसने लगभग भागकर वह मशीन अपने आधिपत्य में ले ली। अभी दो सेट भी पूरे नहीं हो पाए थे कि उसने एक स्थानीय गोरे लड़के को मशीन के बाजू में अपनी पानी की बोतल के पास कुछ रखते देखा।

'आ गया, इस मशीन पर नंबर लगाने' उसने मन में सोचा।

यूँ तो वह दो सेटों के बीच में मशीन से हटकर थोड़ा टहल लेता था लेकिन अभी उसे आपात स्थिति महसूस हुई और वह अपनी जगह पर जमा रहा। उस लड़के की तरफ देखना भी गँवारा न समझा, क्या पता वह साथ में ही, एक-एक करके मशीन इस्तेमाल करने का आग्रह करने लगे। वह बेवजह समय खराब नहीं करना चाहता था।

जब उसका चौथा सेट पूरा हो गया तभी उसने मशीन छोड़ी और फिर उस लड़के की तरफ देखा। मगर लड़का तब तक जा चुका था, जब उसने पानी की बोतल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तब एहसास किया कि जिसे वह मशीन इस्तेमाल करने को आया समझ रहा था असल में वह उसका पहचान पत्र वापस देने आया था, जो वह ट्रेडमिल पर दौड़ते वक्त वहाँ गिरा आया था।

सामने लगे आईने में उसने अपना चेहरा देखना चाहा पर खुद से नजर न मिला पाया।


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