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लघुकथाएँ

खबर के रास्ते में
दीपक मशाल


'नया दौर' से काफी आगे का नया दौर आ चुका था। इतना कि लोगों में एक वर्गीकरण दृष्टव्य उम्र के अंतर का भी आ गया था। कुछ लोग चालीस की उम्र में भी पैंतीस नजर आते थे तो कई अभी भी ऐसे थे जो चालीस में पैंतालीस या अधिक दिखते थे।

चुपके से सही मगर कम दिखने की होड़ इनसानन को उसकी लकीर से खिसका दे रही थी।

समाचार में दिखाया जा रहा था कि इसी तरह की कुछ नई-पुरानी होड़ों में शामिल होने के उपक्रम में एक 'हवलदार जो हद से आगे चला गया था, पकड़ा गया'। कई घर, जमीन-जायदाद, रुपिया-पैसा जोड़ लिए थे उसने, तनख्वाह से बहुत अधिक। अनुभवों से जानता था कि सामने आई है तो यह बात कम से कम दो-चार दिन का मसाला हो जानी है।

पंसारी से कुछ सामान खरीदने निकला तो चौराहे पर भीड़ देखी, पता चला कि करीब की गली में रहने वाला कोई अफसर भी ऐसी ही दौड़ में शामिल मिला। जाँच दल काफी देर से घर में घुसा हुआ था। लोग, जो रामभरोसे जीते थे, दबी जुबान से मन की बात कह रहे थे

- 'खबर' न बने इसकी कोशिशें चल रही हैं।

तनिक दूरी पर खड़े दो संविधान भरोसे सिपाही भी आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा - मोटी खाल है, जल्दी सब नहीं उगलेगा।

इस बात के मायने खोजता घर पहुँचा, देखा कि बाहर जाते हुए टी.वी. बंद करना भूल गया था। नए दौर में कहीं से पुराना विज्ञापन चल निकला -

- जी आपकी त्वचा से तो आपकी उम्र का पता ही नहीं चलता।


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