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कविता

असफल आदमी
विशाल श्रीवास्तव


बिल्कुल अलग नहीं होते हैं असफल आदमी
वे इस अद्भुत समय में
कोहरे और धुएँ से एकदम निर्विकार
शोर और संगीत में एक से तल्लीन
साधारण आदमियों की तरह ही रहते हैं
 
वे प्रायः बड़े व्यस्त रहते हैं
जब उनके पास करने को कोई खास काम नहीं होता
एक ऐसे शहर में
जहाँ लगभग हर आदमी इन्हें जानता है
वे पहचान के हर आदमी से भरसक बचते हैं
मजबूरी में मुस्कराते हैं अपने समूचे कौशल से
इस तरह वे दबाते हैं भीतर के
बासी पड़ चुके पुराने दर्द को
जो उनके अँधेरे कमरे के परदे की चुन्नटों
और एक मरे हुए बिस्तर की उदास सिलवटों में 
लगभग एक साथ बसता है
 
कितना खुश दिखते हैं वे
अपने अवसाद को परतों में छिपाते हुए
यह एक निर्दोष बच्चे का हर्ष है
जो अपने खिलौने छिपाना जानता है
बड़ी मौज में रहते हैं असफल आदमी
वे बड़े भोलेपन से सबकी खुशियाँ मनाते हैं
पूरी सजलता से शामिल होते हैं सबके दुख में
और ऐसा करते हुए वे किसी
उदास और असहाय ईश्वर की तरह लगते हैं
जो स्वयं को सघन शोक से 
माँजता जा रहा है लगातार
 
इस युग के सबसे कठिन आश्चर्य हैं 
असफल आदमी
अपने सबसे मुश्किल दिनों में
अपरिमित निष्ठा के साथ जीवित
 

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