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कविता

अयोध्या
विशाल श्रीवास्तव


बढ़िया स्वच्छ पानी वाला नयाघाट
हम पुल से उछालते सिक्के उसमें
तमाम कामनाएँ करते हुए 
कूदते छप्प-छप्प बच्चे मल्लाहों के सत्वर
कुछ बच्चे बेचते आटे की गोलियाँ सुंदर
जिन्हें फेंकते ही मछलियाँ झपटतीं पानी से बाहर
सूरज होता हुआ मद्धिम डूबने को आतुर
बढ़िया स्वर्णाभ पानी 
काश इतनी ही होती अयोध्या 
 
टेढ़ी बाजार के वे समोसे अद्भुत
बूद्धू किसने नहीं चखा उन्हें 
वह वत्सल पंचर मैकेनिक
मदद करता हमारी किशोर साइकिलों की
चैराहे पर रहते डॉक्टर साहब 
जो दिन भर किया करते शायरी
दूर गाँवों से आते लोग फसल काटने के बाद
देखने विराट मेले अयोध्याी में
हम खाते गन्ने और सिंघाड़े कार्तिक की धूप में
इतनी ही होती अयोध्या तो क्या कम होती
 
क्या ही अच्छा होता यह एक मंद जगह होती
जिसमें हम उसी तरह रहते जैसे
तमाम धीमे कस्बों में रहा करते हैं लोग
जहाँ की लड़कियों से हम बेधड़क प्यार करते
जहाँ एक रंगीन सिनेमाघर होता
जहाँ पुलिस वालों से थोड़ा अधिक आम लोग रहते
 
अब तो गणित की कक्षा की तरह 
शांत रहती है अयोध्या
यहाँ शोर मचाना बिल्कुल मना है
 

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