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संस्मरण

अविस्मरणीय मुद्रा जी
कँवल भारती


'जाने वाले लौटकर नहीं आते, जाने वालों की याद आती है।' मेरे ही शहर के मशहूर शाइर दिवाकर राही का यह मकबूल शेर आज मुद्राराक्षस के निधन पर रह-रहकर याद आ रहा है। सचमुच मुद्रा जी लौटकर नहीं आएँगे, पर उनकी याद हमेशा आएगी। जब भी लखनऊ जाना होगा, उनकी याद आएगी और एक सूनापन महसूस होगा।

मुद्रा जी को पढ़ते हुए उनसे मिलने की इच्छा होती थी, पर उनके घर का कोई पता-ठिकाना मेरे पास नहीं था। उस समय तक लखनऊ में मेरा किसी भी लेखक से खास परिचय नहीं हुआ था। एक दारापुरी जी से जरूर परिचय हो गया था, जिनसे कभी-कभार उनके इंदिरा भवन स्थित ऑफिस में जाकर मिल भी लेता था। मैं संभवतः सुल्तानपुर में तैनात था। मैं वहाँ से अपने निजी या सरकारी कार्य से विभाग के मुख्यालय में आता रहता था। मुख्यालय प्रागनारायण मार्ग पर कल्याण भवन में था। चारबाग से आते हुए मैं अक्सर जीपीओ, नरही, सिकंदर बाग और गोखले मार्ग के रास्तों पर नजर रखता था कि शायद फ्रेंच कट दाढ़ी में कोई व्यक्ति नजर आ जाए, और वह मुद्रा जी हों। अखबारों में उनके लेख के साथ जो फोटो छपता था, उसमें उनकी फ्रेंच कट दाढ़ी होती थी, इसलिए उनका यही चित्र मेरे दिमाग में बसा हुआ था। एक बार गोखले मार्ग से ही एक फ्रेंच कट दाढ़ी वाला व्यक्ति विक्रम में चढ़ा, तो मैं बहुत देर तक उस व्यक्ति को देखता रहा और समझने की कोशिश करता रहा कि क्या यही मुद्रा जी हैं। पर वह नहीं थे, वह शरीर से भी भारी थे। एक बार अमीनाबाद के इलाके में भी मैं इसी पागलपन के साथ मुद्रा जी से अचानक मिलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इस तरह से कोई चमत्कार कभी नहीं हुआ, पर जब सालों बाद हकीकत में उनके घर जाना हुआ, तो पता चला कि वह तो सचमुच अमीनाबाद के ही करीब थे। लेकिन यह उनसे मेरी पहली मुलाकात नहीं थी, अलबत्ता उनके घर पहली बार ही जाना हुआ था।

मुद्राजी से मेरी पहली मुलाकात काफी देर से हुई थी। वर्ष ठीक से याद नहीं है। शायद वह 2000 या उससे पहले का कोई वर्ष हो सकता है, जब कथाक्रम के किसी आयोजन में मैंने पहली दफा उनको देखा और सुना था। वर्ण व्यवस्था, वेद, उपनिषद, कौत्स, मनु और प्रेमचंद आदि पर उनका व्याख्यान विचारोत्तेजक था। मैंने देखा कि अपनी टिप्पणियों से दलित विमर्श को उरूज पर पहुँचा देने वाले गैर दलित वक्ताओं में वही एकमात्र वक्ता थे। रात को खाने से पूर्व वहाँ व्हिस्की और बीयर पीने की व्यवस्था थी। कुछ अपवादों को छोड़कर, जिनमें अदम गोंडवी और एक-दो महिलाएँ थीं, सभी पी रहे थे। सच्ची कहूँ तो इस तरह के माहौल से मेरा वास्ता पहली दफा पड़ा था। अपनी जन्मजात हीनता की ग्रंथि के कारण मैं उस माहौल में स्वयं को अनफिट सा महसूस कर रहा था। मुझे तब पीने का शऊर भी असल में नहीं था। साल में कभी-कभार कुछ देशी पीने वालों के साथ जरूर बैठ जाता था, एकाध गिलास आँख मींचकर हलक में उतार भी लेता था। पर यहाँ पूरा बार ही सजा हुआ था। मैंने व्हिस्की का एक गिलास उठाया और उसमें पानी की जगह बीयर डालने के लिए जैसे ही बोतल उठाई, शैलेंद्र जी ने तुरंत टोक दिया, 'अरे, न... न...! व्हिस्की में बीयर नहीं डाली जाती।' और मैं, जो अपनी हीनता-ग्रंथि से पहले से ही ग्रस्त था, झेंपकर रह गया था। दो-तीन पैग पीने के बाद काशीनाथ सिंह, राजेंद्र यादव और श्रीलाल शुक्ल के बीच जो 'नानवेज डायलाग' शुरू हुआ, और जिस तरह काशीनाथ सिंह ने मुद्राजी की चाँद बजाई और जिस तरह श्रीलाल शुक्ल आज की प्रख्यात, और तब की उदीयमान कथा लेखिका से बार-बार गले मिलने की स्थिति में पहुँच रहे थे, और किस तरह शशिभूषण द्विवेदी एक ग्लैमरस युवा लेखिका पर बाग-बाग हुए जा रहे थे, यह सब देखना मेरे लिए सचमुच एक नया अनुभव था। लेकिन मुद्राजी इस फूहड़पन का अपनी मुस्कान के साथ आनंद ले रहे थे। अपनी चाँद बजाए जाने पर भी वह मुस्करा ही रहे थे। पीना उनकी कमजोरी थी, पर बहकना उनकी आदत में शुमार नहीं था।

इस पहली मुलाकात में उनसे कुछ खास बातचीत नहीं हो सकी थी। हाँ, उनका टेलीफोन नंबर और घर का पता मैंने जरूर ले लिया था। अब मैं फोन पर उनसे बात कर लेता था। बहुत से विषयों पर उनसे चर्चा भी फोन पर हो जाती थी। मेरा लखनऊ आना लगा ही रहता था, जब भी आता और मेरे पास समय रहता तो मैं राजेंद्र नगर में राजवैद्य माताप्रसाद सागर से जरूर मिलता था। लखनऊ में गर्दिश के दिनों में मेरे शरणदाताओं में भी वह प्रमुख थे। एक दिन वैद्य जी से ही मैंने दुर्विजयगंज का रास्ता पूछा, तो बोले, रानीगंज के चौराहे से बाएँ मुड़ जाना, सीधे उनके घर पर ही पहुँच जाओगे। और, सचमुच, मैं उसी रास्ते से मुद्रा जी के घर पहुँच गया। उन दिनों मोबाइल फोन नहीं था, और लैंडलाइन फोन वैद्य जी के घर पर भी नहीं था, इसलिए उन्हें पूर्व सूचना देने या उनसे समय लेने का अवसर नहीं था। मैंने घर के बाहर लगी घंटी बजाई। खिड़की में से एक युवा चेहरा नजर आया, पूछा, कौन? मैंने अपना परिचय दिया, और कुछ क्षण बाद दाहिनी तरफ के एक कमरे में मुझे बैठा दिया गया। कमरा बहुत साधारण था। दीवाल पर एक चित्र टँगा था, जिसमें दो विपरीतलिंगी छोटे बच्चे आपस में किस कर रहे थे। एकाध पेंटिंग भी थी। बैठने के लिए कुछ कुर्सियाँ और बीच में एक मेज थी। वह किधर से भी स्टडी रूम नहीं था, इसलिए कि उसमें कुछ किताबें आदि नहीं थीं। उसी समय मुद्रा जी ने कमरे में प्रवेश किया, कैसे हो कँवल?

मैंने कहा, 'जी ठीक हूँ।'

फिर बोले, 'अरे तुम तो मेरे प्रिय लेखक हो, सारे दलित लेखकों में।'

'यह तो आपका बड़प्पन है।' मैंने कहा था।

मैंने कहा, मैंने सुना है कि हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष के लिए आपका नाम गया है। सुनकर उपेक्षा से बोले, 'मैं अगर जाऊँगा, तो नाटक अकादमी में जाऊँगा, इस वाहियात जगह क्यों जाऊँगा?'

इसके बाद दलित राजनीति पर चर्चा छिड़ गई। वह चर्चा अंबेडकर के पूना पैक्ट और भगत सिंह से होती हुई आज के कम्युनिस्टों तक चली गई। उन्होंने कांशीराम को बहुजन नायक माना, पर मायावती की तीखी आलोचना की। उन्होंने भारतीय इतिहासकारों, खासकर कम्युनिस्ट इतिहासकारों की भी आलोचना की, जिन्होंने उस संपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की उपेक्षा की, जो फुले और अंबेडकर ने बहुजनों की मुक्ति के लिए लड़ा था। उनका कहना था कि इतिहास के इतने महत्वपूर्ण पक्ष को नकारने का एक ही मतलब है कि ये सारे कम्युनिस्ट लेखक अपनी मानसिकता में ब्राह्मणवादी थे। उनके विचारों को सुनते हुए समय का पता ही नहीं चला, घड़ी देखी, तो एक घंटा होने वाला था। उसी समय मैंने उनसे विदा ली।

इसके बाद तो उनसे मिलने के अनगिनत अवसर मिले। कई बार तो कथाक्रम के ही आयोजनों में मिलना हुआ। कथाक्रम 2014 के आयोजन में वे अस्वस्थ चल रहे थे, स्वयं से न खड़े हो सकते थे, और न चल सकते थे। लेकिन इसके बावजूद वे उसमें शामिल हुए थे। उन्होंने अपने वक्तव्य के आरंभ में जो कहा था, वह बहुत मार्मिक है - "मैं जब यहाँ आने के लिए तैयार हुआ, तो पोती बोली, आप को जो बोलना है, उसे बोल दीजिए, मैं लिख देती हूँ। उसे वहाँ भिजवा दीजिए, वहाँ कोई पढ़ देगा। मैंने कहा, नहीं! वहाँ जाने का मतलब सिर्फ बोलना ही नहीं है, लोगों को सुनना और लोगों से मिलना-जुलना भी होता है। और, मैं चला आया।' सभागार में तालियाँ बजीं, और बजनी ही चाहिए थीं, क्योंकि उन्होंने साहित्यिक आयोजनों के महत्व और उनकी अर्थवत्ता को रेखांकित किया था।

उनके साथ उसी अवसर की एक तस्वीर मेरे मोबाइल में कैद है, जिसमें सभागार में अग्रिम पंक्ति में वे मेरे साथ बैठे हुए हैं। इस तस्वीर को एक लेखक मित्र ने अपने मोबाइल से खींचकर मुझे मेल किया था। उस मित्र का नाम अब याद नहीं आ रहा है। जब हम बैठे थे, तो उन्हें पेशाब लगा। मुझसे बोले, 'वह कहाँ है, जो मेरे साथ आया था? मैंने कहा, मैं नहीं जानता, पर आप मुझे बताइए, क्या करना है?' उन्होंने कहा, 'बाथरूम जाना है।' मैंने तुरंत उन्हें उठाया, और उनका हाथ पकड़कर उन्हें टायलेट ले गया। उस समय मैंने जाना कि रोग और बुढ़ापा आदमी को कितना बेबस बना देता है!

अंतिम बार मेरा उनसे मिलना 23 अगस्त 2015 को राय उमानाथ बली प्रेक्षागार, लखनऊ में हुआ था, जहाँ वे भगवानस्वरूप कटियार द्वारा संपादित 'रामस्वरूप वर्मा समग्र' के लोकार्पण के आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में आए थे। संयोग से वहाँ भी मुझे उनके ही साथ बैठने का सुयोग मिला था। उस समय उनका स्वास्थ्य मुझे पहले से भी ज्यादा खराब लग रहा था। उन्हें तब बोलने में भी कठिनाई हो रही थी। लेकिन इसके बावजूद वे वहाँ रामस्वरूप वर्मा के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए आए थे। उनका यही गुण हम जैसे लोगों को, जो थोड़ी सी तकलीफ में भी आराम करना पसंद करते हैं, बहुत प्रेरणा देता है। इस अवसर पर मुद्रा जी ने रामस्वरूप वर्मा के बारे में बोलते हुए कुछ बेबाक टिप्पणियाँ कीं थीं, जिन पर चर्चा बेहद जरूरी थी, पर हुई नहीं। उन्होंने कहा था - वह अपने दौर के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ दलित-पिछड़ी जातियों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ जगाने का काम किया। उस दौर में उन्होंने जिस अर्जक वैचारिकी को स्थापित करने का आंदोलन खड़ा किया, वह आगे स्थिर नहीं रह सका, क्यों? जिस विचारधारा की आज सबसे ज्यादा जरूरत है, वह उन्होंने दी, पर वह जीवित क्यों नहीं रही? कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार स्वयं वर्मा जी भी थे।' लेकिन इस बात को वे खुलकर नहीं कह सके थे। इसका कारण या तो उनकी अस्वस्थता थी या फिर वे रामस्वरूप वर्मा के भक्तों को नाराज नहीं करना चाहते थे, जिनका आचरण उनकी वैचारिकी के ठीक विपरीत था। कार्यक्रम के बाद मैंने अपनी शंका उन पर प्रकट की, तो उनका दर्द छलक आया था। मुद्रा जी इस बात को लेकर दुखी थे कि दलित-पिछड़ी जातियाँ उसी ब्राह्मणवाद को अपने कंधों पर ढो रही हैं, जिसका आजीवन विरोध वर्मा जी ने किया था।

मुद्रा जी से एक अचानक मुलाकात इलाहाबाद में लालबहादुर वर्मा जी के आवास पर हुई थी, जिसका वर्ष याद नहीं आ रहा है, पर, वह इक्कीसवीं सदी का आरंभिक वर्ष हो सकता है। वह मुलाकात दो मायने में महत्वपूर्ण थी, एक, इसलिए कि वहीं पहली दफा सुभाष गताड़े, विकास राय और रवींद्र कालिया से मिलना हुआ था, और दो, इसलिए कि मुझे मुद्रा जी और कालिया जी के बीच चल रही बातचीत में, जिसमें वे अपनी अंतरंग यादें साझा कर रहे थे, मुझे साक्षी बनने का अवसर मिला था। उनकी वे सादें बहुत दिलचस्प थीं, इसलिए बीच-बीच में हँसी के ठहाके भी लग रहे थे। वहाँ हम सभी समान विचारधारा के लोग थे, पर इसके बावजूद, मुद्रा जी समकालीन वामपंथ के आलोचक थे। उनकी आलोचना के केंद्र में वह वामपंथ था, जो जाति चेतना से लड़ना नहीं चाहता था। एक प्रसंग में उन्होंने इस विचार को वहाँ भी पूरी शिद्दत से रखा था, जिसे मैं देख रहा था कि विकास जी ने उनके विचार को किसी उदाहरण से आगे बढ़ाया था।

यह वह दौर था, जब मुद्रा जी 'राष्ट्रीय सहारा' में अपने नियमित स्तंभ-लेखन से दलित-पिछड़े वर्गों के हीरो बने हुए थे। वे अंबेडकर और फुले की विचारधारा को अपने लेखन से निरंतर धार दे रहे थे। उन्होंने चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा के रिक्त स्थान को बहुत जल्दी भर दिया था। वे दलित वर्गों के आदर्श बन गए थे, और उस मुकाम पर पहुँच गए थे, जहाँ कोई दलित लेखक भी आज तक नहीं पहुँचा। यह उन्होंने ही हिंदी जगत को बताया था कि अवसर मिलने पर चांडाल जाति में जन्मे रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविख्यात कवि बने, और हेला यानी भंगी जाति में जन्मे बिस्मिल्लाह खान विश्व के मशहूर शहनाई वादक बने। इसलिए यह मामूली घटना नहीं है कि लखनऊ की एक संस्था (विश्व शूद्र सभा) ने उन्हें 'शूद्राचार्य' की उपाधि दी थी। यह गौरव फिर किसी दूसरे लेखक को हासिल नहीं हुआ। यह अलग बात है कि हिंदी जगत में इसकी बहुत तीखी प्रतिक्रिया हुई थी, और वे रातोंरात 'जातिवादी' करार दे दिए गए थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि यही 'जातिवाद' दलित वर्गों को 'उत्तिष्ठित और जागृत' कर रहा था।

वे हिंदी साहित्य के उन आलोचकों में थे, जिन्होंने आलोचना के मठ तोड़े थे, और साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किया था। इसी पुनर्मूल्यांकन में उन्होंने प्रेमचंद को दलित विरोधी कहा था। उन्होंने यहाँ तक कहा कि - "प्रेमचंद आज होते, तो दलित उन्हें जिंदा जला देते। उनके इस विचार की अत्यंत तीखी आलोचना हुई। वीरेंद्र यादव ने उनके विरुद्ध 'तद्भव' में लंबा लेख लिखा। संभवतः उसी समय दिल्ली में दलित साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर ने प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' को जलाने का अभियान शुरू किया था। इस प्रश्न पर मैं मुद्राजी से पूरी तरह सहमत नहीं था, और प्रेमचंद के साहित्य को जलाना तो हद दर्जे की मूर्खता ही थी।

मुद्रा जी का पूर्व नाम चाहे जो रहा हो, और चाहे वे किसी भी वर्ण या जाति के रहे हों, पर बहुजन समाज ने उन्हें अपना आदर्श मान लिया था। यह इसी का परिणाम था कि मऊ की 'चमार समाज परिषद' के मुखिया पी.डी. टंडन ने उन्हें अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया था। यह अधिवेशन 9 अप्रैल 2006 को मऊ में दाढ़ी चक्की, अंबेडकर पार्क में हुआ था। संयोग से विशिष्ट अतिथि के रूप में मैं भी उसमें उपस्थित था। उनके साथ इस मौके की मुलाकात मेरी सबसे यादगार मुलाकात है। लखनऊ से 8 अप्रैल को हम दोनों को एक ही ट्रेन से मऊ नाथभंजन जाना था। यहाँ मैं उनकी सादगी और आम आदमी की प्रवृति का जिक्र करना चाहूँगा, जिसने मुझे बौना बना दिया था। वह गरमी की संध्या थी। प्लेटफार्म पर मैं उनका इंतजार कर रहा था, पर वे कहीं दिखाई नहीं दे तहे थे। ट्रेन आई, और मैं अपने आरक्षित दूसरे दरजे के वातानुकूलित कोच में बैठ गया, तब मैंने उन्हें फोन किया, (उस वक्त तक वे मोबाइल फोन रखने लगे थे), पूछा कि आप कहाँ हैं? उनका जवाब था, 'मैं ट्रेन में हूँ।' मैंने कहा, 'पूरे डिब्बे में मैंने देख लिया, आप यहाँ तो नहीं हैं।' क्योंकि मैं एसी कोच में ही उनके होने की अपेक्षा कर रहा था, और उस ट्रेन में एसी का एक ही डिब्बा था। वे बोले, 'मैं स्लीपर क्लास में हूँ।' मैं सन्न रह गया। उनसे कोच नंबर पूछकर तुरंत उनसे मिलने गया। मैं अपनी बर्थ पर खिड़की के पास बैठे हुए पसीने-पसीने हो रहे थे। मैं स्तब्ध था। इतना महान लेख इस अँधेरे कोच में गरमी में बैठा है। मैंने उनसे एसी कोच में चलने की प्रार्थना की कि 'आप मेरे साथ चलें, मैं सारी व्यवस्था करा दूँगा।' पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। बोले, 'मैं ठीक हूँ।'

'पर क्यों?', मैंने पूछा।

उन्होंने अपने सामने बैठे व्यक्ति की तरफ देखकर कहा, 'इन्हीं को मुझे ले जाने की जिम्मदारी सौंपी गई है। इन्हें इसी श्रेणी के टिकट मिले हैं। अब इन्हीं के साथ जाना है और इन्हीं के साथ आना है।'

दूसरे दिन भोर में ट्रेन मऊ पहुँची। शाम को कार्यक्रम था। हजारों की भीड़ थी, जो मुद्राजी को सुनने आई थी। उस दिन महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म दिवस भी था। मुद्रा जी ने राहुल जी के प्रति अपने उद्गार प्रकट करते हुए वेद, स्मृतियों, पुराणों और अन्य शास्त्रों से हवाले देकर भारतीय समाज व्यवस्था का जो ब्राह्मणवादी चरित्र उजागर किया, उसे जनता ने मंत्रमुग्ध होकर सुना। उनके मुख से इतना धाराप्रवाह और विचारोत्तेजक भाषण सुनना स्वयं मेरे लिए भी नया अनुभव था।

दूसरे दिन रात में संभवतः 9 बजे की ट्रेन से हमें वापिस जाना था। रात के भोजन से निवृत्त होकर हम समय से स्टेशन पहुँच गए थे। लेकिन ट्रेन पाँच घंटे के विलंब से दो बजे के भी बाद आई। प्लेटफार्म पर शायद बिजली नहीं थी, इसलिए पंखे भी नहीं चल रहे थे। विकट गरमी और मच्छरों से बचने के लिए हमने वह पाँच घंटे प्लेटफार्म पर ही, कभी बैठकर, तो कभी टहलते हुए, गुजारे थे। उस रात प्लेटफार्म पर टहलते हुए हमारे बीच बहुत सी साहित्यिक और राजनीतिक बातों के अलावा घर-परिवार की बातें भी हुई थीं। उस समय तक मैं उनकी पुस्तक 'धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ' को पढ़ चुका था। मैंने उनसे पूछा, 'आपकी आर्य-थियरी सबसे अलग है। आपने लिखा है कि भारत में केवल ब्राह्मण बाहर से आया है, और वह यहाँ घुलमिल कर रहने के लिए नहीं आया। इसीलिए उसने अपनी अलगाववादी व्यवस्था स्थापित की और अपनी पृथक पहचान बनाकर रहता है। लेकिन, डॉ. अंबेडकर की थियरी बिल्कुल अलग है। वह आर्य को भारत का ही मूलनिवासी माने हैं। क्या उनसे इतिहास को समझने में भूल हुई थी?' उन्होंने बेहिचक कहा था, 'हाँ, अंबेडकर से भूल हुई थी।'

अप्रैल, 2011 में, मैंने मुद्रा जी को अपनी पुस्तक 'स्वामी अछूतानंदजी 'हरिहर' और हिंदी नवजागरण' भेजी थी। उन्होंने इसकी चर्चा राष्ट्रीय सहारा में 3 जुलाई 2011 के अपने स्तंभ में की। इस समीक्षा को पढ़कर धर्मवीर आग-बबूला हो गए थे, जिसके जवाब में उन्होंने एक लंबा खत मुद्राजी को भेजा था। खैर, मैं उस अंश को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ, जो यह था - 'हिंदी में हाल में एक महत्वपूर्ण दलित विचारक कँवल भारती की एक किताब आई है 'स्वामी अछूतानंद 'हरिहर' और हिंदी नवजागरण'। मगर ज्यादा बड़ी बात यह है कि जहाँ भारतेंदु जैसे लेखक हिंदी में एनलाइटमेंट के अग्रदूत मानकर पूजे जा रहे हैं, वहीं कँवल ने ज्ञानोदय की वास्तविक प्रतिभाओं में से एक अछूतानंद 'हरिहर' के जीवन, कृतित्व और विचारों पर एक व्यवस्थित और गवेषणात्मक किताब लिखी है, जिसमें 'हरिहर' जी का अन्य हिंदी लेखकों और विचारकों से तुलनात्मक अध्ययन है। इस पुस्तक का यह तुलनात्मक भाग चकित करने की हद तक संतुलित और विचार गहन है। इसमें धर्मवीर की तरह दुर्भाषा का नाहक इस्तेमाल नहीं है। कँवल जानते हैं कि आलोचना तभी प्रभावी होती है, जब वह गाली-गलौंच से बचती है।'

एक और अविस्मरणीय घटना है। यह घटना 2005 की है। दलित शोध संस्थान की ओर से रामपुर में एक सेमिनार का आयोजन किया गया था। माता प्रसाद जी की स्वीकृति मिल गई थी, पर संस्थान के अध्यक्ष धीरज शील का मुद्रा जी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। मैंने मुद्राजी को फोन किया और रामपुर में सेमिनार करने की सूचना देते हुए उसमें उन्हें आने का निवेदन किया। उनकी तबीयत तब भी खराब चल रही थी। बोले, 'कँवल! तबीयत ठीक नहीं चल रही है। पर खैर! तुम्हारे शहर में जरूर आऊँगा।' उनकी स्वीकृति मिलते ही मैंने उन्हें एसी द्वितीय श्रेणी के रिटर्न टिकिट भेज दिए। निश्चित तारीख पर वे और माता प्रसाद जी दोनों सुबह ही रामपुर आ गए। पर, दस बजे के बाद से जो आँधी-तूफान और उसके बाद मूसलाधार बारिश शुरु हुई, तो उसने थमने का नाम नहीं लिया। ऐसे में न श्रोता आए, और न सेमिनार हो सका। मुद्रा जी का दोपहर का खाना और पीना धीरज शील के घर पर रखा गया था। आँधी-तूफान और बारिश में उन्हें शहर में भी कहीं ले जाना संभव नहीं था। उसी दिन, उनकी शाम की ट्रेन से वापसी थी, अतः हमने भारी मन से दोनों विभूतियों को विदा किया। मुद्रा जी का मैं आभार ही व्यक्त कर सका था कि अपनी अस्वस्थता में भी उन्होंने मेरा निमंत्रण स्वीकार किया था। ऐसे थे मुद्रा जी।


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