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सिनेमा

बड़ी गर्म हवा है मियाँ, जो उखड़ा नहीं सूख जावेगा : गर्म हवा
विमल चंद्र पांडेय


"वफाओं के बदले जफा कर रिया है, मैं क्या कर रिया हूँ तू क्या कर रिया है", ताँगेवाले के सुनाए गए इसी शेर में एम.एस. सथ्यु की कालजयी फिल्म 'गर्म हवा' का पूरा सार है। यह कहानी है सलीम मिर्ज़ा की जो चमड़े के जूते का एक कारखाना चलाते हैं और अभी हाल ही में भारत पाकिस्तान के हुए बँटवारे के बाद एक-एक करके अपने सभी रिश्तेदारों को पाकिस्तान विदा करते जा रहे हैं लेकिन खुद हिंदुस्तान छोड़ कर जाने के बारे में सोचना तक नहीं चाहते। उन्हें ताँगे से फैक्ट्री छोड़ने वाला उनका ड्राइवर तक समय के इस भयानकपन से परिचित है। सलीम मियाँ कहते हैं, "कैसे हरे भरे दरख्त कट रहे हैं इस हवा में।" तो ताँगे वाला कहता है, "बड़ी गरम हवा है मियाँ बड़ी गरम, जो उखड़ा नहीं सूख जावेगा मियाँ।" मगर सलीम मियाँ उखड़ने को तैयार नहीं भले ही वो सूख जाएँ। धीरे धीरे कई मुसलमान व्यापारी अपने अपने व्यापार छोड़कर पाकिस्तान जा चुके हैं और जा रहे हैं। सलीम मियाँ को बाजार से कर्जा नहीं मिल रहा है क्योंकि वो मुसलमान हैं, उनके पढ़े लिखे बेटे सिकंदर मिर्ज़ा को कहीं नौकरी नहीं मिल रही क्योंकि वो मुसलमान है, उन्हें जासूसी के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया जाता है क्योंकि वे मुसलमान हैं और उनकी हवेली सरकार जब्त कर लेती है क्योंकि वे मुसलमान हैं, ऐसा और भी कदम कदम पर उनके साथ होता है क्योंकि वे मुसलमान हैं लेकिन उनका विश्वास, इसे खुद पर विश्वास कहें, भाग्य पर या अपने देश पर, टूटने का नाम ही नहीं लेता। उनका एक ही मंत्र है, "कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा" लेकिन उनके कहने के अंदाज में धीरे धीरे फर्क महसूस किया जा सकता है। पहली बार वह कहते हैं, "गांधी जी की कुरबानी रायगा नहीं जाएगी, चार दिनों के अंदर-अंदर सब ठीक हो जाएगा।" उनकी आवाज ऊँची होती है जिसमें विश्वास की हनक सुनाई देती है लेकिन जब वह एक दंगे में घायल होकर लौटते हैं तो अजमानी साहब के पूछने पर कहते हैं, "इंशाल्लाह दो-चार दिन में सब ठीक हो जाएगा।" सबसे अति तब होती है जब शादी के नाम पर दो बार छली गई अपनी बेटी के लिए वह कहते हैं, "खुदा जाने इसी में आमना की कोई भलाई हो"। आमना यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाती और आत्महत्या कर लेती है। सलीम मियाँ की हवेली सरकारी कायदों के अनुसार उनके हाथ से निकल कर कराची से आए अजमानी साहब नाम के एक व्यापारी के हाथ में चली जाती है। सलीम मियाँ की माँ अपने बड़े बेटे हलीम मियाँ के साथ ना तो पाकिस्तान जाने को तैयार होती हैं और ना ही हवेली छोड़ने को लेकिन हवेली उन्हें छोड़नी पड़ती है और इस हुटक में उनकी जान तक चली जाती है। जब सलीम मियाँ का परिवार हवेली छोड़ रहा है तो उनकी बूढ़ी माँ का लकड़ी की धरन के नीचे छिपने का दृश्य बहुत शानदार और अद्भुत है। उन्हें गोद में उठा कर हवेली से किराए के कमरे में लाया जाता है जो सलीम मियाँ ने बहुत मुश्किलों के बाद ढूँढ़ा है। कमरा ढूँढ़ते हुए उन्हें ऐसे ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है कि एक मकान में घुसते समय वो पहले ही कह उठते है, "पहले सुन लीजिए, मकान मुझे चाहिए, मेरा नाम सलीम मिर्ज़ा है और मैं एक मुसलमान हूँ, क्या अब भी मैं मकान देख सकता हूँ?" जवाब आता है, "शौक से शौक से, देखिए मिर्ज़ा साहब मुझे किराए से मतलब है आपके मजहब से नहीं।" मिर्ज़ा साहब इस जवाब से सुकून में दिखाई देते है और कहते हैं, "जब से मकान ढूँढ़ रहा हूँ ये जवाब सुनने के लिए कान तरस गए थे।" देश के हालात बिगड़ते जा रहे हैं और सारे मुसलमान देश छोड़ कर जा रहे हैं। मिर्ज़ा जी को कोई कर्ज देने को तैयार नहीं और वह देश छोड़ने को तैयार नहीं। उनके बड़े भाई और उनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गए हैं और वहाँ से खबरें ऐसे आती है कि दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है। देश में मुसलमानों से व्यवहार बद से बदतर होता जा रहा है। यहाँ तक की सलीम मियाँ एक जगह से कर्ज माँगने के बाद खाली हाथ आकर एक ताँगे में बैठते हैं तो ताँगे वाला किराया बताता है दो रुपया। सलीम मियाँ कहते हैं, ये क्या बात हुई? हम तो हमेशा आठ आने देते हैं।" इस पर ताँगे वाला घुड़कता है, "तुम्हारा टाइम खत्म हुआ, आठ आने में जाना है तो पाकिस्तान जाओ।" दुर्भाग्य की बात है कि यह मनःस्थिति इस फिल्म के बनने के लगभग 35 सालों बाद आज भी रत्ती भर भी नहीं बदली है। सलीम मियाँ के मकान खोजने का दृश्य हर शहर में हर समय दोहराया जा रहा है और अब ऐसे मकानमालिक भी नहीं मिलते जो ये कहें की मुझे किराए से मतलब है मजहब से नहीं। ताँगेवाले का सलीम मियाँ को पाकिस्तान जाने के लिए कहना बहुसंख्यक समाज की उसी मानसिकता का दर्शन है जिसमे आज भी एक वर्ग जी रहा है और ना सिर्फ जी रहा है उसमे पूरी तरह विश्वास करता है और इस विश्वास के प्रसार के लिए बाकायदा अभियान भी चलाता है। मियाँ अपने बड़े बेटे को फैक्ट्री को बचाने के लिए बीवी के गहने ले जाता देख गुस्सा होते हैं और उसे गहने वापस करने का हुक्म देते हैं और इस बार भी उनका सहारा वही है कि उपरवाला सब ठीक करेगा। मिर्ज़ा साहब जूता संघ वालों द्वारा की गई हड़ताल में शामिल नहीं होते क्योंकि यह महीना वह इबादत में गुजारना पसंद करते हैं। अपने छोटे बेटे सिकंदर पर अपनी माँगों के लिए मेमोरेंडम पर दस्तखत करने के लिए वह गुस्सा होते हैं। सिकंदर कहता है कि यह कदम तो परेशानियाँ कम करने के लिए है तो वह उसे ताना भी देते हैं। सिकंदर को कहीं नौकरी नहीं मिल रही और एकाध जगह तो उसे ये सलाहें भी निःशुल्क दी जाती हैं कि उसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए मगर वह इस बात पर कायम है कि हमें पाकिस्तान नहीं भागना चाहिए बल्कि इसी देश में रह कर आम आदमी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने हकों के लिए लड़ना चाहिए और यह बात उसे अपने अब्बा के सामने कहने में भी कोई डर या संकोच नहीं है। लेकिन सलीम मियाँ उसकी बातों से सहमत नहीं। बेटी की आत्महत्या, फैक्ट्री में दंगाइयों द्वारा आग लगा दिए जाने, माँ का हवेली की आस में मर जाने और बड़े बेटे के हार कर वापस चले जाने से सलीम मियाँ टूट चुके हैं। उन्हें जासूस कह कर ताने मारे जा रहे हैं और उनके बेटे को कोई मुस्लिम अधिकारी भी नौकरी नहीं दे रहा है क्योंकि उसे डर है कि उसके ऊपर भी जासूसी का इलजाम ना लगा दिया जाए।

1973 में बनी यह फिल्म उस समय से ज्यादा आज प्रासंगिक लगती है और आज के समय में मुसलमानों की कहीं ज्यादा विकृत हो चुकी समस्याओं को बहुत करीने से उठाने की कोशिश करती है। फिल्म एक तरफ तो सलीम मिर्ज़ा के भीतर और बाहर के द्वंद्व को दिखाती है वहीं दूसरी ओर देश में हलीम और सलीम जैसे दो ध्रुवों के बहाने भारतीय मुसलमानों के दो चेहरे खींचती है। हलीम मियाँ जो भाषण में यह कहते हैं कि देश छोड़कर पाकिस्तान जाने वाले वे आखिरी मुसलमान होंगे, पहला मौका मिलते ही पाकिस्तान निकल लेते हैं। दूसरी तरफ सलीम मियाँ हैं जो एक एक करके अपने सभी रिश्तेदारों को पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में बिठा कर आ रहे हैं लेकिन खुद वह इसी मिट्टी में दफन होना चाहते हैं। अपनी बेगम द्वारा देश छोड़ने की बात कहे जाने पर वह कहते है, यह दुनिया छोड़ने का समय है देश छोड़ने का नहीं। यह किसी महानता या महिमामंडन वाली बात नहीं, बात सिर्फ इतनी सी है कि वह यहाँ से नहीं जाना चाहते, इसे और भी कई तरीके से बड़े बड़े लफ्जों में कहा जा सकता है लेकिन इसका अर्थ यही निकलेगा की यह उनकी मर्जी पर निर्भर है की वो जाएँ या ना जाएँ।

फिल्म के कुछ दृश्य बहुत यादगार हैं। जैसे काज़िम मियाँ के आने की उम्मीद छोडती आमना द्वारा शमशाद का हाथ थामने का दृश्य बहुत सुंदर बन पड़ा है और इस दृश्य के बाद जब वह अपने कमरे में जाती है तो काज़िम के पुराने खतों को निकलती है और उन्हें पढ़ती है। पार्श्व में 'ये संग-ए-दर तुम्हारा तोड़ेंगे अपने सर से' कव्वाली बज रही होती है। आमना उन खतों को पढ़ कर मुस्कराती है और धीरे से एक खत फाड़ देती है। खत को फाड़ते कि पार्श्व में बज रही कव्वाली बंद हो जाती है और कागज के फटने की आवाज पूरे कमरे में गूँज जाती है। उन खतों को फाड़कर आमना अपने अतीत के हर पन्ने को फाड़ देना चाहती है लेकिन आखिर में वही अतीत उसका दुश्मन बन कर आ खड़ा होता है। शमशाद की माँ उस पर इलजाम लगाती हैं की उसमें कोई खराबी होगी तभी तो काज़िम ने उसे छोड़ दिया।

फिल्म का अंत बहुत आशावादी है और हमेशा अकेले चलना पसंद करने वाले सलीम मिर्ज़ा वक्त की माँग और एकता की ताकत को समझते हैं। बात यहाँ यह कतई नहीं उठती की इस तरह के आंदोलनों की दशा दिशा क्या होती है या इनका हश्र क्या होता है या इनमे कितनी राजनीति शामिल या बाहर होती है। बात इतनी है कि सलीम मिर्ज़ा देश छोड़ कर पाकिस्तान उसी ताँगे में जा रहे होते हैं कि रास्ते में अपनी माँगों के लिए निकाले एक जुलूस से उनका सामना होता है। वह सिकंदर की मर्जी देखकर उसे जाने की इजाजत दे देते हैं। लोग लाल झंडे लेकर और 'काम पाना हमरा मूल अधिकार है' की तख्तियाँ लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। जुलूस में सिकंदर का एक दोस्त भी है जो ताँगे पर बैठे सिकंदर से पूछता है, कहाँ जा रहे हो तुम लोग?' और आगे बढ़ जाता है। सलीम मियाँ उससे कहते हैं, "जाओ बेटा, अब मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। इनसान कब तक अकेला जी सकता है?" सलीम मियाँ नारे सुनते बैठे रहते हैं और अपने चेहरे पर तेजी से आ जा रहे भावों के बीच अचानक अपनी बेगम से कहते हैं, "मैं भी अकेली जिंदगी की घुटन से तंग आ गया हूँ"। वह भी उस भीड़ में शामिल हो जाते हैं जो अपने हक के लिए प्रदर्शन कर रही है।

इस्मत चुगताई की एक कहानी पर आधारित यह पूरी फिल्म बलराज साहनी की है और उनका अभिनय यहाँ सबसे अधिक ऊँचाई पर खड़ा दिखाई देता है। वह हर फ्रेम में सहज और स्वाभाविक दिखाई दिए हैं। इस फिल्म को क्लासिक बनाने में सभी तत्वों के अलावा बलराज साहनी के अभिनय का सबसे अधिक योगदान है। अपनी बेटी आमना की मौत पर उनका बिना आँसू बहाया सख्त चेहरा बहुत कुछ कह देता है। यह उनकी अंतिम फिल्म थी और फिल्म का संवाद "मैं भी अकेली जिंदगी की घुटन से तंग आ गया हूँ" उनका अंतिम संवाद था पर इस फिल्म की रिलीज देखने के लिए वह जिंदा नहीं रहे। अन्य कलाकारों का भी अभिनय अच्छा है और इसी फिल्म से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को फारुख शेख के रूप में अभिनय का एक नायाब नगीना मिलता है। फिल्म ऑस्कर पुरस्कारों में 1974 में भारत की तरफ से अधिकारिक प्रविष्टि थी और इसे दो फिल्मफेयर और नर्गिस दत्त पुरस्कारों के साथ कांस फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन पाम के लिए नामांकित किया गया था। फिल्म को बनने और रिलीज होने में बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा था और फिर भी यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है की फिल्म सिर्फ 9 लाख रुपये के बजट में बना ली गई थी।


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