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कहानी

डर
विमल चंद्र पांडेय


लड़की कमसिन थी, साँवली थी और डरपोक थी। शरीर का भराव उसे उसकी आयु से अधिक का दिखाता था नहीं तो वैसे वह चौदह पार कर ही रही थी। उसका बाप उसके डर की वजह से अक्सर उसकी उम्र का उलाहना दिया करता था - ‘तेरी उमर में तेरी माँ की शादी हो गई थी और तू चूहों से डरती है।’ कभी प्यार से समझाता - ‘बेटी, गाँव की बिटिहनियाँ मकड़ों और तिलचट्टों से नहीं डरती। ये शहर की छोरियों के नखरे होवे हैं।’

लेकिन लड़की कुछ चीजों से हमेशा डरती रही थी। चूहों से, अँधेरे से, तिलचट्टों से, भूतों से...। फेहरिस्त लंबी थी। इस फेहरिस्त में कुछ ऐसे नाम थे जिनसे वह रोज दो-चार होती थी, मसलन चूहे, तिलचट्टे, मकड़े, अँधेरा...। कुछ ऐसे भी नाम थे जिनसे अब तक उसका सामना नहीं हुआ था मसलन भूत-प्रेत, अजगर, हाजी बाबा...। लेकिन उन चीजों से उसे ज्यादा डर लगता था जिन्हें उसने सुना था, देखा नहीं था बनिस्बत उनके जिन्हें रोज देखती थी।

अजगर की तस्वीर उसने सरपंच की बेटी की किताब में देखी थी। सरपंच की बेटी उसकी सहेली थी और स्कूल भी जाती थी। वह अक्सर अपनी किताबें उसे दिखाया करती थी। वह तस्वीर देखकर सहम गई थी। बाप रे, इतना बड़ा साँप। और जब उसने सुना कि यह साँप काटता नहीं पूरे आदमी को निगल जाता हे तो अजगर कई रातों तक उसके सपने में आकर उसे डराता रहा।

जब बापू ने समझाया कि अजगर बड़े-बड़े जंगलों में होते हैं, इतने छोटे जंगल में नहीं जितने हमारे गाँव में हैं तब लड़की को कुछ राहत मिली थी। लेकिन सबसे बड़ा डर था हाजी बाबा का। कहते थे कब्रिस्तान में हाजी बाबा रात को अपनी कब्र से निकलकर घूमा करता है। लड़की बाबा से इतना डरती थी कि रात को अपनी झोंपड़ी से बाहर भी नहीं निकलती थी।

आज जब अँधेरी रात में उसे उसी रास्ते से जाना पड़ रहा था तो उसकी टाँगें काँप रही थीं। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और कदम जैसे तुरंत मंजिल पर पहुँच जाना चाह रहे थे। दिमाग में हालाँकि डर से अधिक बाप की खून की उल्टियाँ नाच रही थीं, लेकिन कब्रिस्तान तक पहुँचते ही दिमाग से हर बात को निकालकर डर ने कब्जा जमा लिया।

लड़की बहुत तेज कदमों से चलने लगी। वह जल्दी से जल्दी दूसरे गाँव, डॉक्टर के घर पहुँच जाना चाह रही थी। अब तक बाप का इलाज गाँव का वैद्य ही कर रहा था लेकिन खून की उल्टियों के दौरे रुकने की बजाय बढ़ते गए। आज जब दौरा पड़ा तो खून के साथ मांस का टुकड़ा भी आया। उल्टियों ने जब रुकने का नाम न लिया तो वैद्य ने घबराकर दूसरे गाँव से डॉक्टर को बुलाने के लिए लड़की को तुरंत भेजा। घर में बाप बेटी के अलावा कोई तीसरा था भी नहीं जो इतनी रात में तीन मील का रास्ता तय करके डॉक्टर को बुलाने जाता। अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा है। उसे अपने कदमों में किसी और के कदमों की सम्मिलित आवाज सुनाई देने लगी। शरीर के भीतर एक ठंडी लहर उठी और पूरा शरीर एक बार कँपकँपा उठा। कदमों की रफ्तार उसने तेज कर दी। पीछे भी कदमों की आवाज तेज हो गई और ठंडी बयार के बावजूद उसके माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। अभी भी कब्रिस्तान का रास्ता पाँच सौ मीटर बचा था। लड़की जल्दी से जल्दी कब्रिस्तान का रास्ता पार कर जाना चाहती थी लेकिन वह उड़ नहीं सकती थी पीछे घूम कर देखना भी उसके बस में नहीं था। उसे पक्का विश्वास था कि पीछे कब्रिस्तान से निकल कर हाजी बाबा ही आ रहा है।

हवाएँ अलग-अलग पेड़ों के पत्तों से टकराकर अलग-अलग आवाजें निकाल रही थीं। इन आवाजों को भले ही कोई प्रकृति की सुंदरता और मनोहरता मानता हो, लड़की के लिए ये आवाजें उसके डर को कई गुना बढ़ाने वाली थीं। जमीन पर पड़े सूखे पत्तों पर जब उसके कदम पड़ रहे थे तो उनके चरमराने की आवाज ऐसी लग रही थी मानो पत्ते पैरों से कुचले जाने के कारण चीत्कार कर रहे हों।

भय का साम्राज्य लड़की के पूरे वजूद पर हावी हो रहा था। उसने एक गीत गाने की कोशिश की जो उसकी माँ गाया करती थी। दो साल पहले जब माँ मरी तो लड़की को गीत पूरा जबानी याद हो चुका था। मगर फँसी-फँसी आवाज ने विचारों का साथ नहीं दिया। जब गीत की एक पंक्ति लड़की के मुँह से निकली तो रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक निकल गई। लड़की को अपनी ही आवाज बिल्कुल पहचान में नहीं आई और वह उस अजनबी आवाज को सुनकर डर गई। उसके गीत का एक पत्थर सन्नाटे की झील की शांति को भंग कर गया।

लड़की मन ही मन गीत गाने लगी। माँ बहुत अच्छा गाया करती थी। माँ को तो जलाया गया था, उसे दफनाया नहीं गया था, क्या इसीलिए माँ से डर नहीं लगता? दफनाने और जलाने का फर्क उसे कभी समझ में नहीं आया। तौहीद चाचा को तो इसी कब्रिस्तान में दफनाया गया था। यहाँ से गुजरने पर उनका चेहरा याद आना और डर लगना स्वाभाविक ही है। मान लो हाजी बाबा के बारे में तो सिर्फ सुना है पर तौहीद चाचा तो...। अभी तीन महीना पहले तक उसके घर आया करते थे। उसे लगा जला देना ही ठीक है, किसी को भूत बनने का मौका ही न मिले। नहीं तो कब्रिस्तान में रात को अपनी कब्र से निकल कर भूत बन कर...।

तौहीद चाचा का चेहरा याद आ जाने पर लड़की मन में भी गीत गाना भूल गई। कितनी जोर-जोर से ठहाके लगा कर हँसते थे। उसे लगा जैसे वह पीछे पलटी तो तौहीद चाचा उसके ठीक पीछे ठहाके लगाते दिख जाएँगे। वह सिहर उठी। दिमाग में तौहीद चाचा की ठहाकेदार हँसी गूँजने लगी।

दिमाग में एक साथ कई विचार घूम रहे थे लेकिन सभी विचारों को अचानक विराम मिल गया। लड़की के हाथ पर पानी की एक बूँद गिरी। फिर दूसरी... तीसरी... चौथी... टिप... टिप... टिपटिप... टिपटिप...। पानी से बचने के लिए लड़की ने चारों तरफ देखा। इसी बहाने एक झटके में पीछे भी देख लिया। पीछे कोई नहीं था। उसने फिर पीछे देखा। कई बार पीछे देखकर उसने अपने डर पर काबू पाने की पूरी कोशिश की। कब्रिस्तान करीब सौ मीटर पीछे छूट चुका था। शायद भ्रम रहा हो किसी का चलना... या कब्रिस्तान खत्म हो गया इसलिए वह भी वापस...?

बारिश तेज होने लगी। दूसरे गाँव की सीमा शुरू हो चुकी थी। इस गाँव के दूसरे किनारे से सड़क जाती थी, इसलिए यह गाँव कुछ विकसित था। इसमें कई पक्के घर भी थे जिसमें एक शानदार घर उस डॉक्टर का भी था जिसे कई गाँवों से लोग बुलाने आया करते थे। कब्रिस्तान की सीमा समाप्त होने के कुछ देर बाद गाँव शुरू होते थे वरना बीच में सिर्फ खेत ही खेत थे, या फिर एकाध मड़इयाँ या टीन शेड की छतवाले एकाध कमरे जिनमें रात रुककर लोग अपने खेतों की रखवाली करते थे या अपने ट्यूबवेल की मशीनें गाड़ रखी थीं।

एक टीन शेडवाले कमरे में हल्की रोशनी आ रही थी। लड़की तेज कदमों से बारिश से बचती हुई जाकर दरवाजे से सटकर खड़ी हो गई। कुछ दूरी पर गाँव नजर आ रहा था और टिमटिमाती रोशनियाँ भी। लड़की का डर अपने आप को गाँव के नजदीक और कब्रिस्तान से दूर पाकर थोड़ा समाप्त हो चुका था।

छींटें हवा के कारण तिरछी पड़ रही थीं। लड़की के मुँह पर बौछारें पड़ने लगीं। वह थोड़ी पीछे खिसकी। दरवाजा थोड़ा सा खुल गया।

‘आ जा, दरवाजा खुला है। ...जल्दी आ।’ अंदर से एक मर्दाना आवाज आई।

‘जी... मैं।’

‘जी मैं क्या... जल्दी अंदर आ। कब से इंतजार कर रहा हूँ।’

आवाज में कड़कपन और आदेश था। लड़की सहम कर अंदर प्रवेश कर गई। अंदर एक मोटा आदमी चारपाई पर बैठा हुआ था। तिपाई पर बोतल गिलास और नमकीन रखे हुए थे। लड़की ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा। मोमबत्ती सी रोशनी बिखेरता एक पीला बीमार बल्ब आदमी के खतरनाक चेहरे को और भी खतरनाक बना रहा था। ऐसा लगता था उसके चेहरे पर बाल ही बाल हों। लड़की ने उसके चेहरे से नजरें हटा लीं।

‘जी, बाहर पानी बरस रहा था... इसलिए मैं... यहाँ।’

‘इसलिए देर से आई। मैं कब से इंतजार कर रहा हूँ। बारिश आ गई थी तो कयामत आ गई थी क्या...? कमबख्त, सारा नशा उतार दिया... फिर चढ़ाना पड़ेगा ... साली... पैसा इतना ज्यादा लिया और समय का कुछ ख्याल ...।’ आदमी बड़बड़ाता हुआ उठकर गिलास भरने लगा।

‘अब वहाँ खड़ी क्या है? यहाँ आ, चारपाई पर बैठ। माघव तो कह रहा था तू बड़ी मुँहजोर है, मगर मुझे तो लगता है तेरे मुँह में जबान ही नहीं है।’ आदमी गिलास खाली करने लगा।

लड़की ने उसके आदेश का पालन किया और चारपाई पर बैठ गई। वह उसके चेहरे की ओर देखने हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। नजरें नीची कर अपने नाखून कुतरती रही।

थोड़ी देर में आदमी ने दो गिलास खाली कर दिए और जोर की डकार ली। लड़की ने चिंहुककर आदमी के चेहरे की ओर देखा। बाल ही बाल... दाढ़ी़... मूँछें। अगले ही पल लड़की की चीख निकल गई जब उसने वही बाल, दाढी, मूँछें अपने चेहरे से टकराते पाया।

‘क्या हुआ?’ आदमी रुक गया।

‘कु... कुछ नहीं।’ लड़की काँप रही थी।

‘फिर तू चीखी क्यों...?’

‘मुझे गाँव जाना है... बापू को खून की उल्टियाँ... डॉक्टर...।’ लड़की की आवाज के साथ उसका शरीर भी काँप रहा था।

‘हर इनसान की कोई मजबूरी होती है तभी उसे इस काम में...।’ आदमी कुछ सोचते हुए बोला, फिर उसे महसूस हुआ कि एक रात के संबंधों में कोई जुड़ाव नहीं होना चाहिए। वह बात पूरी किए बिना लड़की के चेहरे को फिर से सहलाने लगा।

‘मुझे जाने दो।’ लडकी का पूरा वजूद काँप रहा था।

‘क्यों... क्यों जाने दूँ...? माधव को पैसे दिए हैं। फ्री में नहीं बुलाया तुझे।’ वह झुँझलाने लगा था।

‘क...कौन माधव...? मैं तो बापू के लिए... डॉक्टर को बुलाने जा रही थी कि बारिश होने लगी। खून की... उल्टियाँ हो रही हैं। आज मांस का... टुकड़ा भी आया। वैद्यजी ने बताया कि यह बीमारी...।’ लड़की काँपती और सुबकती आवाज में पूरा इतिहास सुनाने लगी।

‘चुप रह... चुप।’ आदमी ने डपटा। उल्टियों की बात सुनकर उसका जी खराब हो आया था। नशा भी कम होने लगा था।

‘तू झारगाँव की नहीं है ?’

‘नहीं जी... मैं माहपुर की हूँ।’

‘...’

‘जी, मैं जाऊँ?’ लड़की उठ खड़ी हुई।

अब आदमी को सारा माजरा समझ में आ चुका था। लड़की किसी दूसरे गाँव की है। किसी गरीब की बेटी। गलती से यहाँ आ गई है। शराब का नशा सिर पर नाचने लगा। एकदम अनछुई कली जिस पर जवानी ने अभी-अभी आक्रमण किया है। एकदम नादान, एकदम अनजान...। आदमी ने मुस्कराते हुए जोर की अँगड़ाई ली और दरवाजे तक पहुँची लड़की को पकड़कर चारपाई पर गिरा दिया। एक अलग तरह का उत्साह और वहशीपन उस पर हावी हो चुका था।

‘छोड़ो, छोड़ो मुझे... मुझे डॉक्टर के...।’

आदमी अपने पूरे शरीर का बोझ उसके शरीर पर डालकर उसके होंठ चूमने लगा। लड़की को लगा जैसे उसका पूरा वजूद बालों ही बालों से भर गया। उसने आदमी को उठाने के लिए पूरी ताकत लगा दी पर आदमी टस से मस नहीं हुआ।

लड़की को कुछ नहीं सूझा तो उसने अपने नुकीले दाँत आदमी के कंधे में गड़ा दिए... पूरी ताकत से। आदमी तड़पकर एक तरफ हट गया। लड़की फुर्ती से चारपाई से कूदकर दरवाजे की तरफ लपकी। आदमी अपने कंधे को सहला रहा था। दरवाजा खुलने की आवाज सुनकर उसका ध्यान आकृष्ट हुआ। लड़की तब तक बाहर निकल चुकी थी। आदमी एक ही छलाँग में दरवाजे के पास पहुँच गया। लड़की गाँव के उजाले वाले रास्ते की तरफ न भागकर अँधेरेवाले रास्ते की तरफ भाग रही थी। आदमी पल भर के लिए ठिठका फिर उसी अँधेरे कब्रिस्तान वाले रास्ते की तरफ लड़की के पीछे दौड़ पड़ा।

लड़की ने दौड़ते ही अंदाजा लगा लिए था कि वह गलत दिशा में दौड़ रही है, उसे उल्टी तरफ गाँव की ओर जाना चाहिए था लेकिन अब पीछे जाने का मतलब था एक घिनौना और लिजलिजा एहसास जो अभी तक उसे अपनी साँसों में अनुभव हो रहा था। वह दौड़ती रही।

शेर और हिरन की दौड़ में अक्सर हिरन ही जीतता है क्योंकि शेर भोजन के लिए दौड़ता है और हिरन जीवन के लिए। आदमी पूरी ताकत से दौड़ रहा था पर लड़की अब भी आगे थी। अचानक उसका पाँव कहीं टकराया और वह आगे की ओर गिर पड़ी। उसने उठने में थोड़ा ही वक्त लिया पर आदमी इस बीच काफी पास आ चुका था।

सोचने का समय नहीं था। लड़की ने बस क्षणांश के लिए सोचा और कब्रिस्तान में घुस गई। आदमी भी दौड़ता हुआ कब्रिस्तान के गेट में प्रवेश कर गया। लड़की एक कब्र के पीछे सिमटी हुई थी। आदमी कब्र के दूसरी ओर खड़ा था। पानी बरसना कम हो गया था। लड़की का भूतों और कब्रोंवाला डर भी कम हो गया था।

लड़की ने अपनी फूलती साँस को काबू कर लिया। आदमी ने एक बीड़ी सुलगा ली थी और हर कब्र के पीछे लाकर झाँक रहा था। लड़की इस कब्र के पीछे से धीरे से निकली और दूसरी कब्र के पीछे जा छुपी। आदमी जब उसकीवाली कब्र के पास आता तो वह दूसरी कब्र के पीछे जा छुपती। वह कब्रिस्तान और कब्रों से खेलने लगी थी।

आदमी ने अब दिमाग लगाया। वह माचिस जला जला कर हाथ से ओट करके एक कब्र के पास से कई कब्रों को देखने लगा। लड़की की साँस यथास्थान रुक गई। आदमी अब लड़कीवाली कब्र के पास आ चुका था। उसके माचिस जलाने से पहले ही लड़की ने अपने जीवन का सबसे साहसिक निर्णय लिया। वह दबे पाँव उस कब्र से निकली और झुकते-झुकते कब्रिस्तान की सबसे विराट कब्र के पीछे चली गई। उस कब्र के पास मोटे तनेवाला पेड़ भी था जिसकी विशालकाय डालियाँ अजगर की तरह थीं। पेड़ भी उतना ही चर्चित था जितना हाजी बाबा की यह विराट कब्र। दिन में भी उस रास्ते से गुजरनेवाले इस कब्र और पेड़ की ओर देखने में सिहरन महसूस करते थे। लड़की पेड़ और कब्र के बीच की जगह में छुप गई। बारिश बहुत कम हो गई थी। लड़की का डर भी।

आदमी माचिस की तीलियाँ जलाता हुआ उस विराट कब्र के पास आ रहा था। कब्र से थोड़ी दूरी पर उसने तीली जलाई और भक्क से रोशनी में उसकी नजर कब्र के विराट पत्थर पर पड़ी, फिर उस विशाल पेड़ पर। वह घबराकर पीछे हट गया। कब्र और पेड़ से संबंधित सारी कहानियाँ उसे याद आने लगीं। उसने एक बार अपने चारों तरफ देखा। एक ठंडी सिहरन पाँवों से दिमाग तक दौड़ गई। वह डरकर सीधा गेट की तरफ भागा और एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। गेट से निकल कर भी वह सीधा भागता गया... भागता गया... भागता गया।

बारिश एकदम रुक गई थी।


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